उत्तराखंड में गोरखा शासन का इतिहास (History of Gorkha Rule in Uttarakhand)

समूचे देश की भाँति उत्तराखण्ड में भी समय-समय पर विभिन्न राजवंशों का शासन काल रहा, जैसे – कुणिन्द, पौरव वर्मन, कत्यूरी, चंद, पंवार आदि, चंद व पंवार शासनकाल में उत्तराखण्ड पर विदेशी शासक गोरखाओं ने आक्रमण कर अपना अधिकार कर लिया। मूलतः गोरखा नेपाली मूल के थे जिन्हें गोरखा के नाम से भी जाना जाता था, इनकी सत्ता सैनिक शासन पर आधारित थी।

सर्वप्रथम 1790 ई0 में गोरखों ने जब कुमाऊँ पर आक्रमण कर अपना आधिपत्य स्थापित किया था तब कुमाऊँ में चंद शासकों में आपसी प्रतिबन्द्धिता के कारण फूट पड़ी हुई थी उसी का लाभ गोरखों को मिला इसी तरह की फूट गढ़ शासक पंवारों में भी थी। वहाँ भी 1790 ई0 के शीघ्र बाद गोरखों ने आक्रमण किया परन्तु चीन द्वारा नेपाल पर आक्रमण करने के कारण गोरखों ने गढ़वाल अभियान कुछ समय के लिये स्थगित कर सन्धि कर ली। परन्तु चीन से समझौता होने के बाद गोरखों ने गढ़वाल पर पुनः 1804 में आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया।

कुमाऊँ पर गोरखा अधिकार

जब हर्ष देव को नवाब अवध से सहायता नहीं मिली तो उसने 1790 ई0 में गोरखा शासक बहादुर शाह को कुमाऊँ पर आक्रमण करने हेतु आमन्त्रित किया था तब तक बहादुर शाह गोरखा राज्य की सीमा काली नदी तक विस्तारित कर चुका था अब वह स्वयं भी कुमाऊँ को गोरखा राज्य में मिलाना चाह रहा था। बहादुर शाह ने काजी जगजीत पाण्डे के मार्फत हर्षदेव जोशी को पत्र लिखा कि यदि वह कुमाऊँ पर आक्रमण के समय गोरखों की मदद करेगा तो उसे कुमाऊँ में राज्याधिकार दिये जायेगे। हर्षदेव जोशी ने गोरखा शासक को विश्वास दिलाते हुए कुमाऊँ की सभी राजनैतिक कमजोरियों से गोरखों को परिचित करवाकर स्वयं की एक सेना भी संगठित कर ली। इस अवसर पर बहादुर शाह ने पूर्व कुमाऊँ शासक मोहन चंद्र से हुई संधि को भुला दिया।

जनवरी 1790 ई0 में बहादुर शाह ने काजी जगजीत पाण्डे, अमरसिंह थापा, सुब्वा जोगनारायण मल्ल आदि के नेतृत्व में गोरखा सेना को कुमाऊँ पर अधिकार करने भेज दिया, खबर अल्मोड़ा पहुँचते ही महेन्द्र चंद गंगोली और लाल सिंह काली कुमाऊँ को सेना लेकर गोरखा सैनिकों का सामना करने निकले, गंगोली में महेन्द्र चंद ने गोरखा सेना को पराजित कर दिया था उसके बाद जब वह चाचा लालसिंह की मदद को काली कुमाऊँ की ओर निकला उससे पहले ही वह गोरखों से पराजित होकर तराई को निकल चुका था। इस सूचना से घबराकर महेन्द्र चंद भी तराई कोटा को निकल गया इस प्रकार फरवरी 1790 ई0 में हर्षदेव जोशी की मदद से गोरखों ने कुमाऊँ पर बड़ी सरलता से अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी, और चंद राजवंश सदैव के लिये सम्माप्त हो गया पिछले दशकों से निस्तर राज्याधिकारियों के स्वार्थपरक षडयन्त्रों से पिड़ित स्थानीय जनता ने स्वदेशी सत्ता की सम्माप्ति पर दुखी होने के बावजूद विदेशी सत्ता का सक्रिय विरोध भी नहीं किया था।

इस प्रकार महत्वाकांशी व स्वार्थी हर्षदेव जोशी की सहायता मिलने के कारण गोरखों को अपनी राज्य सत्ता स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं हुई इसके एवज में गोरखों ने सभी जोशी विरादरी को अपनी राज्यव्यवस्था में विभिन्न पदों पर नियुक्त किया था, इनके अतिरिक्त अन्य ब्राह्मण  समुदाय व जाति के लोगों को भी अलग-अलग जिम्मेदारियाँ सौंपी गयी। मोहनचंद का राज्य सम्माप्त कर यह अवसर हर्षदेव के लिये सुखद था। यही नहीं गोरखा उससे विभिन्न विषयों पर सलाह लेते रहते थे, साथ में हर्षदेव ने गोरखों को गढ़वाल राज्य पर भी अधिकार करने हेतु प्रोत्साहित किया था। तभी उन्होंने गढ़वाल पर भी आक्रमण किया था।

इस बीच 1791 ई0 में चीन ने नेपाल पर आक्रमण कर दिया। जिस पर नेपाल से काजी जगजीत पाण्डे के नाम पत्र आया कि गढ़वाल गढ़वाली राजा को कुमाऊँ हर्षदेव जोशी को सौंप कर वापस नेपाल आयें उस समय गढ़शासक पराक्रम शाह ने सेनापति अमर सिंह थापा को बताया कि वे कुमाऊँ हर्षदेव जोशी को न दें क्योंकि वह बहुत बड़ा धोखेबाज व्यक्ति है इस पर थापा ने जोशी को कैद कर लिया बाद में वह किसी प्रकार गोरखों के कैद से मुक्त हो पाया था।

ब्राह्मणों पर नया टैक्स

गोरखा शासन से पूर्व ब्राह्मणों से कर नहीं लिया जाता था परन्तु 1797 ई0 में जब बमशाह व रूद्रवीर शाह को कुमाऊँ की सत्ता सौंपी गई तो उन्होंने ब्राह्मण काश्तकारों पर ‘कुशही’ नामक नया भूमि कर लगाया था, यह कर प्रति ज्यूला (6 से 13 एकड़) पाँच रूपये के हिसाब से दिया जाता था कहा जाता है कि यह कर राजनीति में भाग लेने वाले या गोरखों के विरूद्ध गतिविधियों में हिस्सेदारी करने वाले ब्राहनणों को आतंकित करने के उद्देश्य से लगाया गया था, जिसे मय बकाये के वसूला जाता था जो ब्राह्मण शान्त जीवन बिताते थे उनसे यह कर नहीं लिया जाता था।

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गढ़वाल में गोरखा राज्य विस्तार

कुमाऊँ पर गोरखा आधिपत्य हो जाने के पश्चात् गढ़वाल राज्य का अस्तित्व भी संकट में था, हर्षदेव जोशी गोरखा सैन्य अधिकारियों को गढ़वाल पर आधिकार हेतु प्रोत्साहित ही नहीं बल्कि हर तरह की मदद भी कर रहा था परन्तु हर्षदेव की तरह गढ़वाल में कोई ऐसा नहीं था जो अपने राजा से असन्तुष्ट था न ही अवसरवादी था। इसलिये कुमाऊँ की अपेक्षा गढ़वाल में गोरखा सैनिकों को विरोध की संभावना अधिक थी इसलिये गोरखों को गढ़ राज्य पर आक्रमण हेतु विशेष तैयारियां करनी पड़ी इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए गढ़ शासक प्रघुम्न शाह ने गढ़वाल की सीमाओं में स्थित गढ़ों (किले) में सेना को सतर्क कर दिया था।

गोरखों द्वारा गढ़वाल पर आक्रमण एवं सन्धि

गढ़वाल शासक प्रघुम्न शाह व उसकी सेना की तैयारी व प्रतिरोध को देखते हुए गोरखा सैन्य अधिकारियों ने अपनी सेना को विभिन्न टुकड़ियों में बाँटकर अनेक रास्तों से गढ़वाल पर आक्रमण किया। गोरखाली सरदार गंगाराम ने अल्मोड़ा द्वाराहाट के रास्ते चाँदपुर गढ़ों की ओर से आक्रमण किया जिसका सामना लोहाबगढ़ी की गढ़ सेना ने आगे बढ़कर वेणीताल में किया था जहाँ गढ़वाली सेना ने गोरखा सेना को पराजित किया तथा सरदार गंगाराम मारा गया और गोरखा सैनिक कुमाऊँ की ओर भाग आई थी।

गोरखा सैनिकों की एक अन्य टुकड़ी ने कोटद्वार के रास्ते लंगूरगढ़ व कौड़िया पट्टी पर आक्रमण किया जहाँ गढ़सेना ने गोरखा सेना को पराजित किया था माना जाता है कि यह युद्ध लगभग एक साल तक चला था इस बीच गोरखा सैनिकों ने लंगूरगढ़ के पास ही डेरा डाल लिया और पड़ोस के गाँवों में लूटमार मचानी शुरू कर दी। सलांण पट्टी में गोरखों ने इतना आतंक मचाया कि लोग घर छोड़ जानवरों को लेकर जंगलों को भाग निकले थे जो लोग गोरखों के हाथ पड़े उन्हें गोरखों ने अपना दास दासी बना लिया था या रोहिलों के हाथों बेच दिया था इस तरह पूरी सलांण पट्टी वीरान हो गई थी।

परन्तु गोरखा सैनिक लगूरगढ़ से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे इसी मध्य 1792 में चीन ने नेपाल पर आक्रमण कर दिया जिस कारण गोरखा सैनिकों को अतिरिक्त सहायता मिलने के स्थान पर काठमांडू से उन्हें सन्देश आया कि वह शीघ्र नेपाल वापस आ जाय क्यों की गोरखा शासक बहादुर शाह दो जगह गढ़वाल व चीन से युद्ध करने की स्थिति में नहीं था इस बीच किसी तरह लंगूरगढ़ से असफल होकर लौटना गोरखों के आत्म सम्मान के विरूद्ध था। किसी तरह कप्तान कालू पाण्डे और अमर सिंह थापा ने साहस जुटाया और कुछ सैनिकों को लेकर श्रीनगर पहुँच गये यह सूचना पाकर गढ़शासक प्रघूम्न शाह परिवार सहित श्रीनगर छोड़कर राणीहाट चला गया और धरणीधर खण्डूरी सन्धि हेतु गोरखा शिविर में भेजा गया जहाँ गढ़शासक द्वारा नेपाल सरकार को तीन सहस्त्र रूपया प्रतिवर्ष कर दिये जाने की शर्त पर सन्धि हुई यद्यपि इस धनराशि में मतभेद भी है साथ ही गोरखों द्वारा बन्दी गढ़वाली जनता को गोरखा दासता से मुक्ति पर भी सहमति हुई थी परन्तु रोहिलों के हाथ बेचे गये लोगों को छुड़ाना असम्भव था। अतः उक्त सन्धि के पश्चात् गोरखा सैन्य अधिकारी वापस नेपाल चले गये थे।

खुश्बुड़ा युद्ध व गढ़वाल पर अधिकार

गढ़राज्य मानवीय व प्राकृतिक आपदाओं से ग्रस्त था उन परिस्थितियों का गोरखों ने पूर्णलाभ उठाया, सितम्बर 1803 में अमर सिंह थापा, हस्तिदल चौतरिया आदि सैनिकों सहित श्रीनगर पहुँच गये, उससे पहले ही प्रघुम्न व पराक्रम शाह देहरादून पहुँच चुके थे यह खबर गोरखों को मिलते ही उन्होंने भी दून की ओर प्रस्थान किया, मार्ग में गढ़प्रजा पर तरह-तरह के अत्याचार किये अक्टूबर 1803 ई0 में गोरखों ने दून पर भी अधिकार कर लिया, उसी समय कम्पनी सरकार ने सहारनपुर पर अधिकार कर लिया था। दून पर गोरखा अधिकार की खबर पाते ही प्रघुम्न शाह ने कनखल में शरण ली थी।

अर्थात इस बीच अमर सिंह थापा व अन्य सैन्य अधिकारी श्रीनगर अपनी राज्य व्यवस्था स्थापित नहीं कर पाये थे की सूचना आई दून में प्रघुम्न शाह सेना लेकर पहुँच गया है। प्रघुम्न ने अपने परिवार को कनखल में छोड़कर सहारनपुर से किसी तरह धन एकत्रित कर व लंढौर के गुजर सरदार राम दयाल सिंह की सहायता से सेना एकत्रित कर दून के कुछ भाग पर अधिकार कर लिया तभी श्रीनगर से अमर सिंह थापा, भक्तिवीर थापा व रणजीत कुवर के नेतृत्व में गोरखा सेना दून पहुँच गई जनवरी 1804 ई0 को खुड़बड़ा के मैदान में भीषण युद्ध हुआ जिस युद्ध में प्रघुम्न शाह के साथ भाई पराक्रम शाह प्रीतम शाह तथा तीनों पुत्र सुदर्शन शाह व देवी सिंह भी थे, युद्ध स्थल में अचानक रणजीत कुवर की गोली से प्रघुम्नशाह वीरगति को प्राप्त हो गया। फलतः पराक्रमशाह नालागढ़ को व सुदर्शनशाह, देवासिंह कनखल पहुँच गये। इस प्रकार प्रघुम्न शाह की मृत्यु के साथ सम्पूर्ण गढ़वाल पर स्वदेशी सत्ता के स्थान पर गोरखा सत्ता स्थापित हो गई। यह खबर सुनते ही दून सहित पूरे गढ़वाल क्षेत्र में खलबली व आतंक फैल गया लोग घरों को छोड़कर जंगलों की ओर भाग निकले।

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उक्त विजय के पश्चात् गोरखों ने सामान्य जन, मौलाराम, सकलानियों, खण्डूरियों आदि गढ़ राज्याधिकारियों को विश्वास में लेकर तथा उन्हें जागीरें देकर अपने पक्ष में कर श्रीनगर में अपनी राज्य सत्ता स्थापित की थी। अर्थात् अब सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में गोरखा साम्राज्य स्थापित हो गया। और उत्तराखण्ड की विवश जनता को विदेशी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी।

गढ़वाल व्यवस्था

गोरखा शासनकाल में (हस्तिदत्त चौतरिया) गढ़वाल पूर्ववत तीन तहसीलों व 84 पट्टियों में विभाजित रहा उसके अधीनस्थ प्रमुखों में अष्टदत्त थापा, काजी रण बहादुर और परशुराम थापा थे, गढ़वाल में जो व्यक्ति निर्धारित राजस्व राशि या अपराध राशि चुकाने में असमर्थ होता था उन्हें हरिद्वार हर की पौड़ी में भीमगोड़ा के पास दास-दासी के रूप में बेच दिया जाता था जिनकी आयु लगभग तीन वर्ष से तीस वर्ष तक होती थी तब वहाँ पंजाबी ऊँट 75 रूपये सामान्य घोड़ा 250-300 रूपयों में बिकते थे परन्तु अभागे गढ़वाली स्त्री, पुरूष, बच्चे 10 रूपये से 150 रूपये तक में बिकते थे बहुत से गढ़वाली महिला व बच्चों को गोरखा सैनिक रखैल या दास के रूप में भी अपने पास रखते थे जो उनका सामान ढोने का काम भी करते थे।

गोरखा शासन प्रबन्ध

ऊपर आपने पढ़ा कि गोरखों ने कैसे कुमाऊँ और गढ़वाल सहित सम्पूर्ण उत्तराखण्ड पर अपनी राजसत्ता स्थापित की जिसे सैनिक शासन के नाम से जाना जाता है। गोरखों के आगमन से पूर्व कुमाऊँ गढ़वाल एक स्वतन्त्र राज्य थे जहाँ राजा के नेतृत्व में मंत्री मंडल स्थापित होता था जैसे – दीवान, दफ्तरी वजीर, फौजदार व राजगरू आदि जो सामहिक रूप से राजा को सलाह मशवरा देते रहते थे बहुत सारे महत्वपूर्ण मामलों में राजा बिना मंत्री मंडल की स्वीकृति के निर्णय नहीं ले सकता था, भाषा बोली, समाज, धर्म आदि परम्पराओं में एकता व अपनत्व था यह सब गोरखा शासनकाल में सम्माप्त हो गया तथा उत्तराखण्ड एक विजित प्रदेश मात्र रहा गया, अब उत्तराखण्ड का शासन प्रशासन नेपाल से संचालित हो रहा था। कुमाऊँ गढ़वाल के जिन व्यक्तियों को अनुभव के आधार पर कुछ पदों पर बैठाया भी था वो सभी उनके कृपापात्र थे। क्योंकि उच्च पदों पर गोरखों की ही नियुक्ति होती थी।

शासन व्यवस्था

गोरखों ने अपनी शासन व्यवस्था चलाने हेतु योग्यता को मानक नहीं रखा बल्कि राज्य में जितने भी महत्वपूर्ण पद थे उन पर सिर्फ गोरखों को ही नियुक्त किया गया। सभ्रान्त परिवारों का उत्पीड़न हुआ, उनकी जागीरें सम्माप्त कर दी गई, दीवान, वजीर, राजगुरू आदि पद सम्माप्त कर सिर्फ दफ्तरी का पद रखा गया फौजदारी, या न्यायालय स्थापित रखे, कमींण व संयाणे नियुक्त किये गये जिनका मुख्य कार्य राजस्व वसूली कर राजकोष में जमा करना था। एक तरह से ये लोग गोरखा राज्य के आर्थिक ढाँचे के आधार स्तम्भ थे जो ब्रिटिश शासनकाल में भी बने रहे, यह लोग राजस्व वसूली के साथ निश्चित अंश अपने पास भी रखते थे, कमीणं व सयांणों को अपने निर्वाह हेतु कुछ भूमि भी दी जाती थी जो राजस्व मुक्त होती थी।

सैनिक, कमींण, सयांणे व ग्राम प्रधान आदि सभी का भार ग्रामीण कृषकों पर ही था इस लूटखसोट तथा निरन्तर उत्पीड़न से परेशान होकार कृषक वर्ग अपने-अपने गाँव छोड़कर दूसरी जगह बस जाते थे या मैदानी क्षेत्रों में बस जाते थे प्रवास में जाने की यह प्रक्रिया पूरे गोरखा शासन काल में बनी रही।

गोरखों ने कुमाऊँ में पहला वन्दोवस्त 1791-92 ई0 में किया था जो मुख्यतः मालगुजारी के सम्बन्ध में था जिसमें प्रत्येक 20 नाली जमीन पर एक रूपया टैक्स, प्रत्येक वयस्क पुरूष से भी एक रूपया टैक्स माँगा या (Pall Tax) लिया जाता था, ‘घुरही पिछही’ नाम से टैक्स सालाना प्रत्येक परिवार से 2 रूपया टैक्स लिया जाता था, इसी तरह गढ़वाल में 1804 ई0 में वन्दोवस्त किया गया प्रारम्भ में पूर्व से चली आई भूव्यवस्था के आधार पर प्राप्त राजस्व ही बरकरार रखा गया, आगे अनेक गाँवों को भी जोड़कर वहाँ सैनिक ठिकाने स्थापित किये गये। प्रत्येक क्षेत्र में सैन्य अधिकारी नियुक्त किये गये जो वहाँ राजस्व वसूली कर अपने वेतन आदि की व्यवस्था करते थे, भू-राजस्व निश्चित करते समय भू उत्पादकता का ध्यान न रखकर सैन्य वेतन निश्चित किया गया। गढ़वाल में दूसरी भूव्यवस्था 1811-1812 ई0 में की गई इसमें कुछ हद तक भू–उत्पादन ध्यान में रखा तथा प्रत्येक गर्खा (क्षेत्र) का सीमा निर्धारण किया गया था।

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मंदिरों के रख रखाव व पूजा हेतु स्थानीय शासकों ने गुँठ व्यवस्था बनाई हुई थी उसमें गोरखों ने हस्तक्षेप नहीं किया, जिसके अन्तर्गत कुछ ग्रामों की भूमि मंदिरों को अर्पित की जाती थी आदि इसके अतिरिक्त गोरखों ने खनिज सम्पदा का भी पूरा दोहन किया, कलाकारों तथा कुटीर उद्योगों की अवहेलना की गई, शिक्षा, चिकित्सा की ओर ध्यान नहीं दिया गया, छुटपुट मंदिर व धर्मशालाओं का निर्माण करवाया गया।

न्याय व्यवस्था

गोरखों की कोई निश्चित न्याय व्यवस्था नहीं थी हर अधिकारी अपने पदानुसार फैसला ले लिया करते थे फिर भी गढ़वाल में उन्होंने तीन तहसील श्रीनगर, लगूर और चाँदपुर में तीन न्यायालय स्थापित किये थे। जिनमें न्यायाधीसों की मदद को कारदार, जमादार व अमलदार तीन सैन्य अधिकारी होते थे। कुमाऊँ में दीवानी व फौजदारी के छोटे मामले फौजी अधिकारी देखते थे बड़े मामले दैशिक शासक फौजी अधिकारियों की मदद से करते थे इनकी अनुपस्थिति पर ‘विचारी’ सुनवाई करते थे। वादी प्रतिवादी के मौखिक बयान होते थे ‘हरिवंश’ उठाने को कहा जाता था, प्रत्यक्षदर्शी साक्षी न होना या सरहद का मामला आदि में अग्नि परीक्षा होती थी जिसे दिव्य कहते थे जिसके अलग-अलग तरीके थे –

  • गोलादीप (दिव्य) गरम लोहे की छड़ हाथ में रखकर कुछ दूर चलना।
  • तराजू दीप (दिव्य) पत्थरों से तोलना अर्थात संभावित अपराधियों को एक दिन पत्थरों से तोलकर सुरक्षित स्थान पर रखकर दूसरे दिन फिर तोला जाता था भारी होने पर निर्दोष व हल्का होने पर दोषी माना जाता था।
  • कढ़ाई दीप गरम तेल में हाथ डालकर न जलने पर निर्दोष माना जाता था ।

ऐसे ही और अन्य न्याय के तरीके थे –
जैसे- तीर का दीप, नहीं तैरना आने वालों को पानी के कुंड में डुबोना, जहर देना, धन के मुकदमे में रूपये, जमीन के मुकदमें में उस जमीन का मिट्टी मंदिर में रखी जाती थी यदि छह महिने के अन्दर सम्बन्धित परिवार में मृत्यु होने पर दैवी प्रकोप समझकर सम्बन्धित व्यक्ति को दण्डित किया जाता था। मृत्यु दंड के अतिरिक्त गोरखों द्वारा अंग-भंग की सजा भी दी जाती थी। डबराल के अनुसार गोरखों ने लौह दण्ड से कठोर शासन किया था। विभिन्न व्यक्तियों से विभिन्न प्रकार का व्यवहार उनकी मनमर्जी पर निर्भर था, जो रिश्वत, खुशामद, चुगली तथा स्वार्थ से प्रभावित होते रहती थी अर्थात गोरखों की न्याय एवं दण्ड व्यवस्था को अमानवीय कहा जा सकता है।

कर प्रणाली

गोरखों ने अपने शासन प्रबन्ध एवं सैन्य व्यवस्था को चलाने हेतु तथा अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक कर निर्धारित किये थे जिनकी वसूली कमींण, सयांणे व गोरखा सैन्य अधिकारी कठोरता के साथ करते थे। करों में किसी प्रकार की छूट किसी भी दशा में नहीं दी जाती थी जिनमें मुख्य कर निम्न थे –

  1. पुगांड़ी या पुगंड़ी (भूमिकर) – जिसे पहले से चली आ रही कर व्यवस्थ को काफी गुना बढ़ा दिया था सबसे अधिक आमदनी इसी कर से थी।
  2. सलामी – इसे नजराना के रूप में लिया जाता था जो मुख्यतः अधिकारियों को नजराना या भेंट के रूप में दिया जाता था।
  3. मौकर – यह कर कुमाऊँ में घरही पिछही’ (प्रत्येक घर से कर) तथा गढ़वाल में मौकर (प्रत्येक मवासे पर) के नाम से विदित था प्रायः एक मक्कान में एक ही मौ (परिवार) रहता था। बदरी दत्त पाण्डे के अनुसार मौकर सिर्फ आवश्यकता पढ़ने पर ही लिया जाता था।
  4. घीकर – यह कर दुधारू पशुओं के नाम से लिया जाता था, दूध देने वाले पशुओं की संख्या प्रतिवर्ष घटते बढ़ते रहती थी 1805 ई0 में निर्धारित कर राशि 1851 ई0 तक बनी रही।
  5. मिझारी – यह कर चर्मकार व शिल्पकारों के विभिन्न शिल्पों (कुटीर उद्योग) पर लगाया कर था जो उनके शिल्पों की उन्नति में बाधक था।
  6. टाडंकर – यह शिल्प आय पर लगाया गया दूसरा कर था। यह कर केवल कोलियों से | ही नहीं हर प्रकार के वस्त्र बुनने वालों से भी लिया जाता था।
  7. सोन्याफागुन – यह कर गोरखा शासकों द्वारा मनाये जाने वाले उत्सवों के व्यय पूर्ति हेतु लिया जाता था साथ में इन उत्सवों हेतु भैंस व बकरे भी देने होते थे।

Source – 

  • पाण्डे, बदरी दत्त :- कुमाऊँ का इतिहास, अल्मोड़ा बुक डिपो; अल्मोड़ा, 1990
  • डबराल, शिव प्रसाद :- गोरख्याणी : वीरगाथा प्रकाशन दोगडा; 2056 वि.
  • कटोच, यशवंत सिंह :- उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास, बिनसर पब्लेिशन, देहरादून, 2010
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