24 अगस्त 2026 को विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने गेहूँ और गेहूँ से बने प्रमुख उत्पादों की निर्यात नीति में महत्वपूर्ण बदलाव किया। अधिसूचना संख्या 35/2026-27 के माध्यम से निर्धारित श्रेणियों के गेहूँ तथा ड्यूरम गेहूँ को “प्रतिबंधित” से “मुक्त” निर्यात श्रेणी में रखा गया। इसी दिन अधिसूचना संख्या 34/2026-27 के माध्यम से गेहूँ/मैस्लिन आटा, मैदा, सूजी, होलमील आटा और रिजल्टेंट आटा को भी मुक्त निर्यात श्रेणी में रखा गया। यह बदलाव उस नीति से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है जिसके तहत 13 मई 2022 को गेहूँ निर्यात को प्रतिबंधित किया गया था। वर्तमान निर्णय को घरेलू आपूर्ति, उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की स्थिति तथा किसानों और निर्यातकों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
Source:
- डीजीएफटी अधिसूचनाओं का आधिकारिक अभिलेख — APD
- गेहूँ निर्यात प्रतिबंध, 2022 से संबंधित DGFT अभिलेख
- गेहूँ निर्यात नीति संशोधन, फरवरी 2026 — DGFT
- कृषि उत्पादन के तीसरे अग्रिम अनुमान — PIB
संदर्भ
24 अगस्त 2026 को भारत ने निर्धारित श्रेणियों के गेहूँ और गेहूँ उत्पादों के निर्यात को फिर से मुक्त कर दिया। इस निर्णय के दो प्रमुख हिस्से हैं:
- गेहूँ तथा ड्यूरम गेहूँ की निर्धारित श्रेणियों को प्रतिबंधित से मुक्त करना।
- आटा, मैदा, सूजी/रवा, होलमील आटा तथा रिजल्टेंट आटा के निर्यात को भी मुक्त करना।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गेहूँ भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का प्रमुख आधार है और साथ ही यह किसान आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा कृषि-निर्यात नीति से सीधे जुड़ा है।
पृष्ठभूमि
वर्ष 2022 में प्रतिबंध क्यों लगाया गया था?
13 मई 2022 को डीजीएफटी ने गेहूँ की निर्यात नीति को “मुक्त” से “प्रतिबंधित” श्रेणी में बदल दिया था। आधिकारिक डीजीएफटी अभिलेख में संबंधित नीति परिवर्तन दर्ज है। यह निर्णय ऐसे समय हुआ जब:
- रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण वैश्विक गेहूँ आपूर्ति प्रभावित थी।
- अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव था।
- घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति की चिंता थी।
- सरकार को घरेलू उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी।
अर्थात 2022 का निर्णय मुख्यतः खाद्य सुरक्षा तथा घरेलू मूल्य स्थिरता के दृष्टिकोण से देखा गया।
2026 में परिस्थिति कैसे बदली?
2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 376.563 मिलियन टन अनुमानित किया गया, जो पिछले वर्ष के 357.732 मिलियन टन से लगभग 5.3 प्रतिशत अधिक है।
इसी अनुमान में गेहूँ उत्पादन 120.657 मिलियन टन बताया गया, जबकि 2024-25 में यह 117.945 मिलियन टन था।
इस प्रकार वर्तमान निर्णय को बढ़ी हुई उत्पादन क्षमता और घरेलू उपलब्धता के व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है।
प्रमुख तथ्य
वर्तमान निर्णय
- 24 अगस्त 2026 — गेहूँ निर्यात नीति में महत्वपूर्ण बदलाव।
- अधिसूचना संख्या 35/2026-27 — निर्धारित गेहूँ श्रेणियों की निर्यात नीति “प्रतिबंधित” से “मुक्त”।
- संबंधित प्रमुख कोड:
- 10011900 — ड्यूरम गेहूँ
- 10019910 — गेहूँ
- अधिसूचना संख्या 34/2026-27 — गेहूँ या मैस्लिन आटा तथा संबंधित उत्पादों की निर्यात नीति में बदलाव।
- प्रमुख कोड:
- 11010000 — गेहूँ/मैस्लिन आटा, मैदा, सूजी/रवा, होलमील आटा और रिजल्टेंट आटा।
उत्पादन
2025-26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार:
- कुल खाद्यान्न उत्पादन — 376.563 मिलियन टन
- गेहूँ — 120.657 मिलियन टन
- चावल — 154.024 मिलियन टन
- मक्का — 55.093 मिलियन टन
- कुल तिलहन — 43.059 मिलियन टन।
पूर्व नीति
- 13 मई 2022 — गेहूँ निर्यात को “मुक्त” से “प्रतिबंधित” किया गया।
- 2022 के बाद भी कुछ विशेष परिस्थितियों में सीमित निर्यात और मानवीय/खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए अनुमति दी जाती रही।
- 24 फरवरी 2026 को सरकार ने निर्धारित मात्रा में गेहूँ निर्यात की अनुमति देने के लिए नीति में आंशिक ढील दी थी।
- 24 अगस्त 2026 — निर्धारित गेहूँ तथा गेहूँ उत्पादों के लिए व्यापक उदारीकरण।
संवैधानिक और कानूनी आयाम
भारत में विदेश व्यापार का विनियमन संघ के अधिकार क्षेत्र में आता है। संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 41 विदेशी देशों के साथ व्यापार तथा सीमा शुल्क सीमाओं के पार आयात-निर्यात से संबंधित है।
विदेश व्यापार नीति का प्रमुख वैधानिक आधार है: विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992।
इसी कानूनी ढाँचे के अंतर्गत केंद्र सरकार को विदेश व्यापार से संबंधित नीति बनाने तथा आवश्यक प्रतिबंध लगाने की शक्ति प्राप्त होती है।
डीजीएफटी की भूमिका
- विदेश व्यापार महानिदेशालय विदेश व्यापार नीति के प्रशासन और निर्यात-आयात संबंधी प्रक्रियाओं के क्रियान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाता है।
“मुक्त” और “प्रतिबंधित” निर्यात
- मुक्त श्रेणी का अर्थ यह है कि संबंधित वस्तु का सामान्य निर्यात नीति की शर्तों के अधीन किया जा सकता है।
- प्रतिबंधित श्रेणी में निर्यात पर अतिरिक्त नियंत्रण या अनुमति की आवश्यकता हो सकती है।
- महत्वपूर्ण: “मुक्त” का अर्थ यह नहीं है कि अन्य सभी सीमा शुल्क, गुणवत्ता, स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा या अन्य लागू कानून समाप्त हो जाते हैं।
आर्थिक आयाम
किसानों के लिए संभावित लाभ
निर्यात बाजार खुलने से किसानों को घरेलू बाजार के अतिरिक्त विदेशी बाजार तक पहुँच मिल सकती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय मांग मजबूत रहती है तो:
- कृषि उपज की मांग बढ़ सकती है।
- किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिल सकता है।
- कृषि प्रसंस्करण को बढ़ावा मिल सकता है।
- गेहूँ आधारित उद्योगों को निर्यात अवसर मिल सकते हैं।
लेकिन यह लाभ स्वतः सुनिश्चित नहीं है।
किसान को वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब: अंतरराष्ट्रीय कीमत + निर्यात लागत + गुणवत्ता + परिवहन लागत + विनिमय दर
भारतीय गेहूँ को प्रतिस्पर्धी बनाए रखें।
उपभोक्ता मूल्य पर संभावित प्रभाव
निर्यात बढ़ने से घरेलू बाजार में उपलब्ध मात्रा पर दबाव पड़ सकता है।
यदि: निर्यात मांग ↑ → घरेलू उपलब्धता ↓ → घरेलू कीमत ↑
तो उपभोक्ताओं पर दबाव पड़ सकता है।
लेकिन यदि घरेलू उत्पादन और सरकारी भंडार पर्याप्त हैं तो यह प्रभाव सीमित हो सकता है।
इसलिए सरकार के लिए चुनौती है: किसानों को बेहतर मूल्य + उपभोक्ताओं को उचित मूल्य + पर्याप्त खाद्य भंडार
इन तीनों के बीच संतुलन बनाना।
कृषि-निर्यात का महत्व
भारत लंबे समय से कृषि निर्यात में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है। गेहूँ के निर्यात को मुक्त करने से:
- कृषि निर्यात टोकरी में विविधता आ सकती है।
- प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है।
- आटा और मैदा उद्योगों को नए बाजार मिल सकते हैं।
- कृषि मूल्य श्रृंखला में निवेश बढ़ सकता है।
लेकिन दीर्घकाल में केवल कच्चे कृषि उत्पादों का निर्यात पर्याप्त नहीं होगा।
भारत को: कच्चा माल → प्रसंस्करण → गुणवत्ता प्रमाणन → ब्रांडिंग → वैश्विक बाजार
की पूरी मूल्य श्रृंखला मजबूत करनी होगी।
सामाजिक आयाम
गेहूँ भारत के बड़े हिस्से की खाद्य टोकरी का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए निर्यात नीति का प्रभाव निम्न समूहों पर पड़ सकता है:
- निम्न आय वाले परिवार
- शहरी गरीब
- ग्रामीण उपभोक्ता
- छोटे किसान
- आटा मिलें
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर निर्भर परिवार
दोहरे हित
यहाँ नीति-दुविधा स्पष्ट है:
किसान के लिए ऊँची कीमत लाभकारी हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता के लिए ऊँची कीमत नुकसानदायक हो सकती है।
इसलिए कृषि व्यापार नीति को केवल निर्यात बढ़ाने के लक्ष्य से नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा और आय वितरण के दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
पर्यावरणीय आयाम
गेहूँ मुख्यतः रबी फसल है और इसकी खेती भारत के उत्तर-पश्चिमी कृषि क्षेत्र में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
लगातार गेहूँ-केंद्रित कृषि व्यवस्था से कुछ दीर्घकालिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं:
- भूजल का अत्यधिक दोहन
- मृदा स्वास्थ्य में गिरावट
- फसल विविधता में कमी
- जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता
- अत्यधिक सिंचाई वाले क्षेत्रों में संसाधन दबाव
इसलिए गेहूँ के निर्यात को बढ़ाने की नीति को जल-सुरक्षित कृषि और जलवायु-स्मार्ट कृषि से जोड़ना आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय आयाम
भारत विश्व कृषि बाजार में एक महत्वपूर्ण खाद्यान्न उत्पादक देश है। 2022 में भारत के निर्यात प्रतिबंध का अंतरराष्ट्रीय गेहूँ बाजार पर प्रभाव इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि रूस-यूक्रेन संघर्ष ने वैश्विक खाद्यान्न आपूर्ति पर पहले ही दबाव बढ़ा दिया था।
अब भारत द्वारा निर्यात उदारीकरण से:
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूँ की उपलब्धता बढ़ सकती है।
- कुछ देशों के लिए आपूर्ति स्रोतों में विविधता आ सकती है।
- भारत की कृषि-व्यापार कूटनीति को नई संभावनाएँ मिल सकती हैं।
- भारत की विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में भूमिका मजबूत हो सकती है।
सरकार की पहल और नीति क्रम
गेहूँ की वर्तमान नीति को एक क्रम में समझना उपयोगी है:
- चरण 1 (2022) – 13 मई 2022: गेहूँ निर्यात “मुक्त” से “प्रतिबंधित”।
- चरण 2 — नियंत्रित निर्यात: विशेष परिस्थितियों और मानवीय खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं के आधार पर सीमित निर्यात की अनुमति।
- चरण 3 — फरवरी 2026: 24 फरवरी 2026 को निर्धारित मात्रा में गेहूँ निर्यात की अनुमति देने के लिए नीति में आंशिक ढील।
- चरण 4 — अगस्त 2026: 24 अगस्त 2026: निर्धारित गेहूँ तथा गेहूँ उत्पादों को “मुक्त” निर्यात श्रेणी में स्थानांतरित किया गया।
यह क्रम बताता है कि कृषि-व्यापार नीति परिस्थितियों के अनुसार प्रतिबंध → सीमित उदारीकरण → व्यापक उदारीकरण की दिशा में आगे बढ़ सकती है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- घरेलू मूल्य नियंत्रण: यदि निर्यात बहुत तेजी से बढ़ता है तो घरेलू कीमतों पर दबाव आ सकता है।
- खाद्य सुरक्षा: सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त भंडार बनाए रखना होगा।
- निर्यात नीति की पूर्वानुमेयता: बार-बार प्रतिबंध और प्रतिबंध हटाने से निर्यातकों तथा अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए नीति जोखिम बढ़ सकता है।
- जल संसाधन: गेहूँ उत्पादन बढ़ाने की रणनीति को भूजल संकट वाले क्षेत्रों की पर्यावरणीय सीमाओं के साथ जोड़ना आवश्यक है।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारतीय गेहूँ की गुणवत्ता, कीमत, परिवहन और बंदरगाह लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करेंगे।
- किसानों को वास्तविक लाभ: निर्यात खुलने का अर्थ यह नहीं है कि हर किसान को स्वतः बेहतर मूल्य मिलेगा। मूल्य लाभ के लिए आवश्यक है:
- बेहतर मंडी व्यवस्था
- भंडारण
- किसान उत्पादक संगठन
- प्रसंस्करण क्षमता
- निर्यातक-किसान संपर्क
- गुणवत्ता परीक्षण
आगे की राह
पूर्वानुमेय कृषि-व्यापार नीति
सरकार को निर्यात प्रतिबंधों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी संकेतक विकसित करने चाहिए।
उदाहरण:
- घरेलू उत्पादन
- सरकारी भंडार
- घरेलू कीमत
- अंतरराष्ट्रीय कीमत
- मुद्रास्फीति
- खाद्य सुरक्षा आवश्यकता
के आधार पर नीति में बदलाव किया जा सकता है।
बफर स्टॉक को मजबूत करना
- निर्यात उदारीकरण के साथ पर्याप्त रणनीतिक खाद्य भंडार बनाए रखना आवश्यक है।
किसान-केंद्रित निर्यात
- निर्यात का लाभ केवल व्यापारियों तक सीमित न रहे।
- किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी संस्थाओं और कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला से जोड़ना चाहिए।
प्रसंस्कृत कृषि निर्यात
- कच्चे गेहूँ के बजाय: आटा → मैदा → बेकरी उत्पाद → तैयार खाद्य पदार्थ
- जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए।
जल-स्मार्ट कृषि
- गेहूँ उत्पादन बढ़ाने की रणनीति को:
- सूक्ष्म सिंचाई
- जल दक्षता
- फसल विविधीकरण
- जलवायु-सहिष्णु किस्मों
से जोड़ना चाहिए।
डिजिटल कृषि-व्यापार सूचना
- किसानों को अंतरराष्ट्रीय कीमतों, मांग, गुणवत्ता मानकों और निर्यात अवसरों की जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध करानी चाहिए।
संतुलित दृष्टिकोण
सरकार का दृष्टिकोण
- सरकार के लिए मुख्य तर्क यह है कि पर्याप्त घरेलू उत्पादन और उपलब्धता की स्थिति में निर्यात बाजार खोलकर किसानों और निर्यातकों को अवसर दिया जा सकता है।
समर्थक पक्ष का दृष्टिकोण
समर्थकों के अनुसार:
- इससे किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलेगा।
- निर्यात बढ़ सकता है।
- कृषि प्रसंस्करण को प्रोत्साहन मिलेगा।
- भारत की वैश्विक कृषि व्यापार भूमिका मजबूत हो सकती है।
आलोचकों का दृष्टिकोण
आलोचकों की मुख्य चिंता यह हो सकती है कि:
- अत्यधिक निर्यात से घरेलू कीमतें बढ़ सकती हैं।
- खाद्य सुरक्षा पर दबाव पड़ सकता है।
- छोटे उपभोक्ताओं पर महँगाई का प्रभाव अधिक पड़ सकता है।
- बार-बार नीति परिवर्तन से व्यापारिक अनिश्चितता बनी रह सकती है।
विशेषज्ञ/संस्थागत दृष्टिकोण
- नीतिगत दृष्टि से मुख्य चुनौती निर्यात उदारीकरण बनाम घरेलू खाद्य सुरक्षा को शून्य-राशि संघर्ष के रूप में देखने के बजाय एक संतुलित प्रणाली विकसित करना है।
निष्कर्ष
गेहूँ निर्यात नीति में अगस्त 2026 का बदलाव केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, किसान आय, कृषि बाजार, उपभोक्ता कल्याण और वैश्विक व्यापार के बीच संतुलन की परीक्षा है।
भारत को ऐसी कृषि-व्यापार व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें सामान्य परिस्थितियों में निर्यात नीति अपेक्षाकृत स्थिर और पूर्वानुमेय हो, जबकि असाधारण खाद्य संकट के समय सरकार के पास आवश्यक हस्तक्षेप की क्षमता बनी रहे।
दीर्घकालीन दृष्टि से लक्ष्य केवल अधिक गेहूँ पैदा करना नहीं होना चाहिए, बल्कि कम जल में अधिक उत्पादकता, बेहतर किसान आय, मजबूत भंडारण, प्रसंस्करण और विश्वसनीय कृषि-निर्यात होना चाहिए।
| UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न |
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GS Paper I (History, Culture, Geography & Society)
GS Paper II (Polity, Governance, Social Justice & IR)
GS Paper III (Economy, Environment, Science & Security)
GS Paper IV (Ethics, Integrity & Aptitude)
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