राजस्थान में राजपूतों की उत्पत्ति (Origin of Rajputs in Rajasthan)  | TheExamPillar
Origin of Rajputs in Rajasthan

राजस्थान में राजपूतों की उत्पत्ति (Origin of Rajputs in Rajasthan) 

राजस्थान में राजपूतों की उत्पत्ति
(Origin of Rajputs in Rajasthan) 

पूर्व मध्यकालीन भारत में राजपूत शक्ति का एक ऐतिहासिक शक्ति के रूप में भारतीय इतिहास क्षितिज पर उदय हुआ। विन्सेण्ट स्मिथ ने राजपूतों के महत्व पर टिप्पणी करते हुए ठीक ही लिखा है “हर्ष की मृत्यु के पश्चात उत्तर भारत पर मुस्लिम आक्रमणों अर्थात सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक राजपूतों का महत्व इतना बढ़ गया था कि इस काल को राजपूत काल के नाम से अभिहित किया जाना चाहिये ।” यद्यपि इस काल में राजपूत वंशो का प्रभुत्व उत्तरी और पश्चिमी भारत तक ही सीमित रहा ।

राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न मत (Different Views of Origin of Rajputs)

राजपूतों की उत्पत्ति का प्रश्न अत्यंत विवादास्पद है। राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किये हैं। कुछ विद्वान इनकी विदेशी उत्पत्ति बताते हैं तो कुछ देशी और कुछ उन्हें देशी-विदेशी मिश्रित उत्पत्ति से सम्बन्धित बताते हैं। राजपूत शब्द राजपुत्र शब्द का अपभ्रंश है। ऋग्वेद में राजपुत्र और राजन्य शब्दों का बहुधा उल्लेख हुआ है और वहाँ दोनों शब्द समानार्थक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। 

प्राचीन भारत में क्षत्रिय शासकों के अतिरिक्त कुछ ब्राह्मणों, कुछ विदेशियों, शक, हूण, कुषाण और यवनों ने भी भारत के विभिन्न भागों में राज्य किया था। धीरे-धीरे इन शासक वंशों के मध्य परस्पर वैवाहिक सम्बन्धों के फलस्वरूप भी विलयन की प्रक्रिया हुई। शासकों तथा सामन्तों के वंशज राजपुत्र थे। जिनको राजपूतों के नाम से जाना जाने लगा। 

 

अग्निवंशीय उत्पत्ति (Origin Agri Dynasty)

प्राचीन काल से विश्व के विभिन्न देशों में राजवंशो द्वारा देवी उत्पत्ति से अपने वंश की श्रेष्ठता सिद्ध करने की परम्परा रही है। कुषाण शासक अपने आपको ‘देवपुत्र’ उपाधि से विभूषित करते थे। राजपूतों को विशुद्ध जाति का सिद्ध करने के लिये इनकी उत्पत्ति अग्नि से बताई गई है। 

सर्वप्रथम बारहबीं शताब्दी ई0 के अन्त में रचित चन्दबरदाई के ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ में राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहानों की उत्पत्ति महर्षि वशिष्ठ के यज्ञ के अग्नि कुण्ड से बताई गई है। कहानी के अनुसार राक्षस ऋषियों के यज्ञ को हाड़, मांस, विष्ठा से अपवित्र करते थे । अत: ऋषि वशिष्ठ ने इनके संहार के लिये आबू पर्वत पर सम्पादित यज्ञ के अग्निकुण्ड से इन वंशो को उत्पन्न किया । 

 

सूर्य और चन्द्रवंशीय उत्पत्ति ( Origin Surya and Chandra Dynasty)

डॉ. गौरीशंकर हीरानन्द ओझा राजपूतों की सूर्य और चन्द्रवंशी उत्पत्ति में विश्वास रखते हैं। अनेक शिलालेखों 1028 विक्रमी संवत का नाथ अभिलेख विक्रमी संवत 1034 का आटपुर लेख, विक्रमी संवत 1342 का आबू और विक्रमी संवत 1485 के शृंगी ऋषि के लेख में गुहिलवशीय राजपूतों को रघुकुल (सूर्यवंशी) से उत्पन्न बताया है। इसी प्रकार पृथ्वीराज विजय, हमीर महाकाये के अनुसार चौहानों को क्षत्रिय कहा है। 

श्री जे. एन. आसोपा के अनुसार 

“सूर्य और चन्द्रवंशी मूलत: आर्यों के दो दल थे जो भारत आये।” 

पार्जिटर ने 

“सूर्यवंशियों को क्षत्रिय द्रविड कहा है और चन्द्रवंशियों को प्रयाग के क्षत्रिय शासक बताया है।” 

सी वी वैद्य का भी विचार है कि 

“सुदूर उत्तरी देशों से आर्यों के आने वाले दल ही महाभारत काल से सूर्य एवं चन्द्रवंशी क्षत्रिय कहलाने लगे।” 

विदेशी वंश से उत्पत्ति (Origin from Foreign Lineage)

राजपूतों की उत्पत्ति का सम्बन्ध अनेक विद्वान विदेशी जाती से बताते है। इन विद्वानो मे कर्नल टोड, विलियम क्रुक, विन्सेंट सिम्थ और डॉ. डी आर. भंडारकर मुख्य है। 

विन्सेंट स्मिथ ने विदेशी आक्रमणकारियो के कलांतरण में भारतीयकरण के फलस्वरूप हुई। कालान्तर में इन सभी भारतीयकृत विदेशी जातियों ने प्रतिष्ठ प्राप्ति के लिए अपने आपको सूर्य और चन्द्रवंशी कहना प्रारम्भ कर दिया । वे पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित यज्ञ कुण्ड से उत्पन्न चार राजवंशो, प्रतिहार, चालुक्य, परमार और चौहनों की उत्पत्ति का सम्बन्ध भी विदेशी उत्पत्ति से जोड़ते है।

उनका कथन है की गूजरों की उत्पत्ति हूणो से हुई। उनका यह भी मानना है की राजपूत जतियों की उत्पत्ति शक हूण, कुषाण, पल्लव जतियों के आक्रमण के समय से होती है। इन विदेशी जातियों ने कालान्तर मे भारतीय धर्म सभ्यता एवं संस्कृति को स्वीकार कर लिया। अत: उन्हे महाभारत एवं रामायणकाल के क्षत्रियों से संबन्धित कर दिया गया और उन्हे सूर्य एवं चन्द्रवंशी कहा जाने लगा।

कर्नल टोड ने राजपूतो को शक और सीथियन बताया है। अपने मत की पुष्टि के लिए राजपूतो में प्रचलित अनेक रीति-रिवाजों, परम्पराओ का इन्होने सहारा लिया है । जो शकों से समयता रखते है । सूर्य पुजा, सती प्रथा, अश्वमेघ यज्ञ,मघपान शस्त्र पूजन, घोडो का पूजन तथा तातारी और शकों की कथाओं की पुराणों की कथाओं से सभ्यता ऐसे तथ्य हैं जो राजपूतों को विदेशी सिद्ध करते हैं ।

डॉ. डी.आर. भण्डारकर ने राजपूतों को विदेशी गुर्जरों की सन्तान माना है। उनका कथन है कि गुर्जर खिजर जाति की सन्तान थे जो कि हूणों के साथ भारत में आये थे। परन्तु डॉ. भण्डारकर के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है कि गुर्जर खिजर थे और ये बाहर से आये थे । भण्डारकर ने प्रतिहारों, चालुक्यों, परमारों और चाहमानों को भी पृथक-पृथक रूप से गुर्जर सिद्ध कर इन राजपूत वंशो की विदेशी उत्पत्ति सिद्ध करने की चेष्टा की है । राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है । अरबों और राष्ट्रकूटों ने भी कन्नौज के प्रतिहारों को गुर्जर कहा है ।

ब्राह्मण उत्पत्ति का सिद्धान्त (Theory of Brahmin Origins)

भण्डारकर महोदय जहाँ कुछ राजपूत वंशों की उत्पत्ति विदेशी गुर्जरों से मानते हैं वहाँ वे यह भी स्वीकार करते थे कि कुछ राजपूत वंश धार्मिक वर्ग से भी सम्बन्धित थे । इस मत की पुष्टि के लिये दे विजोलिया शिलालेख का सहारा लेते हैं जिसमें वासुदेव चहमान के उत्तराधिकारी सामन्त को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण कहा गया है । राजशेखर ब्राह्मण का विवाह चौहान राजकुमारी अवन्तिसुन्दरी से होना भी चौहानों का ब्राह्मणों से सम्बन्ध स्थापित करता है । कायमखाँ रासो में भी चौहानों की उत्पत्ति वत्स से बताई गई है, जो जमदग्नि गोत्र से था। सुण्डा और आबू अभिलेखों से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है इसी तरह डॉ. भण्डारकर गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मण से बताते हैं

राजपूतों की अग्निकुण्ड से उत्पत्ति के सम्बन्ध में आसोपा जी की मान्यता है कि अग्निकुण्ड से उत्पन्न ये चारों वंश ब्राह्मण थे जो क्षत्रिय बन गये। परमार आबू क्षेत्र के अग्नि पूजक वशिष्ठ ब्राह्मण थे जिन्होंने क्षात्र धर्म ग्रहण किया । इसी प्रकार चालुक्य भी आग्नेय ब्राह्मण थे। चाहमान मूलत: शाकम्भरी क्षेत्र में रहने वाले लोगों का भौगोलिक नाम है। इस क्षेत्र के शासक भी ब्राह्मण थे जिन्होंने स्वेच्छों से देश रक्षा के लिये क्षत्रिय धर्म ग्रहण किया। प्रतिहारों को भी लक्षण के वंशज होने के मत को अस्वीकार करते हुए आसोपा ने इनको प्रतिहारी ब्राह्मण कहा है जिनका तैत्तिरीय ब्राह्मण में उल्लेख है। 

इस प्रकार हम श्री आसोपा के मत को माने तो हमें यह मानने को विवश होना पड़ेगा कि क्षत्रिय अपने क्षात्र धर्म को भूलते जा रहे थे जिसकी जिम्मेदारी शास्त्रों ने उन्हें सौंपी थी। इसीलिये ब्राह्मणों को शस्त्र उठाने को बाध्य होना पड़ा लेकिन हमें ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता जिससे यह पता चलता हो कि तुर्को के भारत आक्रमण तक क्षत्रियों का इतना पतन हो गया हो। अत: विद्वानों का एक वर्ग आसोपा के इन सिद्धान्तों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है । 

 

वैदिक आर्यन उत्पत्ति (Vedic Aryan Origin)

राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जे.एन.आसोपा ने अपने ग्रंथ “Origin of the Rajputs” में राजपूतों को वैदिक आर्यो की दो शाखाओं की सन्तान बताकर समस्या को सुलझाने का प्रयास किया हैं। इनके अनुसार आर्यो की दो शाखायें मध्य एशिया से भारतवर्ष में आई । मध्य एशिया में इनका निवास स्थल दो नदियों जैक्सर्टीज (इक्षुवाक) तथा इली के तट पर स्थित थे । इक्षुवाक से आने वाले आर्य भारत में सूर्यवंशी क्षत्रिय और इली से आने वाले चन्द्रवंशी क्षत्रिय कहलाये । इस प्रकार उनके अनुसार सूर्य और चन्द्रवंशी ये दो युद्ध प्रिय समूह थे जो मध्य एशिया से भारत में आये थे । श्री आसोपा के अनुसार वैदिककालीन राजपुत्र शब्द का अपभ्रंश रूप ही राजपूत शब्द हैं । धीरे-धीरे इन राजपुत्रो का जिसमें सामन्त और राजदरबारी शामिल थे, एक विशिष्ट वर्ग बनता जा रहा था और ब्राह्मण ग्रंथों के समय में राजपुत्र, राजन्य और क्षत्रियों में अन्तर किया जाने लगा था । बारहवीं सदी के अन्त और तेरहवीं शताब्दी ई. के आरम्भ तक राजपूत एक जाति वर्ग बन गया था, जो स्वयं अनेक उपजातियों और वंशों में विभक्त हो चुकी थी । इस प्रकार पश्चिमोत्तर प्रदेशों से आने वाले आर्य तथा विदेशी जातियों ने भारत में राज्य स्थापित कर राजपूत जाति के रूप में संगठित होकर वैदिक आर्यों से अपना सम्बन्ध सूर्य या चन्द्रवंशी बनकर स्थापित कर लिया । लेकिन थी आसोपा द्वारा साहित्य और अभिलेखों में उपलब्ध शब्दों की व्याख्या संदेह उत्पन्न करती है और अनेक विद्वान उनके इस मत से सहमति प्रकट नहीं करते ।

सी. वी. वैद्य और गौरी शंकर हीरानन्द ओझा ने राजपूतों को भारतीय आर्यों की सन्तान माना है। उनका कथन है कि समस्त राजपूत परम्पराओं में राजपूतों को क्षत्रिय ही माना गया है । प्रतिहार अपने आप को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं। ग्वालियर अभिलेख में भी उन्हें लक्षण की सन्तान कहा गया है । हेनसांग भी चालुक्य नरेश पुलकेशी द्वितीय को क्षत्रिय बताता है । हम्मीर महाकाव्य में चाहमानों को सूर्य पुत्र कहा गया है । पृथ्वीराज रासो में भी 36 राजपूत कुलों को सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी और यदुवंशी कहा गया हैं । अत्यन्त प्राचीनकाल से राजपुत्र शब्द का प्रयोग क्षत्रिय के लिये ही हुआ है । महाभारत में द्रौपदी को राजपुत्री कहा है । शरीर रचना की दृष्टि से भी राजपूत आर्य प्रतीत होते हैं । राजपूतों में व्यापत प्रथायें यज्ञ, मदिरापान, अश्व पूजा, शस्त्र पूजा, स्त्रियों का सम्मान, युद्ध प्रेम भारतीय क्षत्रियों में वैदिक काल से ही पाई जाती है । इन प्रथाओं को विदेशी बताना असंगत है ।

 

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