Medieval History Notes in hindi

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन 1918

अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन 
(Ahmedabad Mill Workers Movement)

गांधी जी ने अपना तीसरा अभियान अहमदाबाद में छेडा जब उन्होंने मिल मालिकों और श्रमिकों के मध्य संघर्ष में हस्तक्षेप किया। अहमदाबाद, गुजरात के एक महत्वपूर्ण औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हो रहा था परन्तु मिल मालिकों को अक्सर श्रमिकों की कमी का सामना करना पड़ा था और उन्हें आकर्षित करने के लिए वे मजदूरी की ऊंची दर देते थे। 1917 में अहमदाबाद में प्लेग की महामारी फैली। अधिकांश श्रमिक शहर छोड़कर गांव जाने लगे। श्रमिकों को शहर छोड़कर जाने से रोकने के लिए मिल मालिकों ने उन्हें ‘प्लेग बोनस’ देने का निर्णय किया जो कि कभी-कभी साधारण मजदूरी का लगभग 75% होता था। जब यह महामारी समाप्त हो गयी तो मिल मालिकों ने इस भत्ते को समाप्त करने का निर्णय लिया। श्रमिकों ने इसका विरोध किया। श्रमिकों कि धारणा थी कि युद्ध के दौरान जो महंगाई हुई थी, यह भत्ता उसकी भी पूर्ति करता था। मिल मालिक 20% की वृद्धि देने को तैयार थे, परन्तु मूल्य वृद्धि को देखते हुए श्रमिक 50% की वृद्धि मांग रहे थे। 

गुजरात सभा के सचिव गांधी जी को अहमदाबाद की मिलों में कार्य करने की दशाओं के बारे में सूचित करते रहते थे। एक मिल मालिक अम्बालाल साराभाई से उनका व्यक्तिगत परिचय था, क्योंकि उसने गांधी के आश्रम के लिए धनराशि दी थी। इसके अतिरिक्त अम्बालाल की बहन अनसुझ्या साराभाई गांधी जी के प्रति आदर भाव रखती थी। गांधी जी ने अम्बालाल साराभाई से विचार-विमर्श करने के उपरांत इस समस्या में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया। श्रमिक और मिल मानिक इस बात पर सहमत हो गए कि पूरी समस्या को एक मध्यस्थता कराने वाले बोर्ड के ऊपर छोड़ दिया जाए जिसमें कि तीन प्रतिनिधि मजदूरों के हों और तीन मिल मालिकों के। अंग्रेज कलेक्टर इस बोर्ड के अध्यक्ष होने थे। गांधी जी इस बोर्ड में श्रमिकों के प्रतिनिधि के रूप में मौजूद थे, परन्तु अचानक मिल मालिक बोर्ड से पीछे हट गये। इसका कारण उन्होंने यह बताया कि गांधी जी को श्रमिकों की तरफ से कोई अधिकार नहीं दिया गया था और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि श्रमिक इस बोर्ड के निर्णय को स्वीकार करेंगे। 22 फरवरी 1918 से मिल मालिकों ने ताला बंदी की घोषणा की। 

ऐसी परिस्थिति में गांधी जी ने पूरी स्थिति का विस्तृत रूप से अध्ययन करने का निर्णय लिया। उन्होंने मिलों की आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारी हामिल की और उनके द्वारा दी जा रही मजदूरी की दरों की तुलना बंबई में दी जा रही मजदूरी की दरों से की। इस अध्ययन के उपरांत गांधी जी ने यह निष्कर्ष निकाला कि मजदूरों को 50% के स्थान पर 35% बढ़ोत्तरी की मांग करनी चाहिए। गांधी जी ने मिल मालिकों के विरुद्ध सत्याग्रह प्रारंभ किया। श्रमिकों से यह शपथ लेने को कहा गया कि जब तक मजदूरी में 35% वृद्धि नहीं होती। वे काम पर नहीं जागे और शांतिपूर्वक सत्याग्रह करते रहेगे। अनेक स्थानों पर सभाएं हुई और गाधी जी ने इनमें भाषण दिये। इस स्थिति के ऊपर उन्होंने कुछ लेख भी लिखे।

12 मार्च 1918 के दिन मिल मालिकों ने यह घोषणा की कि वे ताला बंदी हटा रहे हैं और उन श्रमिकों को कार्य पर वापस लेंगे जो कि 20% वृद्धि स्वीकार करते हैं। इसके विपरीत 15 मार्च 1918 को गांधी जी ने यह घोषणा की कि जब तक कोई समझौता नहीं होता वे भूख हड़ताल पर रहेंगे। इस समय गांधी जी का उद्देश्य यह था कि जो मजदूर अपनी शपथ के बावजूद काम पर वापस जाने की सोच रहे थे उन्हें उससे रोका जा सके। अंततः 18 मार्च 1918 के दिन एक समझौता हुआ, इसके अनुसार, श्रमिकों को उनकी शपथ को देखते हुए पहले दिन की मजदूरी 35% वृद्धि के साथ हासिल होनी थी और दूसरे दिन उन्हें 20% की वृद्धि, जो कि मिल मालिकों द्वारा प्रस्तावित की जा रही थी, मिलनी थी। तीसरे दिन ही तब तक; जब तक कि एक मध्यस्थता के द्वारा निर्णय नहीं लिया जाता उन्हें 27½% की वृद्धि मिलनी थी। अंततः मध्यस्थ ने गांधी जी के प्रस्ताव को मानते हए मजदूरों के पक्ष में 35% की वृद्धि का निर्णय दिया।

 

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खेड़ा सत्याग्रह 1918 (Kheda Satyagraha 1918)

खेड़ा सत्याग्रह (Kheda Satyagraha)

किसानों के पक्ष में गांधी जी ने दूसरी बार हस्तक्षेप गुजरात के खेड़ा जिले में किया। यहाँ पर उनकी सत्याग्रह की तकनीक को वास्तव में एक इम्तहान से गुजरना पड़ा। खेड़ा अधिक उपजाऊ क्षेत्र था और यहाँ पर उगने वाली खाद्य फसलों, तंबाकू, और रुई को अहमदाबाद में एक सुलभ बाजार प्राप्त था। यहाँ पर कई धनी किसान थे जो कि पट्टीदार कहलाते थे। इसके अतिरिक्त कई छोटे किसान और भूमिहीन कृषक भी यहाँ पर रहते थे। 

1917 में अधिक बारिश के कारण खरीफ की फसल को नुकसान हआ। इसी समय मिट्टी का तेल, लोहा, कपड़ों और नमक की कीमतों में भी वद्धि हुई जिसने कि किसानों के जीवन स्तर को प्रभावित किया। किसानों ने इस समय यह मांग की कि पूरी फसल न होने के कारण लगान माफ किया जाए। लगान कानून के अंतर्गत ऐसा प्रावधान मौजूद था कि यदि कुल उपज सामान्य उपज के मुकाबले केवल 25 प्रतिशत हो तो पूरा लगान माफ किया जा सकता था। बंबई के दो वकीलों, श्री वी.जे. पटेल और जी.के. पारख ने इस संबंध में छान-बीन की और वे इस नतीजे पर पहुँचे कि उपज का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो चूका था, परंतु सरकार इससे सहमत नहीं थी। खेड़ा के कलेक्टर ने यह निर्णय लिया कि लगान माफ करने की मांग का कोई औचित्य नहीं है। सरकारी धारणा यह थी कि किसानों ने यह मांग नहीं कि थी वरन् इसके लिए उन्हें बाहर के लोगों ने भड़काया था जो कि होम रूल लीग और गुजरात सभा से संबंध रखते थे। गांधी जी स्वय इस समय गुजरात सभा के अध्यक्ष थे। सच्चाई यह थी कि यहाँ आदोलन प्रारंभ करने की पहल न तो गांधी जी ने ही की थी और न ही अहमदाबाद के राजनीतिज्ञों ने। यह मांग तो वास्तव में मोहन लाल पाण्डे जैसे स्थानीय गाँव के नेताओं ने उठायी थी।

छान-बीन करने के बाद गांधी जी ने यह धारणा व्यक्त की कि सरकारी अफसरों ने उपज का बढ़ा-चढ़ा कर मूल्य लगाया था और किसानों का यह वैध अधिकार था कि वे लगान न दें। इसमें उन्हें कोई सविधा नहीं प्रदान की जा रही थी लेकिन सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। कुछ हिचकिचाहट के बाद गांधी जी ने यह निर्णय लिया कि 22 मार्च, 1918 से सत्याग्रह का प्रारंभ नदियाद में एक सभा करके किया गया। इस सभा में गांधी जी ने किसानों को यह राय दी कि वे अपना लगान न दें। किसानों के उत्साह को बढ़ाने के लिए और उनके हृदय से सरकार का भय निकालने के लिए गांधी जी ने अनेक गाँवों का दौरा किया। 

इम सत्याग्रह में इन्दुलाल याज्ञिक, बिट्ठल भाई पटेल और अनसुइया साराभाई ने भी गांधी जी की मदद की21 अप्रैल के दिन सत्याग्रह अपनी चरम सीमा पर पहुँचा। 2,337 किसानों ने यह शपथ ली कि वे लगान नहीं देंगे। अधिकांश पट्टाधारियों ने सत्याग्रह में हिस्सा लिया परन्तु सरकार ने अपनी दमनकारी नीति के द्वारा कुछ गरीब किसानों को लगान देने के लिए बाध्य किया। इस समय रबी की फसल अच्छी हुई जिससे कि लगान न देने का मुद्दा कुछ कमजोर पडा। गांधी जी यह समझने लगे थे कि किसान सत्याग्रह से थकने लगे हैं। जब सरकार ने यह आदेश जारी किया कि लगान की वसूली केवल उन्हीं किसानों से की जानी चाहिए जो कि उसको दे सकते हैं और गरीब किसानों पर इसके लिए दबाव नहीं डाला जाना चाहिए, तो गांधी जी ने सत्याग्रह को समाप्त करने की घोषणा की। वास्तव में इस सत्याग्रह का सब गाँवों पर समान असर नहीं पड़ा था। खेड़ा के 559 गांवों में से केवल 70 गाँवों में ही यह सफल रहा था और यही कारण था कि गांधी जी ने केवल थोडी सी रियायत मिलने पर ही सत्याग्रह वापस ले लिया था लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि इस सत्याग्रह के द्वारा गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र में गांधी जी के सामाजिक आधार का विकास हुआ था।

 

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चंपारन में सत्याग्रह

चंपारन में सत्याग्रह (Satyagraha in Champaran)

चंपारन (बिहार) में अंग्रेज व्यापारी किसानों को तिनकठिया व्यवस्था के अन्तर्गत नील पैदा करने के लिए विवश करते थे। इस व्यवस्था में किसान अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील उगाने के लिए बाध्य थे। इसके खिलाफ किसानों का असंतोष, स्थानीय मध्यम और धनी वर्ग के किसान नेताओं के नेतृत्व में 1860 के दशक से ही बढ़ता चला आ रहा था। 19वीं सदी के समाप्त होते-होते जर्मनी के रासायनिक रंगों (डाईज) ने नील को बाजार से बाहर कर दिया। नील की मांग कम होने से चंपारन के किसान और यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बंद करने के लिए विवश हो गए। किसानों को अनुबन्ध से मुक्त करने के लिए बागान मालिकों ने लगान व अन्य गैर कानूनी करो की दर मनमाने ढंग से बढ़ा दी। चंपारन के किसान नेता राजकुमार शुक्ल 1916 के लखनऊ काँग्रेस अधिवेशन में पहुंचे और गाँधीजी को बिहार आकर आन्दोलन का नेतृत्व करने के लिए तैयार किया। सरकार ने गाँधीजी के चम्पारन प्रवेश पर रोक लगा दी थी, परन्तु गाँधीजी ने इस आदेश की पालना अस्वीकार कर दी। इसके लिए किसी भी सजा को भुगतने का फैसला कर लिया। लोगों के लिए यह आश्चर्यजनक प्रयास था। चूंकि भारत सरकार अब तक गाँधीजी को विद्रोही नहीं मानती थी और इस मुद्दे को अनावश्यक महल नहीं देना चाहती थी, अत: उसने गाँधीजी को चंपारन के गांवों में जाने की छूट देने का निश्चय किया ।

गाँधीजी की जांच एवं प्रचार के फलस्वरूप तिनकठिया पद्धति समाप्त कर दी गईनवम्बर 1918 में चंपारन कृषि कानून पारित होने के साथ ही गाँधीजी का लक्ष्य पूरा हो गया । इस ऐक्ट से किसानों के कष्ट काफी हद तक दूर हो गये। गाँधीजी के हस्तक्षेप ने गरीब किसानों के मन से डर को बाहर निकाल फेंका, अब वे अंग्रेजी राज और यूरोप के नील की खेती करवाने वाले ठेकेदारों की सत्ता को चुनौती देने का साहस कर पाते थे | यह गाँधीजी की भारत में पहली विजय थी और इससे उनको यह विश्वास हो गया कि भारत में सत्याग्रह का प्रयोग किया जा सकता है । 

 

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स्वाधीनता के पश्चात भारतीय शिक्षा का विकास (1947-1950 ई.)

स्वाधीनता के पश्चात भारतीय शिक्षा का विकास (1947-1950 ई.)
(Development of Indian Education after Independence (1947-1950))

1947 में स्वाधीन भारत में 1 लाख 73 हजार प्रारंभिक स्कूल, वह हजार माध्यमिक स्कूल, 199 इण्टरमीडिएट कॉलेज, 297 कला और विज्ञान के कॉलेज, 140 व्यावसायिक और टेक्नीकल कॉलेज तथा 20 विश्वविद्यालय थे । 1947 में राजपूताना विश्वविद्यालय, सागर विश्वविद्यालय तथा पंजाब विश्वविद्यालय, 1948 में गोहाटी, पूना, रुड़की और जम्मू काश्मीर में विश्वविद्यालयों 1949 में बडौदा में विश्वविद्यालय और 1950 में कर्नाटक और गुजरात में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी ।

स्वाधीन भारत की सरकार ने 1848 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षतता में एक विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग गठित किया। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय शिक्षा पद्धति के गुण-दोषों की जाँच करना तथा उसके सुधार तथा प्रसार के सुझाव प्रस्तुत करना था। आयोग ने शिक्षा में व्यापक सुधार लाने के लिये अपनी अनुशंसा सहित एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की । राधाकृष्णन आयोग (1949) राधाकृष्णन आयोग ने निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तुत की – 

  • स्कूली पाठ्यक्रम की अवधि 12 वर्ष की होनी चाहिए । इसमें इंटरमीडिएट की कक्षायें भी सम्मिलित होनी चाहिए । 
  • हाई स्कूल तथा इंटरमीडिएट कॉलेजों के अध्यापकों के लिये रिफ्रेशर कोर्स प्रारंभ किया जाना चाहिए । 
  • वर्ष में कम से कम 180 दिन कक्षायें लगनी चाहिए । 
  • विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम इंटरमीडियएट के बाद प्रारंभ होना चाहिए। उसकी अवधि तीन वर्ष की होनी चाहिए।
  • स्नात्कोत्तर कक्षाओं के पाठ्यक्रम और उनके लिये विद्यार्थियों के चयन में एकरूपता होनी चाहिए । 
  • अनुसंधान या पी.एच.डी. डिग्री के लिये प्रशिक्षण की अवधि कम से कम दो वर्ष होनी चाहिए । 
  • कला और साहित्य के विद्यार्थियों को विज्ञान की, और विज्ञान के विद्यार्थियों को कला और साहित्य के विषयों की शिक्षा देनी चाहिए।
  • विश्वविद्यालय शिक्षकों को तीन वर्गों में विभाजित करना चाहिए । 
    • प्रोफेसर 
    • रीडर, 
    • व्याख्याता या लैक्चरर और निर्देशक 
  • उनकी सेवानिवृत्ति की उम्र 60 वर्ष होनी चाहिए। प्रोफेसरों को 04 वर्ष तक कार्य करने की स्वीकृति होनी चाहिए। उनकी पदोन्नति केवल योग्यता के आधार पर होनी चाहिए । 
  • विश्वविद्यालय के पुस्तकालयों और प्रयोगशालाओं में सुधार होना चाहिए।
  • विश्वविद्यालय शिक्षा को समवर्ती सूची में सम्मिलित करना चाहिए।
  • विश्वविद्यालय एक स्वायत्त संस्था होनी चाहिए तथा केन्द्र सरकार को इसके वित्तीय दायित्वों को पूरा करना चाहिए।
  • इन्जीनियरिंग कॉलेजों, औद्योगिक संस्थाओं, कानून और कृषि सम्बन्धी कॉलेजों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है । उन्हें पुन: संगठित करना चाहिए ।
  • विज्ञान के नये-नये विषयों के अध्ययन और अनुसंधान की व्यवस्था की जानी चाहिए। 
  • औद्योगिक तथा वैज्ञानिक विषयों में अन्तर्राष्ट्रीय पारिभाषिक शब्दों को अपनाना चाहिए । 
  • उच्च शिक्षा के लिये शीघ्रातिशीघ्र अंग्रेजी भाषा के स्थान पर किसी भारतीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहिए | संघीय भाषा हिन्दी को विकसित करना चाहिए।
  • केन्द्रीय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग गठित किया जाना चाहिए ।

राधाकृष्णन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए भारत सरकार ने एक परिपत्र सभी विश्वविद्यालयों को भेजा। अनेक विश्वविद्यालयों ने इन सिफारिशों को क्रियान्वित भी किया। 1953 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की गयी । इस प्रकार स्वाधीन भारत की सरकार ने शिक्षा को अधिक सार्थक और उपयोगी बनाने का प्रयास किया।

 

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सार्जेण्ट शिक्षा योजना (1944)

सार्जेण्ट शिक्षा योजना (1944)
(Sargent Education Scheme (1944))

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति पर सरकार ने युद्धोत्तर विकास की अनेक योजनाएँ बनायी । इन योजनाओं में शिक्षा को भी स्थान दिया गया । सर जॉन सार्जेण्ट को, वाइसराय ने आज्ञा दी, कि वे युद्धोत्तर शिक्षा की जाँच कर उस पर स्मृति-पत्र तैयार करें । सार्जेण्ट ने 1944 तक स्मृति पत्र तैयार कर केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया । इसी कारण इस योजना को तीन नामों से पुकारा गया, भारत में युद्धोत्तर शिक्षा-विकास योजना, केन्द्रीय शिक्षा-सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट तथा सार्जेण्ट योजना योजना का रूप अत्यन्त एकाएक था। इसमें पूर्व प्राथमिक स्तर की शिक्षा की जटिलतम समस्याओं पर विचार करके रिपोर्ट को ग्यारह भागों मे विभाजित किया गया। उसके निम्नलिखित सुझाव थे – 

  1. स्कूल दो श्रेणी में हो, एक से ग्यारह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए जूनियर स्कूल हों। इस आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जाये। 
  2. ग्यारह से सत्रह वर्ष की आयु के बच्चों के लिए सीनियर स्कूल हो। सीनियर स्कूल भी दो प्रकार के हो, साहित्यिक एवं व्यावसायिक शिक्षा हेतु । 
  3. इंटरमीडिएट शिक्षा समाप्त की जाये । सीनियर स्कूल की शिक्षा में एक वर्ष की वृद्धि की जाये तथा एक वर्ष की वृद्धि कॉलेज की शिक्षा में की जाये ।

 

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हर्टाग समिति (1929)

हर्टाग समिति (1929)
(Hartog Committee 1929)

शिक्षा संस्थाओं की संख्या बढ़ने से शिक्षा के स्तर में गिरावट आयी। शैक्षणिक पद्धति के प्रति असंतोष बढ़ता गया। 8 नवम्बर 1927 को साइमन कमीशन की नियुक्ति की गयी। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय आन्दोलन से उत्पन्न विभिन्न परिस्थितियों की जाँच के साथ-साथ भारतीय शिक्षा की व्यवस्था की जाँच करना था। कमीशन ने भारतीय शिक्षा की अवस्था की जांच करने के लिये तथा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये सहायता समिति की स्थापना की। इस समिति के सभापति सर फिलिप हर्टाग (Sir Philip Hartog) बनाये गये थे। इसी कारण से इस समिति का नाम हर्टाग समिति (Hartog Committee) पड़ा। भारतीय शिक्षा के समस्त अंगों का अध्ययन करने के पश्चात् कमेटी ने सितम्बर 1929 में अपनी रिपोर्ट साइमन कमीशन के समक्ष प्रस्तुत की । जिसके सुझाव निम्न – 

  • प्राथमिक शिक्षा का विस्तार किया जाये परन्तु उसमें शीघ्रता न की जाये।
  • आठवीं कक्षा के पश्चात विद्यार्थियों को उनकी रूचि और योग्यता के अनुसार व्यावसायिक शिक्षा-संस्थाओं में भेजा जाये । हाई स्कूल तथा उसके आगे की शिक्षा केवल योग्य और चुने हुए विद्यार्थियों को ही दी जाये।
  • विश्वविद्यालय की शिक्षा योग्य विद्यार्थियों तक सीमित की जाये। औद्योगिक शिक्षा का पाठ्यक्रम प्रारंभ किया जाये तथा रोजगार कार्यालय विश्वविद्यालय में खोले जाएं।

 

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सैडलर विश्वविद्यालय कमीशन (1917-19)

सैडलर विश्वविद्यालय कमीशन (1917-19)
(Sadler University Commission (1917–19))

कलकत्ता विश्वविद्यालय में सर आशुतोष मुकर्जी के प्रयत्नों से स्नातकोत्तर विभाग खोला गया। अत: सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की जाँच के लिए 14 सितम्बर 1917 को कलकत्ता विश्वविद्यालय आयोग की नियुक्ति की। इस आयोग के सभापति माइकेल सैडलर थे इस कारण इसको ‘सैडलर कमीशन (Sadler Commission)’ के नाम से भी पुकारते हैं। आयोग का मुख्य उद्देश्य कलकत्ता विश्वविद्यालय की दशा और आवश्यकताओं की जाँच करना और उससे सम्बन्धित समस्याओं का उचित रीति से समाधान करके सुधार के लिए सुझाव देना था। इस कमीशन ने विश्वविद्यालय शिक्षा संबंधी ही नहीं अपितु माध्यमिक शिक्षा सम्बन्धी भी सुझाव दिये। उसके मुख्य सुझाव निम्नवत थे – 

  • माध्यमिक शिक्षा बारह वर्ष में पूर्ण हो । हाई स्कूल की परीक्षा के पश्चात् विदयार्थी दो वर्ष इन्टरमीडिएट में शिक्षा प्राप्त करे। उसके पश्चात उसे विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त हों । इन्टरमीडिएट की शिक्षा हाई स्कूलों के साथ सम्मिलित की जा सकती थी अथवा उसकी पृथक व्यवस्था भी की जा सकती थी । इस शिक्षा की अवस्था के लिये प्रत्येक प्रांत में एक हाई स्कूल और इन्टरमीडिएट बोर्ड की स्थापना की जाये । 
  • स्नातक श्रेणी (Degree Course) की शिक्षा अधिकतम तीन वर्ष की हो तथा पास कोर्स (B.A. Pass) और ऑनर्स कोर्स (B.A. Honours) की शिक्षा पृथक की जाये । 
  • धीरे-धीरे विश्वविद्यालय ऐसे बनाये जायें जहाँ शिक्षा और विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था हो ।
  • स्त्री शिक्षा को बढ़ाया जाये । 
  • अध्यापकों की शिक्षा के लिये स्कूल तथा कॉलेज (Teachers Training Institutes) खोले जाये।
  • वैज्ञानिक तथा तकनीकी शिक्षा का विस्तार किया जाये।
  • मुसलमानों को शिक्षण क्षेत्र में विशेष प्रोत्साहन दिया जाये तथा उनके हितों की सुरक्षा के प्रबंध किये जायें । 

आयोग का सुझाव था कि विश्वविद्यालय शिक्षा का सुधार करने से पूर्व माध्यमिक शिक्षा का सुधार करना आवश्यक है, क्योंकि माध्यमिक शिक्षा, विश्वविद्यालय शिक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी है। यह सत्य है कि कलकत्ता आयोग के सुझावों विश्वविद्यालय शिक्षा के उत्थान का मार्ग प्रदर्शित करते हैं। आयोग के सुझावों के परिणामस्वरूप 1916 मे मैसूर विश्वविद्यालय, 1917 में पटना विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, 1918 में उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद, 1920 में अलीगढ़ विश्वविद्यालय, ढाका विश्वविद्यालय तथा लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी। उस्मानिया विश्वविद्यालय हैदराबाद में, जिसकी स्थापना निजाम ने की थी शिक्षा का माध्यम उर्दू रखा ।

1919 मे मौण्टेग्यू चैम्सफोर्ड सुधारों के अंतर्गत प्रांतों में शिक्षा विभाग लोक निर्वाचित मंत्री के नियंत्रण में दे दिया गया । केन्द्रीय सरकार ने शिक्षा में रूचि लेना बन्द कर दिया अनुदान भी बंद कर दिया गया । वित्तीय कठिनाइयों के कारण प्रांतीय सरकारों ने शिक्षा योजनाओं को हाथ में नहीं लिया। 

 

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1913 का शिक्षा-नीति संबंधी सरकारी प्रस्ताव

1913 का शिक्षा-नीति संबंधी सरकारी प्रस्ताव
(Government Resolution on Education Policy of 1913)

देश में शिक्षा की माँग बढ़ जाने तथा गोखले के आन्दोलन के कारण भारतीय सरकार के लिए आवश्यक हो गया था कि वह अपनी शिक्षा-नीति को दोहराये । साथ ही 1911 ई. के दिल्ली-दरबार में सम्राट जॉर्ज पंचम ने प्राथमिक शिक्षा पर 50 लाख रुपए की अतिरिक्त धनराशि व्यय करने का आदेश प्रदान किया। उपर्युक्त कारणों से शिक्षा का पूर्ण रूप से अवलोकन करने के लिए 11 फरवरी, 1913 ई. को सरकार ने शिक्षा-नीति पर अपना प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव के अन्दर शिक्षा के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डाला गया तथा शिक्षा विस्तार के लिए निम्न सिफारिशें प्रस्तुत की गई।

प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए सुझाव

  • सरकार का कर्तव्य है कि वह पूर्व-प्राथमिक (Lower Primary) विद्यालयों का अधिक से अधिक विकास करे। इन स्कूलों में लिखने-पढ़ने के अतिरिक्त ड्राइंग, गाँव का मानचित्र, प्रकृति-निरीक्षण तथा शारीरिक व्यायाम आदि की शिक्षा भी प्रदान की जाये।
  • सुविधानुसार उचित स्थानों पर उत्तर-प्राथमिक (Upper-Primary) विद्यालयों का निर्माण किया जाये और आवश्यकता के साथ लोअर प्राइमरी स्कूलों को बदला जाये।
  • मकतब तथा पाठशालाओं को यथा संभव अधिक से अधिक सहायता प्रदान की जाये।
  • जिला-परिषद और स्थानीय संस्थाएँ अधिक से अधिक स्कूलों की स्थापना करें। जहाँ पर इस प्रकार के नवीन स्कूल नहीं खोले जा सकते, वही पर व्यक्तिगत स्कूलों की स्थापना की जाये।
  • शिक्षक प्रशिक्षित और मिडिल पास हों। 
  • प्रत्येक कक्षा में 50 से अधिक छात्र न हों। छात्रों की संख्या साधारणतया 40 हो। 
  • दीक्षित अध्यापकों का वेतन कम से कम 12 रुपये प्रतिमास हो।
  • मिडिल स्कूल और वर्नाक्यूलर स्कलों में सुधार किया जाये।

माध्यमिक शिक्षा के विकास के लिए सिफारिशें

  • माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र से सरकार का पूर्ण रूप से हट जाना अनुचित है । 
  • परन्तु साथ ही राजकीय विद्यालयों के बढ़ाने पर असहमति प्रकट की गई । यथासम्भव पूर्व स्थापित विद्यालयों को ही आदर्श रूप प्रदान किया जाये । 
  • परीक्षा-प्रणाली तथा पाठ्यक्रम में सुधार किया जाये।
  • राजकीय विद्यालय में केवल दीक्षित अध्यापकों की ही नियुक्ति की जाये। 
  • अध्यापकों का वेतन निर्धारित किया जाये । 
  • गैर-सरकारी विद्यालयों को सरकार उचित प्रकार से सहायता अनुदान दे। 
  • पाठ्यक्रम में विज्ञान तथा काष्ठकला (मेनुअल ट्रेनिंग), जैसे -आधुनिक विषयों को भी सम्मिलित किया जाये।
  • कार्य-क्षमता में वृद्धि करने के लिए माध्यमिक विद्यालयों पर कड़ा नियन्त्रण लगाया जाये । 

विश्वविद्यालयी शिक्षा के विकास के लिए सुझाव

  • विश्वविद्यालयों की दशा शोचनीय है, अत: उनमें सुधार किया जाये । 
  • सम्पूर्ण देश की माँग तथा आवश्यकताओं को दृष्टि में रखते हुए 5 विश्वविद्यालय तथा 185 कॉलेज अपर्याप्त है । इस कारण प्रत्येक प्रान्त में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये।
  • विश्वविद्यालयों को हाई स्कूलों को मान्यता प्रदान करने से मुक्त कर दिया जाये। इससे विश्वविद्यालयों के कार्य-भार में कमी आ जायेगी । 
  • शिक्षण करने वाले विश्वविद्यालयों की स्थापना पर अधिक बल दिया जाये।
  • उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में औद्योगिक विषयों को सम्मिलित किया जाये । अनुसंधान के इच्छुक छात्रों को सरकार द्वारा सहायता प्रदान की जाये । 
  • विश्वविद्यालयों में समुचित छात्रावास, पुस्तकालय और प्रयोगशालाएँ स्थापित की जाएँ। 
  • छात्रों के नैतिक, चारित्रिक विकास की ओर मी ध्यान दिया जाये।

1913 के सरकारी प्रस्ताव में शिक्षा के प्रत्येक अंग पर प्रकाश डाला गया था | शिक्षा के स्तर में सुधार तथा शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार करने के सुझाव अत्यन्त सराहनीय थे, परन्तु यह दुःख का विषय है कि 1914 ई. में विश्व युद्ध की घोषणा के कारण और भारत के युद्ध में भाग लेने से 1913 ई. के प्रस्तावों पर विचार तक न किया जा सका। युद्ध समाप्त होने के पश्चात् 1917 ई. में भारत सरकार ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के विषयों की जाँच पड़ताल करने के लिए एक आयोग का आयोजन किया।

 

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कर्जन की शिक्षा नीति

कर्जन की शिक्षा नीति
(Curzon’s Education Policy)

भारतीय शिक्षा के इतिहास में लॉर्ड कर्जन (Lord Curzon) का काल महत्वपूर्ण है। कर्जन विद्वान, कुशल प्रशासक तथा पाश्चात्य सभ्यता का परम भक्त था। शिक्षा में स्वतंत्रता एवं विस्तार की नीति का कर्जन विरोधी था। उसका विश्वास था कि शिक्षा का स्तर उँचा करने के लिए शिक्षण संस्थाओं पर सरकार का अधिक से अधिक कठोर नियंत्रण होना चाहिए एवं प्राइमरी शिक्षा पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

कर्जन का विचार था कि भारत की शिक्षा-संस्थाएँ मुख्यतया विश्वविद्यालय राजनीतिक दलबन्दियों अथवा षडयत्रों के केन्द्र बन गये थे। निश्चय ही शिक्षित भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का प्रादुर्भाव हो गया था ओर वे ही अंग्रेजी साम्राज्यवाद के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकते थे। इस कारण कर्जन का मुख्य आशय शिक्षा-संस्थाओं को सरकारी नियंत्रण में लेकर भारतीयों की राजनीतिक गतिविधियों को दुर्बल करने का था। 

कर्जन ने 1901 मे शिमला में सरकारी शिक्षा अधिकारियों और विश्वविदयालयों के प्रतिनिधियों की एक सभा बुलाई। उस सभा ने शिक्षा के संबंध में एक सौ पचास प्रस्ताव स्वीकार किये। कर्जन ने 1902 में सर थॉमस रैले की अध्यक्षता में एक शिक्षा कमीशन की नियुक्ति की। उसका मुख्य कार्य भारतीय विश्वविद्यालयों की शिक्षा के सम्बन्ध के सुझाव देना था। उसकी रिपोर्ट के आधार पर 1904 का भारतीय विश्वविद्यालय कानून बनाया गया जिसकी मुख्य धाराएँ निम्नवत् थी – 

  1. विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा और अनुसंधान पर ध्यान दे। वे योग्य प्रोफेसरों और अध्यापकों की नियुक्ति करें तथा उचित पुस्तकालयों एवं प्रयोगशालाओं की स्थापना का प्रबंध करें । 
  2. विश्वविद्यालय की सीनेट के सदस्यों की संख्या कम से कम पचास और अधिक से अधिक सौ निश्चित की गयी। उनके कार्यकाल की अवधि 3 वर्ष निश्चित की गयी। 
  3. सरकारी नियंत्रण विश्वविद्यालय एवं अशासकीय कॉलेजों पर कड़ा हो गया। उनका समय-समय पर निरीक्षण कडी सम्बद्धता की शर्त, कार्यक्षमता का वांछित उच्च स्तर बनाये रखने के नियम बनाये गये । 
  4. विश्वविद्यालयों की क्षेत्रीय सीमा निर्धारित करने का अधिकार गवर्नर जनरल का था ।

लॉर्ड कर्जन के इस अधिनियम ने भारतीय विश्वविद्यालय को संसार के सर्वाधिक सरकारी विश्वविद्यालयों बना दिया। इस अधिनियम की असेम्बली के अन्दर व बाहर कड़ी आलोचना हुई। फ्रेजर के अनुसार “जिसने भारतीय नेताओं तथा जनमत में सर्वाधिक कड़वाहट उत्पन्न की तथा जिसने कर्जन को सबसे अधिक अलोकप्रियता प्रदान की वह 1904 का शिक्षा अधिनियम ही था।” आलोचनाओं की चिंता न करते हुए लॉर्ड कर्जन ने 1904 का भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम बना दिया। 

कर्जन के अधिनियम में बहुत सी अच्छी सिफारिशें थीं। कर्जन ने मुख्यतया विशेष व्यवसायिक पाठ्यक्रमों जैसे डॉक्टरी, कृषि, इंजीनियरिंग, पशु चिकित्सा तथा अन्य तकनीकी विषयों की ओर अधिक ध्यान दिया। विश्वविद्यालय केवल परीक्षा संचालन संस्थाएँ ही नहीं रह गई बल्कि शिक्षण संस्थाएँ भी बन गई, इससे कालांतर में उच्च शिक्षा का स्तर बढ़ा। इस अधिनियम के बारे में सत्य ही कहा गया है कि विश्वविद्यालय अधिनियम का कोई विशेष महत्व नहीं है परन्तु विश्वविद्यालय में सुधार लाने के लिये आंदोलन प्रारंभ करने का श्रेय कर्जन को है । यह आंदोलन धीमी गति से परन्तु दृढ़ता पूर्वक अपने निर्धारित लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ता जा रहा है ।

 

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हंटर कमीशन (1882-83)

हंटर कमीशन 1882 – 83
(Hunter Commission 1882-83)

1854 के घोषणा-पत्र से शिक्षा के क्षेत्र में जितनी प्रगति की आशा की जाती थी, वास्तव में उतनी न हो सकी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अदृश्य कुछ माध्यमिक विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना की गयी, परन्तु प्राथमिक शिक्षा के लिए कुछ भी नहीं किया गया। भारत पहुँचने पर लॉर्ड रिपन ने 3 फरवरी 1882 को गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी के सदस्य विलियम हण्टर की अधीनता में “भारतीय शिक्षा आयोग” की नियुक्ति की। इसी कारण इसे हंटर कमीशन कहा जाता है। यद्यपि उसका लक्ष्य प्राथमिक शिक्षा के विकास के लिए सुझाव प्रस्तुत करना था, परन्तु उसने उच्च शिक्षा के लिए भी सुझाव दिये। मार्च, 1883 में हंटर कमीशन (Hunter Commission) ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें भारतीय शिक्षा के विषय में महत्त्वपूर्ण सुझाव रखे ।

इसने यह सलाह दी, कि देशी भाषाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जाए और शिक्षा-प्रसार के लिए वैयक्तिक प्रयत्नों और व्यवस्था पर अधिक निर्भर रहा जाये – 

  1. प्राथमिक शिक्षा के विकास और सुधार पर सरकार को ध्यान देना चाहिए । प्राथमिक शिक्षा देशी भाषाओं में होनी चाहिए। स्थानीय जिला परिषदों और नगर पालिकाओं की देखरेख में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए । 
  2. माध्यमिक शिक्षा दो प्रकार की होनी चाहिए – साहित्यिक जो अध्ययनशील उच्च शिक्षा के लिए छात्र तैयार करे तथा दूसरी व्यावसायिक जो छात्रों को जीवनयापन के लिए प्रशिक्षित करे । 
  3. शिक्षा के क्षेत्र में सरकार निजी प्रयत्नों को प्रोत्साहन तथा अनुदान देकर प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा को निजी उपक्रम बनाने का प्रयास करे । 
  4. सरकार को उच्च शिक्षण-संस्थानों के प्रत्यक्ष संचालन तथा प्रबंधन से अपना हाथ धीरे-धीरे हटा लेना चाहिए | इसके स्थान पर सरकार द्वारा कॉलेजों तथा माध्यमिक स्कूलों के लिए वित्तीय सहायता तथा विशेष अनुदान की व्यवस्था की जानी चाहिए । 
  5. कॉलेजों और माध्यमिक स्कूलों की स्थापना मुख्यतया सामाजिक संस्थाओं और व्यक्तिगत प्रयत्नों के दवारा की जानी चाहिए । सरकार उन पर नियंत्रण रखे और उन्हें आर्थिक सहायता दे । 
  6. स्त्री शिक्षा पर बल देना चाहिए ।

अगले बीस वर्षों में भारत में शिक्षा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ । इसी समय में ऐसे विश्वविद्यालय स्थापित हुए जो केवल परीक्षा ही नहीं लेते थे बल्कि जहाँ शिक्षा की व्यवस्था भी की गयी। 1882 में पंजाब विश्वविद्यालय और 1885 में लाहौर में दयानन्द कॉलेज के आधार पर ही देश भर में अनेक कॉलेजों की स्थापना हुई। 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, श्रीमती एनी बेसेन्ट ने 1898 ई. में बनारस में हिन्दू कॉलेज का निर्माण करवाया जो आगे चलकर हिन्दू विश्वविदयालय के रूप में परिणित हुआ। परन्तु प्राथमिक शिक्षा पर सरकार ने अधिक ध्यान नहीं दिया। इस प्रकार 1902 तक पाँच विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों की संख्या 194 हो गयी थी जिसमें बारह कॉलेज महिलाओं के लिए भी थे ।

भारतीय शिक्षा आयोग, भारतीय शिक्षा के इतिहास में प्रथम आयोग नियुक्त हुआ था जिसने शिक्षा की जाँच नियमित ढंग से की और अपने सुझाव देकर शिक्षा की एक निश्चित नीति का सूत्रपात किया । भारत सरकार ने हंटर कमीशन की अधिकांश सिफारिशें स्वीकार कर ली ।

 

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