अंग्रेज़ों का भारत आगमन (Arrival of the British in India)

अंग्रेज़ों का भारत आगमन (Arrival of the British in India)

1599 ई. में कुछ अंग्रेज़ व्यापारियों द्वारा पूर्वी देशों से व्यापार करने के उद्देश्य से ‘गवर्नर ऑफ कंपनी एण्ड मर्चेन्ट ऑफ लंदन ट्रेडिंग टू द ईस्ट इंडीज’ (Governor of Company of Merchants of London Trading to the East Indies) नामक कंपनी की स्थापना की गई। 

  • इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 31 दिसम्बर, 1600 ई. को एक रॉयल चार्टर जारी कर इस कंपनी को 15 वर्ष के लिए पूर्वी देशों से व्यापार करने का एकाधिकार पत्र दे दिया। उस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी में कुल 217 साझीदार थे।
  • 1608 ई. में ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम ने भारत में व्यापारिक कोठियों को खोलने के उद्देश्य से कैप्टन हॉकिन्स को अपने राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। हॉकिन्स ने मुगल सम्राट जहाँगीर से फारसी में बात की।
  • हॉकिन्स वह प्रथम अंग्रेज़ था जिसने भारत की भूमि में प्रवेश समुद्र के रास्ते किया था।
  • हॉकिन्स ने सन् 1609 ई. में मुगल बादशाह जहाँगीर से अजमेर में मिलकर सूरत में बसने की आज्ञा माँगी
  • सूरत के स्थानीय व्यापारियों एवं पुर्तगालियों द्वारा इसका विरोध किया गया। परिणामस्वरूप उसे स्वीकृति नहीं मिली।
  • 1611 ई. में मुगल बादशाह जहाँगीर अंग्रेज़ कैप्टन मिडल्टन के द्वारा स्वाल्ली में पुर्तगालियों के जहाजी बेड़े को पराजित किए जाने से अत्यधिक प्रभावित हुआ।
  • जहाँगीर ने 1613 ई. में सूरत में अंग्रेजों को स्थाई कारखाना स्थापित करने की अनुमति प्रदान की।
  • जहाँगीर के दरबार में सन् 1615 ई. में सम्राट जेम्स प्रथम का दूत सर टॉमस रो पहुँचा जिसने मुगल साम्राज्य के सभी भागों में व्यापार करने एवं फैक्ट्रियाँ स्थापित करने का अधिकार पत्र (शाही फरमान) प्राप्त कर लिया। परिणामस्वरूप, अंग्रेजों ने आगरा, अहमदाबाद तथा भरुच में अपनी व्यापारिक कोठियों की स्थापना की।
  • सन् 1611 ई. में अंग्रेजों द्वारा व्यापारिक कोठी की स्थापना मसुलीपट्टनम में की गई।
  • 1639 ई. में मद्रास तथा 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक कोठियाँ खोली गई।
  • पूर्वी भारत में अंग्रेजों द्वारा स्थापित प्रथम कारखाना 1633 ई. में उड़ीसा के बालासोर में खोला गया। इसके पश्चात् अंग्रेजों ने बंगाल तथा बिहार में भी अपने कारखाने खोले।
  • 1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से हुआ। इस विवाह में बंबई को दहेज के रूप में चार्ल्स को भेंट कर दिया गया, जिसे उन्होंने दस पाउंड के वार्षिक किराये पर कंपनी को दे दिया।
  • अंग्रेज़ों ने 1639 ई. में मद्रास में जमीन को पट्टे पर लेकर कारखाने की स्थापना की, इसके साथ ही कारखाने की किलेबंदी भी की गई। इसे ‘फोर्ट सेंट जॉर्ज’ का नाम दिया गया।
  • 1686 ई. में अंग्रेजों ने हुगली को लूट लिया, परिणामस्वरूप उनका मुगल सेनाओं से संघर्ष हुआ। इस युद्ध के बाद कंपनी को सूरत, मसुलीपट्टनम तथा विशाखापट्टनम इत्यादि कारखानों से अपने अधिकार खोने पड़े। किंतु, अंग्रेजों द्वारा माफी मांगने के पश्चात् औरंगजेब ने डेढ़ लाख रुपये का हर्जाना लेकर उन्हें पुन: व्यापार करने का अधिकार प्रदान कर दिया।
  • 1691 ई. में जारी एक शाही फरमान के द्वारा 3000 रुपये के निश्चित वार्षिक कर के बदले बंगाल में कंपनी को सीमा-शुल्क से छूट दे दी गई।
  • कंपनी ने 1698 ई. में 12000 रुपये का भगतान कर तीन गाँवों- सुतानती, कालीकाता एवं गोविन्दपुर को जमींदारी प्राप्त कर ली तथा फोर्ट विलियम नामक किले का निर्माण किया। कालांतर में जॉब चॉरनाक के प्रयासों से इसी स्थान पर कलकत्ता नगर की नींव पड़ी।
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1717 ई. में मुगल सम्राट फर्रुखसियर का सफल इलाज कंपनी के एक डॉक्टर विलियम हेमिल्टन द्वारा किये जाने से फर्रुखसियर ने कंपनी को व्यापारिक सुविधाओं वाला एक फरमान जारी किया। इस फरमान के अंतर्गत कंपनी को बंगाल में 3000 रुपये वार्षिक के बदले व्यापार करने, आसपास की भूमि किराए पर लेने, सूरत में 10000 रुपये वार्षिक के बदले निःशुल्क व्यापार करने तथा बंबई की टकसाल से जारी सिक्कों को मुगल साम्राज्य में मान्यता दिलाने संबंधी अधिकार प्राप्त हो गए। इतिहासकार ओर्स ने इस फरमान को कंपनी का ‘महाधिकार पत्र’ (मैग्नाकार्टा) कहा है।

 

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