उत्तराखंड के सैन्य छावनियां (Military Cantonments of Uttarakhand)

उत्तराखंड के सैन्य छावनियां (Military Cantonments of Uttarakhand)

सैन्य छावनी (Military Cantonments) से तात्पर्य उस क्षेत्र से है जहाँ सेना रहती है। ऐसे क्षेत्रों का प्रशासन छावनी परिषद द्वारा किया जाता है। राज्य में कुल 9 छावनी परिषदें हैं, जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं – 

अल्मोड़ा छावनी (Almora Cantonment)

अप्रैल 1815 में कर्नल गार्डनर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज (रोहिला फौज) ने गोरखों से अल्मोड़ा किला (लालमन्डी) जीत लिया और उसे नया नाम ‘फोर्ट मौयरा’ दिया। बाद में इसे छावनी का रूप दे दिया गया। आगे चलकर अप्रैल. 1918 में उन गोरखा सैनिकों, जो नेपाल वापस नहीं गये, और स्थानीय गोरखाओं तथा अन्य लोगों को मिलाकर यहाँ तृतीय गोरखा रेजीमेंट की स्थापना की गई।

रानीखेत छावनी (Ranikhet Cantonment)

अल्मोड़ा जिले में स्थित रानीखेत को अंग्रेजों ने 1869 में आरामगाह के लिए खरीदा था लेकिन 1871 में यहाँ छावनी परिषद की स्थापना कर दी गई। इस नगर का अधिकांश भाग छावनी परिषद के अर्न्तगत है। यह छावनी अलग-अलग समयों में अलग-अलग पल्टनों का (अंग्रेज, गोरखा, गढ़वाली) आवास रहा है। 1948 में कुमाऊँ रेजीमेन्ट को आगरा से रानीखेत लाया गया, तब से यह स्थल कुमाऊँ रेजीमेन्ट का मुख्यालय है।

देहरादून छावनी (Dehradun Cantonment)

30 नवम्बर 1814 को अंग्रेज जनरल गिलस्पी के नेतृत्व में 15 हजार सैनिकों द्वारा गोरखों को खलुंगा किले (नालापानी) में हराने के साथ ही देहरादून छावनी में तब्दील हो चुका था। 1815 में गोरखा सैनिक टुकड़ियों को तोड़कर सिरमौर बटालियन (सेकेन्ड गोरखा बटालियन) बनाई गई। ध्यातव्य है कि पहले इस सिरमौर का केन्द्र नाहन में था, जिसे बाद में देहरादून स्थानान्तरित कर दिया गया। आज यहाँ एक सब एरिया तथा सैनिक अस्पताल व कैन्टोनमेन्ट बोर्ड है। इस क्षेत्र को उत्तरांचल की स्थापना के बाद ‘उत्तरांचल सब एरिया’ के नाम से जाना जाता है।

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चकराता छावनी (Chakrata Cantonment)

देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र के चकराता एवं कैलना पहाड़ियों पर स्थित चकराता छावनी 1866 में बनना शुरू हुआ और 1869 से यहाँ सैनिक रहने लगे थे। लेकिन कैन्टोमेन्ट मजिस्ट्रेट का कार्यालय अप्रैल 1873 में स्थापित हुआ था। आज यह एक महत्वपूण छावनी हैं।

लण्डौर छावनी (Landour Cantonment)

मंसूरी स्थित इस छावनी की स्थापना 1836 में वोलेन्टियर कोर की स्थापना के साथ हुई। यहाँ सेना का मैनेजमेन्ट इन्स्टीटयूट भी है।

लैन्सडौन छावनी (Lansdowne Cantonment)

5 मई 1887 को स्थापित प्रथम गढ़वाल राइफल्स के कर्नल मैन्वेरिंग के नेतृत्व में 4 नवम्बर 1887 से इस छावनी को बसाया गया। पौढ़ी जिले में स्थित इस स्थान को पहले कालोंडांडा के नाम से जाना जाता था। यह नगर पूर्ण रूप से छावनी परिषद के अन्तर्गत है। यहाँ के आफीसर्स मेस में स्थित म्यूजियम एशिया के सर्वश्रेष्ठ म्यूजियमों में से एक है। इसके अतिरिक्त दरबान सिंह संग्रहालय, रेजिमेंटल दुर्गा मंदिर, कालेश्वर महादेव मंदिर तथा सेंट मेरी चर्च यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। यहाँ के टिप-इन-टाप नामक स्थान से हिमालय पर्वत की अधिकतम श्रृंखलाएं दिखाई देती हैं।

गढ़वाल राइफल्स की कोटद्वार (कौडिया कैम्प) में भी कुछ अवस्थापना सुविधायें हैं। दुगड्डा में इसका एक कमीसरेट ग्राउंड है।

रुढ़की छावनी (Roorkee Cantonment)

1853 में स्थापित इस छावनी में भारतीय सेना का प्रतिष्ठित संस्थान ‘बंगाल सैपर्स एवं माइनर्स का ग्रुप एवं सेन्टर’, सैनिक अस्पताल तथा कई सैन्य पल्टनें हैं। 

नैनीताल छावनी (Nainital Cantonment)

नैनीताल में छावनी की स्थापना 1841 के आस-पास की गई थी। वर्तमान में यहाँ एक पल्टन और सैनिक आरामगाह है।

राष्ट्रीय इंडियन मिलिटरी कॉलेज (National Indian Military College)

देहरादून में स्थित इस कालेज की स्थापना 1 मार्च, 1922 को डयूक ऑफ विंडसर (प्रिन्स ऑफ वेल्स) द्वारा की गई थी। यह कालेज अब तक 6 रक्षा प्रमुख, 3 थल सेना अध्यक्ष और 3 वायु सेना अध्यक्ष दे चुका है। 3 वायु सेना मुखिया में से 2 पाकिस्तान के रहे है

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भारतीय सैन्य अकादमी (Indian Military Academy)

देहरादून में स्थित इस अकादमी की स्थापना 1 अक्टूबर 1932 को फील्ड मार्शल सर फिलिप चेटवुडबर्ट द्वारा की गई थी। 1934 के इसके पहले बैच में स्वतंत्र भारत के फील्ड मार्शल एस.एच.एफ. मानेकशाह भी थे। यह अकादमी अब तक अनेक पदक प्राप्त कर चुकी है।

अकादमी के पासिंग आउट परेड का अब तक तीन प्रधानमंत्री (1948 एवं 53 में नेहरु, 1982 में इंदिरा, व 10 दिसम्बर 2007 को मनमोहन सिंह) निरीक्षण कर चुके हैं। 

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