यह लेख “Indian Express” में प्रकाशित लेख “How (not) to save the mountains” से लिया गया हैं, इस लेख में अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण के नाम पर वन विभाग द्वारा अपनाई जा रही अवैज्ञानिक और आक्रामक तकनीकों का एक गंभीर और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। लेख मुख्य रूप से राजस्थान वन विभाग की ‘डबल ब्लास्टिंग’ (Double Blasting) जैसी यांत्रिक परियोजनाओं की आलोचना करता है, जिसके तहत कठोर पथरीली भूमि को कृत्रिम रूप से हरित करने के लिए दोहरे विस्फोट किए जा रहे हैं। यह कूटनीति प्रकृति की स्वायत्तता और उसके सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र, जैसे बायोक्रस्ट (Biocrust – साइनोबैक्टीरिया, कवक, लाइकेन और मॉस की जीवित परत) के विनाश को उजागर करती है। लेख यह साक्ष्य प्रस्तुत करता है कि अरावली जैसी 1.5 बिलियन (150 करोड़) वर्ष पुरानी प्राचीन भूवैज्ञानिक संरचना को कृत्रिम वृक्षारोपण की नहीं, बल्कि अवैध खनन, चराई और मानवीय हस्तक्षेप से पूर्ण सुरक्षा (Fencing) की आवश्यकता है, जिससे इसकी अंतर्निहित पारिस्थितिक स्मृति (Ecological Memory) स्वतः पुनर्जीवित हो सके।
पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण बनाम यांत्रिक हस्तक्षेप: अरावली के विशेष संदर्भ में एक समालोचनात्मक मूल्यांकन
भूवैज्ञानिक इतिहास और पारिस्थितिक पृष्ठभूमि
भारतीय उपमहाद्वीप में अरावली पर्वत श्रृंखला न केवल एक भौगोलिक विभाजन है, बल्कि यह विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत श्रृंखलाओं (Folded Mountain Ranges) में से एक है। इसकी अनुमानित आयु लगभग 1.5 बिलियन (150 करोड़) वर्ष है, जो इसे हिमालय कल्प से भी कहीं अधिक प्राचीन बनाती है। अरावली ने अपने सुदीर्घ इतिहास में हिमयुगों (Glaciations), विवर्तनिक हलचलों (Tectonic Upheavals) और हालिया शताब्दियों में अनियंत्रित मानवीय दोहन तथा अवैध खनन को झेला है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी (Environment and Ecology) के दृष्टिकोण से अरावली थार मरुस्थल के पूर्वगामी प्रसार को रोकने के लिए एक प्राकृतिक मरुस्थलीकरण-रोधी दीवार (Anti-Desertification Barrier) के रूप में कार्य करती है।
इस शुष्क और अर्ध-शुष्क भू-भाग की अपनी एक विशिष्ट पारिस्थितिक संरचना है, जिसे इसकी ‘कठोर और पथरीली प्रकृति’ परिभाषित करती है। इस भूवैज्ञानिक स्थिरता में ही इसका जीवन निहित है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् रजा एच तहसीन (Raza H Tehsin) के दीर्घकालिक प्रेक्षणों के अनुसार, इन कठोर चट्टानी प्रणालियों की अपनी एक अंतर्निहित वहन क्षमता (Carrying Capacity) होती है। अरावली के इस पारिस्थितिकी तंत्र में ‘धोक’ (Anogeissus pendula), ‘खैर’ (Acacia catechu), ‘बेर’ (Ziziphus mauritiana) और विशिष्ट शुष्क प्रतिरोधी घासें पाई जाती हैं, जो बिना किसी कृत्रिम मानवीय सहायता के, केवल न्यूनतम नमी और कठोरतम परिस्थितियों में भी जीवित रहने के लिए अनुकूलित हैं।
संवैधानिक प्रावधान और प्रशासनिक प्रयास
भारतीय संविधान राज्य और नागरिकों दोनों पर पर्यावरण संरक्षण का दायित्व डालता है। संविधान के भाग 4 में वर्णित राज्य के नीति निदेशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 48A यह स्पष्ट निर्देश देता है कि राज्य पर्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और देश के वनों तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा। इसी प्रकार, अनुच्छेद 51A(g) के तहत प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य (Fundamental Duty) है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और उसका संवर्धन करे। इन संवैधानिक अधिदेशों के आलोक में, राजस्थान के 5,476 वर्ग किलोमीटर के पथरीले वन क्षेत्र को हरित आवरण में बदलने के लिए वन विभाग द्वारा प्रशासनिक प्रयास किए जा रहे हैं।
वर्तमान में, राजस्थान वन विभाग द्वारा लगभग 5,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने वाले एक पायलट प्रोजेक्ट (Pilot Project) के रूप में ‘डबल ब्लास्टिंग’ (Double Blasting) तकनीक का प्रस्ताव और क्रियान्वयन किया गया है। यह एक ऐसी इंजीनियरिंग तकनीक है जिसका उपयोग सामान्यतः अत्यधिक कठोर चट्टानों को तोड़ने के लिए किया जाता है। इसके तहत भू-गर्भ में गहरे छेद करके नियंत्रित चरणों में विस्फोट किए जाते हैं ताकि चट्टानें मलबे में बदल जाएं और मिट्टी भुरभुरी हो जाए। प्रशासन का तर्क है कि इस विखंडित मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होगी और लगाए गए पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकेंगी। हालांकि, यह प्रशासनिक दृष्टिकोण दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय सिद्धांतों के स्थान पर त्वरित सांख्यिकीय लक्ष्यों और लोक संपर्क (PR-driven metrics) पर अधिक आधारित दिखाई देता है।
पारिस्थितिकीय प्रभाव और बायोक्रस्ट का विनाश
पारिस्थितिकीय विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत, ‘डबल ब्लास्टिंग’ जैसी यांत्रिक प्रक्रियाएं सूक्ष्म-पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचाती हैं। पर्यावरण शोधकर्ता प्रदीप कृष्ण (Pradip Krishen) के अध्ययनों के अनुसार, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों की सबसे ऊपरी पतली परत पर बायोक्रस्ट (Biocrusts) का साम्राज्य होता है। यह बायोक्रस्ट वास्तव में साइनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria), कवक (Fungi), लाइकेन (Lichens) और मॉस (Mosses) की एक अत्यंत सूक्ष्म और जीवित त्वचा होती है।
विज्ञान अब यह स्वीकार करता है कि ये बायोक्रस्ट निम्नलिखित अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करते हैं:
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation): ये वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर कर उसकी प्राकृतिक उर्वरता को बढ़ाते हैं।
- मृदा स्थिरता (Soil Stabilization): ये अपनी सूक्ष्म संरचनाओं से शुष्क और रेतीली मिट्टी के कणों को बांधकर वायु और जल अपरदन (Erosion) को रोकते हैं।
- नमी का प्रतिधारण (Moisture Retention): ये अत्यंत कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी सतह पर नमी को सोखकर वाष्पीकरण की दर को धीमा करते हैं।
जब इन क्षेत्रों में विस्फोट किए जाते हैं, तो यह प्राचीन और नाजुक जैविक परत पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसी प्रकार, दिल्ली के सेंट्रल रिज (Central Ridge) के “पुनरुद्धार” और सौंदर्यीकरण के प्रशासनिक प्रयासों में भी इसी प्रकार की जैविक तबाही देखी गई है। प्रकृति विज्ञानी प्रणय लाल (Pranay Lal) ने रेखांकित किया है कि वन विभागों द्वारा निविदाओं (Tenders) में प्रतिबंधित कीटनाशकों का उल्लेख किया जाता है, जो पारिस्थितिकी को ठीक करने के बजाय उसका ‘थीम-पार्क’ (Theme-park) जैसा कृत्रिम रूपांतरण कर देते हैं। पृथ्वी पर जैविक संतुलन बनाए रखने के लिए प्रति मानव 10 से 20 लाख चींटियां और 70 लाख केंचुए कार्यरत हैं। यांत्रिक विस्फोट और रासायनिक हस्तक्षेप इन अमूल्य सूक्ष्मजीवों और उनके आवासों को समूल नष्ट कर देते हैं।
पारिस्थितिक स्मृति और प्राकृतिक पुनरुद्धार
पारिस्थितिकी तंत्र के जीर्णोद्धार (Ecological Restoration) का मूल सिद्धांत प्रकृति के साथ युद्ध करना नहीं, बल्कि उसे समय और सुरक्षा देना है। इस संदर्भ में ‘पारिस्थितिक स्मृति’ (Ecological Memory) का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरावली जैसी प्राचीन प्रणालियों के बीज, जड़ें और कवक जाल (Mycorrhizal Networks) मिट्टी और चट्टानों की दरारों में सुप्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं। यदि किसी अत्यधिक क्षरणग्रस्त (Degraded) क्षेत्र को केवल बाड़ लगाने (Fencing) के माध्यम से सुरक्षित कर दिया जाए और वहां निम्नलिखित अवांछित गतिविधियों को पूरी तरह रोक दिया जाए:
- अनियंत्रित पशु चराई (Overgrazing)
- ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई (Woodcutting)
- अवैध खनन और उत्खनन (Illegal Mining)
तो वह भूमि अपनी आंतरिक पारिस्थितिक स्मृति के बल पर स्वयं को पुनर्जीवित कर लेती है। वनस्पति का स्वतः वापस आना प्रकृति का शाश्वत नियम है। अरावली को हरे-भरे जंगलों में बदलने के लिए डायनामाइट या भारी मशीनों की आवश्यकता नहीं है, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति के माध्यम से केवल मानवीय हस्तक्षेप को रोकने की आवश्यकता है। कृत्रिम रूप से विदेशी या गैर-स्थानिक प्रजातियों के पौधे रोपने के बजाय स्थानीय वनस्पतियों जैसे धोक और खैर को स्वतः पनपने का अवसर देना ही वास्तविक और स्थायी समाधान है।
सांस्कृतिक पतन और कूटनीतिक दृष्टिकोण में विरोधाभास
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से, भारत का लोकाचार प्रकृति की पूजा और सह-अस्तित्व पर आधारित रहा है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में वटवृक्ष (Banyan Tree) के नीचे सामुदायिक बैठकें, पक्षियों के लिए पहली रोटी निकालना और प्रत्येक पर्वत, जलधारा तथा वन खंड (देववन या पवित्र उपवन – Sacred Groves) के साथ किसी न किसी लोक देवता को जोड़कर उन्हें संरक्षण देने की परंपरा रही है। यह व्यवस्था बिना किसी सरकारी बजट के भी जैव विविधता का संरक्षण सुनिश्चित करती थी।
परंतु आधुनिक नीतिगत और प्रशासनिक प्रतिमान में एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। प्रकृति को पूज्य मानने वाली संस्कृति अब तकनीकी प्रदर्शन और ‘पायलट प्रोजेक्ट्स’ (Pilot Projects) की मोहताज बनती जा रही है। वर्तमान प्रशासनिक कूटनीति दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता के स्थान पर तात्कालिक लोक संपर्क (Public Relations) और सांख्यिकीय रिपोर्टिंग पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। रोपे गए पौधे जीवित रहेंगे या नहीं, इसकी कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं होती, परंतु उन परियोजनाओं की सफलता के बड़े-बड़े प्रशासनिक दावे और प्रेस विज्ञप्तियां अवश्य तैयार हो जाती हैं। यह दृष्टिकोण सतत विकास (Sustainable Development) के वैश्विक मानकों के विपरीत है।
समाधान का मार्ग
अरावली और देश के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के वास्तविक संरक्षण के लिए नीतिगत स्तर पर एक व्यापक वैचारिक और संरचनात्मक परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके प्रमुख बिंदु निम्नलिखित होने चाहिए:
- प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions – NbS): यांत्रिक और इंजीनियरिंग हस्तक्षेपों के स्थान पर प्राकृतिक पुनरुद्धार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वनों को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त कर उन्हें स्वतः विकसित होने का समय दिया जाए।
- पारिस्थितिक प्रभाव आकलन (EIA) का कड़ाई से पालन: वन विभागों द्वारा किसी भी ‘हरित परियोजना’ को लागू करने से पहले उसके सूक्ष्म-पारिस्थितिकी, बायोक्रस्ट और स्थानीय जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का स्वतंत्र और वैज्ञानिक मूल्यांकन (Ecological Audit) अनिवार्य किया जाना चाहिए।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी: वन प्रबंधन में संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) और वन अधिकार अधिनियम, 2006 की भावना के अनुरूप स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों को शामिल किया जाए, जो पारंपरिक ज्ञान के माध्यम से इन वनों की रक्षा कर सकें।
- सख्त कानूनी प्रवर्तन: अरावली क्षेत्र में माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा अवैध खनन पर समय-समय पर लगाए गए प्रतिबंधों का धरातल पर कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
निष्कर्ष
अरावली जैसी डेढ़ अरब वर्ष पुरानी प्राकृतिक धरोहर का संरक्षण कंक्रीट के जंगलों को उगाने वाले यांत्रिक और आक्रामक तरीकों से संभव नहीं है। प्रशासनिक निकायों को यह समझना होगा कि ‘हरियाली’ (Greening) और ‘पारिस्थितिक बहाली’ (Ecological Restoration) दो भिन्न अवधारणाएं हैं। किसी चट्टान को डायनामाइट से उड़ाकर वहां जबरन पौधा रोपना विकास नहीं, बल्कि प्रकृति के आंतरिक संतुलन के साथ एक खतरनाक खिलवाड़ है। वास्तविक सुशासन और पर्यावरण न्याय (Environmental Justice) इसी में निहित है कि हम प्रकृति की स्वायत्तता का सम्मान करें, उसकी आंतरिक पारिस्थितिक स्मृति पर भरोसा करें और संरक्षण के नाम पर किए जाने वाले ‘प्रायोजित विध्वंस’ को तुरंत रोकें। तभी हम ‘विक्सित भारत’ के साथ-साथ एक ‘सुरक्षित और सतत भारत’ की नींव रख पाएंगे।
| UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न |
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Paper I (Essay)
Paper II – GS Paper I (Geography and Society)
Paper III – GS Paper II (Governance and Public Policy)
Paper IV – GS Paper III (Environment, Ecology and Bio-diversity)
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