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नगरपालिका कर्मी (Municipal Worker)

भारत में तीन प्रकार के नगरपालिका कार्मिक हैं। नगर सरकारों में कार्यरत कार्मिक इन तीनों में से किसी एक अथवा तीनों से संबंधित हो सकते हैं:

  1. पृथक् कार्मिक प्रणाली
  2. एकीकृत कार्मिक प्रणाली
  3. समेकित कार्मिक प्रणाली

पृथक् कार्मिक प्रणाली (Separate Personnel System)

इस प्रणाली में प्रत्येक स्थानीय निकाय अपने कार्मिकों की नियुक्ति प्रशासन एवं नियंत्रण स्वयं करता है। ये कार्मिक अन्य स्थानीय निकायों में स्थानांतरित नहीं किए जा सकते। यह व्यवस्था सबसे अधिक प्रचलित है। यह प्रणाली स्थानीय स्वायत्तता के सिद्धान्त को कायम रखती है। तथा अविभक्त निष्ठा को प्रोत्साहित करती है।

एकीकृत कार्मिक प्रणाली (Integrated Personnel System)

इस प्रणाली में राज्य सरकार नगरपालिका कार्मिकों की नियुक्ति, प्रशासन तथा नियंत्रण करती है। दूसरे शब्दों में, सभी नगर निकायों के लिए राज्य स्तरीय सेवाएँ (कैडर) सृजित की जाती हैं। इनमें कार्मिकों का विभिन्न स्थानीय निकायों में स्थानांतरण होता रहता है। यह व्यवस्था आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि में लागू है।

समेकित कार्मिक प्रणाली (Consolidated Personnel System)

इस प्रणाली में राज्य सरकार के कार्मिक तथा स्थानीय निकायों के कार्मिक एक ही सेवा का गठन करते है। दूसरे शब्दों में, नगरपालिका कार्मिक राज्य सेवाओं के सदस्य होते है। इनका स्थानांतरण केवल स्थानीय निकायों में ही नहीं बल्कि राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में भी हो सकता है। यह व्यवस्था ओडिशा, बिहार, कर्नाटक, पंजाब हरियाणा तथा अन्य राज्यों में लागू है। नगरपालिका कार्मिकों को प्रशिक्षण देने के लिए राष्ट्रीय स्तर के अनेक संस्थान कार्यरत है, जैसेः

  • अखिल भारतीय स्थानीय स्वशासन संस्थान (All India Institute of Local Self Government, Mumbai): इसकी स्थापना 1927 में हुई थी और यह एक निजी पंजीकृत सोसायटी है।
  • नगरीय एवं पर्यावरणीय अध्ययन केन्द्र (Studies Centre for Urban and Environmental, New Delhi): इसकी स्थापना 1967 में नगर पालिका कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए गठित नूरूद्दीन अहमद समिति (1963-65) की अनुशंसाओं पर की गई थी।
  • क्षेत्रीय, नगरीय एवं पर्यावरणीय अध्ययन केन्द्र (Regional, Urban and Environmental Studies Centre, Kolkata, Lucknow, Hyderabad and Mumbai): इसकी स्थापना 1968 में नगरपालिका कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए गठित नूरूद्दीन अहमद समिति (1963-65) की अनुशंसाओं पर की गई थी।
  • नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (National Institute of Urban Affairs), 1976 में स्थापित।
  • ह्यूमन सेट्लमेन्ट मैनेजमेन्ट इंस्टीट्यूट (Human Settlement Management Institute), 1985 में स्थापित।

 

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शहरी शासनों के प्रकार (Types of Urban Governance)

भारत में निम्नलिखित आठ प्रकार के स्थानीय निकाय नगर क्षेत्रों के प्रकाशन के लिए सृजित किए गए हैं:

  • नगर निगम
  • नगरपालिका
  • अधिसूचित क्षेत्र समिति
  • नगरीय क्षेत्र समिति
  • छावनी परिषद
  • नगरीय क्षेत्र
  • न्यास पत्तन
  • विशेष उद्देश्य एजेन्सी

नगर निगम (Municipal Corporation)

नगर निगम का निर्माण बड़े शहरों, जैसे-दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद, बंगलुरु तथा अन्य शहरों के लिए है। यह संबंधित राज्य विधानमंडल की विधि द्वारा राज्यों में स्थापित हुईं तथा भारत की संसद के अधिनियम द्वारा केंद्रशासित क्षेत्र में, राज्य के सभी नगर निगमों के लिए एक समान अधिनियम हो सकता है या प्रत्येक नगर निगम के लिए पृथक् अधिनियम भी हो सकता है।

नगर निगम में तीन प्राधिकरण हैं – जिनमें परिषद, स्थायी समिति तथा आयुक्त आते हैं।

परिषद निगम (Council Corporation)

  • परिषद निगम की विचारात्मक एवं विधायी शाखा है।
  • इसमें जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पार्षद होता हैं तथा कुछ नामित व्यक्ति भी होते हैं जिनका नगर प्रशासन में ऊंचा ज्ञान तथा अनुभव होता है।
  • परिषद का प्रमुख महापौर (मेयर) होता है।
  • उसकी सहायता के लिए उप-महापौर (डिप्टी मेयर) होता है।
  • ज्यादातर राज्यों में उसका चुनाव एक साल के नवीकरणीय कार्यकाल के लिए होता है।
  • उसका प्रमुख कार्य परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है।

स्थायी समिति (Standing Committee)

  • स्थायी समिति परिषद् के कार्य को सुगम बनाने के लिए गठित की जाती है जोकि आकार में बहुत बड़ी है।
  • वह लोक कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य कर निर्धारण, वित्त व अन्य को देखती है।
  • वह अपने क्षेत्रों में निर्णय लेती है।
  • नगर निगम आयुक्त परिषद और स्थायी समिति द्वारा लिए निर्णयों को लागू करने के लिए जिम्मेदार है।
  • अत: वह नगरपालिका का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है।
  • वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है।

नगरपालिका (Municipality)

नगरपालिकाएं कस्बों और छोटे शहरों के प्रशासन के लिए स्थापित की जाती हैं। निगमों की तरह, यह भी राज्य में राज्य विधानमंडल से संबंधित अधिनियम द्वारा गठित की गई हैं और केंद्रशासित राज्यों में भारत की संसद के द्वारा गठित की गई हैं। यह अन्य नामों, जैसे नगरपालिका परिषद, नगरपालिका समिति, नगरपालिका बोर्ड, उपनगरीय नगरपालिका, शहरी नगरपालिका तथा अन्य से भी जानी जाती हैं।

  • नगर निगम की तरह, नगरपालिका के पास भी परिषद, स्थायी समिति तथा मुख्य कार्यकारी अधिकारी नामक अधिकार क्षेत्र आते हैं।
  • परिषद निगम की वैचारिक व विधायी शाखा है। इसमें लोगों द्वारा सीधे निर्वाचित (काउंसलर) शामिल है।
  • परिषद का प्रधान अध्यक्ष होता है। उपाध्यक्ष उसका सलाहकार है। वह परिषद की सभा की अध्यक्षता करता है।
  • नगर निगम के महापौर के विपरीत नगर प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण एवम् प्रमुख भूमिका होती है।
  • परिषद की बैठकों की अध्यक्षता के अलावा यह कार्यकारी शक्तियों का भी उपयोग करना है।

स्थायी समिति परिषद के कार्य को सुगम बनाने के लिए गठित की जाती है। वह लोक कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, कर निर्धारण, वित्त तथा अन्य को देखती है। मुख्य कार्यकारी अधिकारी नगरपालिका के दैनिक प्रशासन का जिम्मेदार होता है। वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता

अधिसूचित क्षेत्र समिति (Notified Area Committee)

अधिसूचित क्षेत्र समिति का गठन दो प्रकार के क्षेत्र के प्रशासन के लिए किया जाता है – औद्योगीकरण के कारण विकासशील कस्बा और वह कस्बा जिसने अभी तक नगरपालिका के गठन की आवश्यक शर्ते पूरी नहीं की हों लेकिन राज्य सरकार द्वारा वह महत्वपूर्ण माना जाए।

चूंकि इसे सरकारी राजपत्र में प्रकाशित कर अधिसूचित किया जाता है, इसलिए इसे अधिसूचित क्षेत्र समिति के रूप में जाना जाता है।

  • यद्यपि यह राज्य नगरपालिका अधिनियम के ढांचे के अंतर्गत कार्य करता है।
  • अधिनियम के केवल वहीं प्रावधान इसमें लागू होते हैं, जिन्हें सरकारी राजपत्र में अधिसूचित किया गया है।
  • इसकी शक्तियां लगभग नगरपालिका की शक्तियों के समान हैं।
  • यह पूरी तरह नामित इकाई है, जिसमें राज्य सरकार द्वारा मनोनीत अध्यक्ष के साथ अधिसूचित क्षेत्र समिति के सदस्य हैं।
  • अतः न तो यह निर्वाचित इकाई है और न ही संविधिक निकाय है।

नगर क्षेत्रीय समिति (City Regional Committee)

  • नगर क्षेत्रीय समिति छोटे कस्बों में प्रशासन के लिए गठित की जाती है।
  • यह एक उपनगरपालिका आधिकारिक इकाई है और इसे सीमित नागरिक सेवाएं; जैसे – जल निकासी, सड़कें, मार्गों में प्रकाश व्यवस्था और सरंक्षणता की जिम्मेदारी दी जाती है।
  • यह राज्य विधानमंडल के एक अलग अधिनियम द्वारा गठित किया जाता है।
  • इसका गठन, कार्य और अन्य मामले अधिनियम द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
  • इसे पूर्ण या आंशिक रूप से राज्य सरकार द्वारा निर्वाचित या नामित किया जा सकता है।

छावनी परिषद (Cantonment Council)

  • छावनी क्षेत्र में सिविल जनसंख्या के प्रशासन के लिए छावनी परिषद की स्थापना की जाती है।
  • इसे 2006 के छावनी अधिनियम के उपबंधों के तहत गठित किया गया है, यह विधान केन्द्र सरकार द्वारा निर्मित किया गया है।
  • यह केंद्रीय सरकार के रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन कार्य करता है।
  • अतः ऊपर दी गई स्थानीय शहरी इकाइयों के विपरीत जो कि राज्य द्वारा प्रशासित और गठित की गई हैं, छावनी परिषद केंद्र सरकार द्वारा गठित और प्रशासित की जाती है।
  • 2006 का छावनी अधिनियम इस आशय से अधिनियमित किया गया था कि छावनी प्रशासन से संबंधित नियमों को संशोधित कर अधिक लोकतांत्रिक बनाया जा सके तथा छावनी क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों के लिए वित्तीय आधार को और उन्नत किया जा सके।
  • इस अधिनियम द्वारा छावनी अधिनियम 1924 को निरस्त कर दिया गया।
  • वर्तमान में (2016) देश भर में 62 छावनी बोर्ड हैं।
  • एक छावनी परिषद में आंशिक रूप से निर्वाचित या नामित सदस्य शामिल होते हैं।
  • निर्वाचित सदस्य 3 वर्ष की अवधि के लिए, जबकि नामित सदस्य (पदेन सदस्य) उस स्थान पर लंबे समय तक रहते है।
  • सेना अधिकारी जिसके प्रभाव में वह स्टेशन हो, परिषद का अध्यक्ष होता है और सभा की अध्यक्षता करता है।
  • परिषद के उपाध्यक्ष का चुनाव उन्हीं में से निर्वाचित सदस्यों द्वारा 3 वर्ष की अवधि के लिए होता है।
  • छावनी परिषद द्वारा किए गए कार्य नगरपालिका के समान होते हैं।
  • आय के साधनों में दोनों, कर एवं गैर-कर राजस्व शामिल हैं।
  • छावनी परिषद के कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा होती है।
  • यह परिषद और इसकी समिति के सारे प्रस्तावों एवं निर्णयों को लागू करता है और इस प्रयोजन हेतु गठित केन्द्रीय कैडर से संबद्ध होता है।

नगरीय क्षेत्र (Urban Area)

इस तरह का शहरी प्रशासन वृहत सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा स्थापित किया जाता है। जो उद्योगों के निकट बनी आवासीय कॉलोनियों में रहने वाले अपने कर्मचारियों को सुविधाएं प्रदान करती है।

  • यह उपक्रम नगर के प्रशासन की देखरेख के लिए एक नगर प्रशासक नियुक्त करता है।
  • उसे कुछ इंजीनियर एवं अन्य तकनीकी और गैर-तकनीकी कर्मचारियों की सहायता प्राप्त होती है।
  • अतः शहरी प्रशासन के नगरीय रूप में कोई निर्वाचित सदस्य नहीं होते हैं।
  • यह उपक्रमों की नौकरशाही संरचना का विस्तार है।

न्यास पत्तन (Trust Port)

न्यास पत्तन की स्थापना बंदरगाह क्षेत्रों जैसे – मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और अन्य में मुख्य रूप से दो उद्देश्यों के लिए की जाती है ।

  • बंदरगाहों की सुरक्षा व व्यवस्था ।
  • नागरिक सुविधाएं प्रदान करना।

न्यास पत्तन का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया गया है। इसमें निर्वाचित और गैर-निर्वाचित दोनों प्रकार के सदस्य सम्मिलित हैं। इसका एक आधिकारिक अध्यक्ष होता है। इसके नागरिक कार्य काफी हद तक नगरपालिका की तरह होते हैं।

विशेष उद्देश्य हेतु अभिकरण (Agency for Special Purpose)

इन 7 क्षेत्रीय आधार वाली शहरी इकाइयों (या बहुउद्देशीय इकाइयां) के साथ, राज्यों ने विशेष कार्यों के नियंत्रण हेतु विशेष प्रकार की अभिकरणयों का गठन किया है जो नगर निगमों या नगरपालिकाओं या अन्य स्थानीय शासनों के समूह से संबंधित हों। दूसरे शब्दों में, यह कार्यक्रम पर आधारित हैं न कि क्षेत्र पर। इन्हें ‘एकउद्देशीय’, ‘व्यापक उद्देशीय’ या ‘विशेष उद्देशीय इकाई’ या ‘स्थानीय कार्यकारी ईकाई’ के रूप में जाना जाता है। कुछ इस तरह की इकाइयां इस प्रकार हैं:

  • नगरीय सुधार न्यास
  • शहरी सुधार प्राधिकरण
  • जलापूर्ति एवं मल निकासी बोर्ड
  • आवासीय बोर्ड
  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
  • विद्युत आपूर्ति बोर्ड
  • शहरी यातायात बोर्ड

यह कार्यकारी स्थानीय इकाईयां, सांविधिक इकाइयों के रूप में राज्य विधानमंडल या विभागों के अधिनियम द्वारा स्थापित की जाती हैं। यह स्वायत्त इकाई के रूप में कार्य करती हैं और स्थानीय शहरी प्रशासन द्वारा सौंपे कार्यों को स्वतंत्र रूप से करती हैं अर्थात् नगर निगम, नगरपालिकाएं आदि। अतः ये स्थानीय नगरपालिका इकाइयों के अधीनस्थ नहीं हैं।

 

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नगरपालिका प्रशासन (Municipal Administration)

नगर पालिकाओं से संबंधित मुख्य प्रावधानस्वायत्त शासन की संस्थाएं –

  1. नगर पंचायत, ऐसे क्षेत्र के लिए जो ग्रामीण क्षेत्र से, नगर क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है। (10,000 से 20,000 की जनसंख्या के लिए)
  2. नगर परिषद् छोटे नगर क्षेत्र के लिए (20,000 से 3 लाख की जनसंख्या के लिए)
  3. नगर निगम, बड़े नगर क्षेत्र के लिए । (3 लाख से अधिक जनसंख्या के लिए)
  4. वार्ड – आयोग की स्थापना – ऐसे क्षेत्र जहां जनसंख्या 3 लाख तक है।

नगरपालिका का गठन (Municipal Formation)

नगरपालिकाओं के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित होंगे। राज्य विधान मंडल अपनी विधि द्वारा निम्नलिखित व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रावधान कर सकता है –

  • नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्ति, लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा और विधान परिषद के सदस्य,
  • संविधान के अनुच्छेद 243-ध के अंतर्गत गठित वाई समितियों के अध्यक्ष।
  • अध्यक्षों को निर्वाचन विधानमंडल द्वारा निर्मित उपबंध के अनुसार किया जायेगा।
  • तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र में आने वाले दो या अधिक वाडों के लिए वार्ड समितियां बनाना आवश्यक है।
  • विधान मंडल वाडों का गठन, क्षेत्र तथा सदस्यों के चुनाव की विधि तय करेगा।
  • विधान मंडल अन्य समितियों का भी गठन कर सकता है।

आरक्षण (Reservation)

  • पंचायत की तरह नगरपालिका में भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
  • महिलाओं के लिए 5 स्थानों की आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं का आरक्षण भी शामिल है।
  • नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पद के आरक्षण का निर्णय राज्य विधान मंडल को लेना है। विधान मंडल अध्यक्ष पदों को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित कर सकता है।

कार्यकाल (Tenure)

  • नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष है।
  • इसका विघटन अवधि से पूर्व भी किया जा सकता है। साथ ही, नगरपालिकाओं की तय अवधि से पूर्व ही नये चुनाव हो जाने चाहिए।
  • विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 मास के अंदर ही चुनाव हो जाने चाहिए।
  • यदि शेष अवधि 6 मास से कम है। तो चुनाव कराना आवश्यक नहीं होता है।

योग्यताएं (Qualifications)

संविधान के अनुच्छेद 243-फ के अनुसार राज्यों के विधान मंडल के सदस्यों के लिए निर्धारित योग्यताएं ही नगरपालिकाओं के सदस्यों के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित की गयी हैं। परन्तु इसमें एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। जो व्यक्ति 21 वर्ष के हैं वे भी सदस्यता के लिए अर्ह होंगे, जबकि संविधान में यह उल्लिखित है कि विधान मंडल के निर्वाचन के लिए वे ही व्यक्ति अर्ह होंगे जो 25 वर्ष के हो चुके हैं (अनुच्छेद-178)।

शक्तियां, अधिकार और उत्तरदायित्व (Powers, Rights and Responsibilities)

संविधान के अनुच्छेद 243-ब द्वारा विधान मंडलों को यह शक्ति दी गई है कि वे नगरपालिकाओं को ऐसी शक्तियां और अधिकार दे सकते हैं, जो स्वायत्त शासन की संस्थाओं के लिए आवश्यक है। इन संस्थाओं को निम्नलिखित उत्तरदायित्व सोपे जा सकते हैं:

  • आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं तैयार करना,
  • इन योजनाओं का कार्यान्वयन, तथा;
  • 12वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों के संबंध में। इस अनुसूची में 18 विषय हैं।

18 विषय – राज्य विधानमण्डल द्वारा प्रदान किये जायेंगे

  1. नगरीय योजना (इसमें शहरी योजना भी शमिल है।)
  2. भूमि उपयोग का विनियम और भवनों का निर्माण 
  3. आर्थिक व सामाजिक विकास की योजना 
  4. सड़के व पुल 
  5. घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के निमित जल की आपूर्ति
  6. लोक स्वास्थ्य स्वच्छता, सफाई तथा कूड़ा करकट का प्रबंध
  7. अग्निशमन सेवाएं
  8. नगरीय वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण और पारिस्थितिक पहलुओं की अभिवृद्धि
  9. समाज के कमजोर वर्गों जिसके अंतर्गत विकलांग और मानसिक रुप से मंद व्यक्ति सम्मिलित है के हितों का संरक्षण
  10. गंदी बस्तियों का सुधार
  11. नगरीय निर्धनता में कमी
  12. नगरीय सुख-सुविधाओं, जैसे पार्क, उद्यान, खेल का मैदान इत्यादि की व्यवस्था
  13. सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सौन्दर्यपरक पहलुओं की अभिवृद्धि
  14. कब्रिस्तान, शव गाड़ना , श्मशान और शवदाह तथा विधुत शवदाह
  15. पशु – तालाब तथा जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकना
  16. जन्म-मरण सांख्यिकी (जन्म-मरण पंजीकरण सहित)
  17. लोक सुख सुविधायें (पथ-प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस स्टापं, लोक सुविधा सहित)
  18. वधशालाओं तथा चर्म शोधनशालाओं का विनियमन

कर लगाने की शक्ति (Taxing Power)

राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं को कर, शुल्क, पथकर, आदि वसूलने या संग्रह करने तथा उन्हें निवेश करने का अधिकार दे सकता है। राज्य की संचित निधि से नगरपालिकाओं को-अनुदान दिया जा सकता है [अनुच्छेद-243(भ)]।

वित्त आयोग (Finance Commission)

संविधान के अनुच्छेद 243(म) के अनुसार गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करेगाः

राज्य और नगरपालिकाओं के बीच, राज्य द्वारा वसूले और उनके बीच बंटने वाले कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस की शुद्ध आमदनी का वितरण और नगरपालिकाओं के विभिन्न स्तरों में उनका आबंटन, नगरपालिकाओं की सहायता अनुदान, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक उपाय, तथा; कोई अन्य विषय जो राज्यपाल तय करे।

संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा गठित वित्त आयोग के कर्तव्यों में एक और कर्तव्य की जोड़ा गया है। यह इस प्रकार है- राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य की नगरपालिकाओं के साधन स्रोतों की पूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि में वृद्धि करने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए, इस पर भी राष्ट्रपति द्वारा गठित वित आयोग अपनी सिफारिश देगा।

निर्वाचन (Election)

संविधान के अनुच्छेद 243-य(क) के अनुसार गठित राज्य चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयारी कराने, और; नगरपालिकाओं के चुनाव सम्पन्न कराने के संबंध में कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है।

निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप निषिद्धः

अनुच्छेद – 243 (य छ) के प्रावधानों के अनुसार, न्यायालयों को इस बात की अधिकारिता नहीं होंगी कि वे अनुच्छेद-243 (य क) के अधीन निर्वाचन क्षेत्रो के परिसीमन अथवा स्थानों के आवंटन से सम्बंधित किसी विधि की वैधानिक की जांच करें। नगरपालिका के निर्वाचन, निर्वाचन-याचिका पर ही प्रश्नगत किए जा सकेंगे, जो ऐसे प्राधिकारी को एवं ऐसी रीति से प्रस्तुत की जाएगी जो राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाई गई विधि अथवा उसके अधीन विहित की जाए।

 

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नगरीय प्रशासन की स्थापना (Establishment of Urban Administration)

अगस्त 1989 में, राजीव गांधी सरकार ने लोकसभा में 65वां संविधान संशोधन विधेयक (नगरपालिका विधेयक) पेश किया। इस विधेयक का उद्देश्य नगरपालिका के ढांचे पर उनकी संवैधानिक स्थिति पर परामर्श कर उन्हें शक्तिशाली बनाना एवं सुधारना था। यद्यपि यह विधेयक लोकसभा में पारित हुआ किंतु अक्तूबर, 1989 में यह राज्यसभा में गिर गया और निरस्त हो गया।

वी. पी. सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने सितंबर, 1990 में लोकसभा में पुनः संशोधित नगरपालिका विधेयक पुरः स्थापित किया। फिर भी यह विधेयक पास नहीं हुआ और अंत में लोकसभा विघटित होने पर निरस्त हो गया।

प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव द्वारा इसे 74वें संविधान संशोधन विधेयक 1992 के रुप में पुनः लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। क्रमशः 22 एवं 23 दिसम्बर, 1992 को इसे लोकसभा एवं राज्यसभा द्वारा पारित कर दिये जाने पर 20 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति प्रदान किया गया, तथा 1 जून 1993 से लागू कर दिया गया। इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग-9 ‘क’ तथा 243 त (P) से 243 य छ (ZG) तक 18 नये अनुच्छेद एवं एक नयी अनुसूची (बारहवीं अनुसूची) जोड़कर नगर प्रशासन के विषय में विस्तृत प्रावधान किया गया है। भाग – 9(क) के तहत नगरपालिका के सम्बंध में किये गये प्रमुख प्रावधान अधोलिखित है।

नगरीय शासन सम्बन्धी संवैधानिक उपबंध (भाग 9-क)
Constitutional Provisions Related to Urban Governance (Part 9-A)

  • अनुच्छेद 243 – त (P) – परिभाषा
  • अनुच्छेद 243 – थ (Q) – नगर पालिकाओं का गठन
  • अनुच्छेद 243 – द (R) – नगर पालिकाओं की संरचना
  • अनुच्छेद 243 – ध (S) – वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना
  • अनुच्छेद 243 – न (T) – स्थानों का आरक्षण
  • अनुच्छेद 243 – प (U) – नगर पालिकाओं की अवधि आदि
  • अनुच्छेद 243 – फ (V) – सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
  • अनुच्छेद 243 – ब (W) – नगरपालिकाओं आदि की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तदायित्व
  • अनुच्छेद 243 – भ (X) – नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
  • अनुच्छेद 243 – म (Y) – वित्त आयोग
  • अनुच्छेद 243 – य (Z) – नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
  • अनुच्छेद 243 – य क (ZA) – नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
  • अनुच्छेद 243 – य ख (ZB) – संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होना
  • अनुच्छेद 243 – य ग (ZC) – इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
  • अनुच्छेद 243 – य घ (ZD) – ज़िला योजना के लिए समिति
  • अनुच्छेद 243 – य ङ (ZE) – महानगर योजना के लिए समिति
  • अनुच्छेद 243 – य च (ZF) – विद्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना
  • अनुच्छेद 243 – य छ (ZG) – निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन

 

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नगर निकायों का विकास और आयोग व समितियाँ (Development of Municipal Bodies and Commissions and Committees)

भारत में ‘शहरी स्थानीय शासन (Urban Local Government)’ का अर्थ शहरी क्षेत्र के लोगों द्वारा चुने प्रतिनिधियों से बनी सरकार से है। शहरी स्थानीय शासन का अधिकार क्षेत्र उन निर्दिष्ट शहरी क्षेत्रों तक सीमित है, जिसे राज्य सरकार द्वारा इस उद्देश्य के लिए निर्धारित किया गया है।

भारत में 8 प्रकार के शहरी स्थानीय शासन हैं –

  1. नगरपालिका परिषद (Municipal Council),
  2. नगरपालिका (Municipality),
  3. अधिसूचित क्षेत्र समिति (Notified Area Committee),
  4. शहरी क्षेत्र समिति (Urban Area Committee),
  5. छावनी बोर्ड (Cantonment Board),
  6. शहरी क्षेत्र समिति (Urban Area Committee),
  7. पत्तन न्यास (Port Trust) और
  8. विशेष उद्देश्य के लिए गठित एजेंसी (Agency for Special Purpose)

नगरीय शासन की प्रणाली को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संवैधानिक दर्जा मिल गया। केन्द्र स्तर पर “नगरीय स्थानीय शासन (Urban Local Government)” का विषय निम्नलिखित तीन मंत्रालयों से संबंधित है:
1. नगर विकास मंत्रालय, जो कि 1985 में एक अलग मंत्रालय के रूप में सृजित हुआ।
2. रक्षा मंत्रालय, कैण्टोनमेण्ट बोर्डो के मामले में
3. गृह मंत्रालय, संघीय क्षेत्रों के मामले में

नगर निकायों का विकास (Development of Municipal Bodies)

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य आधुनिक भारत में ब्रिटिश काल के दौरान स्थानीय नगर प्रशासन की संस्थाएँ अस्तित्व में आईं। इस संदर्भ में प्रमुख घटनाएँ निम्नवत हैं:

  • 1687-88 में भारत का पहला नगर निगम मद्रास में स्थापित हुआ।
  • 1726 में बम्बई तथा कलकत्ता में नगर निगम स्थापित हुए।
  • 1870 का लॉर्ड मेयो का वित्तीय विकेन्द्रीकरण का संकल्प स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के विकास में परिलक्षित हुआ।
  • लॉर्ड रिपन का 1882 का संकल्प स्थानीय स्वशासन के लिए “मैग्नाकार्टा” की हैसियत रखता है। उन्हें भारत में ‘स्थानीय स्वशासन का पिता’ कहा जाता है
  • 1907 में रॉयल कमीशन ऑन डीसेन्ट्रलाइजेशन की नियुक्ति हुई, जिसने 1909 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस आयोग के अध्यक्ष हॉब हाउस थे।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1919 के द्वारा प्रांतों में लागू की गई द्विशासनिक योजना के अंतर्गत स्थानीय स्वशासन एक अंतरित विषय बन गया और इसके लिए एक भारतीय मंत्री को प्रभारी बनाया गया।
  • 1924 में कैण्टोमेन्ट एक्ट केन्द्रीय विधायिका द्वारा पारित किया गया
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा लागू प्रांतीय स्वायत्तता के अंतर्गत स्थानीय स्वशासन को प्रांतीय विषय घोषित किया गया।

समितियाँ एवं आयोग (Committees and Commissions)

केन्द्र सरकार द्वारा स्थानीय नगर शासन की कार्य प्रणाली में सुधार के लिए समय समय पर नियुक्त समितियों एवं आयोगों का गठन किया गया है।

स्थानीय नगर शासन विषय पर नियुक्त समितियाँ एवं आयोग (Committees and Commissions Appointed on Local City Governance)

स्थानीय वित्तीय जाँच समिति (Local Financial Checking Committee)

  • वर्ष – 1949 – 51
  • अध्यक्ष – पी. के. वट्टाल

करारोपण जाँच आयोग (Taxation Inquiry Commission)

  • वर्ष – 1953 – 54
  • अध्यक्ष – जॉन मथायी

नगर निगम कर्मचारियों के प्रशिक्षण पर गठित समिति (Committee on Training of Municipal Employees)

  • वर्ष  – 1963 – 65
  • अध्यक्ष – नुरुद्दीन अहमद

ग्रामीण नगरीय संबंध समिति (Rural Urban Relations Committee)

  • वर्ष – 1963 – 66
  • अध्यक्ष – ए.पी.जैन

स्थानीय नगर निकायों के वित्तीय संसाधनों के संवर्द्धन के लिए मंत्रियों की समिति (Committee of Ministers for the Promotion of Financial Resources of Local Municipal Bodies)

  • वर्ष – 1963
  • अध्यक्ष – रफीक जकारिया

नगर निगम कर्मचारियों की कार्यदशाओं पर समिति (Committee on the Working Conditions of the Municipal Corporation)

  • वर्ष – 1965-68

नगर प्रशासन में बजटीय सुधार पर समिति (Committee on Budgetary Reform in City Administration)

  • वर्ष – 1974
  • अध्यक्ष – गिरिजापति मुखर्जी

स्थानीय नगर निकायों तथा नगर निगमों के गठन, शक्तियों तथा कानूनों पर गठित अध्ययन दल (Study Team formed on the formation, powers and laws of local municipalities and municipal corporations)

  • वर्ष – 1982
  • अध्यक्ष – के.एन.सहाय

नगरीकरण पर राष्ट्रीय आयोग (National Commission on Urbanization)

  • वर्ष – 1985-88
  • अध्यक्ष – सी.एन. कुरिया

 

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भारतीय चुनाव प्रणाली (Indian Election System)

17वें लोकसभा चुनाव की तारीख का ऐलान हो गया हैं। यह चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई तक 7 चरणों में होंगे और 23 मई को नतीजे आएंगे। इसके साथ ही आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में भी विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही कराया जायेगा।

चुनाव किसी भी लोकतंत्र के लिए एक सर्वाधिक सशक्त तत्व है तथा जब-तक चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होते रहते हैं, तब-तक राष्ट्र में ईमानदार जन-प्रतिनिधित्व कायम रहता है। विश्व के सबसे बड़े एवं सर्वाधिक लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाला देश भारत इस बात पर गर्व कर सकता है कि केन्द्र एवं राज्यों में यदि विगत 70 वर्षों में शान्तिपूर्ण तरीके से सत्ता का हस्तान्तरण हुआ है, तो इसका श्रेय मुख्य रूप से भारत की निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली को जाना चाहिए।

भारतीय चुनाव प्रणाली (Indian Election System)

लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव बहुमत अथवा ‘फर्स्ट-पास्ट-दि-पोस्ट (First Past the Post)’ निर्वाचन प्रणाली का प्रयोग कर कराए जाते हैं। देश को विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा जाता है, जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, तथा चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र प्रत्याशियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रत्याशी खड़े करते हैं और अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए, अपनी पसंद के एक प्रत्याशी के लिए प्रत्येक व्यक्ति एक वोट डाल सकता है। प्रत्याशी जो अधिकतम मत संख्या प्राप्त कर लेता है, चुनाव जीत जाता है और निर्वाचित हो जाता है। इसलिए चुनाव ही वह साधन है जिसके द्वारा लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं।

कौन मतदान कर सकता है? (Who Can Vote?)

जबकि मतदाता के लिए कोई निर्धारित अधिकतम आयु-सीमा नहीं है, परन्तु भारतीय संविधान के मूल प्रावधानों के अनुसार, 21 वर्ष आयु से ऊपर के सभी भारतीय नागरिक चुनावों के समय वोट देने के हकदार हैं। वर्ष 1988 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री, राजीव गाँधी द्वारा कराये गए 61वें संविधान संशोधन द्वारा नागरिकों की निम्नतम मतदान आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई जो 28 मार्च 1989 से प्रभावी हो गई। इसके अतिरिक्त किसी भी निर्वाचन-क्षेत्र में एक मतदाता के रूप में पंजीकृत किए जाने के लिए कोई व्यक्ति, अनावास के आधार पर, अथवा उसके अस्वस्थ होने पर, अथवा उसे अपराध या भ्रष्टाचार या अवैध व्यवसाय के आधार पर कानून के तहत अयोग्य घोषित न किया गया हो।

चुनाव कौन लड़ सकता है? (Who Can Fight for Elections?)

लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषद् हेतु चुनाव लड़ने के लिए कौन सुयोग्य है। सभी प्रतिस्पर्धी प्रत्याशियों को यदि लोकसभा चुनाव लड़ना हो तो 25,000 रुपये और यदि विधानसभा चुनाव लड़ना हो तो 10,000 रुपये जमा कराने होते हैं। इसको प्रत्याशियों की प्रतिभूति राशि माना जाता है। यह प्रतिभूति राशि उन सभी प्रत्याशियों को लौटा दी जाती है जो उस निर्वाचन क्षेत्र में डाले गए कुछ वैध मतों की संख्या के एक-बटा-छह से अधिक मत प्राप्त करते हैं। अन्य सभी प्रत्याशी अपनी प्रतिभूति राशि हार जाते है।

नोट: आरक्षित वर्ग के लिए यह रकम आधी हो जाती है।

इसके अतिरिक्त, नामांकन उस निर्वाचन क्षेत्र से जिससे प्रत्याशी, यदि – वह किसी पंजीकृत राजनीतिक दल द्वारा प्रायोजित किया जा रहा हो; चुनाव लड़ना चाहता है, कम से कम एक पंजीकृत मतदाता द्वारा समर्थित हो, और यदि वह प्रत्याशी स्वतंत्र प्रत्याशी हो तो कम से कम दस पंजीकृत मतदाताओं द्वारा समर्थित हो।

भारतीय चुनाव प्रणाली की कमजोरियाँ (Vulnerabilities of the Indian Electoral System)

भारत के विशाल भौगोलिक आकार तथा भारत की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक धार्मिक सांस्कृतिक विविधताओं के सन्दर्भ में चुनाव प्रणाली में समय-समय पर किए गए सुधारों से यह उत्तरोत्तर सुदृढ हुई है, लेकिन इसमें आज भी अनेक कमजोरियों दृष्टिगोचर होती हैं। सामान्यतया भारत की निर्वाचन प्रणाली निम्नलिखित कमजोरियों से ग्रसित है –

  • कम मतदान प्रतिशत के साथ विधायिका में ईमानदार और वास्तविक प्रतिनिधित्व की अभाव – मतदान का औसत 55-65 प्रतिशत के बीच रहता है। इसका अर्थ है कि 45-35 प्रतिशत जनता की राष्ट्रीय राजनीति और नीतियों के निर्धारण में कोई भूमिका ही नहीं है।
  • राजनीतिक दलों एवं राजनीतिज्ञों पर से उठता विश्वास – भारत के राजनीतिज्ञों पर से आम आदमी को विश्वास उठ गया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफास (Association for Democratic Rifaas) तथा नेशनल इलेक्शन वाच (National Election Watch) द्वारा सन् 2014 और उसके बाद के निर्वाचनों में विजयी सांसदों/विधायकों की सम्पत्तियों तथा उनके विरुद्ध न्यायालयों में लम्बित आपराधिक मामलों का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है उसके अनुसार 543 सांसदों में से 34 प्रतिशत (184) के विरुद्ध न्यायालयों में आपराधिक वाद लम्बित है।
    • 76 सांसद हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण एवं चोरी जैसे गम्भीर अपराधों में आरोपी हैं।
    • राज्य विधान सभाओं के 4032 विधायकों में से 1258 विधायकों (31%) के विरुद्ध आपराधिक वाद लम्बित हैं।
    • 564 विधायक (14%) हत्या, अपहरण, आगजनी, बलात्कार चोरी जैसे गम्भीर मामलों में अभियुक्त है।
  • राजनीति का अपराधीकरण तथा अपराधियों का राजनीतिकरण – भारतीय राजनीति का विदूपयुक्त चेहरा यह बताता है, कि अपराधियों के चुनाव न लड़ने पर कोई रोक न होने के कारण हत्या, अपहरण, आगजनी, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्त लोग भी केवल इस आधार पर चुनाव लड़ने और जीतने में सफल हो जाते हैं कि मामला न्यायालय में लम्बित है। न्याय-प्रणाली की विडम्बना यह है कि निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की न्यायिक प्रक्रिया में 20 से 30 वर्ष तक का समय लग जाता है।
  • सर्वाधिक खर्चीली चुनाव प्रणाली – भारत की निर्वाचन प्रणाली को सर्वाधिक खर्चीला माना जाता है लोक सभा का चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को अनुमानित 5 करोड़ से 50 करोड़ तक का खर्चा उठाना पड़ता है।

स्पष्ट है कि उम्मीदवारों द्वारा चुनाव लड़ने पर बहुत बड़ी धनराशि खर्च की जाती हैं और यह सारा का सारा धन काला धन होता है।

  • राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चन्दे में अपारदर्शिता – यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि भारत के औद्योगिक घराने सभी बड़े राजनीतिक दलों को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का चन्दा देते हैं, एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफाम्स (ADR) के एक विश्लेषण के अनुसार राजनीतिक दलों को ज्ञात स्रोतों से प्राप्त होने वाले चन्दे का 87 प्रतिशत उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों से आता है। इसका सीधा सा निष्कर्ष है कि राजनीतिज्ञों एवं व्यावसायिक जगत् के कर्ताधर्ताओं के बीच गहरी साँठगाँठ है।

कानूनन भारत के राजनीतिक दल विदेशी कम्पनियों से चन्दा नहीं ले सकते। अब एनडीए सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 को संशोधित करके राजनीतिक दलों द्वारा विदेशी कम्पनियों से चन्दा लेने को वैधता प्रदान कर दी है। इतना ही नहीं अब राजनीतिक दलों द्वारा 5 अगस्त, 1976 के बाद विदेशी कम्पनियों से लिए गए चन्दों की जाँच भी नहीं की जा सकेगी 2014 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले से राजनीतिक दल विदेशी कम्पनियों से लिए गए चन्दे के मामलों में जाँच के घेरे में थे।

कालेधन के रूप में लिए गए चन्दे का तो कोई भी राजनीतिक दल लेखा-जोखा ही नहीं रखता यही कि लगभग सभी राजनीतिक दल स्वयं को सूचना पाने का अधिकार अधिनियम 2005 के दायरे में आने का विरोध कर रहे थे, केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने एक निर्णय में सभी 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों काग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सीपीआई एम, सीपीआई तथा बहुजन समाज पार्टी को सूचना पाने का अधिकार अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत आछादित होने का निर्णय 3 जून, 2013 को सुनाया था। इस निर्णय के विरुद्ध सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आ गए और केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने सूचना पाने का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन लाने सम्वन्धी विधेयक का अनुमोदन कर दिया।

  • मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने की हेरा-फेरी – राज्यों में सत्तारूढ राजनीतिक दल की शह पर जिला निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरा फेरी की जाती है विरोधी राजनीतिज्ञों के समर्थक मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए जाते हैं, जबकि सत्ता-दल के समर्थकों के नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में जोड दिए जाते हैं ।
  • सभी उम्मीदवारों को नकारने का मुद्दा –  समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थक एक स्वर से यह माँग करते रहे हैं, कि मतदाताओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे चुनाव में खडे एक को छोड़कर सभी को नापसंद करने के स्थान पर कोई भी पसन्द नहीं का भी विकल्प चुन सकें सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर भारत निवचिन आयोग ने अक्टूबर-दिसम्बर 2013 में सम्पन्न मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली तथा मिजोरम के चुनाव में उपर्युक्त में से कोई नहीं (None of the Above – NOTA) का विकल्प इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा बटन के रूप में रखा और आश्चर्य जनक रूप से देश के पिछड़े राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ राज्य के अनेक मतदाताओं ने नोटा विकल्प को चुना और हाल ही मे संपन्न हुए विधानसभा के चुनाव में भी इसका अच्छा खासा असर देखा गया
  • निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार (Right to Reciall) – समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थकों की यह भी माँग है कि मतदाताओं को यह भी अधिकार होना चाहिए कि वे यदि अपने निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचित प्रतिनिधि की गतिविधियों से सन्तुष्ट न हों, तो उसकी सदस्यता समाप्त कराने अर्थात् उसे वापस बुला सकें, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के सिद्धान्त का प्रतिपादन लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया था।
  • गैर-गम्भीर सांसदों/विधायकों की बढ़ती संख्या – जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धान्त पर लोक सभा और विधान सभा में ऐसे सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो विधायी कार्यों, आर्थिक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति गम्भीर नहीं हैं। इस कटु वास्तविकता का अनुमान सदन की कार्यवाहियों के दौरान सदस्यों की लगातार घटती संख्या से लगाया जा सकता है। सरकार बचाने या गिराने जैसे मुद्दों पर सदन में मतदान होने के समय उपस्थित रहने के लिए मुख्य सचेतक द्वारा लिखित आदेश की बाध्यता से ही सदस्य सदन में उपस्थित रहते हैं वह भी केवल हों या न का बटन दबाने के लिए या सदन में हल्ला गुल्ला करने के लिए।

 

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