मौर्य साम्राज्य की धार्मिक स्थिति (Religious Status of Mauryan Empire)

मौर्ययुग धार्मिक सहिष्णुता का युग था। यद्यपि इस समय के शासक स्वयं भिन्न-भिन्न धर्मों को मानते थे, किसी भी शासक ने बलपूर्वक अपने धार्मिक विश्वास को प्रजा पर थोपने का प्रयास नहीं किया। सभी धर्मावलम्बी स्वतन्त्र रूप से अपना-अपना धर्म मानते थे। तत्कालीन स्रोतों से इस समय तीन धर्मों के प्रचलन के प्रमाण मिलते हैं – ब्राह्मण धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म इसके अतिरिक्त अन्य छोटे-छोटे धार्मिक सम्प्रदाय भी थे।

ब्राह्मण धर्म

मध्यप्रदेश के मौर्यकालीन समाज में ब्राह्मण धर्म का अपना एक महत्व था जिसमें अन्य युगों की भांति, वैदिक तथा गृह्य अनुष्ठानों का प्राधान्य था। ब्राह्मण वर्ग यज्ञ कर्मकाण्डादि में लगे रहते थे। समकालीन ग्रन्थों में वैदिक सिद्धान्तों और अनुष्ठानों का जो उल्लेख हुआ है, उससे नन्द-मौर्य काल में उनकी प्राधान्यता सूचित होती है। अंगिरस, भारद्वाज, वाससेठ्ठ, कश्यप, भृगु आदि वैदिक ऋषगण ब्राह्मणों के पूर्वज और वैदिक मंत्रों के दृष्टा के नाम से प्रसिद्ध थे। अशोक ने अपने अभिलेख में जिन देव पूजकों का उल्लेख किया है, उनसे अभिप्राय उन्हीं ब्राह्मणों पुरोहितों से है जो यज्ञ किया करते थे लेकिन ये लोकधर्म से पृथक थे। बौद्ध ग्रन्थों में एक विशेष वर्ग के ब्राह्मणों का उल्लेख मिलता है जिन्हें ब्राह्मण-महाशाल कहा जाता था है। उनको राजदत्त भूमि की लगान मिला करती थी। ऐसे ब्राह्मण धनी थे और व्ययशील यज्ञों का अनुष्ठान करते थे। इन्हें ब्रह्मवर्ण, ब्रह्मज्योति एवं प्रियभाषी और प्रियवाक् भी कहा गया है। अध्ययन-अध्यापन इनका प्रमुख कार्य था। सामाजिक दृष्टि से भी इनका स्थान उच्च था। अनेक ब्राह्मण बौद्ध धर्म से प्रभावित हो बौद्ध हो गये थे। अर्थशास्त्र में ‘देवताध्यक्ष’ नामक पदाधिकारी का उल्लेख मिलता है, जो मंदिरों और देवताओं की देखभाल करता था। देवताओं में अपराजित, अप्रतिहत, जयन्त, वैजयन्त, शिव, अश्विन, श्रीमदिरा (दुर्गा), अदिति, सरस्वती, सविता, अग्नि, सोम, कृष्ण, आदि देव-देवियों की पूजा प्रचलित थी। 

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बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म की मौर्यकाल में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। अशोक मूलतः पूर्व में सनातन धर्म का अनुयायी था लेकिन कलिंग युद्ध की विभीषिका ने अशोक का हृदय परिवर्तन कर दिया। बौद्ध धर्म की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उसने बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया। भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा संरक्षक अशोक ही था। अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म के उत्थान और प्रसार में रूचि ली। बौद्ध संघ में व्याप्त मतभेदों को दूर करने के लिए उसने बौद्धों की तीसरी संगीति पाटलिपुत्र में बुलायी। फूट डालने वालों के लिए दण्ड की व्यवस्था की। अवन्ति प्रदेश से भी इस संगीति में अनेक बौद्धाचार्य सम्मिलित हुए। साँची स्तम्भ लेख जो भिक्षु भिक्षुणियाँ संघ में भेद डाल रहे थे उनके विरूद्ध चेतावनी देता है और एक जुट होने का संकेत देता है। गुर्जरा, रूपनाथ व पानगुड़ारिया के अभिलेख से अशोक की धर्मयात्राओं के बारे जानकारी प्राप्त होती है, कि अशोक ने मध्यप्रदेश की धार्मिक यात्रा की थी। निश्चय ही ये स्थल बौद्ध धर्म के बड़े केन्द्र रहें होंगें।

अशोक ने उज्जयिनी में ग्यारह वर्ष तक प्रान्तीय शासक के रूप में कार्य किया था। यही कारण है कि अशोक का मध्यप्रदेश से विशेष लगाव था। अशोक ने तथागत बौद्ध की अस्थियों पर बनाये गये आठ प्रारम्भिक स्तूपों में से सात को खुलवाया और उनमें रखे हुए धातुओं को निकाल कर चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण किया। देउरकुठार, उज्जयिनी, विदिशा के समीप साँची व सतधारा में विशाल स्तूपों व विहारों का निर्माण किया। साँची (जिला रायसेन), रूपनाथ (जिला जबलपुर), गुर्जरा (जिला दतिया) एवं पानगुड़ारिया (जिला सीहोर), कसरावद, माहिष्मती आदि स्थानों से भी मौर्यकालीन पुरावशेष प्राप्त हुए हैं जो मध्यप्रदेश में बौद्ध धर्म के प्रसार में अशोक के व्यक्तिगत रुचि को प्रदर्शित करते हैं।

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जैन धर्म

प्राचीन काल से ही मध्यप्रदेश में जैन धर्म का प्रभाव रहा है। उल्लेख मिलता है कि अवन्ति महावीर वर्द्धमान की उपसर्ग-जयी तपोभूमि होने से तीर्थस्थली बन गई थी। मौर्यकाल में चन्द्रगुप्त मौर्य के समय जैन धर्म एक प्रभावी धर्म था और उन्होंने भद्रबाहु से प्रभावित होकर जैन धर्म ग्रहण कर लिया था। एक समय राज्य काल में बारह वर्ष का अकाल (दुर्भिक्ष) पड़ गया जिससे दुखी होकर चन्द्रगुप्त अवन्ति होते हुए श्रवणबेलगोला चले गये। चन्द्रगुप्त के समय सबसे महत्वपूर्ण घटना घटित हुई कि जैन धर्म दिगम्बर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया। तत्पश्चात् अशोक के प्रपौत्र सम्प्रति ने जैन धर्म के प्रचार-प्रसार में बहुत योगदान दिया। जैन धर्म का विकास यहीं से दक्षिण-पश्चिम में हुआ। सम्प्रति सच्चे अर्थों में जैन धर्म का उपासक था। उसने जैनाचार्य सुहस्ति से धर्म दीक्षा ली। आचार्य की आज्ञानुसार उज्जयिनी के समीप प्रान्तीय प्रदेशों में भी साधुओं के लिए विहार बनवाये। साढ़े पच्चीस देशों में उसने जैन धर्म के प्रचार तथा प्रसार के लिए श्रमणकों और सैनिकों को साधुवेश में भेजा ऐसा उल्लेख मिलता है। इसमें चेष्टि और बेसनगर भी आता है। श्रमणों को सामग्री बिना कष्ट के प्राप्त हो इसलिए सम्प्रति ने वस्तु – विक्रेताओं को आदेश दिया कि श्रमणों को इच्छित वस्तु प्रदान की जाए, तथा उस वस्तु का मूल्य राजकोष से दिया जाय। इसके पूर्व जैन साधु तथा श्रमण भिक्षावृत्ति द्वारा  दैनन्दिन की अवश्यकताएँ पूर्ण करते थे। इस प्रकार साधु और श्रमणों की सांसारिक सुविधा के लिए अनेक सराहनीय कार्य किए। सम्प्रति के इस कार्य से प्रभावित होकर सभी वर्गों के अधिकांश लोगों ने इस धर्म को अंगीकार किया। जैनधर्म ग्रन्थों में उल्लिखित तीर्थंकरों तथा प्रसिद्ध धार्मिक श्रमणों की पूजा तथा श्रद्धा का समन्वित रूप इस समय यहाँ उज्जयिनी प्रवर्तित उत्सवों में दृष्टिगोचर होता है। उज्जयिनी में चैत्ययात्रोत्सव चैत्रमास में मनाया जाता था। उत्सव को देखने दूरस्थ प्रदेशों के लोग यहाँ आते थे। सम्प्रति के समय में इस उत्सव में भाग लेने पाटलिपुत्र से जैनाचार्य सुहस्ति तथा महागिरि उज्जैन आये थे। इसी अवसर पर सम्प्रति ने सुहस्ति से दीक्षा ली थी। उत्सव में जीवन्तस्वामी की प्रतिमा पर विशाल उत्सव का आयोजन किया जाता था। 

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