बौद्ध धर्म (Buddhism)

बौद्ध धर्म (Buddhism)

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तरी भारत में एक धार्मिक क्रांति हुई, जिसने प्राचीन ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विरोध किया। इस समय प्रतिपादित हुए अनेक धर्मों में से बौद्ध धर्म (Buddhism) सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक – महात्मा बुद्ध (Mahatma Buddha) का जन्म नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में शाक्य क्षत्रिय कुल में 563 ई.पू. में हआ था, इनकी माता का नाम महामाया (Mahamaya) तथा पिता का नाम शुद्धोधन (Shuddhodhan) था। 16 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ का विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा से हुआ। 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की एक रात को पीपल (वट) वृक्ष के नीचे निरंजना (पुनपुन) नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई, तत्पश्चात् वे बुद्ध कहलाए। 

वाराणसी के निकट सारनाथ में उन्होंने अपने पांच पुराने साथियों को अपना प्रथम उपदेश देकर धर्म चक्र का प्रवर्तन किया। दिनभर वे घूम-घूमकर धर्मोपदेश देते रहे। 483 ई. पू. में 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर (कसीया) में उनका देहान्त (महापरिनिर्वाण) हो गया। 

बौद्ध धर्म के सिद्धांत (Principles of Buddhism)

चार आर्य सत्य 

  1. दु:ख 
  2. दु:ख समुदय 
  3. दु:ख निरोध 
  4. दु:ख निरोध मार्ग 

बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण जीवन का चरम लक्ष्य है। निर्वाण का शब्दिक अर्थ है “दीपक का बुझ जाना” निर्वाण का अर्थ जीवन का विनाश न होकर उसके दु:खों का विनाश है। दु:खों का कारण है तृष्णा। बौद्ध धर्म के द्वितीय आर्य सत्य दु:ख समुदाय में जरा मराण से लेकर अविधा तक 12 कड़ियाँ बताई गई हैं। तृष्णा रूपी अग्नि के शमन से मनुष्य बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। वस्तुतः बौद्ध धर्म में अष्टागिक मार्ग की संकल्पना है जिस पर चलकर मनुष्य बंधनों से मुक्त होकर निर्वाण की प्राप्ति कर सकता है तथा जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर परमानन्द की प्राप्ति कर सकता है।

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अष्टांगिक मार्ग 

महात्मा बुद्ध ने दु:ख के अन्त हेतु आठ बातों के पालन पर विशेष बल दिया है, जिन्हें अष्टांगिक मार्ग या मध्य मार्ग कहा जाता है – 

  1. सम्यक् दृष्टि : मोह, माया को त्यागर उचित दृष्टिकोण रखना।
  2. सम्यक् संकल्प : उचित वस्तुओं का संकल्प।
  3. सम्यक् वाक : सत्य बोलना।
  4. सम्यक् कर्मांत : अच्छे कर्म करना।
  5. सम्यक् आजीव : ईमानदारीपूर्वक जीविका चलाना।
  6. सम्यक् व्यायाम : समुचित उद्यम।
  7. सम्यक् स्मृति : उचित वस्तुओं का सदैव स्मरण।
  8. सम्यक् समाधि : चित्त को एकाग्र रखना। 

 

बौद्ध साहित्य (Buddhist Literature)

बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक, अंगुत्तर निकाय, धम्मपद, जातक, थेरगाथा, थेरीगाथा, मिलिन्द पन्हों, कथावस्तु एवं विभाषाशास्त्र आदि शामिल हैं। 

  • त्रिपिटक : त्रिपिटक बौद्ध धर्म का सबसे महान् ग्रंथ धर्म के धार्मिक साहित्य का महानतम संकलन है। त्रिपिटक का आशय तीन पिटारियों से है त्रिपिटक निम्नलिखित हैं – 
  • सुत्तपिटक : इस पिटक में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का संकलन मिलता है। इसकी रचना आनंद की गई। 
  • विनयपिटक : बौद्ध भिक्षुओं के अनुशासन संबंधी नियमों का संकलन विनय पिटक में है। इसकी रचना उपालि द्वारा की गई।
  • अभिधम्मपिटक : इसमें बौद्ध दर्शन का विवेचन तथा बुद्ध के उपदेशों का संकलन है। इसकी रचना मोगलीपुत्त तिस्स द्वारा की गई। बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं बुद्ध तथा संघ।

दस शील

महात्मा बुद्ध दु:खों को नष्ट करने तथा निर्वाण प्राप्ति के लिए दस शील बताए हैं, जा एक साधक के लिए आवश्यक है। ये हैं – 

  1. सत्य
  2. अहिंसा 
  3. अस्तेय
  4. अपरिग्रह
  5. ब्रह्मचर्य
  6. नृत्य व संगीत में रुचि नहीं रखना
  7. सुगन्धित पदार्थों का सेवन नहीं करना
  8. असमय भोजन का त्याग 
  9. कोमल शैय्या का त्याग 
  10. कामिनी कंचन का त्याग 

बौद्ध धर्म के संप्रदाय (Cults of Buddhism)

महात्मा बुद्ध की मृत्यु के पश्चात् बौद्ध धर्म दो संप्रदायों में विभाजित हो गया – 

  • महायान : यह संप्रदाय महात्मा बुद्ध को दैवीय शक्ति के रूप में स्वीकार करता है। महायान संप्रदाय महात्मा बुद्ध एवं बौधिसत्व की मूर्तियों की पूजा करते थे, इसमें सभी के मोक्ष की बात की गई है। 
  • हीनयान (थेरवाद) : हीनयान संप्रदाय के लोग बुद्ध की मूर्तियों की पूजा न करके बुद्ध के प्रतीकों की पूजा करते थे। इस संप्रदाय में केवल स्वयं के मोक्ष पर बल दिया गया है। इस संप्रदाय के लोग महात्मा बुद्ध की मूल शिक्षाओं में विश्वास रखते हैं और उनमें परिवर्तन का विरोध करते हैं।
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बुद्ध के जीवन से सम्बधित बौद्ध धर्म के प्रतीक

घटना चिह्न/प्रतीक 
जन्म कमल व साण्ड 
गृहत्याग घोड़ा 
ज्ञान पीपल (बोधि वृक्ष) 
निर्वाण  पद चिह्न 
मृत्यु स्तूप

 

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