भारतीय चुनाव प्रणाली (Indian Election System)

17वें लोकसभा चुनाव की तारीख का ऐलान हो गया हैं। यह चुनाव 11 अप्रैल से 19 मई तक 7 चरणों में होंगे और 23 मई को नतीजे आएंगे। इसके साथ ही आंध्र प्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, ओडिशा और सिक्किम में भी विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही कराया जायेगा।

चुनाव किसी भी लोकतंत्र के लिए एक सर्वाधिक सशक्त तत्व है तथा जब-तक चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से होते रहते हैं, तब-तक राष्ट्र में ईमानदार जन-प्रतिनिधित्व कायम रहता है। विश्व के सबसे बड़े एवं सर्वाधिक लोकप्रिय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाला देश भारत इस बात पर गर्व कर सकता है कि केन्द्र एवं राज्यों में यदि विगत 70 वर्षों में शान्तिपूर्ण तरीके से सत्ता का हस्तान्तरण हुआ है, तो इसका श्रेय मुख्य रूप से भारत की निष्पक्ष निर्वाचन प्रणाली को जाना चाहिए।

भारतीय चुनाव प्रणाली (Indian Election System)

लोकसभा तथा विधानसभा के चुनाव बहुमत अथवा ‘फर्स्ट-पास्ट-दि-पोस्ट (First Past the Post)’ निर्वाचन प्रणाली का प्रयोग कर कराए जाते हैं। देश को विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में बाँटा जाता है, जिन्हें निर्वाचन क्षेत्र कहते हैं। विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, तथा चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र प्रत्याशियों पर कोई प्रतिबंध नहीं है। चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दल अपने प्रत्याशी खड़े करते हैं और अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिए, अपनी पसंद के एक प्रत्याशी के लिए प्रत्येक व्यक्ति एक वोट डाल सकता है। प्रत्याशी जो अधिकतम मत संख्या प्राप्त कर लेता है, चुनाव जीत जाता है और निर्वाचित हो जाता है। इसलिए चुनाव ही वह साधन है जिसके द्वारा लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं।

कौन मतदान कर सकता है? (Who Can Vote?)

जबकि मतदाता के लिए कोई निर्धारित अधिकतम आयु-सीमा नहीं है, परन्तु भारतीय संविधान के मूल प्रावधानों के अनुसार, 21 वर्ष आयु से ऊपर के सभी भारतीय नागरिक चुनावों के समय वोट देने के हकदार हैं। वर्ष 1988 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री, राजीव गाँधी द्वारा कराये गए 61वें संविधान संशोधन द्वारा नागरिकों की निम्नतम मतदान आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई जो 28 मार्च 1989 से प्रभावी हो गई। इसके अतिरिक्त किसी भी निर्वाचन-क्षेत्र में एक मतदाता के रूप में पंजीकृत किए जाने के लिए कोई व्यक्ति, अनावास के आधार पर, अथवा उसके अस्वस्थ होने पर, अथवा उसे अपराध या भ्रष्टाचार या अवैध व्यवसाय के आधार पर कानून के तहत अयोग्य घोषित न किया गया हो।

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चुनाव कौन लड़ सकता है? (Who Can Fight for Elections?)

लोकसभा, विधानसभा, राज्यसभा और विधान परिषद् हेतु चुनाव लड़ने के लिए कौन सुयोग्य है। सभी प्रतिस्पर्धी प्रत्याशियों को यदि लोकसभा चुनाव लड़ना हो तो 25,000 रुपये और यदि विधानसभा चुनाव लड़ना हो तो 10,000 रुपये जमा कराने होते हैं। इसको प्रत्याशियों की प्रतिभूति राशि माना जाता है। यह प्रतिभूति राशि उन सभी प्रत्याशियों को लौटा दी जाती है जो उस निर्वाचन क्षेत्र में डाले गए कुछ वैध मतों की संख्या के एक-बटा-छह से अधिक मत प्राप्त करते हैं। अन्य सभी प्रत्याशी अपनी प्रतिभूति राशि हार जाते है।

नोट: आरक्षित वर्ग के लिए यह रकम आधी हो जाती है।

इसके अतिरिक्त, नामांकन उस निर्वाचन क्षेत्र से जिससे प्रत्याशी, यदि – वह किसी पंजीकृत राजनीतिक दल द्वारा प्रायोजित किया जा रहा हो; चुनाव लड़ना चाहता है, कम से कम एक पंजीकृत मतदाता द्वारा समर्थित हो, और यदि वह प्रत्याशी स्वतंत्र प्रत्याशी हो तो कम से कम दस पंजीकृत मतदाताओं द्वारा समर्थित हो।

भारतीय चुनाव प्रणाली की कमजोरियाँ (Vulnerabilities of the Indian Electoral System)

भारत के विशाल भौगोलिक आकार तथा भारत की सामाजिक आर्थिक राजनीतिक धार्मिक सांस्कृतिक विविधताओं के सन्दर्भ में चुनाव प्रणाली में समय-समय पर किए गए सुधारों से यह उत्तरोत्तर सुदृढ हुई है, लेकिन इसमें आज भी अनेक कमजोरियों दृष्टिगोचर होती हैं। सामान्यतया भारत की निर्वाचन प्रणाली निम्नलिखित कमजोरियों से ग्रसित है –

  • कम मतदान प्रतिशत के साथ विधायिका में ईमानदार और वास्तविक प्रतिनिधित्व की अभाव – मतदान का औसत 55-65 प्रतिशत के बीच रहता है। इसका अर्थ है कि 45-35 प्रतिशत जनता की राष्ट्रीय राजनीति और नीतियों के निर्धारण में कोई भूमिका ही नहीं है।
  • राजनीतिक दलों एवं राजनीतिज्ञों पर से उठता विश्वास – भारत के राजनीतिज्ञों पर से आम आदमी को विश्वास उठ गया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफास (Association for Democratic Rifaas) तथा नेशनल इलेक्शन वाच (National Election Watch) द्वारा सन् 2014 और उसके बाद के निर्वाचनों में विजयी सांसदों/विधायकों की सम्पत्तियों तथा उनके विरुद्ध न्यायालयों में लम्बित आपराधिक मामलों का जो विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है उसके अनुसार 543 सांसदों में से 34 प्रतिशत (184) के विरुद्ध न्यायालयों में आपराधिक वाद लम्बित है।
    • 76 सांसद हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण एवं चोरी जैसे गम्भीर अपराधों में आरोपी हैं।
    • राज्य विधान सभाओं के 4032 विधायकों में से 1258 विधायकों (31%) के विरुद्ध आपराधिक वाद लम्बित हैं।
    • 564 विधायक (14%) हत्या, अपहरण, आगजनी, बलात्कार चोरी जैसे गम्भीर मामलों में अभियुक्त है।
  • राजनीति का अपराधीकरण तथा अपराधियों का राजनीतिकरण – भारतीय राजनीति का विदूपयुक्त चेहरा यह बताता है, कि अपराधियों के चुनाव न लड़ने पर कोई रोक न होने के कारण हत्या, अपहरण, आगजनी, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्त लोग भी केवल इस आधार पर चुनाव लड़ने और जीतने में सफल हो जाते हैं कि मामला न्यायालय में लम्बित है। न्याय-प्रणाली की विडम्बना यह है कि निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की न्यायिक प्रक्रिया में 20 से 30 वर्ष तक का समय लग जाता है।
  • सर्वाधिक खर्चीली चुनाव प्रणाली – भारत की निर्वाचन प्रणाली को सर्वाधिक खर्चीला माना जाता है लोक सभा का चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को अनुमानित 5 करोड़ से 50 करोड़ तक का खर्चा उठाना पड़ता है।

स्पष्ट है कि उम्मीदवारों द्वारा चुनाव लड़ने पर बहुत बड़ी धनराशि खर्च की जाती हैं और यह सारा का सारा धन काला धन होता है।

  • राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले चन्दे में अपारदर्शिता – यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि भारत के औद्योगिक घराने सभी बड़े राजनीतिक दलों को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए का चन्दा देते हैं, एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफाम्स (ADR) के एक विश्लेषण के अनुसार राजनीतिक दलों को ज्ञात स्रोतों से प्राप्त होने वाले चन्दे का 87 प्रतिशत उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों से आता है। इसका सीधा सा निष्कर्ष है कि राजनीतिज्ञों एवं व्यावसायिक जगत् के कर्ताधर्ताओं के बीच गहरी साँठगाँठ है।
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कानूनन भारत के राजनीतिक दल विदेशी कम्पनियों से चन्दा नहीं ले सकते। अब एनडीए सरकार ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 को संशोधित करके राजनीतिक दलों द्वारा विदेशी कम्पनियों से चन्दा लेने को वैधता प्रदान कर दी है। इतना ही नहीं अब राजनीतिक दलों द्वारा 5 अगस्त, 1976 के बाद विदेशी कम्पनियों से लिए गए चन्दों की जाँच भी नहीं की जा सकेगी 2014 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले से राजनीतिक दल विदेशी कम्पनियों से लिए गए चन्दे के मामलों में जाँच के घेरे में थे।

कालेधन के रूप में लिए गए चन्दे का तो कोई भी राजनीतिक दल लेखा-जोखा ही नहीं रखता यही कि लगभग सभी राजनीतिक दल स्वयं को सूचना पाने का अधिकार अधिनियम 2005 के दायरे में आने का विरोध कर रहे थे, केन्द्रीय सूचना आयोग ने अपने एक निर्णय में सभी 6 राष्ट्रीय राजनीतिक दलों काग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सीपीआई एम, सीपीआई तथा बहुजन समाज पार्टी को सूचना पाने का अधिकार अधिनियम, 2005 के अन्तर्गत आछादित होने का निर्णय 3 जून, 2013 को सुनाया था। इस निर्णय के विरुद्ध सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आ गए और केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने सूचना पाने का अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन लाने सम्वन्धी विधेयक का अनुमोदन कर दिया।

  • मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने की हेरा-फेरी – राज्यों में सत्तारूढ राजनीतिक दल की शह पर जिला निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरा फेरी की जाती है विरोधी राजनीतिज्ञों के समर्थक मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए जाते हैं, जबकि सत्ता-दल के समर्थकों के नाम एक से अधिक मतदाता सूचियों में जोड दिए जाते हैं ।
  • सभी उम्मीदवारों को नकारने का मुद्दा –  समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थक एक स्वर से यह माँग करते रहे हैं, कि मतदाताओं को यह अधिकार होना चाहिए कि वे चुनाव में खडे एक को छोड़कर सभी को नापसंद करने के स्थान पर कोई भी पसन्द नहीं का भी विकल्प चुन सकें सर्वोच्च न्यायालय की पहल पर भारत निवचिन आयोग ने अक्टूबर-दिसम्बर 2013 में सम्पन्न मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली तथा मिजोरम के चुनाव में उपर्युक्त में से कोई नहीं (None of the Above – NOTA) का विकल्प इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में नोटा बटन के रूप में रखा और आश्चर्य जनक रूप से देश के पिछड़े राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ राज्य के अनेक मतदाताओं ने नोटा विकल्प को चुना और हाल ही मे संपन्न हुए विधानसभा के चुनाव में भी इसका अच्छा खासा असर देखा गया
  • निर्वाचित प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार (Right to Reciall) – समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थकों की यह भी माँग है कि मतदाताओं को यह भी अधिकार होना चाहिए कि वे यदि अपने निर्वाचन क्षेत्र के निर्वाचित प्रतिनिधि की गतिविधियों से सन्तुष्ट न हों, तो उसकी सदस्यता समाप्त कराने अर्थात् उसे वापस बुला सकें, प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के सिद्धान्त का प्रतिपादन लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने किया था।
  • गैर-गम्भीर सांसदों/विधायकों की बढ़ती संख्या – जिसकी जितनी संख्या भारी उतनी उसकी भागीदारी के सिद्धान्त पर लोक सभा और विधान सभा में ऐसे सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जो विधायी कार्यों, आर्थिक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति गम्भीर नहीं हैं। इस कटु वास्तविकता का अनुमान सदन की कार्यवाहियों के दौरान सदस्यों की लगातार घटती संख्या से लगाया जा सकता है। सरकार बचाने या गिराने जैसे मुद्दों पर सदन में मतदान होने के समय उपस्थित रहने के लिए मुख्य सचेतक द्वारा लिखित आदेश की बाध्यता से ही सदस्य सदन में उपस्थित रहते हैं वह भी केवल हों या न का बटन दबाने के लिए या सदन में हल्ला गुल्ला करने के लिए।
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