मध्यकालीन भारत के प्रमुख राजवंश – (चाहमन राजवंश)

मध्यकालीन भारत के प्रमुख राजवंश

चाहमन राजवंश (Chahamana Dynasty)

चाहमन राजवंश (Chahman Dynasty) वंश की कई शाखाएं थीं। मुख्य शाखा, शाकंभरी (आधुनिक सांभर) जयपूर तथा अन्य जगहों पर शासन करने वाले संगोत्री थे। इनमें से कुछ प्रतिहारों के सामंत थे।

वासुदेव (Vasudev)

  • वासुदेव ने छठी शताब्दी के मध्य में मुख्य शाखा की स्थापना की। 
  • इनकी राजधानी अहिक्षेत्र थी। 
  • राष्ट्रकूटों से संघर्ष के कारण प्रतिहारों की क्षीण होती शक्ति का फायदा उठाते हुए अगले महत्त्वपूर्ण राजा वाकतिराज ने प्रतिहारों का विरोध करना प्रारंभ कर दिया। 
  • उनके शासन काल में चाहमनों की प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई। 
  • इसका प्रमाण उनके द्वारा महाराजा की पदवी धारण करने से मिलता है। 
  • उन्होंने पुष्कर में एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया। 
  • उनके तीन पुत्र थे – सिम्हराज, वत्सराज तथा लक्ष्मण।

सिम्हरान तथा विग्रहराज II (Simharan and Vigraharaj II)

  • सिम्हराज इस वंश के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। 
  • इससे लगता है कि उन्होंने कन्नौज के प्रतिहारों से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी। 
  • सिम्हराज का पुत्र तथा उत्तराधिकारी विग्रहराज II अपने वंश की महानता का वास्तविक संस्थापक था। 
  • उसने गुजरात पर आक्रमण किया तथा चालुक्य मूलराज को कच्छ में (कंठकोट) शरण लेने के लिए बाध्य कर दिया। 
  • उसने दक्षिण में नर्मदा तक विजय प्राप्त की।
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पृथ्वीराज I तथा अजयराज II (Prithviraj – I and Ajayraj – II)

  • पृथ्वीराज I के बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने पुष्कर में ब्राह्मणों को लूटने आए 700 चालुक्यों को मारा था। 
  • उनके पुत्र एवं उत्तराधिकारी अजयराज II के समय से चाहमनों ने आक्रामक साम्राज्यवादी नीति अपनाई उसने अजयमेरू अथवा अजमेर नगर की स्थापना की और इसका विस्तार किया। 
  • अजयराज के बाद उसका पुत्र अरनोराज आया। उसे चालुक्यों का प्रभुत्व स्वीकार करना पड़ा तथा सिद्धराज जयसिम्ह ने अपनी पुत्री का विवाह उससे करवाया। 
  • इस वैवाहिक रिश्ते से कुछ दिनों के लिए शांति स्थापित हो गई परंतु चालुक्य गद्दी पर कुमारपाल के आते ही पुनः युद्ध छिड़ गया।

विग्रहराज III (Vigraharaj – III)

  • यह एक महान विजेता था तथा उसने अपने राज्य की सीमाओं को विभिन्न दिशाओं में फैलाया। 
  • उन्होंने तोमरों से दिल्ली जीती तथा पंजाब के हिसार जिले के हांसी पर कर लिया। 
  • दक्षिण में उसने कुमारपाल के राज्य चालक्यों के हाथों अपने पिता के अपमान का बदला लिया । 
  • उसके राज्य में सतलुज तथा यमुना के बीच पंजाब का का बहुत बड़ा हिस्सा था। 
  • विग्रहराज एक प्रख्यात लेखक भी था। उसने हरीकेली नाटक जैसे नाटकों की रचना की। 
  • अजमेर में उनके द्वार बनाए गए अनेक मंदिरों में सरस्वती मंदिर सर्वश्रेष्ठ है।

पृथ्वीराज II तथा सोमेश्वर(Prithviraj – II and Someswar)

  • अरनोराज के पोते पृथ्वीराज II के समय मुसलमाना के साथ पुराना झगड़ा पुनः प्रारंभ हो गया। 
  • पृथ्वीराज के बाद उनका चाचा तथा अरनोराज का पुत्र सोमेश्वरआया। 
  • कुमारपाल के दरबार में रहते हुए उसने एक कालचुरी राजकुमारी कपूरदेवा से विवाह किया जिनसे पृथ्वीराज III तथा हरीराज नाम के दो पुत्र हुए।
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पृथ्वीराज III (Prithviraj – III)

  • पृथ्वीराज III के प्रारम्भिक दिनों की एक महत्त्वपूर्ण घटना अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह को हवा थी। 
  • उसने गुजरात के चालव्य राज्य पर हमला किया तथा वहां के राजा भीम II को संधि के लिए बाध्य किया। 
  • पृथ्वीराज शत्रुओं से तराई में 1190-91 में भिड़ा। यह पहली लड़ाई सुल्तान के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई, परंतु इस विजय के बाद भी पृथ्वीराज III ने अपने राज्य के उत्तर-पश्चिमी सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया तथा अपना ध्यान गहदवला राजा जयपद से संघर्ष में लगाया।
  • शिहाबद्दीन 1192 में मुल्तान तथा लाहौर कर बिना किसी प्रतिरोध का सामना किए फिर तराई में आया। 
  • दिल्ली के प्रमुख गोविन्दराज सहित एक लाख लोगों की मौत हुए। पृथ्वीराज खुद बंदी बना लिए तथा उन्हें मार दिया गया। 
  • देश के अनेक भाग से विभिन्न कवि तथा विद्वान पृथ्वीराज दरबार में जमा हुए, जो स्वयं पृथ्वीराज विजय तथा पृथ्वीराज रासो जैसे महान कविताओं के विषय बने तथा इन्हें बने वाले क्रमशः जयनक तथा चांद (चंदबरदाई) थे जो उनके दरबारी कवि थे।

 

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