श्रृंगार रस (Shringar Ras) नायक-नायिका के सौन्दर्य एवं प्रेम संबंधी वर्णन की सर्वोच्च (परिपक्व) अवस्था को श्रृंगार रस कहा जाता है। श्रृंगार रस को रसों का राजा/रसराज कहा जाता है। श्रृंगार
“विभावानुभावव्यभिचारि संयोगाद्रसनिष्पत्तिः।” अर्थात् विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। यह रस-दशा ही हृदय का स्थाई भाव है। रस का शाब्दिक अर्थ ‘आनन्द’ है।
अनेक शब्दों के लिए एक शब्द वाक्य शब्द जो शब्दों द्वारा व्यक्त न किया जा सके अवर्णनीय जिसका कोई शत्रु न हो अजातशत्रु ऊपर लिख हुआ उपरिलिखित जो उपकार मानता
वर्णव्यवस्था हमारी भाषा में ‘वर्ण’ शब्द का प्रयोग भाषा की ध्वनियों और उन ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त लिपि-चिह्नों दोनों के लिए होता है। इस प्रकार वर्ण भाषा
SOCIAL PAGE