वायुमंडल की आर्द्रता

वायुमंडल की आर्द्रता (Atmospheric Humidity)

यद्यपि जलवाष्प वायुमंडल में कम ही अनुपात में (0-4%) मौजूद है, फिर भी यह मौसम और जलवायु के निर्णायक के रूप में हवा का सबसे प्रमुख घटक है। जल वायुमंडल में अपने तीनों रूपों में मौजूद रह सकता है। यह गैसीय अवस्था में जलवाष्प, तरल अवस्था में जल की बूंदों तथा ठोस अवस्था में हिमकणों के रूप में रहता है। वायुमंडल में मौजूद अदृश्य जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं। यद्यपि जलवाष्प वायुमंडल की समस्त राशि के 2% और आयतन के 4% का ही प्रतिनिधित्व करता है, तथापि यह मौसम और जलवायु के नियंत्रण का कार्य करता है। यह कई कारणों से बड़े महत्व का है –

  1. यह संघनन और वर्षण के सभी रूपों का स्रोत है। इसकी उपस्थित मात्रा जलवृष्टि की क्षमता प्रदर्शित करती है।
  2. यह सौर विकिरण तथा पार्थिव विकिरण दोनों को सोखने में समर्थ है, अतः वायुमंडल एवं पृथ्वी के लिए ताप नियंत्रक का कार्य करता है।
  3. इसमें गुप्त उष्मा होती है और यह संघनित होती है तो उष्मा का त्याग कर देता है। वायुमंडलीय संचरण के लिए जलवाष्प की गुप्त उष्मा महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत का कार्य करती है। अत्यधिक मात्रा में गुप्त उष्मा निकलने से तुफानी मौसम उत्पन्न होता है।
  4. इसकी मात्रा वाष्पन की दर को प्रभावित करती है। यह हमारे शरीर के ठण्डा होने की दर को प्रभावित करती है। 60% आर्द्रता स्वास्थ्य के लिए आदर्श मानी जाती है। इससे अधिक या कम होना हानिकारक होता है।
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आर्द्रता की माप

वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को निम्नांकित विधियों से व्यक्त किया जाता है –

  1. निरपेक्ष या वास्तविक आर्द्रता (Absolute humidity) : हवा के प्रति इकाई आयतन में मौजूद जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं। इसे अधिकतर ग्राम प्रति घन मीटर में व्यक्त किया जाता है।
  2. विशिष्ट आर्द्रता (Specific humidity) : आर्द्रता को व्यक्त करने का दूसरा अधिक उपयोगी तरीका भी है। हवा के प्रति इकाई भार में जलवाष्प का भार विशिष्ट आर्द्रता कहलाता है। विशिष्ट आर्द्रता पर तापमान और वायुदाब के परिवर्तन का कोई असर नहीं पड़ता है।
  3. सापेक्ष आर्द्रता (Relative humidity) : किसी भी तापमान पर हवा में मौजूद जलवाष्प को उसी तापमान पर हवा की जलवाष्प धारक क्षमता के अनुपात (प्रतिशत) के रूप में व्यक्त करते हैं। सापेक्ष आर्द्रता जितनी ही अधिक होगी, मौसम में उतनी ही नमी होगी, चाहे इस वायु की वास्तविक आर्द्रता कम क्यों न हो। सबसे अधिक सापेक्ष आर्द्रता विषुवतीय क्षेत्रों में होती है (कारण जलवाष्प की अधिकता)। कर्क और मकर रेखाओं से ध्रुवों की ओर पुनः यह बढ़ती है (कारण तापमान में कमी)।

यदि वायु में इतना जलवाष्प हो कि वह और अधिक जलवाष्प ग्रहण करने में असमर्थ है तो उसकी सापेक्षिक आर्द्रता 100 कहलाएगी। ऐसी वायु को संतृप्त वायु कहते हैं। सापेक्षिक आर्द्रता बढ़ने पर वर्षा की संभावना अधिक होती है। वर्षा की संभावनाओं को जानने के लिए यह जानकारी ली जाती है कि वायु संतृप्त होने के कितना निकट है। वायु जिस तापमान पर तृप्त या संतृप्त होती है उसे ओसांक (Dew point) कहते है।।

वाष्पीकरण

जल के तरल अवस्था से गैसीय अवस्था में परिवर्तन की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं। एक ग्राम जल को जलवाष्प में बदलने में लगभग 600 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। एक ग्राम जल के तापमान को एक डिग्री सेल्सियस बढ़ाने में जितनी उष्मा लगती है उसे ही कैलोरी कहते हैं।

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संघनन (Condensation)

जल के गैसीय अवस्था से तरल या ठोस अवस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन कहते है।

संघनन के रूप : जिस तापमान पर हवा ओसांक बिन्दू पर पहुँच जाती है उसी के आधार पर संघनन के मुख्य रूपों का वर्गीकरण किया जाता है। संघनन के समय में ओसांक या तो हिमांक से ऊपर होगा या हिमांक से नीचे। पहली दशा में संघनन हुआ तो इससे ओस कुहरा कुहासा तथा बादल बनते हैं। यदि संघनन दूसरी दशा में हुआ तो इससे तुषार हिम तथा पक्षीय मेघ का निर्माण होता है।

ओस : हवा की जलवाष्प जब संघनित होकर नन्हीं बून्दों के रूप में धरातल पर स्थित घास की नोकों पर जमा हो जाती है। तो इसे ओस कहते हैं। इसके बनने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ हैं साफ आकाश, शांत वातावरण या हल्की पवन, उच्च सापेक्ष आर्द्रता और ठण्ढी तथा लंबी रातें। ओस के निर्माण के लिए यह भी जरूरी है कि तापमान हिमांक से ऊपर हो।

तुषार (पाला) : जब संघनन एक ऐसे ओसांक पर होता है जो हिमांक से नीचे हो, तो अतिरिक्त जलवाष्प जल कणों के बदले हिम-कणों के रूप में बदल जाते हैं। इसे तुषार या पाला कहते हैं। उसके निर्माण के लिए तापमान का हिमांक पर या उससे नीचे होना जरूरी है।

कुहरा : कुहरा एक प्रकार का बादल है जिसका आधार पृथ्वी के धरातल पर उसके बिल्कुल समीप होता है। ठण्डी होने की प्रक्रिया की प्रकृति के आधार पर कुहरा कई प्रकार का होता है। कुहरे में कुहासे की अपेक्षा जलकण अधिक और घने होते हैं। कुहरे में धरातलीय वस्तुएँ साफ नहीं दिखती। दृश्यता आधे किलोमीटर से कम होती है। जबकि कुहासे में दृश्यता एक किलोमीटर तक बनी रहती है। ये दोनों धरातलीय वायु के धुंधलापन के द्योतक है।

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