भारत में 1 अप्रैल 2026 से 16वें वित्त आयोग की पुरस्कार अवधि 2026-27 से 2030-31 शुरू हो गई है। इस अवधि में आपदा प्रबंधन के वित्तपोषण के लिए ₹2,04,401 करोड़ का कुल प्रावधान राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष और राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष के लिए अनुशंसित किया गया है। बदलते जलवायु जोखिमों, बाढ़, भूस्खलन, सूखा, अत्यधिक वर्षा, लू और आकाशीय बिजली जैसी घटनाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण केवल आपदा के बाद राहत देने वाला मॉडल पर्याप्त नहीं है। 16वें वित्त आयोग तथा उसके लिए किए गए अध्ययनों ने जोखिम-आधारित वित्तपोषण, बेहतर आँकड़ों, पूर्व चेतावनी, बीमा और जोखिम न्यूनीकरण पर अधिक जोर दिया है। यह बदलाव भारत में आपदा प्रतिक्रिया से आपदा जोखिम न्यूनीकरण और जलवायु-सहिष्णु विकास की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
Source:
- 16वाँ वित्त आयोग — आधिकारिक रिपोर्ट एवं अध्ययन
- गृह मंत्रालय — आपदा प्रतिक्रिया कोष एवं आपदा न्यूनीकरण कोष
- राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का सचेत पोर्टल
- भारत मौसम विज्ञान विभाग
संदर्भ
भारत में मानसून के दौरान बाढ़, भूस्खलन, अत्यधिक वर्षा, बादल फटना और अन्य आपदाएँ लगातार प्रशासनिक एवं वित्तीय दबाव उत्पन्न करती हैं। 15 अगस्त 2026 को भारत मौसम विज्ञान विभाग ने हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख और उत्तराखंड में 15–20 अगस्त के दौरान व्यापक वर्षा की संभावना बताई है। हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पंजाब के लिए भी 15 अगस्त को व्यापक वर्षा का पूर्वानुमान जारी किया गया है।
इसी व्यापक संदर्भ में 16वें वित्त आयोग का नया आपदा-वित्तपोषण ढाँचा महत्वपूर्ण हो जाता है।
वर्तमान व्यवस्था का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि आपदा आने के बाद कितनी राहत राशि उपलब्ध होगी, बल्कि यह भी है कि:
- जोखिम वाले क्षेत्रों की पहले पहचान कैसे हो?
- आपदा से पहले कितना निवेश किया जाए?
- राज्य सरकारों को जोखिम कम करने के लिए पर्याप्त वित्त कैसे मिले?
- जलवायु परिवर्तन से बदलते जोखिमों को वित्तीय निर्णयों में कैसे शामिल किया जाए?
- बार-बार होने वाली आपदाओं से राज्यों के विकास बजट पर पड़ने वाले दबाव को कैसे कम किया जाए?
यही कारण है कि आपदा जोखिम वित्तपोषण (Disaster Risk Financing) आज केवल राहत एवं पुनर्वास का विषय नहीं, बल्कि राजकोषीय संघवाद, जलवायु अनुकूलन और विकास नीति का विषय बन गया है।
पृष्ठभूमि
भारत में आपदा प्रबंधन की संस्थागत व्यवस्था
भारत में आपदा प्रबंधन का व्यापक कानूनी आधार आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 है।
इसके तहत:
- राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA);
- राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA);
- जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA)
जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं।
गृह मंत्रालय का आपदा प्रबंधन प्रभाग राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन से जुड़े प्रमुख प्रशासनिक कार्यों में नोडल भूमिका निभाता है।
आपदा वित्तपोषण के प्रमुख साधन
वर्तमान व्यवस्था में प्रमुख कोष हैं:
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष — SDRF राज्य सरकारों के पास उपलब्ध प्राथमिक कोष है, जिसका उपयोग अधिसूचित आपदाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिए किया जाता है।
- राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष — NDRF गंभीर प्रकृति की आपदा में, जब राज्य के SDRF में उपलब्ध राशि पर्याप्त नहीं होती, तब अतिरिक्त सहायता प्रदान करता है।
- राज्य आपदा न्यूनीकरण कोष — SDMF – इसका उद्देश्य केवल आपदा के बाद राहत देना नहीं, बल्कि आपदा जोखिम को पहले से कम करना है।
- राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण कोष — NDMF – राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालीन जोखिम न्यूनीकरण के लिए उपयोग किया जाता है।
प्रमुख तथ्य
16वें वित्त आयोग की अवधि
16वें वित्त आयोग की पुरस्कार अवधि 2026-27 से 2030-31 है। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 17 नवंबर 2025 को राष्ट्रपति को प्रस्तुत की थी।
आपदा प्रबंधन के लिए कुल प्रावधान
16वें वित्त आयोग ने SDRF और SDMF के लिए कुल ₹2,04,401 करोड़ की अनुशंसा की है।
इसमें:
- SDRF — ₹1,63,521 करोड़
- SDMF — ₹40,880 करोड़
शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्तर के कोष
16वें वित्त आयोग के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए ₹79,406 करोड़ का कोष निर्धारित किया गया है, जिसमें अधिकतम 25% राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण के लिए रखा जा सकता है।
केंद्र-राज्य हिस्सेदारी
SDRF में सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य का योगदान सामान्यतः : 75 : 25
जबकि पूर्वोत्तर एवं हिमालयी राज्यों के लिए: 90 : 10 है।
यह तथ्य उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर राज्यों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
आपदा जोखिम वित्तपोषण में नया दृष्टिकोण
पारंपरिक मॉडल: आपदा → नुकसान → राहत → पुनर्वास पर केंद्रित था।
नया दृष्टिकोण: जोखिम की पहचान → पूर्व तैयारी → जोखिम न्यूनीकरण → आपदा प्रतिक्रिया → पुनर्निर्माण → अधिक लचीला विकास पर केंद्रित है।
विश्व बैंक के 16वें वित्त आयोग के लिए किए गए अध्ययन में पाया गया कि आपदाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान का एक बड़ा हिस्सा अभी भी बीमित या वित्तीय रूप से सुरक्षित नहीं है। अध्ययन ने अधिक सक्रिय और जलवायु-अनुकूल वित्तपोषण रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया है।
आपदा जोखिम सूचकांक
भारत के आपदा वित्तपोषण में जोखिम-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ाने की दिशा में 15वें वित्त आयोग ने Disaster Risk Index आधारित व्यवस्था को महत्व दिया था।
जोखिम को broadly निम्न घटकों से समझा जा सकता है: जोखिम = खतरा × संवेदनशीलता × जोखिमग्रस्तता ÷ क्षमता
जहाँ:
- Hazard = आपदा की संभावना/तीव्रता
- Vulnerability = सामाजिक, आर्थिक, भौतिक एवं पर्यावरणीय कमजोरियाँ
- Exposure = कितनी जनसंख्या/संपत्ति खतरे में है
- Capacity = आपदा से निपटने की संस्थागत क्षमता
विश्व बैंक के अध्ययन के अनुसार 15वें वित्त आयोग की व्यवस्था ने आपदा जोखिम के आधार पर संसाधनों के वितरण में बदलाव किया था।
बदलते आपदा जोखिम की नई वास्तविकता
भारत में आपदा जोखिम केवल पारंपरिक बाढ़ और चक्रवात तक सीमित नहीं है। अब महत्वपूर्ण जोखिमों में शामिल हैं:
- अत्यधिक वर्षा
- शहरी बाढ़
- भूस्खलन
- लू
- आकाशीय बिजली
- सूखा
- वनाग्नि
- तटीय जोखिम
- हिमनद एवं पर्वतीय जोखिम
- समुद्र-स्तर वृद्धि
16वें वित्त आयोग के अध्ययन में Heatwave और Lightning को भी बढ़ते जोखिमों के रूप में विश्लेषित किया गया है।
लू और बिजली का महत्व
भारत में आपदा नीति का एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अत्यधिक गर्मी और आकाशीय बिजली जैसे hazards को अब वित्तीय जोखिम आकलन में अधिक गंभीरता से देखा जा रहा है।
गृह मंत्रालय की वर्तमान जानकारी में heatwave और lightning SDRF के अंतर्गत सहायता योग्य आपदाओं की सूची में शामिल हैं।
यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- लू का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है;
- श्रम उत्पादकता प्रभावित होती है;
- कृषि एवं पशुधन पर प्रभाव पड़ता है;
- बिजली की माँग बढ़ती है;
- जल संसाधनों पर दबाव पड़ता है;
- गरीब एवं अनौपचारिक श्रमिक अधिक प्रभावित होते हैं।
इसी प्रकार आकाशीय बिजली ग्रामीण क्षेत्रों, खुले क्षेत्रों, कृषि श्रमिकों और कमजोर आवासों में रहने वाली आबादी के लिए गंभीर जोखिम है।
संवैधानिक / कानूनी पहलू
वित्त आयोग
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 280 वित्त आयोग की स्थापना से संबंधित है।
- वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण तथा राज्यों को अनुदान से संबंधित महत्वपूर्ण सिफारिशें करता है।
आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005
आपदा प्रबंधन के लिए मूल कानूनी ढाँचा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 है। इसके अंतर्गत:
- NDMA
- SDMA
- DDMA
- NDRF
जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं।
वित्तीय संघवाद
आपदा प्रबंधन का वित्तीय ढाँचा सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का उदाहरण है क्योंकि:
- राज्य तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं;
- केंद्र वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करता है;
- वित्त आयोग संसाधनों के वितरण के लिए संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
आर्थिक प्रभाव
आपदाओं का आर्थिक प्रभाव तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।
प्रत्यक्ष नुकसान
- सड़क
- पुल
- घर
- सिंचाई
- बिजली
- विद्यालय
- अस्पताल
- फसल
को नुकसान।
अप्रत्यक्ष नुकसान
- उत्पादन में कमी
- रोजगार में कमी
- आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान
- कीमतों में वृद्धि
- पर्यटन पर प्रभाव
राजकोषीय प्रभाव
राज्य सरकारों को अचानक:
- राहत,
- पुनर्वास,
- पुनर्निर्माण
पर अधिक खर्च करना पड़ता है।
इससे पहले से सीमित विकास बजट पर दबाव बढ़ सकता है।
विश्व बैंक के अध्ययन में यह समस्या विशेष रूप से सामने आई कि कुछ बड़े आपदा घटनाक्रमों में आर्थिक नुकसान राज्यों की उपलब्ध आपदा वित्तीय क्षमता से कई गुना अधिक हो सकता है।
सामाजिक प्रभाव
आपदा का प्रभाव सभी सामाजिक समूहों पर समान नहीं होता। सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं:
- छोटे किसान
- भूमिहीन मजदूर
- महिलाएँ
- बच्चे
- वृद्ध
- दिव्यांगजन
- आदिवासी समुदाय
- प्रवासी श्रमिक
- अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक
- पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों की आबादी
इसलिए आपदा वित्तपोषण को केवल भौतिक अवसंरचना की मरम्मत तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है।
इसे सामाजिक सुरक्षा और आजीविका सुरक्षा से जोड़ना आवश्यक है।
पर्यावरणीय आयाम
आपदा जोखिम और पर्यावरणीय क्षरण एक-दूसरे को बढ़ा सकते हैं।
उदाहरण:
- वनों की कटाई → ढलानों की अस्थिरता → भूस्खलन का जोखिम
- आर्द्रभूमि का विनाश → जल धारण क्षमता में कमी → शहरी बाढ़
- मैंग्रोव का क्षरण → तटीय क्षेत्रों की चक्रवातीय संवेदनशीलता में वृद्धि
इसलिए आपदा न्यूनीकरण में:
- आर्द्रभूमि संरक्षण
- मैंग्रोव संरक्षण
- वनीकरण
- जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन
- पर्वतीय पारिस्थितिकी संरक्षण
- प्राकृतिक जल निकासी का संरक्षण
जैसे Nature-based Solutions महत्वपूर्ण हैं।
अंतरराष्ट्रीय आयाम
भारत का आपदा प्रबंधन दृष्टिकोण वैश्विक Sendai Framework for Disaster Risk Reduction 2015–2030 से भी जुड़ता है। इसके प्रमुख विचार हैं:
- आपदा जोखिम को समझना
- आपदा जोखिम शासन को मजबूत करना
- जोखिम न्यूनीकरण में निवेश करना
- आपदा के बाद बेहतर पुनर्निर्माण करना
भारत के लिए यह दृष्टिकोण जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (Climate Adaptation) के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI) जैसे प्रयासों के माध्यम से आपदा-सहिष्णु अवसंरचना पर भी बल देता है।
सरकारी पहल
SDRF और NDRF
तत्काल राहत के लिए मुख्य वित्तीय साधन।
SDMF और NDMF
दीर्घकालीन Disaster Risk Reduction के लिए वित्तीय साधन।
सचेत पोर्टल
NDMA का SACHET प्लेटफॉर्म Common Alerting Protocol आधारित प्रणाली के माध्यम से बहुभाषी और लक्षित आपदा चेतावनी उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया है। इसमें:
- SMS
- मोबाइल एप
- ब्राउज़र सूचना
- RSS
- भौगोलिक रूप से लक्षित चेतावनी
जैसी सुविधाएँ हैं।
IMD का प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान
IMD जिला स्तर पर लू के लिए Impact-Based Forecasts और जोखिम-आधारित चेतावनियाँ जारी करता है। ये चेतावनियाँ केवल मौसम की स्थिति नहीं बल्कि संभावित प्रभाव और आवश्यक कार्रवाई पर भी ध्यान देती हैं।
प्रमुख चुनौतियाँ
राहत और न्यूनीकरण के बीच असंतुलन
आपदा के बाद राहत राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अधिक दिखाई देती है, जबकि जोखिम न्यूनीकरण का लाभ दीर्घकाल में मिलता है।
जोखिम का बदलता स्वरूप
ऐतिहासिक आँकड़ों के आधार पर भविष्य के जोखिम का अनुमान हमेशा पर्याप्त नहीं हो सकता। जलवायु परिवर्तन के कारण:
- वर्षा का वितरण
- तापमान
- चरम मौसम
- समुद्र-स्तर
- हिमनदीय जोखिम
बदल रहे हैं।
बीमा की कमी
आपदाओं से होने वाले आर्थिक नुकसान का बड़ा हिस्सा पर्याप्त रूप से बीमित नहीं है।
राज्य क्षमता में अंतर
सभी राज्यों की:
- संस्थागत क्षमता
- तकनीकी विशेषज्ञता
- वित्तीय क्षमता
- डेटा व्यवस्था
समान नहीं है।
शहरीकरण
अनियोजित शहरीकरण, कंक्रीटीकरण और प्राकृतिक जल निकासी में बाधा शहरी बाढ़ के जोखिम को बढ़ा सकती है।
आँकड़ों की समस्या
जोखिम-आधारित वित्तपोषण के लिए उच्च गुणवत्ता वाले:
- Hazard Data
- Exposure Data
- Vulnerability Data
- Loss Data
की आवश्यकता होती है।
सरकार का नज़रिया
सरकार का दृष्टिकोण व्यापक आपदा प्रबंधन ढाँचे, पूर्व चेतावनी, SDRF/NDRF तथा अब न्यूनीकरण कोषों के माध्यम से तत्काल प्रतिक्रिया और दीर्घकालीन जोखिम न्यूनीकरण दोनों को मजबूत करना है।
समर्थकों का नज़रिय
समर्थक दृष्टिकोण के अनुसार जोखिम-आधारित वित्तपोषण से अधिक धन उन राज्यों और क्षेत्रों की ओर जा सकता है जहाँ वास्तविक आपदा जोखिम अधिक है। इससे संसाधनों का अधिक वैज्ञानिक उपयोग संभव होगा।
आलोचकों का नज़रिया
आलोचनात्मक दृष्टिकोण यह है कि केवल अधिक धन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। यदि परियोजना चयन, स्थानीय संस्थाओं की क्षमता, भूमि उपयोग नियोजन और व्यय निगरानी कमजोर रही तो न्यूनीकरण के लिए उपलब्ध राशि भी अपेक्षित परिणाम नहीं देगी।
विशेषज्ञ / संस्थागत दृष्टिकोण
16वें वित्त आयोग से जुड़े विश्व बैंक अध्ययनों ने जलवायु जोखिम को वित्तीय आकलन में शामिल करने, जोखिम-आधारित आवंटन, बेहतर डेटा, जोखिम हस्तांतरण और वित्तीय सुरक्षा को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
आगे की राह
- राहत से पहले जोखिम न्यूनीकरण – आपदा के बाद खर्च करने की बजाय आपदा से पहले जोखिम कम करने पर अधिक निवेश होना चाहिए।
- Climate-informed Disaster Financing – भविष्य के जलवायु अनुमानों को वित्तीय आवंटन में शामिल किया जाना चाहिए।
- स्थानीय सरकारों को मजबूत करना – नगरपालिकाओं, ग्राम पंचायतों और जिला प्रशासन को आपदा जोखिम न्यूनीकरण में अधिक तकनीकी एवं वित्तीय क्षमता देनी चाहिए।
- जोखिम बीमा का विस्तार – कृषि, आवास, सूक्ष्म उद्यम और महत्वपूर्ण अवसंरचना के लिए कम लागत वाले जोखिम बीमा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- डेटा आधारित वित्तीय निर्णय – राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर: Hazard + Exposure + Vulnerability + Capacity का नियमित अद्यतन होना चाहिए।
- प्राकृतिक अवसंरचना में निवेश – आर्द्रभूमि, मैंग्रोव, जंगल, जलग्रहण क्षेत्र और प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों को आपदा न्यूनीकरण अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए।
- विकास योजनाओं में Disaster Risk Screening – सड़क, बाँध, शहर, औद्योगिक क्षेत्र और पर्यटन परियोजनाओं को स्वीकृति देने से पहले आपदा जोखिम का मूल्यांकन होना चाहिए।
- पारदर्शिता और सामाजिक लेखा-परीक्षण – आपदा न्यूनीकरण निधियों के उपयोग की निगरानी के लिए सार्वजनिक डैशबोर्ड, स्वतंत्र मूल्यांकन और सामाजिक लेखा-परीक्षण उपयोगी हो सकते हैं।
- जोखिम हस्तांतरण – सरकार पर पूरे वित्तीय जोखिम का भार रखने की बजाय: Insurance + Reinsurance + Catastrophe Bonds + Contingent Credit जैसे साधनों का सावधानीपूर्वक विस्तार किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में आपदा प्रबंधन की सफलता का माप केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसी आपदा के बाद कितनी जल्दी राहत पहुँची, बल्कि यह भी होना चाहिए कि आपदा से पहले कितनी जानें, आजीविकाएँ और सार्वजनिक संपत्तियाँ बचाई गईं।
16वें वित्त आयोग का आपदा वित्तपोषण ढाँचा इसी व्यापक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है—जहाँ SDRF/NDRF आधारित प्रतिक्रिया के साथ SDMF/NDMF आधारित जोखिम न्यूनीकरण को भी महत्व मिलता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में आपदा प्रबंधन को विकास नीति से अलग नहीं देखा जा सकता। भारत के लिए अगला चरण ऐसा जोखिम-सचेत, वित्तीय रूप से टिकाऊ और स्थानीय स्तर पर सक्षम विकास मॉडल बनाना है जिसमें सड़क, शहर, कृषि, जल और आवास जैसी प्रत्येक विकास परियोजना को आपदा-सहिष्णुता के दृष्टिकोण से देखा जाए।
यही दृष्टिकोण “Build Back Better” से आगे बढ़कर “Build Better Before Disaster” की दिशा में भारत को ले जा सकता है।
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