आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त) की जीवनी

आचार्य चाणक्य (Acharya Chanakya) का वास्तविक नाम विष्णुगुप्त (Vishnugupta) था, किन्तु इतिहास में वह चाणक्य (Chanakya) नाम से ही प्रसिद्ध हैं। वह आज से कोई 2300 वर्ष पूर्व मगध प्रान्त में पैदा हुए थे। उस समय मगध भारत का एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली राज्य था। उसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। यह पाटलिपुत्र ही आजकल पटना कहा जाता है, जो इन दिनों बिहार प्रदेश की राजधानी है। 

उस समय मगध में महाराज नन्द का राज्य था। चन्द्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya) इन्हीं महाराज नन्द का पुत्र था, किन्तु नन्द की मृत्यु हो जाने पर राज्य के कुचक्रों के कारण परिस्थितिवश चन्द्रगुप्त को अपनी माता के साथ निर्वासित जीवन बिताना पड़ रहा था।

असाधारण राजनीतिज्ञ 

कूटनीतिज्ञ के रूप में आचार्य चाणक्य का स्थान भारतीय राजनीति में सर्वोपरि आता है। एक साधारण युवक-चन्द्रगुप्त को मगध-साम्राज्य का अधिपति बना देना साधारण बात नहीं थी। यह असम्भव सा कार्य आचार्य चाणक्य ने ही अपने जीवन में करके दिखा दिया था। उन्होंने युवक चन्द्रगुप्त को ‘मगध-सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य बना दिया था। चाणक्य का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह था कि उन्होंने राजनीति को ऐसा रूप दिया कि वह एक शास्त्र बन गयी और स्वयं चाणक्य का नाम राजनीति का पर्याय बन गया। आचार्य चाणक्य भारतीय राजनीति के जन्मदाता माने जाते हैं। इस महान् कूटनीतिज्ञ का पूरा जीवन-परिचय अन्धकार में है। वह कौन थे? क्या थे? इतिहास में इसका पता नहीं है।

मगध का राज्य चन्द्रगुप्त को 

चाणक्य ने जो बात कह दी थी, उसे पूरी करने में वह जी-जान से जुट गया। रात होने पर वह शकटार से मिला। दोनों ने मिल कर सलाह की। उन्होंने चन्द्रगुप्त को अपने साथ मिला लिया। 

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चन्द्रगुप्त और चाणक्य पाटलिपुत्र से बाहर चले गये। फिर वे दोनों राजा पर्वतेश्वर से जाकर मिले और उसे मगध का आधा राज्य देने का लालच दिया। पर्वतेश्वर भी शक्तिशाली राजा था। वह आधे राज्य के लालच में आ गया। फिर चाणक्य अपनी कूटनीतिक चालों से धीरे-धीरे अपनी लक्ष्य-पूर्ति की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ते गये और एक दिन उन्होंने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त को मगध राज्य का अधीश्वर बना दिया।

राक्षस को मंत्रिपद 

मगध में अभी भी कुछ लोग महाराज चन्द्रगुप्त का विरोध कर रहे थे। उनमें प्रमुख पूर्व अमात्य राक्षस था। चाणक्य ने मन में विचार किया कि यदि राक्षस महाराज चन्द्रगुप्त का मंत्री बन जाय, तो सब विरोध समाप्त हो जायगा।

चाणक्य ने अमात्य राक्षस के मित्र सेठ चन्दन दास को पकड़वाया। उस पर यह अभियोग लगाया कि उसने अमात्य राक्षस के परिवार को अपने यहाँ छिपाकर रख छोड़ा है। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि वह अमात्य राक्षस की सहायता और महाराज चन्द्रगुप्त का विरोध करता है। इन अपराधों के कारण सेठ चन्दन दास के वध की आज्ञा दे दी गयी।

जब अमात्य राक्षस को यह ज्ञात हुआ कि उसके कारण उसके मित्र सेठ चन्दन दास के प्राण लिए जायेंगे, तो वह बहुत घबराया। वह सच्चा मित्र था।

अमात्य राक्षस अन्त में मित्र के प्राण बचाने के उद्देश्य से चाणक्य के पास पहुंचा। चाणक्य ने कहा- ‘चन्दन दास को छुड़ाने का एक ही उपाय है कि तुम स्वामिभक्ति की शपथ लेकर महाराज चन्द्रगुप्त के मन्त्री बन जाओ।’

अमात्य राक्षस मंत्री नहीं बनना चाहता था। पर चाणक्य के समझाने से मान गया। विवश होकर उसे महाराज चन्द्रगुप्त का मंत्री बनना पड़ा और स्वामिभक्ति की शपथ लेनी पड़ी। इस प्रकार आचार्य चाणक्य ने महाराज चन्द्रगुप्त को सम्राट बना कर अमात्य राक्षस को उसका मंत्री बना दिया।

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आचार्य चाणक्य ने मंत्री का काम छोड़ दिया। पर देश की सारी राजनीति पर उसकी तीव्र निगाह बराबर बनी रहती थी। वह स्वंय विद्यार्थियों को अर्थशास्त्र और राजनीति पढ़ाया करते थे। अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर उन्होंने ‘कौटलीय अर्थशास्त्र’ लिखा। यह अर्थशास्त्र की बहुत उत्तम पुस्तक है।

सम्राट चन्द्रगुप्त और उसके मन्त्री आचार्य चाणक्य का गुरु के समान आदर करते थे। उस जमाने में सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य के समान उतना बड़ा साम्राज्य और किसी राजा का नहीं था।

परिश्रमी और दृढ़ निश्चयी 

आत्म-विश्वास, दूर दृष्टि, दृढ़ निश्चय और कठोर परिश्रम ही जीवन में ऊँचा उठने की सीढ़ी है। ये ही सद्गुण मनुष्य को उन्नति के एवरेस्ट पर पहुँचा सकते हैं। आचार्य चाणक्य के अन्दर आत्म-विश्वास, दृढ़ निश्चय और कठोर परिश्रम की कमी न थी। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन में सफलता प्राप्त की और अपना अपमान करने वालों को उन्होंने दंडित किया। आत्म-सम्मान भी मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है। आत्म-सम्मान रहित व्यक्ति जीवन में कदापि ऊँचा नहीं उठ सुकता।

आचार्य चाणक्य अत्यन्त विद्वान थे। वे तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे। उन्होंने अर्थशास्त्र की भाँति नीति-शास्त्र पर भी एक विद्वत्तापूर्ण ग्रन्थ ‘चाणक्य नीति-दर्पण’ की रचना की थी, जिसमें राजनीति-विषयक सत्तरह अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में मनुष्य-मात्र के लिए जीवनोपयोगी नीति-शास्त्र विषयक श्लोक हैं।

चाणक्य नीति 

आचार्य चाणक्य के नीति-शास्त्र के श्लोक कितने उपयोगी हैं, यह दिखाने के लिए कुछ श्लोक नीचे दिये जाते हैं :

माता शत्रुः पिता बैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंस मध्ये बको यथा।। 

शिक्षा का महत्त्व बतलाते हुए आचार्य चाणक्य कहते हैं: – 

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‘वे माता और पिता शत्रु के समान हैं जो अपने बच्चों को पढ़ाते नहीं हैं। बिना पढ़े-लिखे बालक की वही दशा होती है, जैसे हंसों में बगुला शोभा नहीं पाता।’

एकेनापि सुपुत्रेण विद्या युक्तेन साधना।
आह्लादितं कुलं सर्व यथा चन्द्रेण शर्वरी ।। 

‘एक ही पुत्र हो, वह विद्वान, साधुचरित्र का हो, तो सम्पूर्ण कुल ऐसा आनन्दित हो जाता है जैसे एक ही चन्द्रमा से रात्रि शोभायमान हो जाती है।’ 

आचार्य चाणक्य ने अपने ग्रन्थ ‘चाणक्य नीति-दर्पण’ में श्लोक के द्वारा जीवनोपयोगी नीति युक्त अनेक सशिक्षाएँ दी हैं। आचार्य चाणक्य का यह ग्रन्थ सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए।

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