मैकाले शिक्षा पद्धति (1835)

मैकॉले का विवरण पत्र (1835)

शिक्षा की ओर सर्वप्रथम एक महत्वपूर्ण प्रयास गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक के समय में उठाया गया। बेंटिंक स्वयं पाश्चात्य-शिक्षा को आरंभ किये जाने के पक्ष में था। परन्तु उसने अपने विचार को लादने का प्रयत्न नहीं किया। बेंटिंक ने अपने कानूनी सदस्य मैकॉले को शिक्षा समिति का सभापति नियुक्त किया और उससे निर्णय लेने को कहा। 

2 फरवरी 1835 को मैकॉले ने अपने विचारों को एक विशेष ऐतिहासिक विवरण पत्र में प्रस्तुत किया। उसने भारतीय शिक्षा और शान को बहुत हीन बताया और अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का समर्थन किया। भारतीय भाषाओं के विषय मे उसने लिखा है – “भारतीयों में प्रचलित भाषाओं में साहित्यिक तथा वैज्ञानिक शब्दकोष का अभाव है तथा वे इतनी अल्प विकसित और गँवारू है कि जब तक उसको बाह्य भंडार से सम्पन्न नहीं किया जायेगा तब तक उसमें सरलता से महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद नहीं किया जा सकता ।” इस प्रकार मैकॉले के अनुसार भारतीय भाषाएँ अविकसित और अवैज्ञानिक थीं ।

मैकॉले ने घोषणा की, कि कानूनों के ज्ञान के लिये संस्कृत, अरबी, फारसी के शिक्षालयों पर धन व्यय करना मूर्खता है। उनको बंद करके सरकार को हिन्दू और मुस्लिम कानूनों को अंग्रेजी में संहिताबद्ध कर देना चाहिए। 

1835 के शिक्षा-प्रस्ताव की धाराएँ इस प्रकार थी – 

  1. प्राच्य शिक्षा प्रसार के लिए अब तक जो कुछ भी किया गया है, उसको समाप्त न करके, उसको वैसा ही बना रहने दिया जाये । उसके अध्यापकों तथा छात्रों को पूर्व के समान अनुदान मिलता रहेगा
  2. आंग्ल सरकार का प्रमुख उद्देश्य भारतीयों में यूरोपियन साहित्य और विज्ञान का प्रचार करना है । अत: भविष्य में शिक्षा संबंधी धन राशि, अंग्रेजी माध्यम द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा पर ही व्यय की जायेगी । 
  3. प्राच्य विद्या सम्बन्धी साहित्य का प्रकाशन भविष्य में नहीं किया जायेगा 
  4. प्राच्य साहित्य के स्थान पर, अंग्रेजी साहित्य तथा विज्ञान से संबंधित ग्रंथों के प्रकाशन में धन व्यय किया जायेगा 
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उपरोक्त विवरण पत्र पर पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने 7 मार्च, 1835 के आज्ञापत्र में मैकॉले की सभी बातें स्वीकार कर ली । इस आज्ञापत्र के बाद से लॉर्ड मैकॉले को भारत में अंग्रेजी शिक्षा का जन्मदाता कहा जाता है।

1835 ई. में बेंटिंक ने कलकत्ता में एक मेडिकल कॉलेज की स्थापना की, रूड़की में थॉमसन इंजीनियरिंग कॉलेज खोला गया और मद्रास में 1852 ई. में मद्रास यूनिवर्सिटी हाई स्कूल की स्थापना की गयी । 

सरकारी स्कूलों में कतिपय छात्रवृत्तियाँ देने की व्यवस्था की गयी और देशी भाषाओं की प्रगति में भी कुछ धन व्यय किया गया । 

लार्ड हार्डिंज की 1844 की इस घोषणा में अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों को सरकारी नौकरी प्रदान करने मैं प्राथमिकता दी जावेगी ने उन शिक्षा की गीत को और भी तीव्र कर दिया । 

 

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