आंग्ल-मैसूर युद्ध (Anglo-Mysore War)

आंग्ल-मैसूर युद्ध (Anglo-Mysore War)

प्रथम आंग्ल-मैसूर (First Anglo-Mysore War) (1766 – 69) 

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण

  • हैदरअली द्वारा अंग्रेजों को कर्नाटक से भगाने की महत्त्वाकांक्षा रखना, इस तरह अंग्रेजों को हैदर से उत्पन्न खतरे का पता चलना। 
  • हैदरअली के विरुद्ध अंग्रेजों, एवं मराठों के बीच त्रिपक्षीय संधि हुई। 
  • हैदरअली द्वारा संधि तोड़ने में सफलता मिली और अंग्रेजों के साथ युद्ध की घोषणा की गई।

प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध का घटनाक्रम 

  • हैदर की अंग्रेजों पर विजय एवं मार्च 1769 ई० में पांच मील के क्षेत्र तक मद्रास में उसका अधिकार हो गया। 
  • युद्ध का अंत हो गया एवं अप्रैल 1769 ई० में रक्षात्मक संधि पर हस्ताक्षर किए गए।

मद्रास की संधि (1769)

यह संधि हैदर अली, तंजौर के राजा, मालाबार के शासक एवं कंपनी के बीच हुई थी। 

  • मैसूर के शासक को दिए गए कारुर एवं इसके जिलों को छोड़कर बाकी क्षेत्रों पर आपसी सहयोग से सबका अधिकार था।
  • किसी भी पक्ष पर आक्रमण करने की स्थिति में सभी दलों द्वारा एक-दूसरे का सहयोग करने का वादा किया गया। 
  • हैदर अली द्वारा मद्रास सरकार के सभी बंदी कर्मचारियों को रिहा कर दिया गया। 
  • तंजौर के राजा के साथ हैदरअली द्वारा मित्रतापूर्वक व्यवहार करना। 
  • बांबे प्रेसीडेंसी एवं अंग्रेजी कारखानों की व्यापारिक सुविधाएं पूर्ववत् कायम रखी गईं। 

द्वितीय आंग्ल-मैसूर (Second Anglo-Mysore War) (1780-84) 

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण

  • अंग्रेजों द्वारा परस्पर संदेह करना
  • 1717 ई० में हैदर पर मराठों द्वारा आक्रमण करने पर अंग्रेजों द्वारा रक्षात्मक संधि की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया गया। 
  • अमेरिकन स्वतंत्रता युद्ध के समय अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों के बीच शत्रुता बढ़ गई। 
  • हैदर अधिकृत एक फ्रांसीसी ठिकाने पर अंग्रेजों द्वारा कब्जा कर लिया गया। अंग्रेजों के विरुद्ध हैदर 1779 ई० में मराठों एवं निज़ाम के साथ संधि कर ली
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द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का घटनाक्रम 

  • हैदर ने कर्नल वेली को हटाकर 1780 ई० में आरकोट पर कब्जा कर लिया।
  • सर आयर कोटे द्वारा पोर्टोनोवो 1781 ई० में हैदर की हार हुई।
  • 1782 ई० में हैदर ने कर्नल ब्रेथवेट को हराया। 
  • 1783 ई० में टीपू द्वारा ब्रिगेडियर मैथ्यू एवं उसके आदमियों पर कब्जा कर लिया गया। 
  • 1784 ई० में लॉर्ड मैकार्टनी (मद्रास के गवर्नर) एवं टीपू के बीच मार्च में मंगलौर की संधि हुई। 

मंगलौर की संधि (1784)

  • दोनों पक्ष (मद्रास के गवर्नर एवं टीपू के बीच) एक-दूसरे के शत्रुओं को सीधे या परोक्ष रूप में मदद नहीं करेंगे एवं एक-दूसरे के सहयोगियों के साथ युद्ध नहीं करेंगे। 
  • 1770 ई० में हैदरअली द्वारा कंपनी की दी गई व्यापारिक सुविधाएं पूर्ववत् कायम रहीं। 
  • दोनों पक्ष (मद्रास के गवर्नर एवं टीपू के बीच) अम्बोरगुर एवं सतगुर महलों को छोड़ के बाकी क्षेत्रों पर पूर्ववत् अधिकार के लिए राजी हुए और टीपू भविष्य में कर्नाटक पर दावा नहीं करने के लिए तैयार हुआ। 
  • टीपू युद्ध के सभी बंदियों को जिनकी संख्या 1,680 थी, छोड़ने के लिए तैयार हुआ। 
  • कंपनी को कालीकट 1779 ई० में जो कारखाने तथा अधिकार प्राप्त थे, टीपू उसे वापस देने के लिए राजी हुए। 

तृतीय आंग्ल-मैसूर (Third Anglo-Mysore War) (1790 – 92) 

तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण

  • टीपू ने विभिन्न आंतरिक सुधारों द्वारा अपनी स्थिति को मजबूत करने में सफलता प्राप्त की, जिसके कारण अंग्रेजों निज़ाम एवं मराठों को भय उत्पन्न हुआ। 
  • 1787 ई० में फ्रांस एवं टर्की में टीपू द्वारा अपने दूत भेजकर उनकी मदद प्राप्त करने की कोशिश करना। 
  • 1789 ई० में टीपू द्वारा अपने पड़ोसियों मुख्यतः त्रावणकोर के राजा (जो अंग्रेजों का सहयोगी था) की सीमा में अपने सीमा क्षेत्र का विस्तार करना। 
  • 1790 ई० में अंग्रेजों द्वारा निजाम एवं मराठों के साथ टीपू के विरुद्ध संधि कर ली गई।
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तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का घटनाक्रम 

  • टीपू द्वारा 1790 ई० में मेजर जनरल मेडोस की हार और जनवरी 1791 ई० कार्नवालिस द्वारा स्वयं सेना का संचालन करना। 
  • 1792 ई० फरवरी में कार्नवालिस द्वारा श्रीरंगपटनम पर विजय प्राप्त करना।
  • मार्च 1792 ई० में श्रीरंगपटनम की संधि के साथ युद्ध की समाप्ति।

श्रीरंगपटनम की संधि (1792)

यह संधि टीपू एवं अंग्रेजों और उसके सहयोगी निज़ाम एवं पेशवा के बीच हुई। 

  • अंग्रेजों एवं मैसूर के पूर्व शासकों के बीच हुई संधियों को प्रमाणित किया गया। 
  • टीपू ने अपने राज्य का आधा भाग अंग्रेजों एवं उसके सहयोगियों के बीच बांट दिया, जिसमें निज़ाम एवं मराठों को अपने सीमा क्षेत्र का भाग एवं कावेरी का उत्तरी पूर्व क्षेत्र कंपनी के अधिकार में और नदी का दक्षिण-पश्चिम भाग टीपू को मिला। 
  • टीपू द्वारा युद्ध में हुए हर्जाने के 3 करोड़ रुपए दिए गए। बाकी 2 करोड़ तीन किस्तों में चुकाया गया। 
  • टीपू ने युद्ध के सभी बंदियों को छोड़ दिया। 
  • इन शर्तों के पूरा करने में अंग्रेजों ने उसके दो पुत्रों को जमानत के रूप में रखा। 

निज़ाम को क्षेत्र का सबसे बड़ा भाग मिला, जबकि मराठों ने अपने राज्य का फैलाव तुंगभद्रा एवं कृष्णानदी तक किया। अंग्रेजों द्वारा मालाबार तट पर कैन्नोर तक एवं दक्षिण में पुनानी नदी तक का क्षेत्र अधिकृत कर लिया गया, जिसमें कुर्म को अंग्रेजों ने अपना रक्षात्मक क्षेत्र बनाया। अंग्रेजों ने बारामहल जिला एवं डिंडीगल पर भी अपने कब्जे पर कर लिया लेकिन त्रावणकोर राजा जिसके लिए प्रत्यक्ष रूप से लड़ाई हुई थी, को कुछ नहीं मिला। 

चौथा आंग्ल-मैसूर (First Anglo-Mysore War) (1799) 

चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध का कारण

  • टीपू द्वारा अंग्रेजों से अपनी शर्मनाक हार का बदला लेने एवं अपने ऊपर लगाए गए प्रतिबंधों के लिए बदला लेने की इच्छा प्रबल हुई और मैसूर को पुनः मजबूत बनाने में सफलता मिली।
  • टीपू द्वारा क्रांतिकारी फ्रांसीसियों, अरब, काबुल और टर्की के मुसलमानों से अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए मदद प्राप्त करने कोशिश की गई। (उसने इन सभी देशों में अपने दूत भेजे और 1798 ई० अप्रैल को फ्रांसीसी सेना की एक छोटी टुकड़ी मंगलौर पहुंची) 
  • नया गवर्नर जरनल लॉर्ड वेलेसली द्वारा टीपू से उत्पन्न भय को खत्म करने का निर्णय लिया गया।
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चौथे आंग्ल-मैसूर युद्ध का घटनाक्रम 

  • पहली बार 5 मार्च को स्टुवर्ड द्वारा सेदासीर में एवं 27 मार्च को जनरल हैरिस द्वारा मालवेली में टीपू की हार हुई। 
  • टीपू का श्रीरंगपटनम चला जाना, जहां 4 मई को युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई। 
  • मैसूर के बड़े हिस्से पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और एक छोटे हिस्से को अंग्रेजों द्वारा वोडेयार वंश के राजा कृष्णराजा तृतीय को दे दिया गया जो कि पांच वर्ष का बालक था। 
  • 1799 ई० में नए राजा के साथ अंग्रेजों ने एक सहायक संधि पर हस्ताक्षर किए। मैसूर के शासक द्वारा अच्छी तरह से शासन नहीं करने के कारण विलियम बेनटिंक ने 1831 ई० में प्रशासन अपने हाथों में ले लिया। लेकिन 1881 ई० में लॉर्ड रिपन द्वारा पुनः वहां के शासक को प्रशासन की बागडोर वापस कर दी गई।

 

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