Q61. “छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था भी दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से ।” व्याख्या: छायावाद की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को रेखांकित करने वाला यह प्रसिद्ध कथन डॉ. नामवर सिंह का है। उन्होंने अपनी युगांतकारी आलोचनात्मक कृति ‘छायावाद’ में इस आंदोलन को केवल आध्यात्मिक या रूमानी न मानकर, उसे भारत के राष्ट्रीय जागरण, सामंतवाद विरोधी चेतना और विदेशी गुलामी से मुक्ति के संघर्ष से जोड़कर देखा है।
उक्त कथन किस आलोचक का है ?
(a) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी
(b) डॉ. नामवर सिंह
(c) डॉ. नगेन्द्र
(d) डॉ. निर्मला जैन
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Q62. प्रकाशन – वर्ष के अनुसार जयशंकर प्रसाद के नाटकों का निम्नलिखित में से कौन सा अनुक्रम सही है ? व्याख्या: जयशंकर प्रसाद जी के इन ऐतिहासिक नाटकों का सही प्रकाशन वर्ष इस प्रकार है:
(a) राज्यश्री – स्कन्दगुप्त – अजातशत्रु – चंद्रगुप्त
(b) राज्यश्री – अजातशत्रु – चंद्रगुप्त – स्कन्दगुप्त
(c) अजातशत्रु – राज्यश्री – स्कन्दगुप्त – चंद्रगुप्त
(d) राज्यश्री – अजातशत्रु – स्कन्दगुप्त – चंद्रगुप्त
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‘राज्यश्री’ — 1915 ई. (प्रसाद जी का पहला महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नाटक)
‘अजातशत्रु’ — 1922 ई.
‘स्कन्दगुप्त’ — 1928 ई.
‘चंद्रगुप्त’ — 1931 ई.
अतः सही कालानुक्रम विकल्प (d) में दिया गया है। (इनका अंतिम नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ 1933 ई. है)।
Q63. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: व्याख्या: सुप्रसिद्ध इतिहासकार और आलोचक डॉ. बच्चन सिंह ने अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में गजानन माधव मुक्तिबोध का मूल्यांकन करते हुए ये दोनों बातें कही हैं: कथन I सही है: मुक्तिबोध निरंतर अपनी कमियों, समाज के प्रति अपनी जवाबदेही और बौद्धिक द्वंद्व को लेकर आत्ममंथन व आत्म-संघर्ष करते दिखाई देते हैं। कथन II सही है: उनकी कविताओं का ढांचा प्रयोगवादी (नए बिंब, फैंटेसी, प्रतीक) है, लेकिन उनकी चेतना और वैचारिकता प्रगतिवादी (मार्क्सवादी/शोषित वर्ग की चिंता) है। इन दोनों का रासायनिक मिश्रण ही मुक्तिबोध की कविता को विशिष्ट बनाता है।
कथन I. : मुक्तिबोध आत्ममंथन के कवि हैं।
II. : मुक्तिबोध की कविता में प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का रासायनिक मिश्रण है ।
मुक्तिबोध के संदर्भ में डॉ. बच्चन सिंह के कथनों की सत्यता का चयन नीचे दिये गये कूट से कीजिए
कूट :
(a) कथन I और कथन II दोनों सही हैं ।
(b) कथन I और कथन II दोनों गलत हैं ।
(c) कथन I सही है और कथन II गलत है।
(d) कथन I गलत है और कथन II सही है।
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Q64. आदिकालीन साहित्य के अन्तर्गत निम्नलिखित में से कौन-कौन से साहित्य सम्मिलित हैं?
I. सिद्ध साहित्य
II. निर्गुण मार्गी संत साहित्य
III. जैन साहित्य
IV. नाथ साहित्य
V. प्रेममार्गी सूफी साहित्य
नीचे दिए गए कूट की सहायता से सही विकल्प चुनिए :
कूट :
(a) I, III, IV, V
(b) II, III, IV, V
(b) I, III, IV
(d) II, III, IV
व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल और अन्य विद्वानों के अनुसार आदिकाल (वीरगाथा काल) के अंतर्गत मुख्य रूप से निम्नलिखित साहित्य आते हैं:Show Answer/Hide
I. सिद्ध साहित्य (सरहपा, शबरपा आदि)
III. जैन साहित्य (स्वयंभू, देवसेन, पुष्पदंत आदि)
IV. नाथ साहित्य (गोरखनाथ और अन्य नाथ)
इसके अलावा रासो साहित्य और लौकिक साहित्य भी इसमें शामिल हैं। जबकि निर्गुण मार्गी संत साहित्य (II) और प्रेममार्गी सूफी साहित्य (V) दोनों ही भक्तिकाल (पूर्व मध्यकाल) की काव्यधाराएं हैं, आदिकाल की नहीं।
Q65. नीचे दो कथन दिए गए हैं, उन पर विचार कीजिए: व्याख्या: कथन I बिल्कुल सही है: भक्तिकाल के संत कवि कुंभनदास ने कहा था— “संतन को कहा सीकरी सों काम! आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयौ हरि नाम॥” अर्थात वे राज्याश्रय से दूर थे। इसके विपरीत रीतिकालीन कवि राजाओं के दरबारी थे, उनका जीविकोपार्जन और प्रतिष्ठा पूरी तरह राजाओं के आश्रय (सीकरी) पर टिकी थी। बिहारी का दोहा “सरैन एकौ काम” इसी प्रवृत्ति को दिखाता है। कथन II भी सही है: रीतिकालीन कवि कला-कौशल के प्रति पूरी तरह सचेत थे। वे राजाओं को प्रसन्न करने, पुरस्कार (अशर्फियाँ) पाने और अपनी जीविका चलाने के लिए लक्षण-ग्रंथ और श्रृंगारिक कविताएँ लिख रहे थे।
कथन – I : भक्तिकाल के भक्त कवियों को ‘सीकरी’ से कोई काम न था, पर रीतिकालीन कवियों का सीकरी के ‘बिना ‘सरैन एकौ काम’ ।
कथन- II : रीतिकालीन कवि सचेत रूप से कविता लिख रहे थे, जो उनके जीविकोपार्जन से जुड़ी हुई थी ।
रीतिकाल संबंधी उपर्युक्त कथनों की सत्यता / असत्यता पर विचार कीजिए और सही विकल्प का चयन कीजिए ।
कूट :
(a) कथन I और II दोनों सही हैं।
(b) कथन I सही है, किन्तु कथन II गलत है।
(c) कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।
(d) कथन II सही है, किन्तु कथन I गलत है ।
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Q66. निम्नलिखित में से किस इतिहासकार ने सर्वप्रथम हिंदी साहित्य के इतिहास का काल-विभाजन और नामकरण किया था ? व्याख्या: यद्यपि हिंदी साहित्य का पहला इतिहास गार्सा द तासी ने और दूसरा शिवसिंह सेंगर ने लिखा था, परंतु उन दोनों ने काल-विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया। डॉ. जॉर्ज ग्रियर्सन ने सन् 1888 में प्रकाशित अपने ग्रंथ ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान’ में सबसे पहले संपूर्ण इतिहास को 11 अध्यायों में बांटकर उसका ‘काल-विभाजन और नामकरण’ किया था (जैसे- चारण काल, धार्मिक पुनर्जागरण, जायसी की प्रेम कविता आदि)।
(a) ठाकुर शिवसिंह सेंगर ने
(b) डॉ. जार्ज ग्रियर्सन ने
(c) मिश्र बंधुओं ने
(d) रामचन्द्र शुक्ल ने
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Q67. स्वयंभू, पुष्पदंत की रचनाएँ किस भाषा रूप में हैं ? व्याख्या: स्वयंभू (जिन्हें अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा जाता है, रचना- ‘पउम चरिउ’) और पुष्पदंत (जिन्हें अपभ्रंश का वेदव्यास कहा जाता है, रचना- ‘महापुराण’) आदिकाल के जैन मत से प्रभावित महान अपभ्रंश भाषा के कवि हैं। इनकी रचनाओं से ही हिंदी के आदि रूप का विकास हुआ।
(a) अपभ्रंश में
(b) प्राकृत में
(c) मैथिली में
(d) संस्कृत में
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Q68. आदिकाल के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: व्याख्या: कथन 1 बिल्कुल सही है: आदिकालीन साहित्य में जहाँ एक ओर सिद्धों, नाथों, जैनियों का धार्मिक उपदेशपरक कथ्य है, वहीं रासो काव्यों में युद्ध और प्रेम का वीरगाथात्मक कथ्य है। साथ ही चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ को छंदों का अजायबघर कहा जाता है क्योंकि इसमें दोहा, गाहा, तोमर, छप्पय आदि छंदों की भारी विविधता है। कथन 2 गलत है: आदिकाल में केवल डिंगल (अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी) का प्रयोग नहीं हुआ, बल्कि इसके साथ-साथ पिंगल (अपभ्रंश मिश्रित ब्रजभाषा), मैथिली (विद्यापति द्वारा), और प्रारंभिक खड़ी बोली (अमीर खुसरो द्वारा) जैसी विविध शैलियों व भाषाओं का प्रचुर प्रयोग हुआ था।
1. आदिकालीन साहित्य में कथ्य की विविधता के साथ छन्द प्रयोग की विविधता भी रही है।
2. आदिकालीन साहित्य में केवल डिंगल शैली का प्रयोग हुआ।
उपर्युक्त में से कौन-सा /से कथन सही है/हैं ?
कूट की सहायता से सही विकल्प चुनें:
(a) कथन 1 एवं कथन 2 दोनों सही हैं।
(b) कथन 1 एवं कथन 2 दोनों गलत हैं।
(c) कथन 1 सही है, किन्तु कथन 2 गलत है।
(d) कथन 1 गलत है, किन्तु कथन 2 सही है।
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Q69. ‘श्रावकाचार’ नामक ग्रंथ के रचनाकार हैं व्याख्या: जैन आचार्य देवसेन ने 933 ईस्वी में ‘श्रावकाचार’ ग्रंथ की रचना की थी। इसमें 250 दोहों में श्रावक धर्म (जैन गृहस्थ धर्म) के कर्तव्यों का प्रतिपादन किया गया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और अन्य अधिकांश इतिहासकारों ने इस ग्रंथ को हिंदी की पहली साहित्यिक पुस्तक के रूप में स्वीकार किया है।
(a) शालिभद्र सूरि
(b) देवसेन
(c) आसगु
(d) चन्द्रमुनि
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Q70. हिंदी साहित्य के उद्भव के विषय में सत्य कथन है/हैं: व्याख्या: कथन I सत्य है: हिंदी साहित्य के शुरुआती रूप (प्राकृताभास हिंदी/अपभ्रंश) के सबसे प्राचीन प्रमाण वज्रयान बौद्धों (सिद्धों) की तांत्रिक रचनाओं में मिलते हैं (जैसा शुक्ल जी ने भी माना है)। कथन III भी सत्य है: अपभ्रंश शब्द का प्रथम प्रामाणिक और लिखित ऐतिहासिक उल्लेख वल्लभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने अपने पिता गुहसेन को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है। कथन II गलत है: भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में लोकभाषा को ‘अपभ्रंश’ नहीं, बल्कि ‘देशभाषा’ या ‘भ्रष्ट’ कहा था। कथन IV गलत है: वररुचि ने ‘प्राकृत प्रकाश’ में प्राकृत भाषा के भेद किए हैं, अपभ्रंश का व्यवस्थित उल्लेख बाद के आचार्यों (जैसे भामह, चंड और हेमचंद्र) ने किया है।
I. प्राकृताभास हिंदी की रचनाओं का सबसे पुराना नमूना योगमार्गी बौद्धों की रचनाओं में मिलता है।
II. भरत मुनि ने सबसे पहले तीसरी सदी की लोकभाषा को ‘अपभ्रंश’ नाम दिया ।
III. अपभ्रंश नाम का पहला उल्लेख राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है।
IV. वररुचि ने अपनी रचना ‘प्राकृत प्रकाश’ में पहली बार प्राकृत के साथ अपभ्रंश की रचनाओं का भी उल्लेख किया है।
कूट :
(a) I और II
(c) I, II और III
(b) I और III
(d) II, III और IV
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