अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Courts)

संविधान के अनुच्छेद 333 में अधीनस्थ न्यायालय अथवा जिला न्यायालय का प्रावधान किया गया है। उच्च न्यायालयों के अधीन कई श्रेणी के न्यायालय होते हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है। विभिन्न राज्यों में इनके अलग-अलग नाम और अलग-अलग दर्जे हैं, लेकिन व्यापक परिप्रेक्ष्य में इनके संगठनात्मक ढांचे में समानता है। प्रत्येक जिले में एक जिला न्यायालय होता है जिसका इस जिले भर में अपील संबंधी क्षेत्राधिकार होता है। इन जिला अदालतों के अधीन कई निचली अदालतें होती हैं। उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों की तरह ही जिला न्यायालयों को कार्यपालिका से स्वतंत्र रखने के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किये गये हैं।

जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of District Judges)

उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्यपाल जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। सामान्यतः जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य की न्यायिक सेवा के अधिकारियों में से वरिष्ठता तथा योग्यता के आधार पर की जाती है। राज्यपाल, न्यायालय की सिफारिश पर उस व्यक्ति को भी जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त कर सकता है, जो कम से कम 7 वर्ष तक किसी न्यायालय में लगातार अधिवक्ता रहा हो।

जिला न्यायाधीशों के अतिरिक्त अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति दो प्रकार से की जाती है।

  • उच्च न्यायालय द्वारा आयोजित उच्च न्याययिक सेवा परीक्षण सेवा परीक्षा के परिणाम के आधार पर तथा
  • राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रांतीय न्यायिक सेवा परीक्षा के परिणाम के आधार पर।

प्रत्येक जिले में तीन प्रकार के न्यायालय होते हैं –

दीवानी (सिविल) न्यायालय (Civil Court)

इन जिला स्तर के न्यायालयों में चल-अचल संपत्ति से संबंधित मामलों की सुनवाई की जाती है।

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फौजदारी (आपराधिक) न्यायालय (Forensic (Criminal) Court)

इन जिला स्तरीय न्यायालयों में मारपीट, लड़ाई-झगड़े आदि से संबंधित मुकदमों की सुनवाई की जाती है। इनकी सुनवाई करने वाले जिला न्यायाधीश को सत्र न्यायाधीश कहा जाता है।

भू-राजस्व न्यायालय (Land Revenue Court)

इसमें भू एवं लगान संबंधी मामलों की सुनवाई होती है। जिला न्यायाधीश दीवानी और फौजदारी दोनों मामलों पर निर्णय देता है। दीवानी मामलों पर निर्णय देते समय इस न्यायाधीश को जिला न्यायाधीश तथा फौजदारी मामलों पर निर्णय देते समय सत्र न्यायाधीश कहा जाता है।

लोक अदालत (Public Court)

लोक अदालत से अभिप्राय है – जनता का न्यायालय। लोक अदालत व्यक्तियों के बीच के विवादों के शीघ्र निबटारे तथा अल्प व्यय के आधार पर आपसी समझौतों द्वारा निपटाने का प्रयास करती है। 6 अक्टूबर, 1985 को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायविद तथा मुख्य न्यायाधीश पी.एन. भगवती की अध्यक्षता में प्रथम लोक अदालत का आयोजन दिल्ली में किया गया। उसी दिन 116 विवादों का आपसी समझौते द्वारा हल निकाला गया।

न्यायिक सेवा प्राधिकार अधिनियम 1987 ने लोक अदालत के अभियान में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है। इस अधिनियम के अनुसार –

  • केन्द्र सरकार या राज्य सरकार या जिला प्रशासन समय-समय पर निर्धारित स्थानों पर लोक अदालत का आयोजन कर सकते हैं।
  • लोक-अदालत द्वारा दिये गये निर्णय दीवानी या सिविल अदालत द्वारा दिये गये निर्णय माने जाते हैं। तथा संबंधित व्यक्ति निर्णय के प्रति बाध्य होते हैं।
  • लोक अदालत द्वारा निर्णय दे दिये जाने के बाद कोर्ट शुल्क वापस कर दिये जाते हैं।
  • न्यायिक पदाधिकारी अथवा सरकार द्वारा निर्धारित योग्यता रखने वाले व्यक्ति लोक अदालत की अध्यक्षता करते हैं।
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इस प्रकार लोक अदालतें अल्प समय, अल्प खर्चे तथा आपसी समझौते के द्वारा विवादों का निपटारा कर न्यायालय के भारी बोझ को कम करती हैं।

जनहित याचिका (Public Interest Litigation)

जनहित याचिका इन सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्रों में से एक है, जिसे भारत में विधायिका व कार्यपालिका के कानूनी दायित्वों को लागू करने के लिए हाल ही में न्यायपालिका ने प्राप्त किया है। इसका उद्देश्य है- न्याय देना तथा लोगों के हित के संवर्द्धन में सहायता करता। दूसरी व्याख्या एक ऐसी याचिका के रूप में की जा सकती है, जिसका संबंध अधिकांश लोगों के हित-संरक्षण से है। इसका प्रयोग सामान्यतः समाज के हितों की रक्षा हेतु किया जाता है, न कि व्यक्तिगत हितों की रक्षा हेतु जिन हितों की रक्षा मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। जनहित याचिका जारी करने का अधिकार केवल सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को है। ऑस्ट्रेलिया में अपनी जड़ों के निहित होने के कारण जनहित याचिका की संकल्पना संविधान की न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति से नि:सृत है। अपने अनेक आदेशों के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका से संबंधित नियमों को विकसित किया है। सार्वजनिक हित के लिए जागरूक कोई भी व्यक्ति या संस्था जनहित याचिका दायर कर सकता है। एक पोस्टकार्ड की रिट याचिका के रूप में माना जा सकता है। न्यायालय द्वारा दी गई राहत प्रायः राज्य को निर्देश या आदेश के रूप में होती है, जिसमें प्रभावित पक्षों का मुआवजा भी शामिल है। जनहित याचिका ने चार प्रमुख उद्देश्यों को पूरा किया है –

  • इसने लोगों को अनेक अधिकारों तथा उन्हें क्रियान्वित करने के लिए न्यायपालिका के रूप में संस्थागत व्यवस्था के प्रति अत्यंत जागरूक बना दिया है। यह कहा जाता है कि जनहित याचिका ने न्यायपालिका का लोकतंत्रीकरण कर दिया है।
  • जनहित याचिका द्वारा सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 32 व अनुच्छेद 226 की उदार व्याख्या करते हुए मौलिक अधिकारों के क्षेत्र को अत्यंत व्यापक बना दिया है।
  • इसने कार्यपालिका तथा विधायिका को लोगों के प्रति अपने संविधानिक दायित्वों के निर्वाह के लिए बाध्य किया है।
  • इसने लोगों को भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन तथा रहने योग्य पर्यावरण प्रदान करने का एक प्रयास किया है।
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हालांकि जनहित याचिका भी आलोचना से मुक्त नहीं है। यह कहा जाता है कि इसने न्यायालय की समान्य न्यायिक कार्यकलापों में बाधा डालनी शुरू कर दी है। साथ ही साथ इससे कुछ चीजों को मात्र विलंब करने के उद्देश्य से दायर की गई झूठी याचिकाओं को बढ़ावा मिला है। जनहित याचिका को नियमित करने के लिए उसमें विधायिका संबंधी कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इसके स्थान पर, जनहित याचिका के संबंध में न्यायपालिका को स्वयं अपनी आचार संहिता विकसित करनी चाहिए।

  • जनहित याचिकाओं के अध्ययन के लिए न्यायपालिका छानबीन करने वाली एक समिति गठित कर सकता है, जो समय बचाने के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।
  • नकली जनहित याचिका दायर करने के लिए न्यायपालिका जुर्माना भी ले सकती है।
  • न्यायालय जनहित याचिका को अधिक प्रभावी ढंग से निपटाने में अर्थात् ‘न्यायालय का मित्र’ का उदार रीति से प्रयोग कर सकता है।
  • सामान्य नियम के तौर पर याचिकाकर्ता से याचिका में लगाए गए आरोपों के लिए साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जा सकता है।

 

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