Physical Geography Notes in Hindi - Page 2

एशिया की प्रमुख नदियाँ

एशिया महाद्वीप की प्रमुख नदियाँ (Major Rivers of Asia Continent)

आमू दरिया (Amu Darya)

  • देश –  अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान
  • उद्गम स्थान – पामीर पर्वतीय क्षेत्र
  • मुहाना – अरल सागर में
  • अर्द्धशुष्क क्षेत्र में बहती है।

सीर-दार्या (Syr Darya)

  • देश –  कज़ाख्स्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान
  • उद्गम स्थान – पामीर पर्वतीय क्षेत्र
  • अर्द्धशुष्क क्षेत्र में बहती है।
  • मुहाना- अरल सागर में

चाओ-फ़ाया नदी (Chao Phraya Rive)

  • देश –  थाइलैंड
  • मुहाना – थाईलैंड की खाड़ी
  • इसका बेसिन चावल उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है।
  • इसके मुहाने पर थाइलैंड की राजधानी ‘बैंकॉक’ स्थित है।

टिगरिस नदी (Tigris River)

  • देश –  तुक, इराक, सीरिया
  • उद्गम स्थान – टॉरस पर्वत (टक)
  • यह बेसिन ‘खजूर’ उत्पादन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
  • इस नदि को ‘दजला’ नाम से भी जाना जाता है।

यूक्रेटस नदी (Euphrates River)

  • देश –  तुक, इराक, सीरिया
  • उद्गम स्थान – टॉरस पर्वत (टक)
  • यह बेसिन ‘खजूर’ उत्पादन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
  • इस नदि को ‘फरात’ नाम से भी जाना जाता है।

यलो रिवर (ह्वांगहो) (Yellow River (Huang))

  • देश –  चीन
  • उद्गम – कुनलुन पर्वत
  • मुहाना- पो हाई की खाड़ी (यलों सागर)
  • अपने कटाव व बाढ़ के लिये प्रसिद्ध चीन यह नदी ‘चीन का शोक’ कहलाती है।

यांग्सौक्यांग नदी (Yangtze River)

  • देश –  चीन
  • मुहाना – पूर्वी चीन सागर
  • एशिया की सबसे लंबी नदी
  • इसी नदी के तट पर ‘शंघाई’ एवं ‘वुहान’ शहर स्थित हैं।
  • इस नदी पर ‘थ्री गॉर्ज डैम’ स्थित है।

इरावदी नदी (Irrawaddy River)

  • देश – म्याँमार
  • उद्गम स्थान – माली और नामी नदी का संगम
  • मुहाना – अंडमान सागर
  • इसके डेल्टाई क्षेत्र पर म्याँमार का ‘यांगून’ शहर स्थित है।

सालवीन नदी (Salween River)

  • देश – म्याँमार
  • उद्गम – चीन (तिब्बत का पठार)
  • मुहाना – अंडमान सागर
  • यह म्याँमार की सबसे लंबी नदी है।

मेकॉन्ग नदी (Mekong River)

  • देश – चीन, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया, वियतनाम (प्राकृतिक सीमा- म्याँमार – लाओस तथा थाईलैंड – लाओस)
  • उद्गम स्थान – तिब्बत का पठार
  • मुहाना – दक्षिणी चीन सागर
  • इस नदी के किनारे कंबोडिया की राजधानी ‘नामपेन्ह’ स्थित है।
  • विश्व में अमेजन नदी के बाद दूसरे स्थान पर सर्वाधिक जैव विविधता वाला बेसिन है।

एशिया महाद्वीप का अपवाह तन्त्र (Drainage System of Asia Continent)

अपवाह तन्त्र (Drainage System)

किसी भी क्षेत्र की धरातली आकृतियाँ उस क्षेत्र के अपवाह तन्त के स्वरूप को निर्धारित करती हैं साथ ही अपवाह तंत्र भी धरातीलय आकृतियों के स्वरूप को प्रभावित करता है। एशिया महाद्वीप में मिलने वाले धरातलीय स्वरूपों के अनुरूप ही यहाँ के अपवाह तन्त्र का विकास हुआ है। एशिय महाद्वीप के मध्यवर्ती भाग में उच्च पर्वतीय एवं पठारी भागों का अस्तित्व मिलता है। इसी उच्च प्रदेश से निकल कर उत्तर पूर्व दक्षिण दिशा में सैकड़ों नदियों बहती हैं और क्रमशः आर्कटिक प्रशान्त तथा हिन्द महासागर में प्रमुख रूप से गिरती हैं। वस्तुतः एशिया महाद्वीप के अपवाह प्रतिरूप का निर्धारण यहाँ की उच्च-भूमियों द्वारा किया जाता है। इस आधार पर हम इसे निम्नांकित अपवाह क्षेत्रों में विभक्त कर सकते हैं –

  1. आर्कटिक महासागरीय अपवाह क्षेत्र (Arctic Ocean Drainage System)
  2. प्रशान्त महासागरीय अपवाह क्षेत्र (Pacific Ocean Drainage System)
  3. हिन्द महासागरीय अपवाह क्षेत्र (Indian Ocean Drainage System)
  4. भूमध्य सागरीय अपवाह क्षेत्र (Mediterranean Sea Drainage System)
  5. आन्तरिक अपवाह क्षेत्र (Inland Drainage System)

आर्कटिक महासागरीय अपवाह क्षेत्र

  • एशिया के मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम से निकल कर दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली नदियाँ इस अपवाह में सम्मिलित हैं।
  • इन नदियों में ओबे (Obe), यनीस (yenisei) लीना (Leena) सर्व प्रमुख नदियाँ हैं जिनकी लम्बाई क्रमशः 5410 किमी, 4092 किमी तथा 4400 किमी है।
  • ओबे नदी का नदी बेसिन 29.75 लाख वर्ग किमी, यनीसी नदी का नदी बेसिन 25.8 लाख वर्ग किमी. तथा लीना नदी बेसिन 24.90 लाख वर्ग किमी. क्षेत्रफल में विस्तृत है।
  • दिवीना (Divina), पिचोरा (Pichora), याना (Yana), इन्दीगिरीका (Indigirica) तथा कोलिमा (Kolima) इस अपवाह क्षेत्र की अन्य महत्त्वपूर्ण नदियाँ हैं।
  • इन नदियों के अधिकाशं जलीय भाग शीतकाल के 7 महीने अत्यधिक शीत के कारण जम जाते हैं।
  • ओबे, यनीसी तथा लीना विश्व की 11 लम्बी नदियों में से हैं जो एशिया के मध्यवर्ती पर्वतीय भाग से निकलती हुई वृक्षाभ अपवाह (Dendritic Dranaige) के साथ उत्तर की ओर बहती है।
  • ग्रीष्मकाल में इस अपवाह तन्त्र की अधिकांश नदियों का प्रयोग नावों व स्टीमरों द्वारा प्रमुख परिवहन मागों के रूप में होता है। जबकि शीतकान में स्लेज (Sleighs) सड़क के रूप में इन नदियों का प्रयोग किया जाता है।

प्रशान्त महासागरीय अपवाह क्षेत्र

  • यह अपवाह क्षेत्र एशिया महाद्वीप के पूर्वी भाग पर विस्तृत हैं इसमें साइबेरिया का पूर्वी भाग चीन तथा हिन्द चीन सम्मिलित हैं।
  • इस अपवाह क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ, आमूर (4416 किमी) ह्वांगहों (4845 किमी) याँगटि सिक्याँग (5520 किमी) सिक्याँग (2655 किमी) मीकांग (4500) किमी तथा मीनाम हैं अधिकाशं नदियाँ एशिया के मध्यतर्वी पर्वतीय भागों से निकलकर पूर्व की ओर बहती हुई प्रशान्त महासागकर में गिरती हैं।
  • मीनाम तथा मीकांग नदी का प्रवाह उत्तर से दक्षिण की ओर मिलता है।
  • ह्वांगहो अपनी सहायक नदियों के साथ जालीनुमा (Trellis) अपवाह निर्मित करती है, जबकि याँगटिसीक्याँग नदी अपनी सहायक नदियों के साथ वृक्षाभ अपवाह (Dendritic Drainage) बनाती है।
  • शांतुग प्रायद्वीप के दक्षिण में यालूलिओं तथा हो नदियाँ, ह्वांगाहो तथा याँगटिसिक्याँग के मध्य में हाई नदी, तथा याँगटिसिक्याँग नदी के दक्षिण में सी तथा लाल नदियाँ प्रशान्त महासागरीय अपवाह की अन्य नदियाँ हैं।

हिन्द महासागरीय अपवाह क्षेत्र

  • इस अपवाह क्षेत्र का विस्तार दक्षिणी एशिया में मध्यवर्ती पर्वतीय पठारी क्रम के दक्षिण की ओर मिलती है।
  • इस अपवाह क्षेत्र की अधिकांश नदियों के उद्गम स्थल एशिया के मध्यवर्ती पर्वती पठारी क्रम में ही स्थित हैं।
  • इस अपवाह तन्त्र में पूर्व की ओर सालविन (2820 किमी) सिवांग तथा इरावदी नदियाँ स्थिति हैं।
  • मध्यवर्ती भाग में गंगा (2700 किमी), ब्रह्मपुत्र (2960 किमी), सिन्धु (3190 किमी.) नर्मदा तथा महानदी प्रमुख नदियाँ हैं।
  • इस अपवाह तन्त्र के पश्चिम की ओर दजला (1850 किमी) तथा फरात 2760 किमी) नदियाँ बंगाल की खाड़ी में, सिन्धु, नर्मदा तथा ताप्ती अरब सागर में तथा दजला फरात फारस की खाड़ी अपना जल डालती हैं।
  • यह नदियाँ संकरी तथा गहरी घाटियों में बहती हैं।

भूमध्यसागरीय अपवाह क्षेत्र

  • इस अपवाह क्षेत्र का विस्तार एशिया महाद्वीप के सुदूर पश्चिमी भागों में मिलता है।
  • इस प्रवाह क्षेत्र के अन्तर्गत अधिकांश तुर्की (आन्तरिक अपवाह वाले अनातोलिया पठार को छोड़कर) लीवेन्ट उच्च भूमि एवं उसके पश्चिमी भूमध्यसागरीय तटवर्ती क्षेत्र सम्मिलित है।
  • अनातोलिया पठार के उत्तरी भागों, पोन्टस पर्वत-मालाओं सहित काला सागर के समस्त तटवर्ती क्षेत्र का जल काला सागर में गिरता है।
  • अनातोलिया पठार के पश्चिमी भाग में तथा टारस पर्वत श्रेणियों में मेन्डेरिस (Menderes), गेडिज (Gediz), ब्यूक (Buyuk), दालामन (Dalaman), सेहान (Seyhan) तथा केहान (Ceyhan) नदियाँ प्रमुख हैं।
  • लीवेन्ट उच्च भूमि से लितानी (Litani) (उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हुई) तथा ओरन्टस (Oronter) (दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हुई) नदियाँ निकलकर भूमध्यसागर में गिरती हैं।

आन्तरिक अपवाह क्षेत्र

  • इस अपवाह क्षेत्र का विस्तार एशिया के मध्य में आनातोलिया के पठार, ईरान, केस्पियन निम्न भूमि, तिब्बत तथा सिक्यॉग से होता हुआ उत्तरी मंगोलिया तक विस्तृत है।
  • यह क्षेत्र तूरानी निम्न भूमि और मध्यवर्ती पठारों पर स्थित है।
  • इस क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ आमू नदियाँ (लम्बाई 2620 किमी) तथा सर दरिया हैं, जो अरल-के स्पियन-तूरानी निम्न भूमि में स्थित अरल सागर में गिरती हैं।
  • उत्तरी मंगोलिया के पठार पर मासगोल तथा कुलीन, सिक्याँग के पठार पर इजीकुल तथा टेलेजकोई तथा तिब्बत के पठार पर दारु, पालटी, कोकोनोर, धलारिंग, चरोल, इकनोमूर तथा हौरापा प्रमुख खारे पानी की झीलें हैं।
Read More :

Read More Geography Notes

 

 

एशिया महाद्वीप के देश (Countries of Asia continent)

वर्तमान में एशिया महाद्वीप (Asia Continent) में संयुक्त राष्ट्र (U. N.) के अनुसार 48 देश हैं। इन देशों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित हैं – 

अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan)

  • राजधानी (Capital) – काबुल
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 37,209,007
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 57/Km2
  • क्षेत्रफल (Area) – 652,860 Km2
  • मुद्रा (Currency) – अफगानी

आर्मेनिया (Armenia)

  • राजधानी (Capital) – येरेवन
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 2,936,173
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 103/Km2
  • क्षेत्रफल (Area) – 28,470 Km2
  • मुद्रा (Currency) – द्राम

अजरबैजान (Azerbaijan)

  • राजधानी (Capital) – बाकू
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 9,995,373
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 121/Km2
  • क्षेत्रफल (Area) – 82,658 Km2
  • मुद्रा (Currency) – आज़रबाइजानी मनात

बहरीन (Bahrain)

  • राजधानी (Capital) – मनामा
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 1,621,903
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 2155 /Km2
  • क्षेत्रफल (Area) – 760 Km2
  • मुद्रा (Currency) – बहरीन दिनार

बांग्लादेश (Bangladesh)

  • राजधानी (Capital) – ढाका
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 167,705,617
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 1291 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 130,170 Km2
  • मुद्रा (Currency) – टका

भूटान (Bhutan)

  • राजधानी (Capital) – थिम्पू
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 824,278
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 22 /Km2  
  • क्षेत्रफल (Area) – 38,117 Km2
  • मुद्रा (Currency) – गुलटुम

ब्रुनेई (Brunei)

  • राजधानी (Capital) – बंदर सेरी बेगावान
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 438,216
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 83 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 5,270 Km2
  • मुद्रा (Currency) – 

कम्बोडिया (Cambodia)

  • राजधानी (Capital) – नाम पेन्ह
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 16,431,964
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 93 /Km2
  • क्षेत्रफल (Area) – 176,520 Km2
  • मुद्रा (Currency) – कम्बोडियन रीएल

चीन (China)

  • राजधानी (Capital) – बीजिंग
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 1,419,010,571 
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 151 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 9,388,211 Km2
  • मुद्रा (Currency) – रॅन्मिन्बी (युआन)

साइप्रस (Cyprus)

  • राजधानी (Capital) – निकोसिया
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 1,196,453
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 130 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 9,240 Km2
  • मुद्रा (Currency) – यूरो

जॉर्जिया (Georgia)

  • राजधानी (Capital) – टैबिलिसि
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 3,904,813 
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 56/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 69,490 Km2
  • मुद्रा (Currency) – जॉर्जिया लारी

भारत (India)

  • राजधानी (Capital) – नई दिल्ली
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 1,365,617,244 
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) –  460 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 2,973,190 Km2
  • मुद्रा (Currency) – रुपया

इंडोनेशिया (Indonesia)

  • राजधानी (Capital) – जकार्ता
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 268,954,602
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 149 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 1,811,570 Km2
  • मुद्रा (Currency) – रुपया

ईरान (Iran)

  • राजधानी (Capital) – तेहरान
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 82,649,180
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 51 /Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 1,628,550 Km2
  • मुद्रा (Currency) – रियाल

इराक (Iraq)

  • राजधानी (Capital) – बगदाद
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 40,177,635
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 93/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 434,320 Km2
  • मुद्रा (Currency) – इराकी दिनार

इजरायल (Israel)

  • राजधानी (Capital) – जेरूसलम
  • जनसंख्या (Population) (2019) –  8,555,829
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 397/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 21,640 Km2
  • मुद्रा (Currency) – इजरायली नई शेकेल

जापान (Japan)

  • राजधानी (Capital) – टोक्यो
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 126,923,240
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 348/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 364,555 Km2
  • मुद्रा (Currency) – येन

जॉर्डन (Jordan)

  • राजधानी (Capital) – अम्मान
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 10,034,145
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 113/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 88,780 Km2
  • मुद्रा (Currency) – जॉर्डन दिनार

कजाकिस्तान (कजाखस्तान) (Kazakhstan)

  • राजधानी (Capital) – अस्ताना
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 18,552,832
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 7/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 2,699,700 Km2
  • मुद्रा (Currency) – कज़ाखस्तानी टेंगे

कुवैत (Kuwait)

  • राजधानी (Capital) – कुवैत शहर
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 4,237,928
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 238/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 17,820 Km2
  • मुद्रा (Currency) – कुवैती दिनार

किर्गिस्तान (Kyrgyzstan)

  • राजधानी (Capital) – बिश्केक
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 6,200,307
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 32/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 191,800 Km2
  • मुद्रा (Currency) – सोम

लाओस (Laos)

  • राजधानी (Capital) – वियनतियाने
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 7,042,193
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 31/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 230,800 Km2
  • मुद्रा (Currency) – लाओ कीप

लेबनान (Lebanon)

  • राजधानी (Capital) – बेरुत
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 6,071,617
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 593/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 10,230 Km2
  • मुद्रा (Currency) – पाउंड

मलेशिया (Malaysia)

  • राजधानी (Capital) – क्वालालम्पुर
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 32,366,596
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 99/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 328,550 Km2
  • मुद्रा (Currency) – डॉलर

मालदीव (Maldives)

  • राजधानी (Capital) – माले
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 450,132
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 1506/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 300 Km2
  • मुद्रा (Currency) – मालदीव रूफिया

मंगोलिया (Mongolia)

  • राजधानी (Capital) – उलानबटोर
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 3,156,736
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 2/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 1,553,560 Km2
  • मुद्रा (Currency) – तुगरिक

म्यांमार (बर्मा) (Myanmar)

  • राजधानी (Capital) – नैप्यीडॉ (Naypyidaw) 
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 54,234,427
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 83/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 653,290 Km2
  • मुद्रा (Currency) – क्यात

नेपाल (Nepal)

  • राजधानी (Capital) – कांठमांडू
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 29,874,470
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 209/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 143,350 Km2
  • मुद्रा (Currency) – रुपया

उतरी कोरिया (North Korea)

  • राजधानी (Capital) – प्योंगयांग
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 25,702,892
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 214/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 120,410 Km2
  • मुद्रा (Currency) – वॉन

ओमान (Oman)

  • राजधानी (Capital) – मस्कट
  • जनसंख्या (Population) (2019) – 4,963,716
  • जनसंख्या घनत्व (Population Density) – 16/Km2 
  • क्षेत्रफल (Area) – 309,500 Km2
  • मुद्रा (Currency) – ओमानी रियाल

एशिया महाद्वीप की भौतिक संरचना (Physical Structure of Asia Continent)

धरातलीय उच्चावच एवं भौतिक विशेषताओं के आधार पर एशिया महाद्वीप को निम्नलिखित भागों में विभक्त किया गया है –

  1. उत्तर का निचला मैदान (North Lowlands)
  2. मध्यवर्ती पर्वतीय एवं पठारी श्रेणियाँ (Central Mountain and Plateaus Ranges)
  3. नदियों के मैदान (River Plains)
  4. दक्षिणी प्रायद्वीपीय पठार (Southern Peninsular Plateau)
  5. द्वीप समूही मालाएँ (Archipelagoes)

1. उत्तर का निचला मैदान

उत्तर का निचला मैदान एशिया महाद्वीप के लगभग 20 प्रतिशत भाग में सोवियत संघ के साइबेरिया तथा तूरानी निम्न भूमि में विस्तृत है। स्टाम्प महोदय ने इस मैदान को उत्तर पश्चिम का बहुत नीची भूमि वाला त्रिभुज’ कहा है इस त्रिभुजाकार मैदान के उत्तर में उत्तरी ध्रुव महासागर, दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में एशिया की मध्यवर्ती बलित पर्वतमालाएँ तथा पश्चिम में यूराल पर्वत एवं कैस्पियन सयागर की उपस्थिति मिलती है। उत्तर का यह निचला मैदान वास्तव में एक मैदानी भाग नहीं है अपितु इसका अधिकांश भाग एक कटा-फटा निचला पठारी भाग है जो मैदान के रूप में परिवर्तित हो गया है। इस विशाल मैदान को दो विभागों में विभक्त किया जाता है –

  1. साइबेरिया का मैदान (The Siberian Plain)
  2. तूरानियन निम्न भूमि (The Turanian Lowland)

साइबेरिया का मैदान

  • उत्तर के निचले मैदान के दक्षिणी-पश्चिमी भाग को छोड़कर शेष मैदानी भाग साइबेरिया के मैदान के रूप में जाना जाता है।
  • इस मैदान का सामान्य ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है।
  • ओबे (Obe), यनीसी (Yenisei) तथा लीना (Lena) इस मैदान में दक्षिण से उत्तर की ओर बहने वाली प्रमुख नदियाँ हैं जो आर्कटिक सागर में गिरती हैं।
  • इन नदियों के मुहाने वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढके रहते है। जिससे इन नदियों के जल प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हो जाता हैं।
  • साइबेरिया मैदान की औसत ऊँचाई 180 मीटर है।

तूरानियन निम्न भूमि

  • उत्तर के निचले मैदान का दक्षिण-पश्चिमी भाग तूरानियन निम्न भूमि या तुर्किस्तान के मैदान के रूप में जाना जाता है।
  • भू-वैज्ञानिकों का विश्वास है कि प्राचीन काल में यहाँ एक आन्तरिक सागर था जो बाद में अवसादों से भरकर एक निचले मैदान के रूप में परिवर्तित हो गया इस सागर के अवशेष आज यहाँ अरब सागर तथा केस्पियन सागर के रूप में मिलते हैं।
  • तूरानियन निम्न भूमि में अरल सागर तथा के स्पियन सागर के मध्य में उस्त-उर्त (Ust-urt) का पठार है जिसकी औसत ऊँचाई लगभग 165 मीटर है।

2. मध्यवर्ती पर्वतीय एवं पठारी क्रम

एशिया महाद्वीप में मध्यवर्ती पंर्वतीय एवं पठारी भाग का विस्तार महाद्वीप के उत्तरी-पूर्वी कोने से लेकर महाद्वीप के पश्चिमी कोने तक हुआ है। यह भौतिक प्रदेश एशिया के लगभग 78 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैला हुआ है जो एशिया महाद्वीप के कुल क्षेत्रफल का लगभग 17 प्रतिशत भाग है।

एशिया महाद्वीप के इस मध्यवर्ती क्रम के पठारों तथा पर्वतों की ऊँचाई 700 मीटर से 8848 मीटर के मध्य मिलती है। इस पर्वतीय पठारी क्रम का केन्द्र पामीर की गाँठ (Knot of Pamir) है। पामीर की गाँठ एक ऊँचा पठारी भाग है जिसकी औसत ऊँचाई 7400 मीटर है। पामीर की गाँठ इस मध्यवर्ती पर्वतीय एवं पठारी क्रम को निम्नलिखित दो भागों में विभक्त करती है –

  1. पामीर को गाँठ से पश्चिम की ओर का पर्वतीय क्रम
  2. पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर का पर्वतीय क्रम

पामीर की गाँठ से पश्चिम की ओर का पर्वतीय क्रम

यह पर्वतीय क्रम पामीर की गाँठ से पश्चिम की ओर तुर्की तक विस्तृत है। पामीर की गाँठ से पश्चिम की ओर भिन्न-भिन्न पर्वतीय श्रृंखलाएं हैं –

  • हिन्दुकुश-एलबुर्ज-आरमीनिया की गाँठ-पोन्टस पर्वत श्रेणियाँ।
  • सुलेमान -किरथर -जैग्रोस-आरमीनिया की गाँठ- टारस पर्वत श्रेणियाँ।

पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर का पर्वतीय क्रम

पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर निम्न चार पर्वतीय क्रम निकलते हैं:

  • पामीर की गाँठ से दक्षिण-पूर्व की ओर एक प्रमुख पर्वतीय क्रम है जिसे हिमालय पर्वत श्रेणी (Himalayan Mountain Rages) के नाम से जाना जाता है।
  • पामीर की गाँठ से दूसरा पर्वतीय क्रम पूर्व की ओर कुनलुनशन (Kunlunshan) पर्वत श्रेणी के रूप में मिलता है जो आगे दो भागों में विभक्त हो जाती है। उत्तर की शाखा अलताई ताग-नानशान-खिंगन पर्वतों के रूप में चीन के उत्तरी-पूर्वी तक विस्तृत है जबकि दक्षिण की शाखा बयानकारा- सिनलिगशान (Tsinlingshan) पर्वत श्रेणियों के रूप में मध्यवर्ती चीन तक विस्तृत है।
  • कुनलुशान श्रेणी के दक्षिण में पामीर की गाँठ से एक छोटी शाखा दक्षिण-पूर्व की आर निकलती हैं ।
  • पामीर की गाँठ से निकलने वाला चौथा पर्वत क्रम उत्तर-पूर्व की ओर तियानशान (Tienshan) पर्वत श्रेणी के रूप में प्रारम्भ होता है।

पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर अन्तपर्वतीय पठार-एशिया महाद्वीप में पामीर की गाँठ से पूर्व की ओर निम्नलिखित अन्तपर्वतीय पठारों की उपस्थिति मिलती है –

1. तिब्बत का पठार (Tibetan Plateau) – कुनलुनशान तथा हिमालय पर्वत श्रेणियों के मध्य तिब्बत का पठार स्थित है जिसकी औसत ऊँचाई 3600 मीटर है।

2. सिक्याँग का पठार या तारिम बेसिन (Sikiang Plaleau of Traim Basin) – तियानशान पर्वत श्रेणी तथा कुनलुनशज पर्वत श्रेणी के मध्य एक पठारी भाग मिलता है जिसकी ऊँचाई 500 से 900 मीटर के मध्य है।

3. जंगेरियन बेसिन या पठार (Zungarian Basin or Plateau) – तियानशान पर्वतश्रेणी तथा अल्टाई पर्वतश्रेणी के मध्य एक निचला पठारी भाग स्थित है। इस पठार की औसत ऊँचाई 300 मीटर है। इसका एक बड़ा भाग दलदली है।

4. साइदाम बेसिन (Tasidam Basin) – नानशान तथा वयानकारा पर्वतश्रेणियों के मध्य 2700 मीटर ऊँचाई का एक अन्तरप्रवाही बेसिन है जो साइदाम बेसिन के नाम से जाना जाता है।

5. गोबी का पठार (Gobi Plateau) – जुगेरियन बेसिन के पूर्व में महान खिंगन तथा अल्टाई पर्वत श्रेणियों के मध्य 1000 से 1500 मीटर ऊँचाई का गोबी का पठार स्थित है।

3. नदियों के मैदान

मध्यवर्ती पर्वतीय एवं पठारी क्रम से कई बड़ी-बड़ी नदियाँ निकल कर दक्षिण की ओर बहती हैं। जहाँ वह कई बड़े-बड़े मैदानों का निमार्ण करती हुई दक्षिण में स्थित महासागरों में गिर जाती हैं। यह मैदान कृषि की दृष्टि से उर्वरक तथा प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति के केन्द्र माने जाते हैं साथ ही एशिया महाद्वीप की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या इन्हीं नदियों के मैदानों में निवास करती है। एशिया महाद्वीप में मिलने वाले नदियों के मैदानों में निम्न मैदान उल्लेखनीय हैं।

दजलाफरात (या मेसोपोटामिया) का मैदान

  • यह मैदान दजला और फरात नदियों के मध्य (ईराक) में विस्तृत हैं।
  • इस मैदान का ढाल उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर है
  • इस मैदान के मध्य भाग का ढाल अत्यन्त धीमा है जिससे यहाँ बाढ़ आती है।
  • सुमेरी, बेवीलोनी तथा उसीरी नामक प्राचीन सभ्यताओं का विकास यहीं हुआ था।

सिन्धु गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान

  • इस मैदान का निर्माण हिमालय से निकलने वाली तीन मुख्य नदियों- सिन्धु, गंगा, ब्रह्मपुत्र एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा लाये गये अवसादों से हुआ है।
  • पूर्व से पश्चिम यह मैदान 2400 किमी की लम्बाई में स्थित है।
  • सिन्ध के मैदान का ढाल उत्तर पूर्व से दक्षिण पश्चिम, गंगा के मैदान का ढाल उत्तर पश्चिम से दक्षिणपूर्व तथा ब्रह्मपुत्र मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर मिलता है।

इरावदी की मैदान

  • बर्मा देश में उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाली इरावदी नदी के द्वारा बिछाये गये अवसादों से यह मैदान निर्मित है।

मीनाम का मैदान

  • थाइलैंड देश में उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाली मीनाम नदी द्वारा बिछाये गये अवसादों से यह मैदान निर्मित है।

मीकांग का मैदान

  • यह एक संकरा मैदान है जो हिन्द चीन प्रायद्वीप पर मीकांग नदी द्वारा बिछाये गये अवसादों से बना है।

सीक्याँग मैदान

  • चीन के सुदूर दक्षिणी भाग में पश्चिम से पूर्व ओर सीक्योंग नदी द्वारा एक संकरा मैदान निर्मित होता है।

याँगटिसीश्याँग मैदान

  • याँगटिसीक्याँग नदी तथा उसकी सहायक नदियों द्वारा बिछाये गये अवसादों से मध्य चीन में यह मैदान निर्मित होता है।

4. दक्षिण महाद्वीप पठार

एशिया महाद्वीप के दक्षिणी भाग में प्राचीनतम चट्टानों से निर्मित निन्नांकित 3 प्रमुख प्रायद्वीपीय पठार स्थित हैं।

अरब का प्रायद्वीपीय पठार

  • यह प्रायद्वीपीय पठार एशिया के दक्षिणी पश्चिमी भाग में स्थित है जिसका ढाल दक्षिणी पश्चिम से उत्तर पूर्व की ओर है।
  • इस पठार की औसत ऊँचाई 1500 मीटर है।
  • जलवायु की शुष्कता के कारण यह पठारी भाग रेतीला मरुस्थलीय भाग हैं।

भारत का प्रायद्वीपीय पठार

  • भारत का दक्षिणी प्रायद्वीपीय भाग एक पठारी भाग के रूप में है।
  • यह एक त्रिभुज के आकार का पठार है जिसके पूर्व और पश्चिम में पर्वतीय श्रेणियाँ हैं।
  • इस पठारी की औसत ऊँचाई 1200 मीटर है।
  • इस पठार का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। कृष्णा, कावेरी, महानदी, गोदावरी आदि नदियों द्वारा यह पठार जगह-जगह काट दिया गया है।

हिन्दी चीन का पठार

  • दक्षिणी पूर्वी एशिया में हिन्द चीन का प्रायद्वीपीय भाग कठोर चट्टानों द्वारा निर्मित है।
  • इसकी औसत ऊँचाई 1200 मीटर है।
  • सालविन, मीकांग, मिनाम आदि नदियों ने इस पठार को जगह-जगह कटा-फटा बना दिया है।
  • इस पठार का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है।

5. द्वीपसमूह मालाएँ

  • एशिया महाद्वीप के दक्षिण पूर्व में जावा, सुमात्रा, का नीमन्तन तथा फिलीपाइन द्वीप समूह स्थित हैं जबकि पूर्व में जापान, ताइवान तथा सखालिन द्वीप स्थित है।
  • इन द्वीपों में वलित पर्वतीय श्रेणियों का अस्तित्व मिलता है तथा तटीय भागों पर संकरे तटीय मैदान मिलते हैं।
  • वर्तमान में इन द्वीपों पर जागृत अथवा मृत ज्वालामुखियों का अस्तित्व मिलता है।
Read More :

Read More Geography Notes

 

 

मोटे अनाज (Coarse Grains)

मोटे अनाजों में ज्वार-बाजरा, मक्का और जौ शामिल किये जाते है। हमारे देश में लगभग 360 लाख हेक्टेयर भूमि पर मोटे अनाज की खेती की जाती है। सन् 1970 के दशक में इसका उत्पादक लगभग स्थिर था। सन् 1983-84 में इसका शिखर उत्पादन 325 लाख टन हो गया था। इसके बाद से यह पुनः घट गया। इसका मुख्य कारण शस्य-क्षेत्र में ह्रास था क्योंकि इन अनाजों के स्थान पर उच्च मूल्य वाली फसलें उत्पन्न की जाने लगी हैं। वर्तमान में 2017-18 में मोटे अनाजों का उत्पादन 448.7 लाख टन हो गया हैं। 

ज्वार (Sorghum)

भारत में चावल तथा गेहूँ के बाद ज्वार सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। दक्षिणी पठार के शुष्क भागों में जहाँ चावल तथा गेहूँ की कृषि नहीं की जा सकती, वहाँ यह विस्तृत क्षेत्र में बोया जाता है और लोगों का मुख्य आहार है। देश के कई भागों में इसे पशुओं के लिए चारे के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।

उत्पादक क्षेत्र : ज्वार का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य   महाराष्ट्र   है। इसके बाद द्वितीय स्थान   कर्नाटक   एवं तृतीय स्थान   मध्य प्रदेश   का है। इसके अलावा   आन्ध्र प्रदेश ,   तमिलनाडु ,   उत्तर प्रदेश ,   गुजरात  इत्यादि राज्यों में भी इसकी कृषि की जाती है। वर्ष 2005-06 के दौरान देश के कुल उत्पादन का 39.0 लाख टन (51.11 प्रतिशत ) ज्वार का उत्पादन करके महाराष्ट्र प्रथम स्थान पर रहा । ज्वार के उत्पादन में जिनअन्य राज्यों ने अशदान दिया वे कर्नाटका (21.89 प्रतिशत ), मध्य प्रदेश (8.26 प्रतिशत ), आंध्र प्रदेश (7.73 प्रतिशत ), तिमलनाडु (3.01 प्रतिशत ), उत्तर प्रदेश (3.15 प्रतिशत ), गजरात (1.97 प्रतिशत ),राजस्थान (2.23 प्रतिशत ), हरयाणा (0.26 प्रतिशत ), और उड़ीसा (0.13 प्रतिशत ) ।

बाजरा (Millet)

बाजरा निर्धन लोगों के लिए भोजन तथा पशुओं के लिए चारे के रुप में प्रयोग की जाने वाली प्रमुख फसल है। बाजरे के लिए 25 से 30° सेटीग्रेड तापमान तथा 40 से 50 से०मी० वर्षा की आवश्यकता होती हैं हल्की व रेतीली मिट्टी में यह भली-भाँति उगता हैं। भारी वर्षा इसके लिए हानिकारक होती हैं।

98 मिलियन टन हुआ। प्रमुख उत्पादक राज्य गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र है। इसके अतिरिक्त आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब तथा मध्य प्रदेश में भी बाजरे की खेती की जाती है।

मक्का (Maize)

मक्का एक अन्य महत्वपूर्ण मोटा अनाज है। इसमें ग्लूकोज तथा मांड (Starch) की मात्रा अधिक होती है, जिस कारण इसे पशुओं को मोटा करने के लिए खिलाया जाता है यह निर्धन लोगों के भोजान का काम भी करता है।

इसके लिए 21 से 27° सेंटीग्रेड, तापमान तथा 75 से०मी० वर्षा की आवश्यकता होती हैं। यह फसल नदियों द्वारा लाई दोमट मिट्टी में भली-भाँति उगती हैं। इसकी कृषि मुख्यतः मैदानी भागों में की जाती है।

भारत में उत्पादक राज्य : भारत में मक्का , राष्ट्रीय खाद्य टोकरी में लगभग 9% योगदान देता है। भारत में मक्का के कुल उत्पादन का 80% से अधिक आंध्र प्रदेश (20.9%), कर्नाटक (16.5%), राजस्थान (9.9%), महाराष्ट्र (9.1%), बिहार (8.9%), उत्तर प्रदेश (6.1%), मध्य प्रदेश (5.7%), हिमाचल प्रदेश (4.4%) इत्यादी राज्योंमें होता है। इसके अलावा जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में भी मक्का उगाया जाता है। मक्का गैर परंपरागत क्षेत्रों जैसे प्रायद्वीपीय भारत एवं आंध्र प्रदेश में महत्वपूर्ण फसल के रूप में उभरा है जहाँ कुछ जिलों में उत्पादकता (5.26 टन प्रतिहेक्टयेर ) और उच्चतम उत्पादन (4.14 लाख टन ) के अधिक या अमरीका के बराबरहोता है। मक्का का उत्पादन 2017-18 में 268.8 लाख टन था।

जौ (Barley)

जौ एक मोटे अनाज की फसल है। यह निर्धन लोगों के भोजन के काम आता हैं। इससे सत्तू, बीयर तथा शराब भी बनाई जाती हैं। इसकी सर्वाधिक माँग मदिरा कारखानों को रहती है।

जौ की उपज की दशाएँ गेहूँ से मिलती-जुलती है। अन्तर यह है कि यह कम वर्षा तथा कम तापमान को भी सहन कर लेती है। इसकी उपज के लिए 10 से 150 सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। यह 40 से०मी० से 50 से०मी० वर्षा में उग आता है। इसके लिए हल्की दोमट मिट्टी अच्छी होती हैं। यह 1000 मीटर की ऊँचाई वाले इलाको में भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। जौ के कुल क्षेत्रफल के 54% भाग में सिंचाई नहीं की जाती।

भारत के उत्पादक राज्य : देश में जौ के प्रमुख उत्पादकों में राजस्थान (40%), उत्तर प्रदेश (30%), मध्य प्रदेश (8%), हरयाणा (6%) और पंजाब (5%) का नाम आता है। कुछ खेती बिहार , हिमाचल प्रदेश औरउत्तरांचल में भी की जाती है।

प्रमुख भारतीय व्यापार केंद्र : जौ के प्रमुख बाजार राजस्थान और मध्य प्रदेश में स्थित हैं। राजस्थान में तीन सबसे बडे़ बाजारों में कोटा , रामगंज मंडी और बारन का नाम आता है।

उत्पादक देश : यूरोपीय संघ , रूस , उक्रेन , कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , जर्मनी , भारत टर्की   और अमेरिका जौ के प्रमुख उत्पादक देश हैं, ये कुल वैश्विक उत्पादन के 75 फीसदी के हिस्सेदार हैं।

Read More :

Read More Geography Notes

 

दालें (Pulses)

दालें (Pulses)

भारत में अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और हमारे आहार में दालें प्रोटीन का प्रमुख स्त्रोत है। दालों के उत्पादन में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई जिस अनुपात में अनाजों के उत्पादन में हुई अन्य दालें है। सकल फसल-क्षेत्र में दालों का क्षेत्र कम हुआ है। दालों का 90% क्षेत्र वर्षा पर ही निर्भर करता है। शस्यवर्तन (Crop Rotation) द्वारा दालों का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बिहार, हरियाण, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलानाडु तथा पश्चिमी बंगाल मुख्य उत्पादक राज्य हैं। दालें खरीफ तथा रबी दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती हैं। अरहर (तुर), मूंग, उर्द, मोठ आदि खरीफ की फसलें हैं जबकि चना, मटर, मसूर, आदि रबी की फसलें हैं। दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय दाल विकास कार्यक्रम सन् 1986-87 में शुरु किया गया।

अरहर (Cajanus Indicus ) – यह पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार तथा अन्य राज्यों में सर्वाधिक खाई जानेवाली दाल है। अरहर में प्रोटीन 27.67%, वसा 2.31%, कार्बोहाइड्रेट 57.27%, लवण 5.50% तथा जल 10.08% रहता है। इसमें विटामिन B पाया जाता है।

मूँग (Phaseolus Mungo) – इसमें प्रोटीन 23.62%, वसा 2.69%, कार्बोहाइड्रेट 53.45%, लवण 6.57% तथा जल 10.87% रहता है। इसमें विटामिन B मिलता है। अन्य दालों की अपेक्षा यह शीघ्र पचती है। अत: रोगियों को पथ्य के रूप में भी दी जाती है।

उड़द (Phaseolus Radiatus) – इसी को माष भी कहते हैं इसमें प्रोटीन 25.5%, वसा 1.7%, कार्बोहाइड्रेट 53.4%, लवण 3.3% एवं जल 13.1% होता है। इस दाल का पंजाब, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, मद्रास एवं मध्य प्रदेश में अत्यधिक प्रचलन है दाल के अतिरिक्त बड़ा, कचौड़ी, इमिरती, इडली और दोसे इत्यादि के बनान में उड़द की दाल का ही विशेष उपयोग होता है।

मसूर (Lentil) –इटली , ग्रीस और एशिया का देशज है। भारत में उत्तरप्रदेश, मद्रास, बंगाल एवं महाराष्ट्र में इसका व्यवहार अत्यधिक हाता है और इसे पौष्टिक आहार समझा जाता है। इसमें 25.5% प्रोटीन, 1.9% तेल, 52.2% कार्बोहाइड्रेट, 3.4% रफेज एवं 2.8% लोहा होता है।इसकी राख में पोटाश एवं फॉस्फेट अधिक मात्रा में रहता है।

मटर (Pisum Arvense) –पूर्वी यूरोप का देशज है। इसकी दूसरी जाति पीसम सैटिवम (Pisum sativum) है , जो एशिया का देशज है। इसमें 22.5% प्रोटीन, 1.6% तेल, 53.7% कार्बोहाइड्रेट, 5.4% रफेज तथा 2.9% राख रहती है। लगभग सभ राज्यों में इसका उपयोग होता है।हरी फली से निकली मटर सब्जी के का आती है और पक जाने पर दाल के लिय इसका उपयोग होता है।

चना (Chick Pea or Cicer Arietinum) – इसका प्रयोग भारत में लगभग सभी प्रदेशों में सामान्य रूप से हाता है।  यह सभी दलहनों में सर्वाधिक पौष्टिक पदार्थ है। पालतू घोड़े को भी यह खिलाया जाता है। घोड़े कोखिलाया जानेवाला चना अंग्रेजी में हॉर्स ग्राम (Horse Gram) कहलाता है। सका वानस्पतिक नाम डॉलिकोस बाइफ्लोरस (Dolichos biflorus) है। इसमें विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में रहता है।चने का बेसन पकौड़ी, बेसनी , कढ़ी तथा मिठाई बनाने के काम में आता है। हरा चना सब्जी बनाने एवं तलकर खाने के काम में आता है।

खेसारी (Lathyrus Sativum) – यह अत्यंत निम्नकोटि का दलहन है। पशुओं के खिलाने और खेतों में हरी खाद के लिए इसका उपयोग अधिक होता है। यह अल्प मात्रा में ही दाल के रूप में खाई जाती है। इसकेअधिक सेबन से कुछ रोग हो जाने की सूचना मिली है।

सोयाबीन (Glycinemax) – यह पूर्वी एशिया का देशज है। इसकी फलियाँ छोटी, रोएँदार होती हैं , जिनमें दो से चार तक बीज होते हैं। इसमें 66-71% जल , 5.5% राख, 14 से 19% वसा , 4.5 से 5.5 % रफेज , 5 से 6 % नाइट्रोजन , 1.5 से 3% स्टार्च , 8 से 9.5% हेमिसेलूलोज़, 4 से 5% पेंटोसन रहता है। इनके अतिरिक्त कैल्सियम , मैग्नीशियम और फॉस्फोरस रहते हैं।

सेम (Bean) –यह कई प्रकार की होती है , जिसमें लाल और सफेद अधिक प्रचलित है। इसमें प्रोटीन 15 से 20%, राख 6 से 7%, शर्करा 21 से 29%, स्टार्च और डेक्सट्रिन 14 से 23% हेमिसेलूलाज 8.5 से 11% तथा पेंटोसन लगभग 7% रहता है। इसके प्रोटीन बिना पकाए शीघ्र नहीं पचते।

उत्पादन – वित्त वर्ष 2017-18 में भारत में 245.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र दलहनों के लिये था जिसमे मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश द्वारा योगदान किया गया था। 

 

Read More :

Read More Geography Notes

 

भारत के प्रमुख फसलें – गेहूँ (Wheat)

गेहूँ (Wheat)

चावल के बाद गेहूँ हमारे देश का दूसरा महत्वपूर्ण खाद्यान्न पदार्थ है। भारत गेहूं का विश्व में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और यह विश्व का लगभग 8% गेहूँ उत्पन्न करता है। देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में रहने वाले लोगों का यह मुख्य आहार है।

गेहूँ की उपज के लिए निम्नलिखित दशाएँ उपलब्ध है।

तापमान – यह एक शितोष्ण कटिबन्धीय पौधा है, जिसके लिए 10 से 15° सोल्सियम तापमान होना आवश्यक है। गेहूँ को उगाते समय 10° सेल्सियस वर्द्धन के समय 15°C और पकते समय 20 से 25° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है।

वर्षा – गेहूँ की कृषि के लिए 80 से०मी० वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है। 100 से०मी० से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूं की कृषि नहीं की जाती। वास्तव में 100 से०मी० वार्षिक वर्षा की समवर्षा रेखा गेहूँ तथा चावल के क्षेत्रों को विभाजित करती है। सिंचाई की सहायता से गेहूं 20 से०मी० वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है।

मिट्टी – गेहूँ की कृषि अनेक प्रकार की मिट्टियों में की जा सकती हैं। परंतु हल्की चिका मिट्टी, चिकायुक्त दोमट मिट्टी, भारी दोमट मिट्टी तथा बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त होती है। भारत में अधिकांश गेहूँ विशाल मैदान के जलोढ़ मिट्टियों के क्षेत्र में उगाया जाता है।

भूमि – गेहूँ की कृषि में बड़े पैमाने पर यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है इसलिए इसे समतल मैदानी भाग की आवश्यकता होती है।

श्रम – गेहूं की कृषि में यन्त्रों का प्रयोग अधिक किया जाता है अतः इसकी कृषि के लिए अधिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती।

उत्पादन तथा वितरण – भारत की लगभग एक-तिहाई कृषि भूमि पर गेहूँ की कृषि की जाती हैं। यह भारत में रबी (शीतकालीन) की फसल है जो शीत ऋतु के समाप्त होने पर काट ली जाती है। हमारे देश में गेहूं के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पैकेज टेकनोलॉजी के कारण देश में 1967 में हरित क्रान्ति आई जिसके प्रभावाधीन भारत में कृषि उत्पादन बढ़ा परंतु हरित क्रान्ति का सबसे अधिक प्रभाव गेहूँ के उत्पादन पर पड़ा। सन् 1970-71 में 1960-61 की तुलना में गेहूं का उत्पादन दुगुने से भी अधिक हो गया। इसी अवधि में गेहूँ के क्षेत्रफल तथा प्रति हेक्टेयर उपज में लगभग डेढ़ गुना वृद्धि हुई। 2017-2018 में लगभग 986.1 लाख टन गेहूँ पैदा किया गया।

गेहूँ की कृषि मुख्यतः पंजाब, हरियाण तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में की जाती है। राजस्थान और गुजरात के कुछ चयनित क्षेत्रों में कृषि की जाती है। देश में कुल गेहूँ उत्पादन का लगभग दो-तिहाई भाग पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से प्राप्त होता है गेहूँ के अन्तर्गत क्षेत्र को भी अब काफी बढ़ा दिया गया है, विशेष तौर पर बिहार और पश्चिमी बंगाल जैसे गैर-परम्परागत क्षेत्रों तक। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी गेहूँ की कृषि पर्याप्त बड़े क्षेत्र पर की जाती है। बिहार और पश्चिमी बंगाल दोनों मिलकर देश में गेहूं के कुल उप्पादन का 8% भाग उत्पन्न करते हैं। पश्चिमी बंगाल में गेहूं की उपज प्रति हेक्टेयर बहुत अधिक है।

वैश्विक बाजार

डेरिवेटिव्स एक्सचेंजेस शिकागो मर्कन्टाइल एक्सचेंज जिसने शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड का अधिग्रहण किया, कानसास सिटी बोर्ड ऑफ ट्रेड, झेंगझोउ कमोडिटी एक्सचेंज, दक्षिण अफ्रीकी फ्यूचर्स एक्सचेंज, एमसीएक्स और एनसीडीईएक्स। यूएसएफओबी और ईयू (फ्रांस) एफओबी कीमतें भौतिक मूल्यों का निर्धारण करती हैं।

आयात और निर्यात

अमेरिका , यूरोपीय संघ -28, कनाडा , ऑस्ट्रेलिया अर्जेंटिना और भारत  प्रमुख निर्यातक हैं वहीं ऐसे कई देश हैं जो विकासशील देशों से उत्पन्न अधिकतम मांग के लिए गेहूं का आयात करते हैं। मध्य-पूर्व एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका आयात करने वाले प्रमुख क्षेत्र हैं। इजिप्ट, ब्राजील, इंडोनेशिया और अल्जीरिया सबसे महत्वपूर्ण आयातक राष्ट्र हैं।

Read More :

Read More Geography Notes

 

भारत के प्रमुख फसलें – चावल (Rice)

चावल (Rice)

चावल (Rice) भारत की सर्वप्रमुख फसल है जिस पर भारत की लगभग आधी से भी अधिक जनसंख्या रहती करती है। चीन के बाद भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल का सर्वाधिक उत्पादक करता है। विश्व का लगभग 29% चावल क्षेत्र भारत में ही होता हैं। भारत की कुल कृषि भूमि के 25% भाग पर चावल बोया जाता हैं। 150 से० मी० से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में चावल लोगों का मुख्य आहार है।

चावल की उपज के लिए निम्नलिखित दशाएँ अनुकूल हैं:

तापमान – यह एक उष्ण कटिबंधीय फसल है जिसके लिए कम-से-कम 24° सेल्सियम तापमान होना आवश्यक है। इसे बोते समय 21° सेल्सियस बढ़ते समय 24° सेल्सियस तथा पकते समय 27° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती हैं।

वर्षा – चावल की फसल के लिए 125 से 200 से०मी० वार्षिक वर्षा आवश्यक है।

मिट्टी – चावल के लिए बहुत उपजाऊ मिट्टी चाहिए। इसके लिए उपजाऊ चीका या दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी में यह पौधा भली-भाँति उगता हैं।

भूमि – चावल की कृषि के लिए हल्की ढाल वाले मैदानी भाग अनुकूल होते हैं। नदियों के डेल्टों तथा बाढ़ के मैदानों में चावल खूब फलता है।

श्रम – चावल की कृषि में मशीनों से काम नहीं लिया जा सकता, इसलिए इसकी कृषि के लिए अत्यधिक श्रम की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि चावल साधारणतया घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बोया जाता हैं।

उत्पादन – भारत में चावल का उत्पादन निरन्तर बढ़ रहा है। 1950-51 में केवल 205 लाख टन चावल का उत्पादन हुआ था। यह उत्पादन 2017-2018 बढ़कर 1115.2 लाख टन हो गया।

यद्यपि हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों में चावल की कृषि में उल्लेखनीय प्रगति हुई है फिर भी हम अन्य देशों की तुलना में काफी पिछड़े हुए हैं। उदाहरणतः भारत में चावल की प्रति हेक्टेयर उपज केवल 1990 किलोग्राम हैं जबकि रूस में 2,630, चीन में 3,600 अमेरिका में 4,770 जापान में 6,220 तथा कोरिया में 6,670 किलाग्राम प्रति हेक्टेयर चावल प्राप्त किया जाता है।

वितरण – यदि जल उपलब्ध हो तो हिमालय के 2440 मीटर से अधिक ऊँचे भागों को छोड़कर शेष समस्या भारत में ग्रीष्म ऋतु में चावल की कृषि की जा सकती है। भारत में बोई गई भूमि के अन्तर्गत सबसे अधिक क्षेत्रफल चावल का है।

भारत का अधिकांश चावल डेल्टाई तथा तटीय भागों में होता है। इसके अतिरिक्त इसकी कृषि दक्षिणी पठार के कुछ भागों में भी की जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों से सतलुज-गंगा के मैदान में चावल की कृषि ने उल्लेखनीय उन्नति की है। इसका मुख्य कारण सिंचाई की सुविधाओं का विस्तार तथा उत्तम बीजों का प्रयोग हैं। हिमालय पर्वत की निचली घाटियों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर चावल की कृषि की जाती हैं। मुख्य उत्पादक राज्य पश्चिमी बंगाल, उत्तर प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, बिहार, पंजाब आदि है। पश्चिमी बंगाल, असम, बिहार, उड़ीसा तथा तमिलनाडु में वर्ष में कहीं-कहीं चावल की तीन-तीन फसलें उगाई जाती हैं क्योंकि यहाँ पर शरद और ग्रीष्म ऋतुओं में भी चावल उगाया जाता है।

वैश्विक परिदृश्य

विश्व उत्पादन : चावल  विश्व की दूसरी सर्वाधिक क्षेत्रफल पर उगाई जाने वाली फ़सल है। विश्व में लगभग 15 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर 45 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है। विश्व में कुल चावल उत्पादन का 90% चावल दक्षिण – पूर्वी एशिया में प्राप्तकिया जाता है।एशिया में प्रमुख उत्पादन देश चीन, भारत , जापान , बांग्लादेश , पाकिस्तान, इण्डोनेशिया, ताइवान, म्यांमार, मलेशिया, फिलिपींस, वियतनाम तथा कोरिया आदि हैं। एशिया से बाहर चावल के प्रमुख उत्पादक देश मिस्र, ब्राज़ील, अर्जेण्टीना, संयुक्त राज्य अमरीका, इटली, स्पेन, तुर्की गिनी कोस्ट तथा मलागासी हैं। चावल का अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थान मनीला (फिलीपींस ) में स्थित है।

चीन : चीन विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। यहाँ पर 3.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर 17.1 करोड़ मीट्रिक टन चावल पैदा किया जाता है जो विश्व के कुल उत्पादन का लगभग एक तिहाई है।

भारत : भारत विश्व में चावल का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है। भारत विश्व में चावल का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ पर विश्व के कुल उत्पादन का 20% चावल पैदा किया जाता है। भारत में 4.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर 9.2 करोड़ मीट्रिक टन चावल काउत्पादन किया जाता है। चावल भारत की सर्वाधिक मात्रा में उत्पादित की जाने वाली फ़सल है।

इण्डोनेशिया : इण्डोनेशिया विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है जो कुल उत्पादन का 8% चावल उत्पादन करता है। यहाँ पर  जावा द्वीप  में सबसे अधिक चावल का उत्पादन होता है।

बांग्लादेश: विश्व का 5% चावल उत्पादन कर बांग्लादेश  विश्व का चौथा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ पर भूमि के 60% भाग में चावल का उत्पादन किया जाता है। यहाँ वर्ष में चावल की तीन फ़सलें उगाई जाती हैं।

इसके अतिरिक्त थाईलैण्ड , जापान , म्यांमार तथा कोरिया चावल के प्रमुख उत्पादक देश हैं। चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश थाईलैण्ड है।

इसके अतिरिक्त म्यांमार , वियतनाम , संयुक्त राज्य अमेरिका , संयुक्त अरब गणराज्य , पाक़िस्तान , इटली ,ब्राजील , पेरू तथा आस्ट्रेलिया आदि बड़े निर्यातक देशों में शामिल हैं।

Read More :

Read More Geography Notes

 

चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात (Cyclone and Anticyclone)

चक्रवात (Cyclone)

सामान्य रूप से चक्रवात निम्न वायुदाब के केन्द्र होते हैं, जिनके चारों तरफ समकेन्द्रीय समवायुदाब रेखाएँ विस्तृत होती हैं तथा केन्द्र से बाहर की ओर वायुदाब बढ़ता जाता है। परिणामस्वरूप परिधि (बाहर से) केन्द्र की ओर हवाएँ चलने लगती है। हवाओं की दिशा उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी के सुइयों के विपरीत तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी के सुइयों के अनुकूल होती है। चक्रवातों का आकार प्रायः गोलाकार या अण्डाकार या V अक्षर के समान होता है। जलवायु तथा मौसम में चक्रवातों का पर्याप्त महत्व होता है, क्योंकि इनके द्वारा किसी भी स्थान (जहाँ पर वे पहुँचते हैं,) की वर्षा तथा तापमान प्रभावित होते है। स्थिति के दृष्टिकोण से चक्रवात को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है।

  1. शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclone)
  2. उष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (Temperate Cyclone)

मध्य अक्षांशों में निर्मित वायुविक्षोभ के केन्द्र में कम वायुदाब तथा बाहर की ओर अधिक वायुदाब होता है और ये प्रायः गोलाकर, अण्डाकार या L के आकार के होते हैं जिस कारण इन्हें लो गर्त या ट्रफ कहते हैं। इनका निर्माण दो विपरीत स्वभाव वाली ठण्डी तथा उष्णार्द्ध हवाओं के मिलने के कारण होता है तथा इनका क्षेत्र दोनों गोलार्थों के 35 से 65° अक्षांशों में पाया जाता है, जहाँ पर ये पछुआ पवनों के प्रभाव में पश्चिम से पूर्व दिशा में चलते रहते हैं। मध्य अक्षांशों के मौसम को ये चक्रवात बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। इसका विस्तार बहुत ज्यादा होता है लगभग 500 से 3000 कि.मी.) इसकी गति प्रतिघंटा गर्मी में 32 कि.मी./घंटा तथा जाड़ों में 48 कि.मी./घण्टा होती है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात (Tropical Cyclone)

कर्क तथा मकर रेखाओं के मध्य उत्पन्न चक्रवातों को ‘उष्णकटिबंधीय चक्रवात’ के नाम से जाना जाता है। शीतोष्ण चक्रवातों की तरह इन चक्रवातों में समरूपता नहीं होती है। इन चक्रवातों के कई रूप होते हैं, जिनकी गति, आकार तथा मौसम संबंधी तत्वों में पर्याप्त अन्तर होता है। निम्न अक्षांशों के मौसम खासकर वर्षा पर उष्णकटिबंधयी चक्रवातों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। इनका व्यास सामान्य रूप से 80 से 300 कि.मी. तक होता है। इनकी गति 32 कि.मी. से 200 कि.मी. घण्टे से भी अधिक होती है। ये चक्रवात सागरों पर तेज चलते हैं। परन्तु स्थलों पर पहुँचते-पहुँचते इनकी गति क्षीण हो जाती हैं तथा आंतरिक भागों में पहुँचने के पहले समाप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि ये महाद्वीपों के केवल तटीय भाग पर अधिक प्रभावशाली होते हैं। उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का समय निश्चित रहता है। यह ग्रीष्म काल में ही आते हैं।

उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के उदाहरण

  • हरिकेन – संयुक्त राज्य अमेरिका और कैरेबियन सागर
  • टायफून – चीन
  • टारनेडो – संयुक्त राज्य अमेरिका
  • विली-विली – आस्ट्रेलिया
  • साइक्लोन – भारत/हिन्द महासागर

प्रतिचक्रवात (Anticyclone)

इसमें वायु व्यवस्था चक्रवात के विपरीत होती है। केन्द्र में उच्च वायुदाब रहता है। तथा बाहर की ओर निम्न वायुदाब रहता है। चक्रवात की अपेक्षा प्रतिचक्रवात में समदाब रेखाएँ बहुत दूर-दूर होती हैं। इसमें पवन की गति मंद पड़ पाती है। प्रतिचक्रवात उत्तरीगोलार्द्ध में Clockwise तथा दक्षिण गोलार्द्ध में Anticlockwise चलती हैं।

Read More :

Read More Geography Notes

 

 

वृष्टि (Precipitation)

खुली स्वछन्द हवा में वायुमंडलीय जलवाष्प का लगातार होने वाला संघनन संघनित कणों की आकार-वृद्धि में सहायक होता है। जब ये कण बड़े हो जाते हैं और हवा का अवरोध उन्हें गुरूत्वाकर्षण बल के खिलाफ लटकाए रखने में असफल होता है तो आकार में बड़े संघनित कण पृथ्वी की धरातल पर गिरने लगते हैं। जल की बून्दों और हिमखडों के गिरने की इस प्रक्रिया को वृष्टि या वर्षण (Precipitation) कहते हैं।

जब वृष्टि जल के बून्दों के रूप में होती है तो इसे जलवृष्टि या वर्षा कहते हैं। जब तापमान हिमांक से नीचे होता है तो वृष्टि हिम-रवों के रूप में होती है, जिसे हिमवृष्टि या हिमपात कहते है। यही दो मुख्य प्रकार की वृष्टियाँ हैं। इनके अलावा सहिम-वृष्टि (स्लीट) और ऊपलवृष्टि (ओले) भी वृष्टि में सम्मिलित हैं। सहिमवृष्टि और ऊपलवृष्टि की घटनाएँ अपेक्षाकृत कम होती हैं। समय और क्षेत्र के संदर्भ में इस प्रकार की वृष्टि केवल कभी-कभी और यत्र-तत्र ही होते हैं।

जब बर्फ की कड़ी और बड़ी गोलियों की बौछार होने लगती है तो इसे ऊपल वृष्टि या ओला वृष्टि कहते हैं। कभी-कभी तेज उर्ध्वाधर वायु धाराएँ ऊपर उठते समय वर्षा की बून्दों को हिमांक तल के ऊपर चढ़ा देती हैं। एक बार जम जाने के बाद ये हिमरवे आकार में बड़े होने लगते हैं और हवा उन्हें लटकाए रखने में असमर्थ हो जाती है जिससे ये नीचे गिरने लगते हैं। किन्तु तेजी से ऊपर उठने वाली वायुधाराएँ इन्हें पुनः ऊपर उठा देती हैं। इस प्रक्रिया में इन पर बर्फ की और पर्ते चढ़ जाती हैं। और बड़े भार के कारण इनका धरातल पर गिरना शुरू हो जाता है। इसलिए ओले में बर्फ की कई संकेन्द्री पर्ते पाई जाती हैं।

वृष्टि के प्रकार (Types of Precipitation)

उत्पत्ति के अनुसार वृष्टि को हम तीन मुख्य वर्गों में बाँट सकते हैं –

  1. संवहनीय वर्षा
  2. पर्वतकृत वर्षा
  3. चक्रवर्ती या वाताग्री वर्षा।

संवहनीय वृष्टि

गर्म और नम हवा का अधिक ऊँचाई तक ऊपर उठना ही संवहनीय वृष्टि का मुख्य कारण है। यह अधिकतर जलवृष्टि के रूप में होती है। ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी के धरातल के अत्यधिक तपने से ऊर्ध्वाधर वायुधाराएँ पैदा होती हैं। जैसे-जैसे धरातलीय वायु ऊपर उठती है, यह फैलती है और ठण्डी होती जाती है तथा अधिक ऊँचाई पर पहुँचकर संतृप्त हो जाती है। इसके बाद इसके जलवाष्प का संघनन होता है और फिर वृष्टि होती है। इस प्रक्रिया से गुप्त उष्मा निकलती है जो वहाँ की हवा को पुनः गर्म करती है तथा उसे और ऊपर उठने को बाध्य करती है। इससे और संघनन तथा वर्षण होता है किन्तु उसका क्षेत्र बड़ा ही सीमित होता है, और उसमें आकाश का बहुत कम भाग बादलों से ढका होता है। डोलड्रम या विषुवतीय शांत कटिबंध में वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है।

पर्वतकृत वृष्टि

गर्म और आर्द्र वायु जब पर्वत श्रेणी सरीखे स्थलाकृति से टकराती है तो बाध्य होकर ऊपर उठती है इससे जो वृष्टि होती है उसे पर्वतकृत वृष्टि कहते हैं। पर्वतकृत वृष्टि में पवन-विमुख ढालों की अपेक्षा पवनभिमुख ढालों पर वृष्टि की मात्रा बहुत अधिक होती है। पवन विमुख ढालों पर हवा नीचे उतरती है और क्रमशः गर्म होती जाती है। साथ ही पवनाभिमुख ढालों पर अधिक वृष्टि करने के बाद हवा में वाष्प की मात्रा भी काफी कम हो जाती है। यही कारण है कि पवन विमुख ढालों और उनके आस-पास की नीची भूमि अपेक्षाकृत शुष्क होती है। इन्हें वृष्टि-छाया क्षेत्र कहते हैं। प्रायद्वीपीय भारत में स्थित महाबलेश्वर व पुणे, एक दूसरे से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं किन्तु इन दोनों स्थानों की वर्षा की मात्रा में काफी अंतर होता है। इस अंतर का कारण पर्वतकृत वृष्टि है। महाबलेश्वर में वर्षा 600 से०मी० है जबकि पुणे में इसकी मात्रा सिर्फ 70 से०मी० है। पुणे की स्थिति वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ती है।

चक्रवाती या वाताग्री वृष्टि

चक्रवातों के कारण होने वाली वृष्टि को चक्रवाती वृष्टि कहते हैं। वाताग्री उत्पत्ति वाली वर्षा तथा हिमवृष्टि चक्रवात वाले क्षेत्रों में विशेषकर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातीय क्षेत्रों में होती है। गर्म और आर्द्र वायुराशि ठंडी वायुराशि से टकराती है तो भीषण तुफानी दशाएँ उत्पन्न होती हैं। गर्म वायुराशि ठण्डी वायुराशि पर चढ़ती है और वहाँ वृष्टि होने लगती है। खासकर इन वायुराशियों के वाताग्रों पर ऐसा प्रायः होता है।

Read More :

Read More Geography Notes

 

error: Content is protected !!