वृष्टि (Precipitation)

खुली स्वछन्द हवा में वायुमंडलीय जलवाष्प का लगातार होने वाला संघनन संघनित कणों की आकार-वृद्धि में सहायक होता है। जब ये कण बड़े हो जाते हैं और हवा का अवरोध उन्हें गुरूत्वाकर्षण बल के खिलाफ लटकाए रखने में असफल होता है तो आकार में बड़े संघनित कण पृथ्वी की धरातल पर गिरने लगते हैं। जल की बून्दों और हिमखडों के गिरने की इस प्रक्रिया को वृष्टि या वर्षण (Precipitation) कहते हैं।

जब वृष्टि जल के बून्दों के रूप में होती है तो इसे जलवृष्टि या वर्षा कहते हैं। जब तापमान हिमांक से नीचे होता है तो वृष्टि हिम-रवों के रूप में होती है, जिसे हिमवृष्टि या हिमपात कहते है। यही दो मुख्य प्रकार की वृष्टियाँ हैं। इनके अलावा सहिम-वृष्टि (स्लीट) और ऊपलवृष्टि (ओले) भी वृष्टि में सम्मिलित हैं। सहिमवृष्टि और ऊपलवृष्टि की घटनाएँ अपेक्षाकृत कम होती हैं। समय और क्षेत्र के संदर्भ में इस प्रकार की वृष्टि केवल कभी-कभी और यत्र-तत्र ही होते हैं।

जब बर्फ की कड़ी और बड़ी गोलियों की बौछार होने लगती है तो इसे ऊपल वृष्टि या ओला वृष्टि कहते हैं। कभी-कभी तेज उर्ध्वाधर वायु धाराएँ ऊपर उठते समय वर्षा की बून्दों को हिमांक तल के ऊपर चढ़ा देती हैं। एक बार जम जाने के बाद ये हिमरवे आकार में बड़े होने लगते हैं और हवा उन्हें लटकाए रखने में असमर्थ हो जाती है जिससे ये नीचे गिरने लगते हैं। किन्तु तेजी से ऊपर उठने वाली वायुधाराएँ इन्हें पुनः ऊपर उठा देती हैं। इस प्रक्रिया में इन पर बर्फ की और पर्ते चढ़ जाती हैं। और बड़े भार के कारण इनका धरातल पर गिरना शुरू हो जाता है। इसलिए ओले में बर्फ की कई संकेन्द्री पर्ते पाई जाती हैं।

वृष्टि के प्रकार (Types of Precipitation)

उत्पत्ति के अनुसार वृष्टि को हम तीन मुख्य वर्गों में बाँट सकते हैं –

  1. संवहनीय वर्षा
  2. पर्वतकृत वर्षा
  3. चक्रवर्ती या वाताग्री वर्षा।

संवहनीय वृष्टि

गर्म और नम हवा का अधिक ऊँचाई तक ऊपर उठना ही संवहनीय वृष्टि का मुख्य कारण है। यह अधिकतर जलवृष्टि के रूप में होती है। ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी के धरातल के अत्यधिक तपने से ऊर्ध्वाधर वायुधाराएँ पैदा होती हैं। जैसे-जैसे धरातलीय वायु ऊपर उठती है, यह फैलती है और ठण्डी होती जाती है तथा अधिक ऊँचाई पर पहुँचकर संतृप्त हो जाती है। इसके बाद इसके जलवाष्प का संघनन होता है और फिर वृष्टि होती है। इस प्रक्रिया से गुप्त उष्मा निकलती है जो वहाँ की हवा को पुनः गर्म करती है तथा उसे और ऊपर उठने को बाध्य करती है। इससे और संघनन तथा वर्षण होता है किन्तु उसका क्षेत्र बड़ा ही सीमित होता है, और उसमें आकाश का बहुत कम भाग बादलों से ढका होता है। डोलड्रम या विषुवतीय शांत कटिबंध में वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है।

पर्वतकृत वृष्टि

गर्म और आर्द्र वायु जब पर्वत श्रेणी सरीखे स्थलाकृति से टकराती है तो बाध्य होकर ऊपर उठती है इससे जो वृष्टि होती है उसे पर्वतकृत वृष्टि कहते हैं। पर्वतकृत वृष्टि में पवन-विमुख ढालों की अपेक्षा पवनभिमुख ढालों पर वृष्टि की मात्रा बहुत अधिक होती है। पवन विमुख ढालों पर हवा नीचे उतरती है और क्रमशः गर्म होती जाती है। साथ ही पवनाभिमुख ढालों पर अधिक वृष्टि करने के बाद हवा में वाष्प की मात्रा भी काफी कम हो जाती है। यही कारण है कि पवन विमुख ढालों और उनके आस-पास की नीची भूमि अपेक्षाकृत शुष्क होती है। इन्हें वृष्टि-छाया क्षेत्र कहते हैं। प्रायद्वीपीय भारत में स्थित महाबलेश्वर व पुणे, एक दूसरे से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं किन्तु इन दोनों स्थानों की वर्षा की मात्रा में काफी अंतर होता है। इस अंतर का कारण पर्वतकृत वृष्टि है। महाबलेश्वर में वर्षा 600 से०मी० है जबकि पुणे में इसकी मात्रा सिर्फ 70 से०मी० है। पुणे की स्थिति वृष्टि छाया क्षेत्र में पड़ती है।

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चक्रवाती या वाताग्री वृष्टि

चक्रवातों के कारण होने वाली वृष्टि को चक्रवाती वृष्टि कहते हैं। वाताग्री उत्पत्ति वाली वर्षा तथा हिमवृष्टि चक्रवात वाले क्षेत्रों में विशेषकर शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातीय क्षेत्रों में होती है। गर्म और आर्द्र वायुराशि ठंडी वायुराशि से टकराती है तो भीषण तुफानी दशाएँ उत्पन्न होती हैं। गर्म वायुराशि ठण्डी वायुराशि पर चढ़ती है और वहाँ वृष्टि होने लगती है। खासकर इन वायुराशियों के वाताग्रों पर ऐसा प्रायः होता है।

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