कुली बेगार और कुली बरदायष आन्दोलन

कुली बेगार और कुली बरदायष (Coolie Labor and Coolie Bardayash Movement)

कुली–बेगार (Coolie Begar) में ब्रिटिश अधिकारियों की निःशुल्क सेवा करनी पड़ती थी एवं कुली-बरदायष (Coolie Bardayash) में खाद्य सामग्री निःशुल्क देनी पड़ती थी। सुधारवादी नेताओं ने इन कुप्रथाओं को दूर करने के लिये कई सभायें आयोजित की।

1917 में मदन मोहन मालवीय गढ़वाल आये उन्होंने भी इस कुप्रथा के विरूद्ध एकजुट होकर कार्य करने की सलाह दी। उस समय स्थानीय जनता अधिकारियों के सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए कुली का काम करती थी। गाँव के मालगुजार के पास रजिस्टर में सभी ग्रामवासियों के नाम लिखे होते थे। मालगुजार ही ग्रामीणों को इन कुप्रथाओं के लिए भेजा करता था। विरोध करने वाले व्यक्ति के सिर पर अंग्रेज अधिकारी कमोड या अन्य निकृष्ट सामग्री रख देते थे तथा उल्लंघन करने पर पाँच रूपये से लेकर पन्द्रह रूपये तक दण्ड निर्धारित था।

इन कुलियों पर ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा अमानवीय अत्याचार किया जाता था। उनका मेहनताना भी भारतीय कर्मचारियों द्वारा हड़प लिया जाता था जिससे कुलियों में असंतोष व्याप्त हो गया था।

गढ़वाल में कुली बेगार आन्दोलन

गढ़वाल में कुली बेगार आन्दोलन के तीन नेता थे। चमोली में अनुसूयां प्रसाद बहुगुणा, पौड़ी में मथुरा प्रसाद नैथानी तथा लैन्सडौन में बैरिस्टर मुकुन्दी लाल। 1 जनवरी 1921 को बैरिस्टर मुकुन्दी लाल की अध्यक्षता में चमेठाखाल में एक सार्वजनिक सभा के प्रस्तावों पर विचार-विमर्श करने के बाद सभा के अन्त में यह निर्णय लिया गया कि जनता ब्रिटिश प्रशासन को बेगार नहीं देगी और जब तक सरकार जनता की मांगों को स्वीकार कर इस कुप्रथा को बन्द नहीं करती तब तक जनता सरकार से असहयोग करती रहेगी।

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कुमाऊँ में कुली बेगार आन्दोलन

कुमाऊँ में भी इस प्रथा का पुरजोर विरोध किया गया। बी. डी. पाण्डे, हरगोविन्द, मोहन सिंह एवं चिरंजीलाल जैसे नेताओं ने इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान किया। हेनरी रामजे जैसे लोकप्रिय कमिश्नर ने भी सोमेश्वर पट्टी के लोगो पर कुली बर्दायष में असमर्थता व्यक्त करने पर दण्ड लगाया था। बद्रीदत्त पांडे ने गांधी जी को इस कुप्रथा से अवगत कराया था। नागपुर कांग्रेस से लौटने के पश्चात् जनवरी, 1921 को चिरंजीलाल, बद्रीदत्त पाण्डे एवं कुमाऊँ परिषद् के सदस्य बागेश्वर पहुचे। 13 जनवरी 1921 को मकर संक्राति के अवसर पर सरयू नदी तट पर एक आमसभा का आयोजन हुआ। तत्पश्चात् सरयू को साक्षी मानकर जबरन कुली न बनने की शपथ ली गई। इस अवसर पर कुछ मालगुजारों ने कुली रजिस्टरों को सरयू में प्रवाहित किया। इस घटना को असहयोग की पहली ईंट और रक्तहीन क्रांति की संज्ञा दी गई।

इसके पश्चात् यह आन्दोलन सम्पूर्ण प्रदेश में तीव्र हो गया। कमिश्नर ट्रेल ने इस समस्या का हल निकालने के लिए वर्ष 1922 ई0 से खच्चर सेना के विकास का प्रयास आरम्भ किया।

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