यह लेख “The Hindu” में प्रकाशित लेख “The Himalayan Battleground of Belief” से लिया गया हैं, इस लेख में उत्तराखंड के सीमावर्ती पिथौरागढ़ जिले में स्थित ओम पर्वत के समीप स्वदेशी रंग (Rung) समुदाय और बाहरी धार्मिक ट्रस्टों के बीच उपजे सांस्कृतिक व धार्मिक विवाद का गंभीर विवेचन करता है। 15 जून को श्री आदि कैलाश ग्रुप 2020 ट्रस्ट द्वारा नाबिदांग में तीन टन भारी मानव-निर्मित शिवलिंग स्थापित करने के प्रयास को स्थानीय रंग समुदाय ने अपनी प्रकृति-पूजक परंपराओं और सांस्कृतिक संप्रभुता पर आघात मानकर रोक दिया। यह संघर्ष केवल एक मूर्ति की स्थापना का नहीं, बल्कि हिमालय के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र में अनियोजित धार्मिक व्यावसायीकरण, स्वदेशी समुदायों के सांस्कृतिक आत्मसात (Assimilation) के भय, और बुनियादी ढाँचे के विकास (BRO सड़कों) के कारण उत्पन्न सामाजिक-सांस्कृतिक असंतुलन का प्रतीक है। आर्टिकल रेखांकित करता है कि स्वदेशी संस्कृतियों का संरक्षण और हिमालयी पर्यावरण की रक्षा केवल प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में छोड़कर ही संभव है।
विश्वास का हिमालयी रणक्षेत्र: स्वदेशी रंग परंपरा बनाम कंक्रीट का धार्मिक आचरण
(The Himalayan Battleground of Belief: Indigenous Rung Identity vs Religious Commercialization)
वर्तमान स्थिति और विवाद का तात्कालिक कारण
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में धारचूला के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित ओम पर्वत (ऊंचाई लगभग 5,500 मीटर) वर्तमान में एक गंभीर सांस्कृतिक और वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन गया है। विवाद का तात्कालिक कारण 15 जून को घटित हुआ, जब पटना, नासिक, जोधपुर, सूरत और नोएडा के हिंदू भक्तों द्वारा गठित श्री आदि कैलाश ग्रुप 2020 ट्रस्ट के सदस्य नाबिदांग (ओम पर्वत का व्यूप्वाइंट) पर राजस्थान से ट्रकों में लाए गए तीन टन भारी शिवलिंग को स्थापित करने पहुँचे।
स्थानीय स्वदेशी रंग समुदाय ने इस कदम का तीव्र और संगठित विरोध किया। रंग समुदाय का तर्क है कि वे स्वयं भगवान शिव के उपासक हैं, परंतु वे शिव को किसी मानव-निर्मित मूर्ति या कंक्रीट के ढांचे में नहीं, बल्कि हिमालय की प्राकृतिक संरचनाओं—पर्वतों, ग्लेशियरों, और नदियों के रूप में पूजते हैं। समुदाय को डर है कि इस प्रकार की कृत्रिम धार्मिक स्थापनाओं से उनके प्राचीन प्राकृतिक पूजा स्थलों का अनियंत्रित व्यावसायीकरण होगा। स्थानीय विरोध की संवेदनशीलता को देखते हुए, जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप किया और शिवलिंग को गर्भाधार नामक रणनीतिक पड़ाव पर ही रोक दिया। वर्तमान में यह शिवलिंग हल्द्वानी में ट्रस्ट के एक सदस्य के आवास पर रखा गया है, लेकिन ट्रस्ट ने भविष्य में पुनः स्थापना के प्रयास करने की बात कही है, जिससे क्षेत्र में सांस्कृतिक तनाव की स्थिति बनी हुई है।
संवैधानिक और विधिक पृष्ठभूमि
इस विवाद के मूल में भारत के स्वदेशी और जनजातीय समुदायों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण और मुख्यधारा के धार्मिक संगठनों के अधिकारों के बीच का टकराव निहित है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा) नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने और संरक्षित करने का अधिकार प्रदान करता है। रंग समुदाय सरकारी अभिलेखों में अनुसूचित जनजाति के रूप में पंजीकृत है, जिसके कारण वे संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत विशेष सुरक्षा और पहचान के पात्र हैं।
यद्यपि श्री आदि कैलाश ग्रुप 2020 ट्रस्ट के सदस्य संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) (भारत के राज्य क्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता) का हवाला देकर देश के किसी भी हिस्से में अपनी धार्मिक आस्था व्यक्त करने के अधिकार का दावा कर रहे हैं, परंतु यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अनुसूचित जनजातियों के हितों के संरक्षण के आधार पर इन अधिकारों पर तार्किक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। रंग कल्याण संस्था के अध्यक्ष प्रकाश सिंह गुंजियाल के अनुसार, यदि बाहरी संस्थाओं को जनजातीय क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों और पूजनीय स्थलों पर अतिक्रमण करने की अनुमति दी जाती है, तो यह उनके सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। विधिक दृष्टिकोण से, सीमावर्ती और जनजातीय क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के स्थायी कंक्रीट ढांचे के निर्माण के लिए स्थानीय ग्राम सभाओं (पेसा अधिनियम या प्रासंगिक राज्य कानूनों के तहत) और जिला प्रशासन की पूर्वानुमति अनिवार्य होती है, जिसका इस मामले में उल्लंघन करने का प्रयास किया गया था।
ऐतिहासिक भूमिका और सांस्कृतिक विरासत
रंग समुदाय एक ऐतिहासिक कृषि-पशुपालक और व्यापारिक समुदाय है, जिसका जीवन सदियों से भारत, तिब्बत और नेपाल को जोड़ने वाले ट्रांस-हिमालयी व्यापारिक मार्गों से संचालित होता रहा है। इस समुदाय की जनसंख्या वर्तमान में भारत और विदेशों को मिलाकर लगभग 21,000 है, जो मुख्य रूप से पिथौरागढ़ की तीन प्रमुख घाटियों – व्यास, दारमा और चौदांस में निवास करती है। ऐतिहासिक रूप से, यह समुदाय अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जीवित रहने और हिमालय के दर्रों के माध्यम से तिब्बत के साथ वस्तु-विनिमय व्यापार करने के लिए जाना जाता था।
इस समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को पहला बड़ा आघात ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में मिशनरी गतिविधियों के माध्यम से लगा। इसके बाद, इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक व्यवधान 1962 का भारत-चीन युद्ध था। इस युद्ध के परिणामस्वरूप सदियों पुराने पारंपरिक व्यापारिक मार्ग पूरी तरह से सील कर दिए गए, जिससे रंग समुदाय की आर्थिक रीढ़ टूट गई। उनकी आजीविका, पैतृक नेटवर्क और मौसमी प्रवास का स्वरूप रातों-रात बदल गया। अस्तित्व बचाने के लिए इस समुदाय के एक बड़े हिस्से को मैदानी इलाकों की ओर पलायन करना पड़ा, जहां उन्होंने शिक्षा और आधुनिक व्यवसायों को अपनाया। इस पलायन के कारण उनकी मौखिक रूप से हस्तांतरित होने वाली भाषा ‘रंगल्वो’ जो एक तिब्बती-बर्मन भाषा परिवार का हिस्सा है और जिसकी अपनी कोई व्यापक लिपि नहीं है) के विलोपन का खतरा पैदा हो गया। वर्ष 2019 में, देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में रंगल्वो भाषा और स्वदेशी संस्कृति को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की सराहना की थी, जो इस सांस्कृतिक विरासत के राष्ट्रीय महत्व को प्रमाणित करता है।
प्रशासनिक प्रयास और रणनीतिक चिंताएं
चूंकि यह क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन पर स्थित है, इसलिए यहाँ की प्रत्येक प्रशासनिक और सामाजिक गतिविधि का सीधा संबंध राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा से होता है। प्रशासनिक स्तर पर, जिला प्रशासन पिथौरागढ़ और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) इस क्षेत्र में कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं। पहला बड़ा सुरक्षा चेकपॉइंट च्यालेख में स्थित है, जहां ITBP द्वारा इन संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश करने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री और नागरिक के दस्तावेजों का गहन सत्यापन किया जाता है।
रणनीतिक दृष्टिकोण से, रंग समुदाय ने हमेशा देश की सुरक्षा का समर्थन किया है। सेना और ITBP के शिविरों के लिए समुदाय ने अपनी पैतृक भूमि स्वेच्छा से समर्पित की है। परंतु, प्रशासनिक चुनौती तब उत्पन्न होती है जब सुरक्षा के नाम पर या धार्मिक पर्यटन के बहाने स्थानीय भूमि का अनियंत्रित हस्तांतरण होने लगता है। रंग समुदाय का आरोप है कि प्रशासन कई बार बाहरी धार्मिक समूहों के प्रति नरम रुख अपनाता है, जिससे स्थानीय संतुलन बिगड़ता है। उदाहरण के लिए, श्री आदि कैलाश ग्रुप 2020 ट्रस्ट के सदस्य संजीव जोशी के अनुसार, ट्रस्ट ने वर्ष 2022 में आदि कैलाश में स्थानीय विरोध के बिना एक त्रिशूल और नंदी की मूर्ति स्थापित की थी। इसके बाद, वर्ष 2023 में जब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने आदि कैलाश की यात्रा की, तो उन्होंने उसी त्रिशूल के समक्ष पूजा-अर्चना की थी। इससे ट्रस्ट को बल मिला और उन्होंने ओम पर्वत पर भी ऐसा ही प्रयास किया। प्रशासन के लिए अब चुनौती यह है कि वह एक तरफ देश के सर्वोच्च नेतृत्व के धार्मिक दौरों से उत्पन्न पर्यटन की मांग को संभाले और दूसरी तरफ सीमा पर रहने वाले राष्ट्रभक्त स्वदेशी समुदाय के असंतोष को रोके, क्योंकि सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय आबादी का असंतोष राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हानिकारक हो सकता है।
राजनीतिक भूमिका और वैचारिक विमर्श
इस संघर्ष ने भारत में चल रहे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वदेशी अस्मिता के बीच के वैचारिक विमर्श को राजनीतिक धरातल पर ला खड़ा किया है। मुख्यधारा के हिंदू संगठनों का दृष्टिकोण यह है कि संपूर्ण भारतवर्ष के हिंदुओं को देश के किसी भी कोने में स्थित पवित्र तीर्थस्थलों पर अपने आराध्य की मूर्ति स्थापित करने और पूजा करने का पूर्ण अधिकार है। ट्रस्ट के सदस्य पंकज कुमार का यह बयान कि—”वह क्षेत्र भारत में है, और एक भारतीय के रूप में मैं अपने देश में कहीं भी अपने भगवान की मूर्ति स्थापित करने के लिए स्वतंत्र हूँ”—इस राष्ट्रव्यापी धार्मिक-राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है।
इसके विपरीत, रंग समुदाय की राजनीति अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखने की है। वे स्वयं को सनातनी हिंदू मानते हैं, परंतु वे बहुसंख्यकवादी या मुख्यधारा के कंक्रीटीकृत धार्मिक आचरण के विरोधी हैं। सेवानिवृत्त ITBP महानिरीक्षक (IG) ए.पी.एस. निम्बाडिया, जिन्होंने इस क्षेत्र में एक दशक से अधिक समय तक सेवा की, इस विवाद में एक भिन्न राजनीतिक-सांस्कृतिक तर्क प्रस्तुत करते हैं। वे अरुणाचल प्रदेश और असम की तिब्बती-बर्मन जनजातियों (जैसे जीरो घाटी में अपातनी जनजाति) का उदाहरण देते हैं, जहां प्रकृति पूजा के साथ-साथ मुख्यधारा के हिंदू प्रतीकों (जैसे सिद्धेश्वर नाथ मंदिर या कार्दो महादेव) का समावेश हुआ और वहां जनजातीय पहचान नष्ट नहीं हुई। लेकिन रंग समुदाय के बुद्धिजीवी जैसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की सहायक प्रोफेसर संदेशा रायपा गर्बियाल इस तर्क को खारिज करती हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार का राजनीतिक-धार्मिक समावेश अंततः ‘सांस्कृतिक आत्मसात’ का रूप ले लेता है, जिससे स्वदेशी संस्कृतियों की विशिष्टता समाप्त हो जाती है और वे मुख्यधारा के धार्मिक राष्ट्रवाद का एक छोटा सा हिस्सा बनकर रह जाती हैं।
सामाजिक प्रभाव और वाणिज्यिक तीर्थाटन का भय
बुनियादी ढांचे के विकास ने इस दूरस्थ सामाजिक ताने-बाने को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। वर्ष 2020 से पहले, धारचूला से ओम पर्वत और आदि कैलाश की यात्रा अत्यंत कठिन थी। तीर्थयात्रियों को गहरी खाइयों, खड़ी चट्टानों और भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों से होकर 90 से 100 किलोमीटर का पैदल ट्रैक करना पड़ता था, जिसमें 7 से 10 दिन का समय लगता था। यह कठिन यात्रा केवल अत्यंत समर्पित लोग ही करते थे, जिससे पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति पर मानवीय दबाव न्यूनतम था। परंतु, सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा सड़कों के निर्माण के बाद यह परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। अब यही दूरी वाहनों द्वारा कुछ घंटों में तय हो जाती है।
इस सुगम्यता ने ‘धार्मिक पर्यटन’ को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक से सेवानिवृत्त जमन सिंह रौतेला (76 वर्ष) के अनुसार, सड़कों के आने से आर्थिक अवसर तो बढ़े हैं, लेकिन स्थानीय सामाजिक मूल्यों और पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँच रही है। रंग समुदाय का मुख्य सामाजिक भय यह है कि मानव-निर्मित मूर्तियों और मंदिरों की स्थापना के बाद वहां घेराबंदी शुरू होगी, दान पेटियां रखी जाएंगी, और अंततः बड़ी व्यावसायिक कंपनियों का प्रवेश होगा। इससे जो पवित्र प्राकृतिक परिदृश्य वर्तमान में शांत और प्रदूषण मुक्त है, वह प्लास्टिक कचरे, होटलों, वाणिज्यिक दुकानों और भीड़भाड़ वाले कंक्रीट के जंगल में बदल जाएगा। यह सामाजिक और सांस्कृतिक विस्थापन स्थानीय युवाओं को अपनी जड़ों से दूर कर सकता है और उनके पारंपरिक जीवन मूल्यों को पूरी तरह से व्यावसायिक बना सकता है।
पारिस्थितिकीय प्रभाव और प्राकृतिक आपदाओं की चेतावनी
मध्य हिमालय का यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील भूगर्भीय और भूकंपीय ज़ोन V के अंतर्गत आता है। यहाँ का पारिस्थितिक तंत्र इतना नाजुक है कि अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप और कंक्रीट का निर्माण विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। रंग समुदाय के लोग सदियों से इन पहाड़ों के साथ सह-अस्तित्व में रहे हैं, और उनकी प्रकृति पूजा की पद्धति वास्तव में जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने का एक पारंपरिक साधन थी।
इस क्षेत्र की पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता का सबसे बड़ा और भयावह प्रमाण 18 अगस्त 1998 को आया मालपा भूस्खलन है। इस विनाशकारी आपदा में पूरा का पूरा मालपा गाँव मलबे में तब्दील हो गया था और 221 लोगों की जान गई थी, जिनमें 60 कैलाश-मानसरोवर तीर्थयात्री शामिल थे। इन मृतकों में भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना प्रतिमा बेदी भी थीं। आज भी रंग समुदाय के लोग मालपा से गुजरते समय अपने पूर्वजों और इस आपदा में मारे गए लोगों की याद में हवा में चावल के दाने बिखेरकर सम्मान प्रकट करते हैं और पहाड़ों को न छेड़ने की मन्नत मांगते हैं। हिमालय में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के निर्माण और उसके बाद अनियंत्रित कंक्रीट के धार्मिक स्थलों के विकास से पहाड़ों की ढलानें अस्थिर हो रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ने और बार-बार होने वाले भूस्खलन के बावजूद, बाहरी ट्रस्टों द्वारा भारी-भरकम कंक्रीट की मूर्तियां स्थापित करने की जिद इस संवेदनशील क्षेत्र के लिए एक गंभीर पारिस्थितिकीय खतरा है।
समाधान का मार्ग
इस जटिल सामाजिक-पारिस्थितिकीय और धार्मिक विवाद का समाधान किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय में नहीं, बल्कि ‘सतत विकास’ और ‘सांस्कृतिक बहुलवाद’ के मध्य संतुलन स्थापित करने में निहित है। निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समाधान का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है:
- पारिस्थितिक-सांस्कृतिक पर्यटन नीति का निर्माण: सरकार को आदि कैलाश और ओम पर्वत क्षेत्र के लिए एक सख्त गाइडलाइन बनानी चाहिए, जिसमें कंक्रीट के स्थायी धार्मिक ढांचों के निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध हो। पर्यटन को ‘मास टूरिज्म’ के बजाय नियंत्रित और विनियमित ‘इको-टूरिज्म’ के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों को निर्णय लेने का अधिकार: किसी भी धार्मिक या पर्यटन विकास परियोजना में रंग समुदाय की संस्थाओं (जैसे रंग कल्याण संस्था) को शामिल किया जाना चाहिए। पेसा (PESA) अधिनियम की भावना के अनुरूप, स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी बाहरी धार्मिक ट्रस्ट को भूमि आवंटित या किसी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
- धारणीय क्षमता का आकलन: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान या राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) जैसी विशेषज्ञ संस्थाओं के माध्यम से इस क्षेत्र की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाना चाहिए। प्रतिदिन जाने वाले वाहनों और तीर्थयात्रियों की संख्या को सीमित किया जाना चाहिए, जैसा कि अमरनाथ या गोमुख यात्रा में किया जाता है।
- सांस्कृतिक संवेदीकरण: बाहरी राज्यों से आने वाले तीर्थयात्रियों और ट्रस्टों को यह कड़ा संदेश दिया जाना चाहिए कि वे स्थानीय स्वदेशी संस्कृति का सम्मान करें। जैसा कि पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्च्याल ने कहा है, यह लड़ाई हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि स्वदेशी पहचान को बचाने की है। अतः, प्रकृति को उसके मूल रूप में पूजने की परंपरा को भी सनातनी परंपरा का हिस्सा मानकर उसका आदर किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
हिमालय केवल एक भौगोलिक सीमा या धार्मिक पर्यटन का व्यावसायिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह अद्वितीय स्वदेशी संस्कृतियों और अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र का एक जीवंत मेल है। ओम पर्वत पर तीन टन के शिवलिंग को स्थापित करने से रोकना रंग समुदाय की अपनी अस्मिता, भाषा (रंगल्वो) और जल-जंगल-जमीन को बचाने की सदियों पुरानी ललक का परिणाम है। 1962 के युद्ध के बाद आर्थिक रूप से टूटने और विस्थापन झेलने के बावजूद इस समुदाय ने राष्ट्र की सुरक्षा और अपनी संस्कृति दोनों को थामे रखा है।
वैश्वीकरण और बुनियादी ढांचे के इस दौर में, विकास को विनाश और सांस्कृतिक आत्मसात का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता। मालपा की 1998 की त्रासदी इस बात की गवाह है कि जब हम प्रकृति के साथ जबरदस्ती कंक्रीट का खिलवाड़ करते हैं, तो परिणाम कितने भयावह होते हैं। रंग कल्याण संस्था के अध्यक्ष प्रकाश सिंह गुंजियाल का यह कथन कि—“कभी-कभी, श्रद्धा का सर्वोच्च रूप पहाड़ों को उनके हाल पर अकेला छोड़ देना होता है”—इस पूरे विवाद का सबसे तार्किक और दार्शनिक निचोड़ है। राज्य को बहुसंख्यकवादी धार्मिक दबावों से ऊपर उठकर, संवैधानिक सुरक्षा उपायों (अनुच्छेद 29) के तहत इस देश के मूल निवासियों की सांस्कृतिक संप्रभुता और हिमालय की पारिस्थितिकीय अखंडता की रक्षा करनी होगी।
Source – The Hindu
| Read More |
|---|
