Q91. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा ‘पृथ्वीराज रासो’ के संबंध में दिए गए निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा / कौन-से असत्य है/हैं? व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ग्रंथ के अनुसार तथ्यों का विश्लेषण इस प्रकार है: कथन 1 असत्य है: ‘पृथ्वीराज रासो’ में 59 समय नहीं, बल्कि 69 समय (सर्ग/अध्याय) हैं। यही कारण है कि यह कथन गलत है। कथन 2 सत्य है: इसमें छप्पय, दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा आदि प्राचीन काल में प्रचलित लगभग सभी छंदों का भरपूर उपयोग हुआ है (चंदबरदाई को ‘छप्पय का राजा’ भी कहा जाता है)। कथन 3 सत्य है: यह प्रसिद्ध है कि जब चंदबरदाई राजा के पीछे गजनी जा रहे थे, तब उन्होंने पुस्तक अपने पुत्र के हाथ सौंपी थी—“पुस्तक जल्हण हत्थ दै चलि गज्जन नृप काज।” कथन 4 सत्य है: आचार्य शुक्ल ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि—“यह पूरा ग्रंथ जाली है।” अतः केवल पहला कथन असत्य होने के कारण विकल्प (a) सही उत्तर है।
1. पृथ्वीराज रासो में 59 समय (सर्ग/अध्याय) हैं।
2. इसमें प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छन्दों का व्यवहार हुआ है।
3. चन्दबरदाई ने अपने पुत्र जल्हण के हाथ में रासो की पुस्तक देकर उसे पूर्ण करने का संकेत किया।
4. यह पूरा ग्रन्थ जाली है।
दिए गए कूट से सही विकल्प का चयन कीजिए:
(a) केवल 1
(c) केवल 2 और 4
(b) केवल 1 और 4
(d) केवल 4
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Q92. ‘पृथ्वीराज रासो’ को प्रामाणिक रचना मानने वाले विद्वान हैं- व्याख्या: ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रामाणिकता को लेकर विद्वान तीन वर्गों में बंटे हैं। बाबू श्यामसुंदर दास, मिश्र बंधु, मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या और कर्नल टॉड इसे पूर्णतः प्रामाणिक मानते हैं।
(a) डॉ. बूल्हर / बूलर
(b) देवीप्रसाद
(c) श्यामसुंदर दास
(d) रामचन्द्र शुक्ल
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Q93. रामभक्ति की ‘स्वसुखी शाखा’ के प्रवर्तक है- व्याख्या: रामभक्ति शाखा में रसिक भावना का समावेश करने के अंतर्गत रामचरणदास ने ‘स्वसुखी शाखा’ की स्थापना की। इस शाखा के भक्त स्वयं को सीता जी की सखी मानकर राम की आराधना करते हैं और सुखानुभूति को प्रधानता देते हैं।
(a) द्वारकादास
(b) कील्हदास
(c) अग्रदास
(d) रामचरणदास
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Q94. “सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना प्रसंगोद्भावना करने वाली ऐसी प्रतिभा हम तुलसी में नहीं पाते ।” व्याख्या: यह सुप्रसिद्ध कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। उनका मानना था कि यद्यपि सूरदास की कथावस्तु का आधार श्रीमद्भागवत महापुराण है, फिर भी अपनी मौलिक ‘प्रसंगोद्भावना’ (नए-नए प्रसंगों को गढ़ने की क्षमता) के कारण उन्होंने ‘भ्रमरगीत’ और ‘बाल-लीला’ के अंतर्गत ऐसे नए मर्मस्पर्शी प्रसंगों की सृष्टि की है जिसकी बराबरी तुलसीदास की प्रबंध-पटुता भी नहीं कर पाती।
सूरदास के संबंध में उपर्युक्त कथन किसका है ?
(a) आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का
(b) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का
(c) आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी का
(d) आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र का
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Q95. ‘रामायण महानाटक’ के रचयिता हैं – व्याख्या: रीतिकाल/भक्तिकाल के संधिकाल में सन् 1610 ई. के आसपास रचित ‘रामायण महानाटक’ के रचनाकार प्राणचंद चौहान हैं। यह संवाद शैली (नाटक रूप) में लिखा गया एक अनूठा रामकथा काव्य है, जिसका प्रभाव तत्कालीन रामलीला परंपरा पर गहरा पड़ा।
(a) गोस्वामी तुलसीदास
(b) प्राणचन्द चौहान
(c) नाभादास
(d) हृदयराम
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Q96. “प्रेममार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जबाँदानी का ऐसा दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कबि नहीं हुआ ।” – शुक्लजी का उपर्युक्त कथन किस कवि के संदर्भ में है ? व्याख्या: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल के ‘रीतिमुक्त’ स्वच्छंद काव्यधारा के सिरमौर कवि घनानंद की प्रशंसा में यह अमूल्य बात कही थी। शुक्ल जी के अनुसार घनानंद भाषा की लाक्षणिकता और व्यंजकता का जैसा बेजोड़ प्रयोग करते हैं, वैसा ब्रजभाषा का कोई अन्य कवि नहीं कर सका। वे ‘साक्षात रसमूर्ति’ कहे गए हैं।
(a) मतिराम के
(b) घनानंद के
(c) बिहारीलाल के
(d) बोधा के
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Q97. निम्नलिखित में से कौन-सी प्रवृत्ति सिद्ध साहित्य की नहीं है ? व्याख्या: सिद्ध साहित्य (पंचमकार साधना—मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) में स्त्रियों और मदिरा का निषेध नहीं था, बल्कि वे इसे अपनी तांत्रिक साधना का एक अनिवार्य अंग मानते थे (जिसे वे ‘महासुखवाद’ कहते थे)। अतः ‘निषेध’ वाली बात सिद्धों के संबंध में गलत है। सिद्धों में देशभाषा (अपभ्रंश मिश्रित पुरानी हिंदी), उलटबाँसियों व अबूझ पहेलियों की शुरुआत और आंतरिक साधना पर अत्यधिक बल देने की प्रवृत्तियाँ साफ दिखाई देती हैं।
(a) देशभाषा का प्रयोग
(b) अबूझ पहेलियों की रचना
(c) मद्य तथा स्त्रियों का निषेध
(d) अंतस्साधना पर जोर
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Q98. ‘अनुराग बाँसुरी’ किसकी रचना है ? व्याख्या: ‘अनुराग बाँसुरी’ (1764 ई.) सूफी काव्यधारा के अंतिम प्रसिद्ध कवि नूर मोहम्मद की रचना है। यह एक रूपक काव्य (Allegory) है, जिसकी भाषा शुद्ध अवधी है और इसकी सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता यह है कि इसमें सूफी काव्यों की तरह ‘दोहा-चौपाई’ के स्थान पर ‘बरवै-चौपाई’ छंद व्यवस्था का प्रयोग किया गया है। इनकी एक और प्रसिद्ध रचना ‘इन्द्रावती’ है।
(a) नूर मोहम्मद की
(b) शेख नबी की
(c) क़ासिम शाह की
(d) उस्मान की
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Q99. निम्नलिखित कृष्ण-भक्त कवियों एवं उनकी रचनाओं को सुमेलित कीजिए : व्याख्या: कृष्णभक्ति शाखा के कवियों और उनकी कृतियों का सही सुमेलन इस प्रकार है: अतः कूट संयोजन A-IV, B-I, C-II, D-III के अनुसार विकल्प (b) पूर्णतः सत्य है।
रचना – कवि
A. दानलीला – I. चतुर्भुजदास
B. भक्तिप्रताप – II. रसखान
C. प्रेमवाटिका – III. सूरदास
D. साहित्यलहरी – IV. नन्ददास
नीचे दिये गये कूट से सही उत्तर चुनिए :
कूट :
A B C D
(a) I, III, II, IV
(b) IV, I, II, III
(c) II, III, IV, I
(d) III, II, IV, I
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Q100. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: व्याख्या: कथन 1 सही है: कबीरदास, गुरु नानक और दादूदयाल तीनों ही निर्गुण भक्तिधारा के अंतर्गत ज्ञानमार्गी (संत) शाखा के प्रमुख कवि हैं। कथन 2 गलत है: इस कथन में कबीर तो संत कवि हैं, किंतु ‘हृदयराम’ रामभक्ति शाखा (हनुमन्नाटक के रचयिता) से जुड़े हैं और ‘छीतस्वामी’ अष्टछाप के सुप्रसिद्ध कृष्णभक्त कवि हैं। इसलिए यह युग्म गलत हो जाता है। अतः केवल कथन 1 सही होने के कारण विकल्प (a) ही उचित विकल्प है।
1. कबीर, नानक और दादूदयाल ज्ञानमार्गी संत कवि थे ।
2. कबीर, हृदयराम और छीतस्वामी ज्ञानमार्गी संत कवि थे ।
नीचे दिए गए कूट से सही विकल्प चुनिए :
कूट :
(a) केवल कथन 1 सही है ।
(b) कथन 1 एवं 2 दोनों सही हैं।
(c) केवल कथन 2 सही है।
(d) कथन 1 एवं 2 दोनों गलत हैं।
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