प्रस्तुत लेख ग्रेट निकोबार द्वीप के पारिस्थितिक तंत्र, इसके विकास और संभावित पर्यावरणीय तथा सामाजिक परिणामों का एक गहन और तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ₹81,000 करोड़ (लगभग $9.4 बिलियन) की लागत वाली ग्रेट निकोबार मेगा-इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना का लक्ष्य भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करना है। हालांकि, इससे 9.64 लाख पेड़ों की कटाई और प्राथमिक वर्षावनों के विनाश का गंभीर खतरा है। लेख में इस बात की पड़ताल की गई है कि वर्तमान में हीटवेव, वनों की गुणवत्ता में गिरावट और जनजातीय समुदायों की सुरक्षा जैसे मुद्दों के बीच इस परियोजना का पर्यावरणीय मूल्य कितना उचित है। यह चर्चा “India Is Burning. And We’re About to Cut Down a Million Trees” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है।
ग्रेट निकोबार की दुविधा: विकास और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन
(The Great Nicobar Dilemma: Balancing Development and Environmental Sensitivity)
भूमिका: ग्रेट निकोबार परियोजना – विकास और पारिस्थितिकी के बीच का द्वंद्व
वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप वैश्विक तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है, भारत को एक अभूतपूर्व पर्यावरणीय और रणनीतिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान स्थिति यह है कि दुनिया के 20 सबसे गर्म शहरों में से 19 शहर भारत में स्थित हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तापमान 44–45°C तक पहुंच रहा है, जो कि ग्रीष्मकाल की चरम अवधि शुरू होने से पहले ही एक गंभीर स्थिति है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही अप्रैल-जून 2026 तक चलने वाली हीटवेव की चेतावनी जारी कर दी है। ऐसे संवेदनशील समय में जब पूरा देश भीषण गर्मी की चपेट में है, भारत सरकार ने ग्रेट निकोबार के प्राचीन उष्णकटिबंधीय वर्षावनों (Tropical Rainforests) के एक बड़े हिस्से को काटने की योजना बनाई है।
यह लेख किसी भी प्रकार से विकास या सरकार विरोधी नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है: जब पूरा देश गर्मी और जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है, तो एक ऐसे प्राचीन वर्षावन को नष्ट करने का क्या अर्थ है जिसे विकसित होने में हजारों वर्ष लगे हैं। इस परियोजना के दूरगामी और जटिल परिणाम हो सकते हैं। इस लेख के माध्यम से हम ग्रेट निकोबार विकास परियोजना, इसके पर्यावरणीय और रणनीतिक पहलुओं, जनजातियों पर इसके प्रभाव, तथा इसके पीछे के आंकड़ों और तथ्यात्मक विसंगतियों का विश्लेषण करेंगे।
ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट: एक व्यापक अवलोकन
ग्रेट निकोबार के समग्र विकास (Holistic Development of Great Nicobar Island) के लिए ₹81,000 करोड़ (लगभग $9.4 बिलियन) की इस मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की कल्पना नीति आयोग द्वारा 2021 में की गई थी और इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित किया गया था। इस परियोजना का क्रियान्वयन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO) द्वारा किया जा रहा है।
इस परियोजना के तहत ग्रेट निकोबार द्वीप पर निम्नलिखित प्रमुख अवसंरचनाओं के निर्माण का प्रस्ताव है:
- गैलेथिया खाड़ी (Galathea Bay) में एक अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल: इसका उद्देश्य भारत को विदेशी ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने में मदद करना है।
- एक ग्रीनफील्ड डुअल-यूज़ नागरिक और सैन्य हवाई अड्डा: यह रणनीतिक और नागरिक विमानों दोनों के लिए उपयोग में लाया जाएगा।
- एक विशाल टाउनशिप: यह टाउनशिप लगभग 3.5 से 4 लाख लोगों को बसाने के लिए तैयार की जा रही है।
- एक बिजली संयंत्र (Power Plant)
ग्रेट निकोबार द्वीप हिंद महासागर के दक्षिण में स्थित एक सुदूर, अपेक्षाकृत अछूता द्वीप है। यह मलक्का जलडमरूमध्य के निकट स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक है। इस परियोजना के लिए सरकार के घोषित उद्देश्य स्पष्ट और तर्कसंगत हैं: विदेशी बंदरगाहों (जैसे सिंगापुर और कोलंबो) पर भारत की निर्भरता को कम करना। वर्तमान में ये विदेशी बंदरगाह भारत के 75% कार्गो को संभालते हैं। इसके अलावा, इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री और सैन्य उपस्थिति को मजबूत करना और 1 लाख प्रत्यक्ष तथा 1.5 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करना है। इन रणनीतिक उद्देश्यों को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसके पर्यावरणीय और सामाजिक परिणामों को भी समान रूप से समझने की आवश्यकता है।
भौगोलिक और रणनीतिक महत्व: ग्रेट निकोबार का अवस्थिति विश्लेषण
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में भारत की रणनीतिक योजना का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र है। इस द्वीप की निकटता मलक्का जलडमरूमध्य, सुंडा जलडमरूमध्य और लोम्बोक जलडमरूमध्य जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों से है। ये मार्ग वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण धमनियां हैं।
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति और नौसैनिक विस्तार, जिसमें म्यांमार के कोको द्वीप समूह (Coco Islands) तक पहुंच शामिल है, भारत के लिए एक वास्तविक और बढ़ता हुआ सुरक्षा खतरा है। ग्रेट निकोबार में एक ट्राई-सर्विसेज बेस और गहरे पानी के बंदरगाह (Deep-water port) की स्थापना से भारत को इन रणनीतिक जलमार्गों पर कड़ी निगरानी रखने और अपनी समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार इन मार्गों से होकर गुजरता है और देश को अपने कार्गो को संभालने के लिए विदेशी बंदरगाहों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह निर्भरता न केवल अतिरिक्त लागत का कारण बनती है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी भारत को कमजोर स्थिति में रखती है। गैलेथिया खाड़ी में एक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल इस निर्भरता को कम कर सकता है और विदेशी मुद्रा की बचत कर सकता है। इस प्रकार, इस परियोजना का रणनीतिक और आर्थिक पक्ष मजबूत है, जो कि भारत की आर्थिक संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक है।
पारिस्थितिक क्षरण और जैव विविधता का विनाश
ग्रेट निकोबार द्वीप को केवल एक साधारण द्वीप नहीं माना जा सकता। इसके कुल क्षेत्रफल का 85% हिस्सा वन आवरण (Forest Cover) है। यह द्वीप 200 से अधिक पक्षी प्रजातियों का घर है। यहाँ ऐसे पारिस्थितिक तंत्र मौजूद हैं जो हजारों वर्षों से पूर्ण अलगाव में विकसित हुए हैं। यह द्वीप यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) का एक मजबूत दावेदार है।
इस परियोजना के कारण लगभग 130 वर्ग किलोमीटर के प्राथमिक उष्णकटिबंधीय वर्षावन (Primary Tropical Rainforest) के प्रभावित होने का अनुमान है, जो कि द्वीप के कुल भूभाग का लगभग 15% है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संसद को आधिकारिक तौर पर सूचित किया है कि इस परियोजना के लिए लगभग 9.64 लाख (964,000) पेड़ों को काटा जाएगा। हालांकि, स्वतंत्र पारिस्थितिकीविदों का अनुमान है कि जब इस परियोजना का पूरा प्रभाव क्षेत्र सामने आएगा, तो काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या 1 करोड़ (10 million) तक पहुंच सकती है।
तुलना के लिए, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि भारत प्रतिवर्ष पूरे देश में लगभग 18,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ लगाता है। पिछले दो वर्षों में भारत के कुल वन और वृक्ष आवरण (Forest and Tree Cover) में वृद्धि केवल 1,446 वर्ग किलोमीटर दर्ज की गई थी। इस प्रकार, अकेले ग्रेट निकोबार परियोजना में काटा जाने वाला वन क्षेत्र देश के वार्षिक वनीकरण से कहीं अधिक है।
इसके अतिरिक्त, गैलेथिया खाड़ी, जहां यह बंदरगाह बनाया जाएगा, एक रामसर-संरक्षित आर्द्रभूमि (Ramsar-protected wetland) है। यह भारत में विशालकाय लेदरबैक समुद्री कछुए (Leatherback Sea Turtle) के लिए सबसे महत्वपूर्ण घोंसला बनाने का स्थान है। यह कछुआ दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री कछुआ है और एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) प्रजाति है। इस अभयारण्य को 1997 में विशेष रूप से इन कछुओं की रक्षा के लिए नामित किया गया था, लेकिन 2021 में, उसी वर्ष जब इस परियोजना को मंजूरी दी गई, इसे चुपचाप डी-नोटिफाई (Denotify) कर दिया गया। बंदरगाह के निर्माण के लिए समुद्र के तल को लाखों घन मीटर तक ड्रेज (Dredge) करना पड़ेगा, जिससे मूंगा चट्टानें (Coral reefs), समुद्री घास के मैदान (Seagrass meadows) और कछुओं के घोंसले नष्ट होने का खतरा है। गैलेथिया के मैंग्रोव बेल्ट, जो प्राकृतिक सुनामी अवरोधक (Tsunami barriers) का काम करते हैं, को भी हटा दिया जाएगा।
हीटवेव का संकट और वनों की जलवायु-नियामक भूमिका
ग्रेट निकोबार के वर्षावनों के विनाश और भारत में हाल ही में अनुभव की जा रही हीटवेव के बीच एक गहरा और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित संबंध है। वन केवल कार्बन सिंक (Carbon sinks) नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति के एयर कंडीशनिंग सिस्टम के रूप में कार्य करते हैं। एक विशाल उष्णकटिबंधीय पेड़ वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) की प्रक्रिया के माध्यम से आसपास की हवा को ठंडा करता है। यह प्रक्रिया मिट्टी से पानी को वातावरण में पंप करती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि एक बड़ा उष्णकटिबंधीय पेड़ कई एयर कंडीशनर के समान लगातार शीतलन प्रभाव प्रदान करता है।
पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज (2025) में प्रकाशित एक अध्ययन ने 20 वर्षों तक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वनों की कटाई (Deforestation) का विश्लेषण किया। इसके निष्कर्ष बहुत ही चौंकाने वाले थे: जिन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अपने वन बनाए रखे गए, वहां का तापमान औसतन 0.2°C बढ़ा। इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों के वनों को साफ कर दिया गया, वहां का तापमान 0.7°C बढ़ गया, जो कि अन्य क्षेत्रों की तुलना में तीन गुना अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। इसी शोध में पाया गया कि वनों की कटाई के कारण होने वाली उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की गर्मी हर साल 28,000 गर्मी से संबंधित मौतों (Heat-related deaths) से जुड़ी हुई है।
इसके साथ ही, साइंस डायरेक्ट (ScienceDirect) के एक अन्य सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन में पाया गया कि 15 वर्षों की उष्णकटिबंधीय वनों की कटाई के कारण 28 लाख (2.8 million) बाहरी श्रमिकों (Outdoor workers) के लिए सुरक्षित कार्य परिस्थितियों में भारी कमी आई है।
भारत पहले से ही पृथ्वी पर सबसे अधिक गर्मी के संपर्क में आने वाले देशों में से एक है। गंगा का मैदानी इलाका, जहां करोड़ों किसान और श्रमिक रहते हैं, वहां गर्मी का तनाव (Heat stress) उस सीमा को पार कर रहा है जिसे मानव शरीर के लिए सुरक्षित माना जाता है। जब वनों को नष्ट किया जाता है, तो वह गर्मी केवल उस विशेष स्थान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि क्षेत्रीय तापमान को प्रभावित करती है। ग्रेट निकोबार के वर्षावन केवल एक सजावट नहीं हैं, बल्कि ये एक अदृश्य आधारभूत संरचना (Invisible Infrastructure) हैं जो क्षेत्रीय जलवायु को बिगड़ने से रोकते हैं। इन्हें नष्ट करने का प्रभाव केवल द्वीप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह बाहर की ओर फैलेगा।
भारत में वन आवरण का विश्लेषण: ISFR 2023 और इसके छिपे हुए तथ्य
यह दावा अक्सर किया जाता है कि “भारत ने दुनिया में अपने हरित आवरण में सबसे अधिक वृद्धि की है”। यह दावा पूरी तरह से गलत नहीं है और वास्तविक डेटा पर आधारित है, लेकिन पूरी तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है। आइए भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की 18वीं भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR 2023) के आंकड़ों का विश्लेषण करें।
ISFR 2023 के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 25.17% है, और 2021 के बाद से इसमें 1,446 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।
हालांकि, इन आधिकारिक आंकड़ों के पीछे कुछ महत्वपूर्ण तथ्य छिपे हुए हैं:
वृक्षारोपण (Plantations) को वन माना जाना:
भारतीय वन सर्वेक्षण उपग्रह चित्रों का उपयोग करके “वन आवरण” (Forest cover) को परिभाषित करता है। इस परिभाषा के अंतर्गत किसी भी भूमि का टुकड़ा, जिसमें पर्याप्त वृक्षों का चंदवा (Tree canopy) हो, वन माना जाता है। इसके तहत चाय के बागान, कॉफी बागान, रबर एस्टेट, नारियल के बगीचे, गन्ने के खेत और फलों के बगीचे भी शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) ने स्पष्ट रूप से बताया है कि यह समावेश वन आवरण को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। ये असली वन नहीं हैं, बल्कि ये व्यावसायिक फसलें हैं जिन्हें नियमित रूप से काटा जाता है, और ये अपने संग्रहीत कार्बन को वापस वातावरण में छोड़ देते हैं।
वास्तविक नुकसान का छिपा होना:
ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच (GFW) एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय उपग्रह निगरानी मंच है, जिसने FSI डेटा और वास्तविक जमीनी स्थिति के बीच महत्वपूर्ण विसंगतियां पाई हैं। GFW के आकलन के अनुसार, 2000 और 2023 के बीच भारत में कम से कम 23,300 वर्ग किलोमीटर प्राकृतिक वन नष्ट हो गए थे। GFW ने यह भी पाया कि 2001 और 2022 के बीच भारत के वनों ने कार्बन को सोखने के बजाय 510 लाख टन (510 lakh tonnes) CO₂ वातावरण में छोड़ी।
वनों की गुणवत्ता में गिरावट:
ISFR के अपने डेटा से पता चलता है कि पिछले एक दशक में, 46,707 वर्ग किलोमीटर घने और मध्यम घने वन खुले वनों या गैर-वन क्षेत्रों (Open forests or non-forest areas) में बदल गए हैं। कर्नाटक के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक, बी. के. सिंह, ने स्पष्ट रूप से कहा है: “भारत में सालाना 18,000 वर्ग किलोमीटर में वृक्षारोपण होता है। लेकिन कुल वन और वृक्ष आवरण की वृद्धि दो वर्षों में केवल 1,400 वर्ग किलोमीटर है। बाकी सब कहां जा रहा है?”
उत्तर-पूर्व में वनों का क्षरण:
उत्तर-पूर्व भारत, जो देश के कुछ सबसे अधिक जैविक रूप से समृद्ध वनों का घर है, ने हर द्विवार्षिक FSI रिपोर्ट में प्राकृतिक वन आवरण में निरंतर गिरावट देखी है।
इस प्रकार, “भारत ने हरित आवरण बढ़ाया है” का शीर्षक तकनीकी रूप से गलत नहीं है, लेकिन यह गलत चीज को माप रहा है। एक हजार साल पुराने वर्षावन को काटकर उसके स्थान पर चाय का बागान लगाना और उसे शुद्ध-शून्य (Net-zero) लेनदेन कहना, एक अस्पताल को फार्मेसी से बदलने जैसा है।
जनजातीय अधिकार और जनसांख्यिकीय संकट: शोंपेन और निकोबारी समुदाय
ग्रेट निकोबार द्वीप दो स्वदेशी और कमजोर जनजातीय समुदायों का निवास स्थान है:
- निकोबारी (Nicobarese) समुदाय: यह एक अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) है, जो पीढ़ियों से इस द्वीप पर रह रही है। इनमें से कई गांव 2004 की सुनामी में पूरी तरह से तबाह हो गए थे और अब जाकर धीरे-धीरे उबर रहे हैं। आदिवासी परिषद (Tribal Council) ने अनुरोध किया था कि उनके सदस्यों को उनके पैतृक गांवों में लौटने की अनुमति दी जाए, लेकिन इस अनुरोध को खारिज कर दिया गया है।
- शोंपेन (Shompen) समुदाय: यह एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) है, जिसकी कुल जनसंख्या 200 से 300 व्यक्तियों के बीच आंकी गई है। यह दुनिया के सबसे अलग-थलग समुदायों में से एक है, जिनकी बाहरी बीमारियों के प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) नहीं है।
इस परियोजना के माध्यम से लगभग 3.5 से 4 लाख लोगों को एक ऐसे द्वीप पर लाने की योजना है, जिसकी वर्तमान जनसंख्या बहुत कम है। फरवरी 2024 में, 13 देशों के 39 नरसंहार विशेषज्ञों (Genocide experts) ने एक औपचारिक चेतावनी जारी की कि यह जनसंख्या का आगमन शोंपेन समुदाय के लिए एक “मौत की सजा” होगा, और यह अंतर्राष्ट्रीय अपराध के समान है। उन्होंने बताया कि बाहरी आबादी के संपर्क में आने से संक्रामक रोगों का प्रसार होगा, जिसके खिलाफ शोंपेन लोगों की कोई प्रतिरोधक क्षमता नहीं है।
संवैधानिक और विधिक पहलू: अनुच्छेद 338-A और वन अधिकार अधिनियम, 2006
भारत का संविधान और यहाँ के पर्यावरण कानून, स्वदेशी और जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान करते हैं। इस परियोजना के संदर्भ में, संवैधानिक और विधिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन के कई आरोप लगे हैं:
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST):
संविधान के अनुच्छेद 338-A के तहत, सरकार को जनजातीय समुदायों द्वारा उपयोग की जाने वाली वन भूमि को हटाने (Diverting forest land) से पहले राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से परामर्श करने की आवश्यकता है। ग्रेट निकोबार परियोजना के मामले में ऐसा कोई परामर्श नहीं किया गया, जो कि एक संवैधानिक विसंगति है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006):
यह अधिनियम अनिवार्य करता है कि वन भूमि को किसी अन्य उपयोग के लिए मोड़ने से पहले, वन अधिकारों का निपटान (Settlement of forest rights) किया जाना चाहिए। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस बात की रिपोर्ट मांगी है कि क्या इस परियोजना में इन नियमों का पालन किया गया है, लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक लंबित है। इस प्रकार, इस परियोजना का आगे बढ़ना विधिक और संवैधानिक सिद्धांतों के अनुपालन पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) की विफलता और विसंगतियां
जब भारत में विकास कार्यों के लिए वनों को काटा जाता है, तो कानून यह मांग करता है कि इसके बदले में कहीं और पेड़ लगाए जाएं, जिसे प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) कहा जाता है। ग्रेट निकोबार के प्राचीन वर्षावनों के नुकसान की भरपाई के लिए, योजना हरियाणा और मध्य प्रदेश में पेड़ लगाने की है।
यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह इस पूरी प्रक्रिया का मूल दोष है। अंडमान सागर के उष्णकटिबंधीय वर्षावन और हरियाणा में लगाए जाने वाले वृक्षारोपण (Plantations) पारिस्थितिक रूप से एक-दूसरे के समान नहीं हैं। ग्रेट निकोबार के वन ने हजारों वर्षों में अपनी जैव विविधता को विकसित किया है—इसकी मिट्टी का सूक्ष्मजीव (Soil microbiomes), बहु-स्तरीय आवरण (Multi-layered canopy), स्थानिक प्रजातियां (Endemic species) और क्षेत्रीय जलवायु विनियमन में इसकी भूमिका को किसी अन्य राज्य, अलग जलवायु क्षेत्र और अलग मिट्टी के प्रकार में पेड़ लगाकर नहीं दोहराया जा सकता।
पर्यावरणविदों ने इसे सही ही कहा है: यह कोई मुआवजा नहीं है, यह केवल कागजी कार्रवाई (Paperwork) है।
सरकार का पक्ष और रणनीतिक आवश्यकताएँ
किसी भी संतुलित विश्लेषण में, सरकार के तर्कों को भी समान रूप से सुनना आवश्यक है:
- सामरिक आवश्यकताएं: हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के सामने भारत की रणनीतिक भेद्यता वास्तविक है। गैलेथिया खाड़ी में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत को मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जलडमरूमध्य की निगरानी करने में मदद करेगा, जो कि सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- आर्थिक स्वायत्तता: भारत के 75% ट्रांसशिपमेंट कार्गो वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों से होकर गुजरते हैं, जिससे भारत को भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। यह परियोजना इस निर्भरता को कम करेगी।
- रोजगार और विकास: इस परियोजना से 1 लाख प्रत्यक्ष और 1.5 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होंगे जो देश की अर्थव्यवस्था और आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देंगे।
- न्यायिक स्वीकृति: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने कुछ शर्तों के साथ इस परियोजना को मंजूरी दी है, जिसमें प्रवाल भित्तियों, रेतीले समुद्र तटों और कछुओं के घोंसले के स्थानों की सुरक्षा शामिल है। सरकार ने NGT के समक्ष कहा है कि वह जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रति पूरी तरह से अवगत है और उसके पास इसके शमन की योजना (Mitigation plan) है।
समाधान का मार्ग और नीतिगत अनुशंसाएं
ग्रेट निकोबार परियोजना के संदर्भ में एक स्थायी समाधान खोजने के लिए, सरकार और पर्यावरणविदों के बीच एक सार्थक संवाद होना आवश्यक है। पारिस्थितिक संतुलन और आर्थिक विकास के बीच तालमेल बिठाने के लिए निम्नलिखित नीतिगत उपाय किए जाने चाहिए:
- रणनीतिक महत्व के स्थानों पर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) का कड़ाई से पालन: निर्माण कार्यों से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि गैलेथिया खाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा के लिए सख्त प्रोटोकॉल हों।
- शोंपेन समुदाय के लिए पृथक क्षेत्र (Buffer Zones) की स्थापना: शोंपेन समुदाय के निवास स्थानों को बाहरी आबादी से दूर रखा जाना चाहिए और उनकी सुरक्षा के लिए एक सख्त पृथक नीति बनाई जानी चाहिए।
- पारिस्थितिक मुआवजे का व्यावहारिक दृष्टिकोण: प्रतिपूरक वनीकरण केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसी क्षेत्र या द्वीप के आसपास के अन्य हिस्सों में वनों के पुनर्स्थापन (Restoration ecology) के रूप में हो।
- विकास बनाम पर्यावरण का सामंजस्य: ग्रेट निकोबार के विकास के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण करते समय पर्यावरण की क्षति को कम से कम करने वाली आधुनिक तकनीकों (Green technology) का उपयोग किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्ष के रूप में, यह कहा जा सकता है कि ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट का रणनीतिक और आर्थिक महत्व अपनी जगह सही है, लेकिन इसकी भारी पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह परियोजना एक ऐसे समय में लागू की जा रही है जब भारत अपने सबसे भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है, अपने प्राकृतिक वनों को खो रहा है और गुणवत्तापूर्ण वनों के स्थान पर केवल वाणिज्यिक वृक्षारोपण कर रहा है। ग्रेट निकोबार के वर्षावन न केवल द्वीप को ठंडा रखते हैं, बल्कि पूरे क्षेत्रीय जलवायु तंत्र को नियंत्रित करते हैं। अतः विकास और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच एक ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिससे भावी पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध पर्यावरण और मजबूत राष्ट्र दोनों का निर्माण हो सके।
Source –
- The India Forum — “Great Nicobar Island: Hurtling Towards an Environmental Catastrophe”
- South Asian Voices — “India’s Great Nicobar Project Faces Uphill Climb”
- Drishti IAS — NGT Approved Great Nicobar Project
- India Meteorological Department — Heatwave Extended Outlook
- Press Information Bureau — IMD Heatwave Advisory (April 2026)
- Mongabay India — “Forest Survey Reveals India’s Shift Towards Plantations”
- World Resources Institute — “Deforestation and Heat Stress in the Tropics”
- IPCC AR6 — Cross-Chapter Paper 7: Tropical Forests
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