गढ़वाल पेंटिंग स्कूल (Garhwal Painting School)

गढ़वाल क्षेत्र शुरू से ही पर्यटकों, साहसिक व्यक्तियों, दर्शनशास्त्रियों एवं प्रकृति प्रेमियों के लिए एक सुरक्षित स्वर्ग के रूप में जाना जाता रहा है। 17वीं सदी के मध्य में एक मुगल राजकुमार सुलेमान शिकोह ने गढ़वाल में शरण ली थी। राजकुमार अपने साथ एक कलाकार एवं उसके पुत्र को लाया जो कि उसके दरबारी पेन्टर थे एवं मुगल शैली की पेंटिंग में कुशल थे।

उन्नीस माह बाद राजकुमार ने गढ़वाल को छोड दिया परन्तु उसके दरबारी पेन्टर जो यहाँ के मनोहर वातावरण से मन्त्रमुग्ध हो गये थे वे यहीं पर रुक गये। ये पेन्टर श्रीनगर (गढ़वाल) में स्थापित हो गया जो पंवार राज्य की तत्कालीन राजधानी थी एवं गढ़वाल में मुगल शैली की पेन्टिंग को प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे समय के साथ इन मूल पेन्टरों के उत्तराधिकारी विशिष्ट पेन्टर बन गये तथा उन्होने अपने प्रकार की नवीन मुल पद्धति को विकसित किया।

यह शैली बाद में गढ़वाल पेन्टिंग स्कूल के रुप में प्रसिद्ध हुआ। लगभग एक शताब्दी बाद एक प्रसिद्ध चित्रकार मोला राम ने पेन्टिंग की कुछ अन्य पद्धतिय को विकसित किया। वे गढ़वाल स्कूल के एक महान चित्रकार होने के साथ-साथ अपने समय के एक महानतम कवि भी थे। मोला राम की चित्रों में हमे कुछ सुन्दर कविताएं प्राप्त होती हैं।

यद्यपि इन चित्रों में अन्य पहाडी स्कूलों का प्रभाव निश्चित रुप में दिखाई पडता है तथापि इन चित्रों में गढ़वाल स्कूल की सम्पूर्ण मूलता को बनाए रखा गया है। गढ़वाल स्कूल की प्रमुख विशिष्टताओं में पूर्ण विकसित वक्षस्थलों, बारीक कटि-विस्तार, अण्डाकार मासूम चेहरा, संवेदनशील भी है एवं पतली सुन्दर नासिका से परिपूर्ण एक सौन्दर्यपूर्ण महिला की पेन्टिंग सम्मिलित है।

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राजा प्रद्युम्न शाह (1797 – 1804) द्वारा कांगडा की एक गुलर राजकुमारी के साथ किये गये विवाह ने अनेकों गुलर कलाकारों को गढ़वाल में आकर बसने पर प्रेरित किया। इस तकनीक ने गढ़वाल की पेन्टिंग शैली को अत्यधिक प्रभावित किया।

आदर्श सौन्दर्य की वैचारिकता, धर्म एवं प्रेम लीला में विलयकरण, कला एवं मनोभाव के सम्मिश्रण सहित गढ़वाल की चित्र प्रेम के प्रति भारतीय मनोवृत्ति के साकार स्वरुप को दर्शाती है। विशिष्ट शोधकर्ताओं एवं एतिहासिक कलाकारों द्वारा किये गये कुछ कठिन शोध कार्यों के कारण इस अवधि के कुछ चित्रकार के नाम प्रसिद्ध हैं।

चित्रकार के पारिवारिक वृक्ष में श्याम दास, हर दास के नाम सर्वप्रथम लिये जाते हैं जो राजकुमार सुलेमान के साथ गढ़वाल आने वाले प्रथम व्यक्ति थे। इस कला विद्यालय के कुछ महान शिक्षकों में हीरालाल, मंगतराम, भोलाराम, ज्वालाराम, तेजराम, ब्रजनाथ प्रमुख हैं।

रामायण (1780) का चित्रण, ब्रहमा जी के जन्म दिवस (1780) का आयोजन, शिव एवं पार्वती रागिनी, उत्कट नायिका, अभिसारिका नायिका, कृष्ण पेन्टिंग, राधा के चरण, दर्पण देखती हुई राधा, कालिया दमन, गीता गोविन्दा चित्रण पुरातत्वीय अन्वेषणों से प्राप्त अनेकों प्रतिमाओं सहित वृहत्त मात्रा में इन पेन्टिंगों को श्रीनगर (गढ़वाल) में विश्वविद्यालय संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।

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