SSLV Upgrade and the Rise of India’s Small-Satellite Launch Ecosystem

SSLV में नया सुधार: भारत के छोटे उपग्रह प्रक्षेपण और निजी अंतरिक्ष उद्योग की नई क्षमता

August 13, 2026

11 अगस्त 2026 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (Small Satellite Launch Vehicle – SSLV) के प्रथम चरण SS1 के उन्नत संस्करण का स्थैतिक परीक्षण किया। इसमें प्रणोदक (Propellant) की दहन-दर, ताप-सुरक्षा, नोजल तथा द्रव्यमान में सुधार किए गए हैं और परीक्षण के दौरान 600 से अधिक मानकों की निगरानी की गई। प्रारंभिक परीक्षण परिणाम अपेक्षाओं के अनुरूप रहे। इस सुधार से SSLV की निम्न-पृथ्वी कक्षा में पेलोड क्षमता लगभग 100 किलोग्राम बढ़ने का अनुमान है। यह विकास भारत के त्वरित, मांग-आधारित और औद्योगिक रूप से उत्पादित छोटे प्रक्षेपण यान तथा बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

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चर्चा में 

भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम लंबे समय तक मुख्यतः सरकारी संस्थागत क्षमता, विशेषकर ISRO, पर आधारित रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र का स्वरूप बदल रहा है। अब भारत का लक्ष्य केवल उपग्रह प्रक्षेपित करना नहीं, बल्कि एक पूर्ण अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था विकसित करना है जिसमें प्रक्षेपण यान, उपग्रह, अंतरिक्ष-आधारित सेवाएँ, डेटा, संचार, पृथ्वी अवलोकन और निजी नवाचार शामिल हों।

इसी व्यापक परिवर्तन के बीच 11 अगस्त 2026 को SSLV के प्रथम चरण SS1 के उन्नत संस्करण का स्थैतिक परीक्षण किया गया। ISRO के अनुसार इसमें प्रणोदक की दहन-दर, ताप-सुरक्षा प्रणाली, नोजल उप-प्रणाली और द्रव्यमान से जुड़े सुधार किए गए। परीक्षण में 600 से अधिक मापदंडों की निगरानी की गई और परीक्षण-परिणाम अनुमानित प्रदर्शन के निकट रहे। ISRO के नवीनतम समाचार पटल पर यह विकास प्रमुख तकनीकी उपलब्धियों में सूचीबद्ध है।

इस विकास को केवल एक रॉकेट के तकनीकी सुधार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके तीन बड़े आयाम हैं—

  • छोटे उपग्रहों के लिए त्वरित प्रक्षेपण क्षमता।
  • भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का औद्योगिकीकरण।
  • निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए प्रक्षेपण पारिस्थितिकी तंत्र।

इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 18 जुलाई 2026 को Skyroot Aerospace के Vikram-I ने श्रीहरिकोटा से सफलतापूर्वक कक्षीय उड़ान भरी। ISRO के अनुसार यह भारतीय निजी कंपनी द्वारा भारतीय भूमि से पहला सफल कक्षीय प्रक्षेपण था।

अर्थात भारत एक साथ दो प्रक्रियाओं से गुजर रहा है—सरकारी प्रक्षेपण क्षमता का तकनीकी उन्नयन और निजी क्षेत्र का कक्षीय अंतरिक्ष बाजार में प्रवेश

SSLV 

लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (Small Satellite Launch Vehicle – SSLV) को विशेष रूप से छोटे उपग्रहों को निम्न-पृथ्वी कक्षा में स्थापित करने के लिए विकसित किया गया है।

पारंपरिक बड़े प्रक्षेपण यानों की तुलना में छोटे उपग्रहों की आवश्यकता अलग होती है। कई विश्वविद्यालय, स्टार्ट-अप, अनुसंधान संस्थान और छोटे वाणिज्यिक ग्राहक ऐसे उपग्रह विकसित करते हैं जिनका भार कुछ किलोग्राम से लेकर कुछ सौ किलोग्राम तक होता है।

ऐसे उपग्रहों के सामने पहले एक समस्या थी—उन्हें बड़े रॉकेटों के साथ सह-यात्री पेलोड के रूप में प्रक्षेपित करना पड़ता था। इससे प्रक्षेपण की तारीख और कक्षा का निर्धारण मुख्य पेलोड पर निर्भर हो सकता था।

SSLV का उद्देश्य इसी समस्या का समाधान करना है।

SSLV की प्रमुख विशेषताएँ

  • यह तीन चरणों वाला ठोस प्रणोदक आधारित प्रक्षेपण यान है।
  • इसके अंतिम चरण में Velocity Trimming Module (VTM) का प्रयोग होता है।
  • इसे अपेक्षाकृत कम लागत, कम तैयारी समय और त्वरित प्रक्षेपण के लिए डिजाइन किया गया है।
  • इसका उद्देश्य Launch-on-Demand क्षमता विकसित करना है।
  • यह छोटे उपग्रहों के बढ़ते वैश्विक बाजार को लक्षित करता है।

ISRO के अनुसार SSLV का प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भारतीय उद्योग की ओर पहले ही आगे बढ़ चुका है। 10 सितंबर 2025 को SSLV तकनीक के हस्तांतरण के लिए ISRO, NSIL, IN-SPACe और HAL के बीच समझौता हुआ था।

प्रमुख तथ्य

वर्तमान तकनीकी विकास

11 अगस्त 2026 को SSLV के SS1 प्रथम चरण के उन्नत संस्करण का स्थैतिक परीक्षण किया गया।

उन्नयन में मुख्यतः—

  • दो मोटर खंडों में प्रणोदक की दहन-दर में सुधार
  • ताप-सुरक्षा प्रणाली का अनुकूलन
  • नोजल उप-प्रणाली में उत्पादन-अनुकूल सुधार
  • प्रथम चरण के द्रव्यमान में कमी

शामिल हैं।

परीक्षण के दौरान 600 से अधिक मापदंडों की निगरानी की गई, जिनमें प्रज्वलन, बैलिस्टिक प्रदर्शन, संरचनात्मक व्यवहार, तापीय व्यवहार, गतिशीलता और ध्वनिक प्रदर्शन शामिल थे। परीक्षण के आँकड़े अनुमानित प्रदर्शन के निकट पाए गए।

सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि उन्नत SS1 के शामिल होने पर SSLV की निम्न-पृथ्वी कक्षा में पेलोड क्षमता लगभग 100 किलोग्राम बढ़ने का अनुमान है।

SSLV की विकास यात्रा

SSLV की विकास प्रक्रिया में तकनीकी सीख का महत्वपूर्ण स्थान रहा है।

  • 7 अगस्त 2022 — SSLV-D1 का पहला विकासात्मक प्रक्षेपण; मिशन अपने कक्षीय उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाया।
  • 10 फरवरी 2023 — SSLV-D2 का सफल विकासात्मक प्रक्षेपण।
  • 16 अगस्त 2024 — SSLV-D3 ने EOS-08 को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया और विकास कार्यक्रम की सफलता को प्रमाणित किया।
  • 30 दिसंबर 2025 — SSLV के तृतीय चरण SS3 के उन्नत संस्करण का स्थैतिक परीक्षण किया गया; कार्बन-एपॉक्सी मोटर केस से द्रव्यमान घटाने और पेलोड क्षमता बढ़ाने का उद्देश्य था।
  • 11 अगस्त 2026 — प्रथम चरण SS1 का नया उन्नत संस्करण परीक्षण के लिए प्रस्तुत किया गया।

इस क्रम से स्पष्ट है कि SSLV का विकास एक क्रमिक अभियांत्रिकी सुधार प्रक्रिया है, जिसमें हर चरण में द्रव्यमान, दक्षता, विश्वसनीयता और उत्पादन क्षमता को बेहतर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

आर्थिक पहलू

अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल वैज्ञानिक प्रतिष्ठा का क्षेत्र नहीं है। यह संचार, मौसम, कृषि, आपदा प्रबंधन, नौवहन, रक्षा, वित्तीय सेवाओं और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ चुका है।

सरकार के अनुसार भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार 2023 में लगभग 8.4 अरब डॉलर था, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का लगभग 2% था। इसे 2033 तक लगभग 44 अरब डॉलर और 2040 तक लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य/अनुमान प्रस्तुत किया गया है।

SSLV इस आर्थिक रणनीति में तीन तरह से योगदान कर सकता है।

छोटे उपग्रहों के लिए बाजार

छोटे उपग्रहों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पृथ्वी अवलोकन, इंटरनेट, मौसम, कृषि और इंटरनेट ऑफ थिंग्स जैसी सेवाओं के लिए छोटे उपग्रह उपयोगी हैं।

प्रक्षेपण लागत में प्रतिस्पर्धा

छोटे पेलोड के लिए बड़े रॉकेट का उपयोग हमेशा आर्थिक रूप से अनुकूल नहीं होता। SSLV जैसे यान इस अंतर को कम कर सकते हैं।

औद्योगिकीकरण

यदि SSLV का उत्पादन भारतीय उद्योग द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है, तो इससे —

ISRO → उद्योग → स्टार्ट-अप → अनुसंधान संस्थान → वैश्विक ग्राहक

का पूरा औद्योगिक नेटवर्क विकसित हो सकता है।

सामाजिक पहलू

अंतरिक्ष क्षेत्र का सामाजिक प्रभाव अप्रत्यक्ष लेकिन व्यापक है।

कृषि

उपग्रह पृथ्वी अवलोकन से फसल क्षेत्र, सिंचाई, मिट्टी की नमी और कृषि तनाव का आकलन किया जा सकता है।

आपदा प्रबंधन

उपग्रहों से बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात और जंगल की आग जैसी घटनाओं की निगरानी में सहायता मिलती है।

शिक्षा

छोटे उपग्रहों और विश्वविद्यालय-आधारित अंतरिक्ष परियोजनाओं से विद्यार्थियों को वास्तविक अंतरिक्ष अभियांत्रिकी का अनुभव मिल सकता है।

रोजगार

निजी अंतरिक्ष उद्योग केवल रॉकेट इंजीनियरों तक सीमित नहीं है। इसमें—

  • इलेक्ट्रॉनिक्स
  • सॉफ्टवेयर
  • सामग्री विज्ञान
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता
  • दूरसंवेदी
  • संचार
  • विनिर्माण
  • डेटा विश्लेषण

जैसे क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं।

पर्यावरणीय पहलू

रॉकेट प्रक्षेपण के पर्यावरणीय प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

ठोस प्रणोदक आधारित रॉकेटों में प्रयुक्त रसायन, प्रक्षेपण स्थल की पारिस्थितिकी, वायुमंडलीय उत्सर्जन और अंतरिक्ष मलबा महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

हालाँकि, SSLV की प्रमुख पर्यावरणीय प्रासंगिकता उसके छोटे आकार, विशिष्ट मिशन आवश्यकता और त्वरित प्रक्षेपण मॉडल से जुड़ी है। छोटे उपग्रहों के लिए अधिक उपयुक्त प्रक्षेपण प्रणाली विकसित होने से अनावश्यक रूप से बड़े प्रक्षेपण यानों के उपयोग को कुछ परिस्थितियों में कम किया जा सकता है।

लेकिन इसे स्वतः “हरित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी” मानना उचित नहीं होगा। अंतरिक्ष क्षेत्र में वास्तविक पर्यावरणीय स्थिरता के लिए—

  • प्रक्षेपण उत्सर्जन,
  • अंतरिक्ष मलबा,
  • उपग्रहों का जीवन-चक्र,
  • पुनःप्रवेश,
  • कक्षा का दीर्घकालिक उपयोग

सभी को साथ में देखना आवश्यक है।

अंतर्राष्ट्रीय आयाम

वैश्विक स्तर पर अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में निजी कंपनियों की भूमिका तेजी से बढ़ी है। ऐसे वातावरण में भारत के सामने दोहरी चुनौती है—

तकनीकी आत्मनिर्भरता + वैश्विक प्रतिस्पर्धा।

भारत केवल घरेलू मांग पर निर्भर रहकर बड़ा अंतरिक्ष उद्योग विकसित नहीं कर सकता। उसे अंतरराष्ट्रीय उपग्रह ग्राहकों, प्रक्षेपण सेवाओं और अंतरिक्ष-आधारित डेटा बाजार में प्रतिस्पर्धी होना होगा।

इसी संदर्भ में 18 जुलाई 2026 को Skyroot Aerospace के Vikram-I का सफल कक्षीय प्रक्षेपण विशेष महत्व रखता है। ISRO के अनुसार यह भारतीय निजी कंपनी द्वारा भारतीय भूमि से पहला सफल कक्षीय प्रक्षेपण था।

इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र केवल सरकारी अनुसंधान कार्यक्रम से आगे बढ़कर व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र बन रहा है।

भारत के लिए इसका रणनीतिक लाभ यह हो सकता है कि वह—

  • वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाए,
  • अंतरिक्ष आपूर्ति शृंखलाओं में स्थान बनाए,
  • मित्र देशों के साथ अंतरिक्ष सहयोग बढ़ाए,
  • अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं के निर्यात को बढ़ाए।

सरकारी पहल

भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के लिए कई उपाय किए हैं।

अंतरिक्ष क्षेत्र सुधार, 2020

निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों में व्यापक भागीदारी का अवसर दिया गया।

भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023

इसने अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की पूरी मूल्य-श्रृंखला में गैर-सरकारी संस्थाओं की भागीदारी के लिए नीति आधार प्रदान किया।

IN-SPACe

निजी क्षेत्र के लिए प्राधिकरण, सुविधा और समन्वय की प्रमुख संस्था के रूप में कार्य करता है।

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण

SSLV जैसी ISRO तकनीकों को भारतीय उद्योग को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। 2025 में SSLV तकनीक हस्तांतरण समझौता इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

वित्तीय समर्थन

सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए ₹1,000 करोड़ के Venture Capital Fund तथा ₹500 करोड़ के Technology Adoption Fund जैसी पहलों का उल्लेख किया है।

FDI सुधार

2024 में अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश व्यवस्था को उदार बनाया गया। उपग्रह, प्रक्षेपण यान, अंतरिक्ष बंदरगाह तथा अंतरिक्ष घटकों के विनिर्माण के लिए अलग-अलग निवेश सीमाएँ और प्रवेश मार्ग निर्धारित किए गए।

मुख्य चुनौतियाँ

  • विश्वसनीयता – अंतरिक्ष प्रक्षेपण में एक असफलता का आर्थिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है। इसलिए तकनीकी क्षमता के साथ लगातार सफल मिशनों का रिकॉर्ड आवश्यक है।
  • उत्पादन का विस्तार – एक प्रोटोटाइप बनाना और दर्जनों/सैकड़ों प्रक्षेपण यानों का औद्योगिक उत्पादन करना अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।
  • निजी कंपनियों की वित्तीय क्षमता – अंतरिक्ष उद्योग में अनुसंधान एवं विकास की अवधि लंबी और पूँजीगत आवश्यकता अधिक होती है। स्टार्ट-अप को निरंतर वित्तपोषण चाहिए।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा – भारत को अमेरिका, यूरोप, चीन तथा अन्य उभरते प्रक्षेपण सेवा प्रदाताओं के साथ प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
  • नियामकीय स्पष्टता – अंतरिक्ष गतिविधियों में सुरक्षा, दायित्व, बीमा, डेटा, कक्षा, अंतरराष्ट्रीय दायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित नियम स्पष्ट और स्थिर होने चाहिए।
  • अंतरिक्ष मलबा – छोटे उपग्रहों की संख्या बढ़ने के साथ कक्षीय भीड़ और मलबे की समस्या बढ़ सकती है।
  • सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच संतुलन – निजी क्षेत्र को बढ़ावा देते समय ISRO की मूल भूमिका—उन्नत अनुसंधान, दीर्घकालीन मिशन और राष्ट्रीय रणनीतिक क्षमता—को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।

आगे की राह 

  • “प्रक्षेपण” से “पूर्ण अंतरिक्ष मूल्य-श्रृंखला” की ओर – भारत को केवल रॉकेट निर्माण पर नहीं, बल्कि — उपग्रह निर्माण → प्रक्षेपण → डेटा → अनुप्रयोग → सेवाएँ → निर्यात पर समान ध्यान देना चाहिए।
  • उद्योग के लिए दीर्घकालीन मांग – सरकारी खरीद, रक्षा, कृषि, मौसम, संचार और आपदा प्रबंधन में भारतीय अंतरिक्ष कंपनियों के लिए पूर्वानुमेय मांग विकसित की जा सकती है।
  • ISRO–Industry–Academia मॉडल – विश्वविद्यालयों और स्टार्ट-अप को ISRO की परीक्षण सुविधाओं, विशेषज्ञता और डेटा तक नियंत्रित एवं पारदर्शी पहुँच दी जानी चाहिए।
  • गुणवत्ता और विश्वसनीयता – तेजी से उत्पादन के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता, परीक्षण और प्रमाणन व्यवस्था आवश्यक है।
  • अंतरिक्ष स्थिरता – हर नए मिशन के साथ Space Situational Awareness, मलबा प्रबंधन और उपग्रहों के सुरक्षित निष्क्रियकरण को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  • वैश्विक बाजार पर ध्यान – भारतीय कंपनियों को केवल घरेलू ग्राहकों के बजाय एशिया, अफ्रीका, यूरोप और वैश्विक दक्षिण के छोटे उपग्रह बाजारों को लक्ष्य करना चाहिए।
  • तकनीकी आत्मनिर्भरता – प्रणोदक, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप, सामग्री, संचार प्रणाली और सॉफ्टवेयर में घरेलू आपूर्ति शृंखला विकसित करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

SSLV के SS1 में सुधार भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की उस दिशा को दर्शाता है जिसमें तकनीकी क्षमता को औद्योगिक उत्पादन और व्यावसायिक उपयोग से जोड़ा जा रहा है। इसके साथ Vikram-I का निजी कक्षीय प्रक्षेपण यह संकेत देता है कि भारत की अंतरिक्ष व्यवस्था सरकारी नेतृत्व से आगे बढ़कर एक बहु-अभिकर्ता पारिस्थितिकी तंत्र में बदल रही है।

आगे की सफलता केवल अधिक रॉकेट बनाने में नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, लागत-प्रतिस्पर्धा, निजी निवेश, वैज्ञानिक अनुसंधान, नियामकीय स्पष्टता और अंतरिक्ष स्थिरता के बीच संतुलन बनाने में होगी।

अतः भारत की अंतरिक्ष नीति का अंतिम लक्ष्य केवल “अंतरिक्ष तक पहुँच” नहीं, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को राष्ट्रीय विकास, रणनीतिक स्वायत्तता, वैज्ञानिक प्रगति और समावेशी आर्थिक विकास का साधन बनाना होना चाहिए।

UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न

GS Paper I 

  • “भारत में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास अब वैज्ञानिक उपलब्धि से आगे बढ़कर राष्ट्रीय विकास और सामाजिक परिवर्तन का साधन बन रहा है।” चर्चा कीजिए।

GS Paper II 

  • भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी संस्थाओं और गैर-सरकारी संस्थाओं की भूमिकाओं को किस प्रकार पुनर्परिभाषित किया है? इसके नियामकीय महत्व का परीक्षण कीजिए।

GS Paper III 

  • SSLV जैसे छोटे प्रक्षेपण यान भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कैसे प्रभावित कर सकते हैं? विश्लेषण कीजिए।

GS Paper IV 

  • वैज्ञानिक नवाचार में सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग तथा अंतरिक्ष मलबे जैसी अंतर-पीढ़ीगत पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है? चर्चा कीजिए।

Essay Topic 

  • “तकनीकी आत्मनिर्भरता केवल तकनीक विकसित करने में नहीं, बल्कि उसे संस्थागत क्षमता, उद्योग और समाज से जोड़ने में निहित है।”

 

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