नगरपालिका प्रशासन (Municipal Administration)

नगर पालिकाओं से संबंधित मुख्य प्रावधानस्वायत्त शासन की संस्थाएं –

  1. नगर पंचायत, ऐसे क्षेत्र के लिए जो ग्रामीण क्षेत्र से, नगर क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है। (10,000 से 20,000 की जनसंख्या के लिए)
  2. नगर परिषद् छोटे नगर क्षेत्र के लिए (20,000 से 3 लाख की जनसंख्या के लिए)
  3. नगर निगम, बड़े नगर क्षेत्र के लिए । (3 लाख से अधिक जनसंख्या के लिए)
  4. वार्ड – आयोग की स्थापना – ऐसे क्षेत्र जहां जनसंख्या 3 लाख तक है।

नगरपालिका का गठन (Municipal Formation)

नगरपालिकाओं के सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा निर्वाचित होंगे। राज्य विधान मंडल अपनी विधि द्वारा निम्नलिखित व्यक्तियों के प्रतिनिधित्व के लिए प्रावधान कर सकता है –

  • नगरपालिका प्रशासन में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले व्यक्ति, लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा और विधान परिषद के सदस्य,
  • संविधान के अनुच्छेद 243-ध के अंतर्गत गठित वाई समितियों के अध्यक्ष।
  • अध्यक्षों को निर्वाचन विधानमंडल द्वारा निर्मित उपबंध के अनुसार किया जायेगा।
  • तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरपालिका क्षेत्र में आने वाले दो या अधिक वाडों के लिए वार्ड समितियां बनाना आवश्यक है।
  • विधान मंडल वाडों का गठन, क्षेत्र तथा सदस्यों के चुनाव की विधि तय करेगा।
  • विधान मंडल अन्य समितियों का भी गठन कर सकता है।

आरक्षण (Reservation)

  • पंचायत की तरह नगरपालिका में भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
  • महिलाओं के लिए 5 स्थानों की आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं का आरक्षण भी शामिल है।
  • नगरपालिकाओं के अध्यक्ष पद के आरक्षण का निर्णय राज्य विधान मंडल को लेना है। विधान मंडल अध्यक्ष पदों को पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित कर सकता है।
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कार्यकाल (Tenure)

  • नगरपालिकाओं का कार्यकाल 5 वर्ष है।
  • इसका विघटन अवधि से पूर्व भी किया जा सकता है। साथ ही, नगरपालिकाओं की तय अवधि से पूर्व ही नये चुनाव हो जाने चाहिए।
  • विघटन की स्थिति में विघटन की तिथि से 6 मास के अंदर ही चुनाव हो जाने चाहिए।
  • यदि शेष अवधि 6 मास से कम है। तो चुनाव कराना आवश्यक नहीं होता है।

योग्यताएं (Qualifications)

संविधान के अनुच्छेद 243-फ के अनुसार राज्यों के विधान मंडल के सदस्यों के लिए निर्धारित योग्यताएं ही नगरपालिकाओं के सदस्यों के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्धारित की गयी हैं। परन्तु इसमें एक महत्वपूर्ण भिन्नता है। जो व्यक्ति 21 वर्ष के हैं वे भी सदस्यता के लिए अर्ह होंगे, जबकि संविधान में यह उल्लिखित है कि विधान मंडल के निर्वाचन के लिए वे ही व्यक्ति अर्ह होंगे जो 25 वर्ष के हो चुके हैं (अनुच्छेद-178)।

शक्तियां, अधिकार और उत्तरदायित्व (Powers, Rights and Responsibilities)

संविधान के अनुच्छेद 243-ब द्वारा विधान मंडलों को यह शक्ति दी गई है कि वे नगरपालिकाओं को ऐसी शक्तियां और अधिकार दे सकते हैं, जो स्वायत्त शासन की संस्थाओं के लिए आवश्यक है। इन संस्थाओं को निम्नलिखित उत्तरदायित्व सोपे जा सकते हैं:

  • आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएं तैयार करना,
  • इन योजनाओं का कार्यान्वयन, तथा;
  • 12वीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों के संबंध में। इस अनुसूची में 18 विषय हैं।

18 विषय – राज्य विधानमण्डल द्वारा प्रदान किये जायेंगे

  1. नगरीय योजना (इसमें शहरी योजना भी शमिल है।)
  2. भूमि उपयोग का विनियम और भवनों का निर्माण 
  3. आर्थिक व सामाजिक विकास की योजना 
  4. सड़के व पुल 
  5. घरेलू, औद्योगिक और वाणिज्यिक प्रयोजनों के निमित जल की आपूर्ति
  6. लोक स्वास्थ्य स्वच्छता, सफाई तथा कूड़ा करकट का प्रबंध
  7. अग्निशमन सेवाएं
  8. नगरीय वानिकी, पर्यावरण का संरक्षण और पारिस्थितिक पहलुओं की अभिवृद्धि
  9. समाज के कमजोर वर्गों जिसके अंतर्गत विकलांग और मानसिक रुप से मंद व्यक्ति सम्मिलित है के हितों का संरक्षण
  10. गंदी बस्तियों का सुधार
  11. नगरीय निर्धनता में कमी
  12. नगरीय सुख-सुविधाओं, जैसे पार्क, उद्यान, खेल का मैदान इत्यादि की व्यवस्था
  13. सांस्कृतिक, शैक्षणिक और सौन्दर्यपरक पहलुओं की अभिवृद्धि
  14. कब्रिस्तान, शव गाड़ना , श्मशान और शवदाह तथा विधुत शवदाह
  15. पशु – तालाब तथा जानवरों के प्रति क्रूरता को रोकना
  16. जन्म-मरण सांख्यिकी (जन्म-मरण पंजीकरण सहित)
  17. लोक सुख सुविधायें (पथ-प्रकाश, पार्किंग स्थल, बस स्टापं, लोक सुविधा सहित)
  18. वधशालाओं तथा चर्म शोधनशालाओं का विनियमन
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कर लगाने की शक्ति (Taxing Power)

राज्य विधानमंडल नगरपालिकाओं को कर, शुल्क, पथकर, आदि वसूलने या संग्रह करने तथा उन्हें निवेश करने का अधिकार दे सकता है। राज्य की संचित निधि से नगरपालिकाओं को-अनुदान दिया जा सकता है [अनुच्छेद-243(भ)]।

वित्त आयोग (Finance Commission)

संविधान के अनुच्छेद 243(म) के अनुसार गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करेगाः

राज्य और नगरपालिकाओं के बीच, राज्य द्वारा वसूले और उनके बीच बंटने वाले कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस की शुद्ध आमदनी का वितरण और नगरपालिकाओं के विभिन्न स्तरों में उनका आबंटन, नगरपालिकाओं की सहायता अनुदान, नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक उपाय, तथा; कोई अन्य विषय जो राज्यपाल तय करे।

संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा गठित वित्त आयोग के कर्तव्यों में एक और कर्तव्य की जोड़ा गया है। यह इस प्रकार है- राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य की नगरपालिकाओं के साधन स्रोतों की पूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि में वृद्धि करने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए, इस पर भी राष्ट्रपति द्वारा गठित वित आयोग अपनी सिफारिश देगा।

निर्वाचन (Election)

संविधान के अनुच्छेद 243-य(क) के अनुसार गठित राज्य चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयारी कराने, और; नगरपालिकाओं के चुनाव सम्पन्न कराने के संबंध में कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है।

निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालय का हस्तक्षेप निषिद्धः

अनुच्छेद – 243 (य छ) के प्रावधानों के अनुसार, न्यायालयों को इस बात की अधिकारिता नहीं होंगी कि वे अनुच्छेद-243 (य क) के अधीन निर्वाचन क्षेत्रो के परिसीमन अथवा स्थानों के आवंटन से सम्बंधित किसी विधि की वैधानिक की जांच करें। नगरपालिका के निर्वाचन, निर्वाचन-याचिका पर ही प्रश्नगत किए जा सकेंगे, जो ऐसे प्राधिकारी को एवं ऐसी रीति से प्रस्तुत की जाएगी जो राज्य विधानमण्डल द्वारा बनाई गई विधि अथवा उसके अधीन विहित की जाए।

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