बिहार के भौगोलिक भागो का वर्गीकरण

संरचना एवं उच्चावच की भिन्नता के आधार पर बिहार को तीन प्रमुख भौतिक विभाग शिवालिक पर्वतीय प्रदेश, गंगा का मैदान एवं छोटानागपुर सीमांत पठारी प्रदेश में विभक्त किया गया है। प्राकृतिक विविधता, उच्चावच में असमानता, भूमि की विषमता, मिट्टी एवं वनस्पति की विविधता बिहार के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन का आधार है। किसी विस्तृत क्षेत्र की संपूर्ण जानकारी को समरूपता के आधार पर प्राप्त कर भौगोलिक प्रदेश का निर्धारण किया। जाता है। इस दिशा में अनेक विद्वानों ने बिहार को अनेक भौगोलिक प्रदेशों में बाँटने का प्रयास किया है। भौगोलिक प्रदेश वह प्रदेश होता है, जहाँ जलवायु, मिट्टी, वनस्पति, भूमि उपयोग प्रतिरूप, शस्य प्रारूप, अधिवास के प्रकार आदि भौतिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक तत्त्वों में एकरूपता पाई जाती है। प्राकृतिक एवं सामाजिकसांस्कृतिक तत्त्वों की समानता के आधार पर प्रो. इनायत अहमद एवं प्रो. राम प्रवेश सिंह ने बिहार को 10 भौगोलिक प्रदेश में बाँटा है –

  1. तराई प्रदेश,
  2. घाघरा-गंडक दोआब,
  3. गंडक-कोसी दोआब,
  4. कोसी-महानंदा दोआब,
  5. कर्मनाशा-सोन दोआब,
  6. सोन-किऊल दोआब,
  7. पूरब-मध्य बिहार का मैदान,
  8. गंगा दियारा क्षेत्र,
  9. कैमूर पठार,
  10. अभ्रक प्रदेश।

तराई प्रदेश

यह प्रदेश गंगा के उत्तरी मैदान में उत्तरी-पश्चिमी एवं उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित है। उत्तर-पश्चिम में शिवालिक की सोमेश्वर श्रेणी और रामनगर दून की पहाड़ियों पर 140 सेंटीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा के कारण भूमि कृषि योग्य नहीं है। परंपरागत तरीकों के साथ-साथ नई तकनीक के द्वारा कृषि की जाती है। उत्तरी-पूर्वी तराई प्रदेश पूर्णिया, अररिया और किशनगंज में है। यह प्रदेश बिहार में सबसे अधिक वर्षावाला क्षेत्र है। यहाँ 200 सेंटीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है। कृषि के लिए यहाँ अच्छी भूमि है, जिसमें धान, जूट एवं गन्ने की अच्छी पैदावार होती है। अधिक वर्षा के कारण यह प्रदेश दलदली एवं घने जंगल का क्षेत्र है। इस प्रदेश में ऊबड़-खाबड़ भूमि के कारण प्रकीर्ण बस्तियाँ अधिक पाई जाती हैं।

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घाघरा-गंडक दोआब

यह प्रदेश 120 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षावाला मैदानी क्षेत्र है। सारण, सीवान और गोपालगंज जिले में विस्तृत यह प्रदेश चौरस जलोढ़ मैदान है। यहाँ धान, मक्का, गेहूँ, गन्ना, तिलहन और दलहन आदि फसलों का उत्पादन होता है। कृषि की दृष्टि से समृद्ध इस प्रदेश में कृषि से जुड़े उद्योग भी हैं। गन्ने का उत्पादन अधिक होने से इस प्रदेश में चीनी उद्योग का अधिक विकास हुआ है। चीनी उद्योग का प्रमुख केंद्र गोपालगंज, छपरा, सीवान, मीरगंज, महरौरा आदि हैं।

गंडक-कोसी दोआब

इस प्रदेश में पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, बेगूसराय आदि जिले हैं। इस प्रदेश में उद्योगों की अधिकता है। चीनी उद्योग और फल प्रसंस्करण उद्योग यहाँ के प्रमुख उद्योग हैं। दरभंगा-आम, मुजफ्फरपुर – लीची और हाजीपुर-केला की बागबानी के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रदेश की मुख्य फसल धान, मक्का, गन्ना, गेहूँ, जौ, दलहन, तिलहन आदि हैं। गन्ना, तंबाकू और लाल मिर्च यहाँ की प्रमुख नगदी फसल हैं। चीनी उद्योग के केंद्र चनपटिया, सुगौली, समस्तीपुर, मोतिहारी, बगहा आदि हैं। बरौनी इस प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध औद्योगिक नगर है। यहाँ उर्वरक कारखाना, तेलशोधक कारखाना और ताप विद्युत केंद्र स्थित है। बरौनी एवं मुजफ्फरपुर में दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है।

कोसी-महानंदा दोआब

इस प्रदेश में पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, खगड़िया और सहरसा जिले आते हैं। यह प्रदेश बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण कृषि, उद्योग और परिवहन आदि की दृष्टि से पिछड़ा क्षेत्र है। यहाँ अत्यधिक वर्षा होती है, जिससे कोसी और उसकी सहायक नदियाँ प्रतिवर्ष बाढ़ की विभीषिका लाती हैं। यद्यपि यहाँ कृषि की जाती है, लेकिन बाढ़ की संभावना के कारण खेती का भविष्य निश्चित नहीं होता। सरकार ने कोसी परियोजना द्वारा बाढ़ की स्थिति को नियंत्रित कराने के प्रयास किए हैं।

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कर्मनाशा-सोन दोआब

इस प्रदेश में भोजपुर, रोहतास, कैमूर और बक्सर जिले आते हैं। यह जलवायविक दृष्टि से कम वर्षावाला क्षेत्र है, लेकिन सोन नदी पर बैराज बनाकर व्यवस्थित नहर प्रणाली का विकास किया गया है। इस प्रदेश में नहरों द्वारा सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है। यहाँ अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या है, जो कृषि पर आधारित है। धान यहाँ की प्रमुख फसल है। अन्य फसलों में गेहूँ, दलहन, तिलहन तथा आलू प्रमुख हैं। इस प्रदेश में कृषि-आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएँ है। इस प्रदेश में सर्वाधिक विकास चावल मिल का हुआ है।

सोन-किऊल दोआब

दक्षिण बिहार के मैदान में स्थित यह दोआब प्रदेश निम्न वर्षा का क्षेत्र है, जहाँ अक्सर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। पटना, जहानाबाद, गया, नालंदा, औरंगाबाद, अरवल, लखीसराय और नवादा जिले इस प्रदेश में आते हैं। अरवल और औरंगाबाद में पूर्वी सोन नहर प्रणाली के द्वारा सिंचाई की व्यवस्था है। धान, गेहूँ, चना, मसूर, खेसारी आदि यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। इस प्रदेश में बिहारशरीफ और ओबरा में रेशमी वस्त्र उद्योग, गया के मानपुर में हथकरघा उद्योग और गलीचा उद्योग का विकास हुआ है। औरंगाबाद में सीमेंट उद्योग एवं खाद्य तेल उद्योग स्थापित किया गया है।

पूरब-मध्य बिहार का मैदान

इस प्रदेश में मुंगेर, बाँका और भागलपुर जिले आते हैं। इनमें से कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। कृषि और उद्योग के मामले में यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। धान, तिलहन और दलहन यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। इस प्रदेश में सिंचाई की समुचित सुविधा उपलब्ध नहीं है। चंदन, किऊल एवं बरुआ नदी पर जलाशय का निर्माण कर सिंचाई सुविधा का विकास किया गया है। मुंगेर में बंदूक, तंबाकू एवं दुग्ध उद्योग तथा भागलपुर में सिल्क उद्योग का विकास हुआ है।

गंगा दियारा क्षेत्र

यह क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ से प्रभावित रहता है और बाढ़ के बाद जो भूमि दिखाई देती है, उसे दियारा क्षेत्र कहते हैं। यह नवीन जलोढ़ का क्षेत्र है। यहाँ पर कृषक अस्थायी अधिवासों (प्रकीर्ण बस्तियों) के सहारे खेती करते हैं। घासफूस और बॉस से बने घर बाढ़ के आने से पहले ही हटा लिये जाते हैं। रबी फसल और सब्जियों की उपज के लिए यह क्षेत्र प्रसिद्ध है। प्रत्येक वर्ष बाढ़ में नए दियारा क्षेत्र का निर्माण होता है।

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कैमूर पठार

इसका विस्तार दक्षिण-पश्चिम बिहार के कैमूर और रोहतास जिले में है। यह पठार विंध्य पर्वत का अंग है। यह पठारी क्षेत्र लगभग 350 मीटर ऊँचा है। इसका क्षेत्रफल 1200 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ की मुख्य फसल धान, गेहूँ, जौ आदि हैं। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहाँ पत्थर-आधारित उद्योग विकसित हुए हैं। कैमूर पठार में पायराइट्स एवं फॉस्फेट पाया जाता है। पायराइट्स आधारित गंधक उद्योग अमझोर में तथा चूना पत्थर-आधारित सीमेंट उद्योग बंजारी में स्थापित है।

अभ्रक प्रदेश

यह मुख्य रूप से झारखंड के कोडरमा जिले की अभ्रक पट्टी है, जिसका विस्तार बिहार के पठारी प्रदेशों झाझा, जमुई, गया और नवादा के क्षेत्रों तक मिलता है। यहाँ अभ्रक बलथर मिट्टी में मिश्रित रूप में मिलता है। लकड़ी, तसर (सिल्क) और लाह का उत्पादन इस क्षेत्र में होता है। कृषि में धान, दलहन और तिलहन का उत्पादन होता है।

इस प्रकार बिहार के समस्त धरातलीय रूप को उपर्युक्त दस भागों में बाँटा गया है। समरूपता के आधार पर कुछ क्षेत्र समृद्ध और विकसित हैं तो कुछ क्षेत्र अति पिछड़े हैं। भूमि की भिन्नता से ऐसा होना स्वभाविक है, लेकिन मानव श्रम और तकनीकी से इस अंतर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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