चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (Chandragupta Vikramaditya) की जीवनी

चन्द्रगुप्त (Chandragupta) नाम से इतिहास में कई नरेश हुए हैं और ‘विक्रमादित्य (Vikramaditya)’ की उपाधि भी कई सम्राटों के साथ जुड़ी हुई मिलती है। इसलिए इतिहासकारों में तरह-तरह के मतभेद रहे हैं। किन्तु सभी बातों पर गम्भीरता से विचार करने के बाद साहित्यकारों ने यह माना है कि ‘चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य’, गुप्त वंश का तीसरा सम्राट और समुद्रगुप्त का पुत्र एवं उत्तराधिकारी ही था। इस सम्राट का शासनकाल 375 ई० से 413 ई० तक माना जाता है। 

विक्रमादित्य की उपाधि 

इस चन्द्रगुप्त ने मालवा, गुजरात और काठियावाड़ पर विजय प्राप्त की, उज्जयिनी के शक शासकों को उखाड़ फेंका और उनका राज्य गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। अपनी इन महान विजयों के उपलक्ष में उसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। ‘विक्रमादित्य’ का अर्थ है – ‘सूर्य की तरह तेजस्वी’ । इतिहासकार मानते हैं कि यह चन्द्रगुप्त वास्तव में सूर्य के समान तेजस्वी, पराक्रमी और प्रतिभावान था। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि जिस विक्रमादित्य की न्यायप्रियता, उदारता और शौर्य-पराक्रम तथा विद्वानों का आदर करने सम्बन्धी किस्से विख्यात हैं- वह यही चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य था। इतिहासकारों ने खोज और अध्ययन के बाद यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि इस चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में कला, स्थापत्य और मूर्तिकला का उल्लेखनीय विकास हुआ और इस प्रकार इसके शासन काल में भारत का सांस्कृतिक विकास अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। 

शकों पर विजय 

चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई० में गद्दी पर बैठा था। अपने पिता समुद्रगुप्त की भाँति, चन्द्रगुप्त भी पराक्रमी और वीर था। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार करने की योजना बनायी। वह दरअसल मालवा और गुजरात-काठियावाड़ के शक शासकों पर विजय प्राप्त करना चाहता था। किन्तु इसमें एक बाधा थी। मालवा और गुजरात के पूर्व में वाकाटक वंश के राजा रुद्रसेन का राज्य था। वाकाटक बड़े शक्तिशाली थे और चन्द्रगुप्त ने सोचा कि यदि उन्होंने मेरे विरुद्ध शकों की सहायता की तो मेरा विजयी होना असम्भव हो जायगा। इसलिए आक्रमण करने से पूर्व चन्द्रगुप्त ने वाकाटक राजा रुद्रसेन को अपने पक्ष में लेने की तरकीब सोची। बस उसने अपनी बेटी प्रभावती के विवाह का प्रस्ताव रुद्रसेन को भेजा। रुद्रसेन ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इस तरह दोनों सम्बन्धी बन गये। अब चन्द्रगुप्त के लिए रास्ता साफ था। उसने मालवा और गुजरात पर आक्रमण करके शकों को परास्त कर दिया और उनके राज्य अपने साम्राज्य में मिला लिये। 

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राज्य का विस्तार

चन्द्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य विस्तार के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि उसकी सीमा पूर्व में बंगाल तक तथा पश्चिम में हिन्दुकुश पर्वत के उस पार वाल्हीक प्रदेश तक फैली हुई थी। इसके प्रमाण स्वरूप इतिहासकार, कुतुबमीनार के पास स्थित लौह-स्तम्भ पर खुदे लेख को मानते है जिसमें किसी चन्द्र नामक सम्राट द्वारा इन सीमाओं तक अपना राज्य विस्तार करने का उल्लेख है। अन्य प्रमाणों से भी यही सिद्ध होता है कि वह राजा चन्द्र, गुप्त वंश का चन्द्रगुप्त द्वितीय ही था। 

इस प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय के साम्राज्य में गुजरात, मालवा और बंगाल जैसे उपजाऊ क्षेत्र आ जाने से उसके राज्य में धन की वर्षा होने लगी थी। उस समय उज्जयिनी बहुत बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। चन्द्रगप्त ने वहाँ अपनी एक और राजधानी बना दी थी, जबकि मुख्य राजधानी उसने पाटलिपुत्र ही रखी। इसके अलावा गुजरात-सौराष्ट्र का क्षेत्र उसके अधीन आ जाने के कारण, इन राज्यों में स्थित बंदरगाहों से होने वाला समुद्री व्यापार भी चन्द्रगुप्त के नियन्त्रण में आ गया था और इससे भी उसके राज्य का कोष भरने लगा था। 

फाह्यान की भारत यात्रा 

प्रसिद्ध चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के ही शासनकाल में भारत भ्रमण पर आया था। उसका काल सन् 405 से 411 ई. माना जाता है। वह छः वर्षों तक भारत में रहा। हालांकि इस दौरान फाह्यान कभी चन्द्रगुप्त के दरबार में नहीं गया, फिर भी उसने चन्द्रगुप्त के गुणों और उसकी शासन-व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया है।

वास्तव में फाह्यान बौद्ध भिक्षु था और वह चीन से चलकर भारत में बौद्धग्रंथों की खोज में आया था। फाह्यान पश्चिमी चीन से चलकर गोबी मरुस्थल के दक्षिण में लाप-नोर होते हुए खोतान आया। फिर वह पामीर पर्वत को पार कर, भयंकर कष्टों को सहते हुए उदयनोर पहुँचा। वहाँ से तक्षशिला होते हुए वह पेशावर पहुँचा और इस तरह उत्तरी भारत की यात्रा करते हुए वह पाटलिपुत्र पहुंचा। यहाँ वह तीन वर्ष रहा। यहाँ उसने संस्कृत भाषा सीखी और तब बौद्ध-ग्रंथों का अध्ययन किया।

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फाह्यान ने उस समय भारत में जो कुछ देखा, उसका बड़ा ही रोचक विवरण लिखा है। किन्तु उसने उस समय के शासक का नाम कहीं नहीं लिखा। उस समय चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही शासन था, इसलिए फाह्यान का वर्णन, चन्द्रगुप्त की ही शासन-व्यवस्था से सम्बद्ध सिद्ध होता है। 

सब धर्मों का आदर 

फाह्यान ने लिखा है कि उस समय की जनता धनी, सुखी और वैभव-सम्पन्न थी। सभी को अपना धर्म मानने की पूरी स्वतन्त्रता थी। यद्यपि चन्द्रगुप्त के समय में पौराणिक हिंदू धर्म का अधिक प्रभाव था और स्वयं चन्द्रगुप्त भी इसी धर्म को मानता था, किन्तु बौद्ध तथा दूसरे धर्म के लोगों को अपना धर्म मानने की पूरी स्वतन्त्रता थी। चन्द्रगुप्त की धार्मिक सहिष्णुता का अनुमान इसी एक तथ्य से लगा सकते हैं कि उसके दो मन्त्री ऐसे थे जिसमें से एक शैव धर्म को मानता था और दूसरा बौद्ध धर्म को।

फाह्यान लिखता है कि यहाँ के लोग बेरोकटोक कहीं भी आ-जा सकते थे। कहीं किसी को पंजीयन कराने या परिचय-पत्र दिखाने की जरूरत नहीं होती। बड़े राजमार्गों पर विश्रामगृह बने हुए थे। एक बहुत अच्छा चिकित्सालय भी था। 

फाह्यान के अनुसार चन्द्रगुप्त के शासन काल में प्राणि-हत्या नहीं होती थी। कोई शराब नहीं पीता था और न कोई प्याज-लहसुन खाता था। इससे पता चलता है कि चन्द्रगुप्त के शासन में लोग संयमी और शाकाहारी थे। 

सुरक्षित जीवन – सदाचारी लोग 

फाह्यान के अनुसार उस समय अपराधों के लिए मुख्यतः अर्थ दंड दिया जाता था। भूमि के लगान से राजस्व प्राप्त किया जाता था और सभी राजकीय अधिकारियों को नियमित वेतन मिलता था। सुरक्षा का प्रबंध ऐसा था कि कोई भी व्यक्ति निर्भय होकर घूम सकता था। स्वयं फाह्यान कई बार कीमती चीजें लेकर अकेला ही सुनसान मार्गों से गया, किन्तु उसे किसी ने न लूटा, न तंग किया। हाँ, देशद्रोह जैसे अपराध के लिए सबसे बड़ा दंड यह था कि अपराधी का दाहिना हाथ काट दिया जाता था। 

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चन्द्रगुप्त के राज्य में सभी को अपनी पसंद का पेशा अपनाने की स्वतन्त्रता थी। राज्य में पूर्ण शान्ति थी और शासन-व्यवस्था ऐसी थी कि चोरी, बटमारी की घटनाएँ न के बराबर ही होती थीं। सबसे अच्छी बात यह थी कि जनता का चरित्र बहुत उच्चकोटि का था। लोग ईमानदार और सत्यभाषी थे।

फाह्यान ने अशोक का राजप्रासाद भी देखा था। वह लिखता है कि यह राजप्रासाद देवताओं द्वारा निर्मित लगता है। कोई मनुष्य इतना सुंदर और कलापूर्ण भवन बना ही नहीं सकता।

चन्द्रगुप्त के समय में, गुप्त-सम्राटों द्वारा चलाये गये सोने, चाँदी और ताँबे के सिक्के ही चलते थे। चन्द्रगुप्त अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सदा चिंतित और तत्पर रहता था। उसने अनेक स्थानों पर यात्रियों की सुविधाओं के लिए धर्मशालाएँ बनवायी थीं। गरीबों की मुफ्त चिकित्सा के लिए स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे चिकित्सालय खुलवाये थे। धनीमानी लोगों ने भी धर्मार्थ चिकित्सालय खुलवाये थे और वे ही उनका खर्च उठाते थे। 

नवरत्न 

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य जहाँ एक ओर पराक्रमी, कुशल प्रशासक और प्रजा का हितैषी था, वहीं वह साहित्य प्रेमी, कला-पारखी और विद्वानों का आदर करने वाला था। उसके दरबार में ‘नवरत्न’ थे जिनमें संस्कृत के महान कवि कालिदास भी एक थे। इसके अलावा अमरकोश के रचयिता तथा महान् चिकित्सक धन्वन्तरि, आर्य भट्ट, वराहमिहिर जैसे ज्योतिषविद्, बौद्ध-विद्वान् वसुबंधु, दिग्नाग तथा अन्य कई विद्वान चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नवरत्नों में थे। 

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य बहुमुखी प्रतिभा और सर्वगुण सम्पन्न सम्राट था। उसके शासन काल में जनता अत्यन्त सुखी थी। न कोई अभाव था, न कष्ट और न ही कोई भय। इस कारण वह बहुत लोकप्रिय हुआ। उसकी उदारता, वीरता और न्याय आदि के अनेक किस्से चल पड़े और बाद में वे अनेक कथाओं की आधार भूमि बने जैसे ‘सिंहासन बत्तीसी’ ‘बैताल पच्चीसी’ आदि। 

चन्द्रगुप्त ने करीब 39 वर्ष तक राज्य किया। सन् 413 में उसका निधन हो गया। लेकिन उसके शांतिपूर्ण शासन काल की प्रशंसा, इतिहास आज भी कर रहा है। 

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