राज्य सभा (Rajya Sabha)

राज्य सभा संसद का उच्च सदन है इसमें राज्यों के प्रतिनिधि सम्मिलित हैं। राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम सीमा 250 है इसमें से 238 राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों से आते हैं तथा शेष 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किये जाते हैं। मनोनीत सदस्य उन व्यक्तियों में से लिए जाते हैं जिन्होंने साहित्य, कला, विज्ञान, सामाजिक सेवा इत्यादि में ख्याति प्राप्त की हो। राज्य के प्रतिनिधियों को वहां की विधान सभाएं अनुपातिक प्रतिनिधित्व की पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा चुना जाता है। यह बात ध्यान योग्य है कि राज्य सभा में राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है।

राज्य सभा का सदस्य बनने के लिए प्रत्याशी में निम्न योग्यताएं होनी चाहिए:

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. उसकी आयु 30 वर्ष अथवा उससे अधिक हो।
  3. वह उस राज्य का मतदाता होना चाहिए, जहां से वह चुनाव लड़ना चाहता है।
  4. उसके पास अन्य योग्यताएं होनी चाहिये, जो कि संसद समय-समय पर निर्धारित करती है।

2003 में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में किए गए एक संशोधन द्वारा राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए निवास सम्बन्धी योग्यता को समाप्त कर दिया गया। इसके अतिरिक्त गोपनीय मतदान के स्थान पर खुले मतदान का प्रावधान किया गया।

इस नियम की वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की वैधता को स्वीकार करते हुए, राज्य सभा के चुनाव के संबंध में निवास संबंधी योग्यता को समाप्त कर दिया। जो प्रत्याशी राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त करना चाहता है वह किसी भी ऐसी अयोग्यता से पीड़ित न हो जिसका उल्लेख लोक सभा के सदस्यों के संदर्भ में किया गया है।

राज्य सभा के सदस्यों को छ: वर्ष के लिए चुना जाता है लेकिन इसके एक तिहाई सदस्य हर दो वर्ष पश्चात् अवकाश प्राप्त कर लेते हैंराज्य सभा एक स्थायी सदन है और उसे भंग नहीं किया जा सकता। भारत का उप-राष्ट्रपति राज्य सभा का प्रधान सभापति है। इसके अतिरिक्त राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उप-सभापति भी चुनती है जो उपराष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राज्य सभा की अध्यक्षता करता है।

संसद के सत्र (Sessions of Parliament)

संसद के सत्र राष्ट्रपति द्वारा स्वेच्छा से बुलाए जाते हैं परन्तु दो सत्रों के बीच छ: मास से अधिक अंतर नहीं होना चाहिए।

स्थगन (Adjournment)

स्थगन से हमारा अभिप्राय संसद के अधिवेशन में होने वाले उस संक्षिप्त अवकाश से है जो सदन के अध्यक्ष द्वारा घोषित किया जाता है। इस अवकाश की अवधि कुछ मिनट, घंटे अथवा दिन हो सकती है। इस अवकाश के फलस्वरूप सदन का अधिवेशन समाप्त नहीं होता। इससे केवल सदन की कार्यवाही आगे की तिथि व समय तक स्थगित हो जाती है। कई बार अध्यक्ष सदन की कार्यवाही को एक अनिश्चित समय तक स्थगित कर देता है तथा भविष्य की बैठक की तिथि अथवा समय निश्चित नहीं करता। ऐसी स्थिति को संसदीय भाषा मे अनिश्चित काल स्थगन कहा जाता है।

सदन का सत्रावसान (Prorogation of House)

संविधान द्वारा सदन का सत्रावसान करने का अधिकार राष्ट्रपति को प्रदान किया गया है। सदन के सत्रावसान के फलस्वरूप सदन का केवल सत्र समाप्त होता है जीवन नहीं। इसका अर्थ केवल यह है कि किसी विशेष समय पर सदन कार्य करना छोड़ देता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि इंग्लैंड में सत्रावसान के फलस्वरूप सभी विचाराधीन विधेयक तथा अन्य कार्यवाही समाप्त हो जाती है। इसके विपरीत भारत में सत्रावसान के कारण विचाराधीन विधेयक व कार्यवाही समाप्त नहीं होती। वास्तव में जब सदन सत्रावसान के पश्चात बैठक करता है तो यह विचाराधीन मामलों पर फिर विचार करना प्रारम्भ कर देता है।

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सदन को भंग करना (Dissolution of House)

सदन को भंग करने से सदन का जीवन (कार्यकाल) समाप्त हो जाता है और एक नए सदन का गठन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। भारत में केवल लोक सभा को उसके कार्यकाल से पूर्व भंग किया जा सकता है। राज्य सभा, इसके विपरीत, एक स्थायी सदन है, और इसे भंग नहीं किया जा सकता। लोक सभा को भंग करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है जो इसका प्रयोग प्रायः प्रधानमंत्री के परामर्श से करता है। जब लोक सभा को भंग किया जाता है तो कोई भी विधेयक जो इसके विचाराधीन होता है अपने आप समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार कोई भी विधेयक जिसे लोक सभा पारित कर चुकी है तथा जो राज्य सभा में विचाराधीन हैं, भी अपने आप समाप्त हो जाता है। यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि यदि राष्ट्रपति यह संकेत देता है कि इस विषय पर वह दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाना चाहता है तो यह विधेयक समाप्त नहीं होता। इसके विपरीत यदि कोई विधेयक जो राज्य सभा के पास विचाराधीन है परन्तु जो अब तक लोक सभा द्वारा पारित नहीं किया गया, समाप्त नहीं होता।

संसद की भाषा (Language in Parliament)

संसद की समस्त कार्यवाही हिन्दी अथवा अंग्रेजी में संचालित की जाती है। परन्तु दोनों सदनों के अध्यक्ष (राज्य सभा का सभापति व लोक सभा का स्पीकर) किसी भी ऐसे सदस्य को जिसे हिन्दी अथवा अंग्रेजी में अपने विचार व्यक्त करने में कठिनाई आती है, अपनी मातृभाषा में सदन को सम्बोधित करने की अनुमति दे सकते हैं।

वेतन तथा भत्ते (Salaries and Allowances)

दोनों सदनों के सदस्‍य ऐसे वेतन और भत्ते, जिन्‍हें संसद समय समय पर, विधि द्वारा तय करे, पाने के हकदार है। संसद ने संसद सदस्‍य (वेतन, भत्ते और पेंशन) अधिनियम के अधीन सदस्‍यों को पेंशन दिए जाने की स्‍वीकृति दी है। इस समय सदस्यों को प्रति मास 30,00 वेतन तथा 20,000 रुपए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता दिया जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें सदन अथवा उसकी समितियों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता, निर्धारित मात्रा में नि:शुल्क हवाई तथा रेल यात्रा की टिकटें, नि:शुल्क निवास, डाक्टरी सहायता इत्यादि सुविधा उपलब्ध हैं। उन्हें अवकाश प्राप्ति पर 6000 रुपए प्रति मास पेंशन भी दी जाती है।

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संयुक्त बैठक (Joint Sessions)

राष्ट्रपति को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाने (अनुच्छेद108) का अधिकार है। इस प्रकार की संयुक्त बैठक तीन परिस्थितियों में बुलाई जा सकती है।
(i) प्रथम, एक सदन द्वारा पारित विधेयक दूसरे सदन द्वारा अस्वीकार कर दिया जाए,
(ii) दूसरा, किसी भी विधेयक में एक सदन द्वारा सुझाए गए संशोधन दूसरे सदन को स्वीकार न हों,
(iii) तीसरा, एक सदन द्वारा पारित विधेयक जब दूसरे सदन के पास भेजा जाए और वह उस पर 6 मास तक कोई कार्यवाही न करे। इस प्रकार की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा की जाती है तथा सभी निर्णय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से लिए जाते हैं। जब से संविधान लागू हुआ है दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन केवल तीन बार बुलाया गया है-1961, 1978 तथा 2002 में दोनों सदनों का अंतिम संयुक्त अधिवेशन मार्च 2002 में पोटा बिल पारित करने के लिए बुलाया गया।

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