भूस्खलन (Landslide)

16 एवं 17 जून 2013 को तेज वर्षा से प्रेरित भूस्खलन ने मंदाकिनी नदी एवं उसकी उपशाखाओं की धारा को रोककर, अल्पकालिक झील का निर्माण कर दिया बादल के फटने से आयी त्वरित बाढ़ ने बस्तियों एवं सडकों को बहा दिया और उत्तराखण्ड में विशेष कर केदारनाथ क्षेत्र में ऐसा विनाश किया

क्या होता है भूस्खलन?

पर्वतीय ढालों या नदी तटों पर छोटी शिलाओं, मिट्टी या मलबे का अचानक खिसकर नीचे आ जाना ही, भूस्खलन है। पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन का सिलसिला निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। इससे पर्वतों के जन-जीवन पर बुरे प्रभाव दिखाई पड़ने लगे हैं।

भूस्खलन प्रवण क्षेत्र

हिमालय, पश्चिमी घाट और नदी घाटियों में प्राय भूस्खलन होते रहते हैं। भूस्खलनों का प्रभाव जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम तथा सभी सात उत्तर पूर्वी राज्य भूस्खलन से ज्यादा ही त्रस्त है। दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल को भूस्खलन का प्रकोप झेलना पड़ता है।

Landslide Area in India
Image Source – NCERT

भूस्खलन के कारण

  • भारी वर्षा – भारी वर्षा भूस्खलन का एक प्रमुख कारण है।
  • वन-नाशन – वनों का विनाश भूस्खलन का मुख्य कारण है। वृक्ष, झाड़ियाँ और घासपात मृदा कणों को बांधे रखते हैं। पेड़ों के कटने से पहाड़ी ढाल नंगे हो जाते हैं। ऐसे ढालों पर वर्षा का जल निर्बाध गति से बहता है। उसे सोखने के लिए वनस्पति का आवरण नहीं होता।
  • भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट –  हिमालयी क्षेत्र में प्रायः भूकंप आते रहते हैं। भूकंप के झटके पहाड़ों को हिला देते हैं और वे टूट कर नीचे की ओर खिसक जाते हैं। ज्वालामुखी विस्फोटों से भी पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन होते हैं।
  • सड़क निर्माण – विकास के लिए पहाड़ों में सड़कों का निर्माण चल रहा है। सड़क बनाते समय ढेर सारा मलबा हटाना पड़ता है। इस तरह चट्टानों की बनावट एवं उनके ढाल में बदलाव आता है। फलतः भूस्खलन तीव्र हो जाता है।
  • झूम कृषि – उत्तरपूर्वी भारत में झूम खेती के कारण भूस्खलनों की संख्या या आवृत्ति बढ़ी है।
  • भवन निर्माण – जनसंख्या वृद्धि तथा पर्यटन के लिए आवास की व्यवस्था हेतु पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक मकान और होटल बनाए जा रहे हैं। इनसे भी भूस्खलनों में वृद्धि होती है।
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भूस्खलन के परिणाम

  • पर्यावरण का ह्रास  – भूस्खलनों से पर्वतों के पर्यावरण में ह्रास हो रहा है। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य धीरे-धीरे घट रहा है।
  • जल स्रोत सूख रहे हैं।
  • नदियों में बाढ़ की वृद्धि हो रही है।
  • सड़क मार्ग अवरूद्ध हो रहा है।
  • अपार धन-जन की हानि हो रही है।

भूस्खलन रोकने तथा इसके दुष्प्रभावों को कम करने के उपाय

  • वनरोपण – वृक्ष और झाड़ियाँ मृदा को बांधे रखने में सहायक होती है।
  • सड़कों के निर्माण में नई तकनीक – सड़क इस तरह बनायी जानी चाहिए ताकि कम से कम मलबा निकले।
  • खनिजों और पत्थरों के निकालने पर रोक लगाई जाए।
  • वनों का शोषण न करके वैज्ञानिक दोहन किया जाए।
  • ऋतुवत या वार्षिक फसलों के बदले स्थायी फसलें जैसे फलों के बाग लगाए जाएँ।
  • भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों में पृष्ठीय जल प्रवाह को नियन्त्रित करके जलरिसाव को कम किया जाए।
  • पहाड़ी ढालों पर मलबे को खिसकने से रोकने के लिए मजबूत दीवारें बनाई जाएं।
  • भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों का मानचित्रण किया जाना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में निर्माण कार्यों पर रोक लगाई जाए।

 

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