यह लेख “The Wire” में प्रकाशित लेख “Only 1.5% of Funds Used, the PM Internship Scheme Has Missed Its Targets by a Wide Margin” से लिया गया हैं, इस लेख में भारत सरकार की महत्वाकांक्षी ‘प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना’ (PM Internship Scheme – PMIS) के कार्यान्वयन और उसके निराशाजनक परिणामों का एक विस्तृत विश्लेषण है। वर्ष 2024 के बजट में घोषित इस योजना का लक्ष्य 5 वर्षों में 1 करोड़ युवाओं को शीर्ष 500 कंपनियों में इंटर्नशिप प्रदान करना था, ताकि वे वास्तविक व्यावसायिक वातावरण का अनुभव प्राप्त कर सकें। हालांकि, नवीनतम डेटा और आरटीआई (RTI) खुलासे दर्शाते हैं कि योजना अपने लक्ष्यों से काफी पीछे है। वित्त वर्ष 2024-25 और 2025-26 के दौरान आवंटित बजट का 1.5% से भी कम हिस्सा खर्च हो पाया है। इसके अतिरिक्त, इंटर्नशिप के प्रस्तावों को स्वीकार करने और कार्यक्रम पूरा करने वाले युवाओं की संख्या भी चिंताजनक रूप से कम है। अपर्याप्त वजीफा, भौगोलिक बाधाएं और प्रशासनिक कमियां इस ‘सिस्टमैटिक विफलता’ के मुख्य कारण बताए गए हैं।
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना: एक विश्लेषणात्मक अवलोकन
ऐतिहासिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि
भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) अपनी चरम सीमा पर है, युवाओं को कौशल प्रदान करना और उन्हें रोजगार योग्य बनाना राज्य के नीति निदेशक तत्वों (अनुच्छेद 41) के अनुरूप है, जो काम और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की बात करता है। इसी परिप्रेक्ष्य में, केंद्र सरकार ने बजट 2024-25 में प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (PMIS) की घोषणा की। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटना था। सरकार ने इसके लिए 63,000 करोड़ रुपये का कुल परिव्यय निर्धारित किया था, जिसमें पहले दो वर्षों में 30 लाख युवाओं को कवर करने का लक्ष्य था। यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘कौशल भारत’ अभियानों को मजबूती देने के लिए शुरू की गई थी।
वित्तीय स्थिति और बजटीय विश्लेषण
योजना की सबसे बड़ी विफलता इसके वित्तीय उपयोग में देखी गई है। वित्त वर्ष 2024-25 में, 2,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, लेकिन केवल 21.10 करोड़ रुपये (1.05%) ही खर्च हुए। स्थिति अगले वर्ष और भी विकट हो गई; वित्त वर्ष 2025-26 में 10,831.07 करोड़ रुपये के भारी बजट अनुमान (BE) के मुकाबले 28 फरवरी 2026 तक केवल 59.16 करोड़ रुपये (0.54%) व्यय किए गए। यह विशाल अंतर दर्शाता है कि योजना का क्रियान्वयन जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं रहा है। राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने इसे ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ करार देते हुए सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं।
प्रशासनिक प्रयास और कार्यान्वयन की चुनौतियां
कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और IIM बैंगलोर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर इस योजना का मूल्यांकन किया। प्रशासनिक स्तर पर, पोर्टल का शुभारंभ और कंपनियों का पंजीकरण उत्साहजनक था, जहाँ पहले दिन ही 111 कंपनियों ने पंजीकरण कराया। हालांकि, कार्यान्वयन के स्तर पर कई खामियां पाई गईं। लोकसभा सदस्य हर्ष मल्होत्रा के अनुसार, आवंटित राशि के बावजूद मुख्य योजना पूरी तरह शुरू नहीं हो सकी और यह केवल एक पायलट प्रोजेक्ट तक ही सीमित रह गई। प्रशासनिक सुस्ती और कंपनियों के साथ संचार की कमी ने इस योजना की गति को बाधित किया है।
इंटर्नशिप के आंकड़ों का तुलनात्मक विवरण
आंकड़े बताते हैं कि युवाओं में इस योजना के प्रति प्रारंभिक आकर्षण तो था, लेकिन टिकाऊपन का अभाव रहा।
- प्रथम चरण (Round I): 1.27 लाख से अधिक अवसर प्रदान किए गए, लेकिन केवल 28,000 (22%) ने इसे स्वीकार किया और मात्र 3,995 (3.1%) ही इसे पूरा कर सके।
- द्वितीय चरण (Round II): 1.18 लाख अवसरों में से केवल 4,652 (~4%) ही कार्यक्रम में बने रहे या उसे पूरा किया।
सामाजिक और लैंगिक प्रभाव
संसदीय स्थायी समिति (अध्यक्ष भर्तृहरि महताब) ने अपनी रिपोर्ट में विशेष रूप से लैंगिक असमानता और सामाजिक बाधाओं पर प्रकाश डाला है। रिपोर्ट के अनुसार, महिला उम्मीदवारों के लिए सुरक्षा, आवास और स्थानांतरण की चुनौतियां अधिक गंभीर हैं, जिसके कारण उनकी भागीदारी कम रही है। ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए बड़े शहरों में स्थित कंपनियों में इंटर्नशिप करना वित्तीय रूप से अव्यवहारिक सिद्ध हुआ है। 5,000 रुपये का मासिक वजीफा और 6,000 रुपये की एकमुश्त सहायता शहरी जीवन स्तर और यात्रा खर्चों को वहन करने के लिए अपर्याप्त पाई गई है।
युवाओं के मोहभंग के कारण
मूल्यांकन रिपोर्ट में पाया गया कि 61% युवाओं ने व्यक्तिगत कारणों से जॉइन नहीं किया, जबकि 16% ने भौगोलिक दूरी को कारण बताया। जो लोग बीच में ही इंटर्नशिप छोड़ गए, उनमें से 39% ने व्यक्तिगत समस्याओं और 12% ने वित्तीय बाधाओं का उल्लेख किया। कई युवा इस राशि से बेहतर अन्य नौकरियों या उच्च शिक्षा (36%) और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह स्पष्ट है कि योजना की प्रोत्साहन संरचना युवाओं की वास्तविक जरूरतों के साथ मेल नहीं खाती।
समाधान की राह
संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि मासिक वजीफे को वर्तमान जीवन यापन की लागत के अनुरूप बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही, आवास और यात्रा के लिए एक ‘ग्रेडेड सपोर्ट मैकेनिज्म’ विकसित किया जाना चाहिए, विशेषकर महिलाओं और ग्रामीण उम्मीदवारों के लिए। योजना की सफलता के लिए इसे केवल कॉर्पोरेट जिम्मेदारी न मानकर एक सशक्त कौशल विकास तंत्र के रूप में पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना का वर्तमान स्वरूप अपनी महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबा हुआ प्रतीत होता है। 99% से अधिक बजट का अनुपयोगी रहना और मात्र 0.3% लक्ष्य प्राप्ति यह संकेत देती है कि नीति निर्माण और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच एक गहरा अंतराल है। यदि भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ उठाना है, तो उसे केवल घोषणाओं तक सीमित न रहकर, वित्तीय लचीलेपन और समावेशी बुनियादी ढांचे पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
| UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न |
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Paper I (Essay)
Paper III – GS Paper II (Governance)
Paper IV – GS Paper III (Economy)
Paper V – GS Paper IV (Ethics)
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