भारत की ऊर्जा सुरक्षा और हरित ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) को एक प्रमुख समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। हालांकि, यह पहल देश में पहले से ही गंभीर जल संकट को और अधिक गहरा कर सकती है। यह लेख India Toady में प्रकाशित “10,000 litres water for one litre of ethanol: India’s fuel push to worsen water crisis” पर आधारित हैं, इसके अनुसार, चावल और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों से एथेनॉल उत्पादन के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। विशेष रूप से, एक लीटर चावल-आधारित एथेनॉल के उत्पादन में लगभग 10,000 लीटर पानी की खपत होती है। यह स्थिति जल-तनावग्रस्त राज्यों में संसाधनों के असंतुलित दोहन की ओर संकेत करती है।
एथेनॉल सम्मिश्रण और जल संकट: एक विश्लेषणात्मक सारांश
भारत सरकार ने कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने के उद्देश्य से एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम को आक्रामक रूप से विस्तारित किया है। 2024-25 के लिए सरकार ने एथेनॉल उत्पादन हेतु 52 लाख टन चावल आवंटित किया है, जिसे 2025-26 तक बढ़ाकर 90 लाख टन करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से गरीबों को दिए जाने वाले टूटे हुए चावल की हिस्सेदारी को 25% से घटाकर 10% करने की योजना है, ताकि अधिशेष चावल को डिस्टिलरी (आसवनी) की ओर मोड़ा जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का तर्क है कि जिसे ‘स्वच्छ ईंधन’ कहा जा रहा है, वह वास्तव में भारत के बहुमूल्य जल संसाधनों की कीमत पर प्राप्त हो रहा है।
जल पदचिह्न (Water Footprint) का सांख्यिकीय विश्लेषण
एथेनॉल उत्पादन की जल तीव्रता चिंताजनक है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा द्वारा 2024 में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, चावल से एक लीटर एथेनॉल बनाने में कुल 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसमें सिंचाई और प्रसंस्करण दोनों शामिल हैं। तुलनात्मक रूप से, मक्के से एक लीटर एथेनॉल बनाने में 4,670 लीटर और गन्ने से 3,630 लीटर पानी की खपत होती है। चूंकि 1 किलोग्राम चावल उगाने में ही 3,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है और 1 टन चावल से केवल 470 लीटर एथेनॉल प्राप्त होता है, इसलिए चावल को ईंधन के सबसे जल-गहन स्रोतों में से एक माना जा रहा है।
क्षेत्रीय जल तनाव और औद्योगिक प्रभाव
भारत की कुल एथेनॉल उत्पादन क्षमता वर्तमान में 1,822 करोड़ लीटर है। चिंता का विषय यह है कि इस क्षमता का एक बड़ा हिस्सा उन राज्यों में केंद्रित है जो पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं। महाराष्ट्र की क्षमता 396 करोड़ लीटर है, जबकि वहां के विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्र पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में एथेनॉल संयंत्र उन्हीं भूजल भंडारों का उपयोग कर रहे हैं जिन्हें ‘गंभीर रूप से कम’ (Critically Depleted) श्रेणी में रखा गया है। नीति आयोग के कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 प्रमुख शहरों में भूजल स्तर शून्य तक पहुँच सकता है।
पर्यावरणीय प्रभाव और अपशिष्ट प्रबंधन
एथेनॉल उत्पादन केवल पानी की खपत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदूषण का भी कारण है। आईपीसीसी (IPCC) लेखक अंजल प्रकाश के अनुसार, एथेनॉल मिलें भारी मात्रा में अपशिष्ट जल (विनासे/Vinasse) उत्पन्न करती हैं। यदि इस अपशिष्ट का उचित उपचार नहीं किया गया, तो यह सतही जल और भूजल दोनों को प्रदूषित कर सकता है। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा के किसानों को लंबे समय तक भूजल दोहन के लिए जिम्मेदार ठहराया गया, लेकिन अब उन्हीं फसलों का उपयोग औद्योगिक स्तर पर ईंधन बनाने के लिए किया जा रहा है, जिसे ‘हरित ऊर्जा’ का लेबल दिया गया है। यह विरोधाभास नीतिगत स्तर पर स्थिरता (Sustainability) के प्रति सवाल खड़े करता है।
प्रशासनिक चुनौतियाँ और सामाजिक प्रभाव
सरकार की एथेनॉल नीति का सीधा प्रभाव खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय पर भी पड़ सकता है। गरीबों के राशन से चावल की कटौती कर उसे ईंधन उत्पादन में लगाना एक नैतिक और प्रशासनिक चुनौती है। ‘इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस’ (IEEFA) की विशेषज्ञ स्वाति शेषाद्रि के अनुसार, गन्ना उगाने वाले क्षेत्रों में एथेनॉल संयंत्रों की स्थापना से वहां की जल तालिका पर दबाव असहनीय स्तर तक बढ़ गया है। जहां किसान को एक किलो अनाज के लिए पानी बर्बाद करने का दोषी माना जाता है, वहीं उद्योगों द्वारा हजारों लीटर पानी की खपत पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत का एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी भारी जल-लागत को नजरअंदाज करना आत्मघाती हो सकता है। जल-गहन फसलों (चावल, गन्ना) के बजाय गैर-खाद्य और कम पानी वाली फसलों या द्वितीय पीढ़ी (2G) एथेनॉल (कृषि अवशेषों से प्राप्त) पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है। यदि जल प्रबंधन को ऊर्जा नीति के साथ एकीकृत नहीं किया गया, तो भविष्य में भारत को ईंधन की उपलब्धता के बावजूद पानी के भीषण अकाल का सामना करना पड़ सकता है। सतत विकास के लिए ऊर्जा सुरक्षा और जल सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना समय की मांग है।
Source – India Today
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