श्री मोलाराम की जीवनी (Biography of Molaram)

गढ़वाली चित्रांकन शैली के महानतम आचार्य, कुशल राजनीतिज्ञ, कवि व इतिहासकार तथा सफल मनस्तत्ववेत्ता श्री मोलाराम ने विभिन्न दिशाओं में अपनी प्रतिभा का चमत्कार दिखाया था। इनकी रचनाओं ने गढ़वाल की कला व साहित्य को अमर कर दिया है। अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के गढ़वाल पर जो राजनैतिक अंधकार छाया हुआ था, उसके बावजूद इन्होंने कला, साहित्य और ज्ञान की मशाल को प्रज्वलित रखा; और इस कारण इन्होंने स्वयं अपने आप ही को नहीं, बल्कि इस प्रदेश को भी, अमरत्व प्रदान कर दिया है। केवल पर्वतीय प्रदेशों के कलाकारों में ही नहीं, अपितु भारतवर्ष भर के सर्वप्रमुख कलाकारों में इनकी गणना की जाने लगो है।

Molaram Tomar
               मोलाराम (Molaram)
पिता का नाम  श्री मंगतराम 
माता का नाम  श्रीमती रामदेवी 
जन्म  सन् 1740 ई० के लगभग श्रीनगर में
मृत्यु  1833 ई०

जीवन की मुख्य घटनायें 

मोलाराम का जन्म श्री मंगतराम के सुपुत्र के रूप में सन् 1740 ई० के लगभग श्रीनगर में इनका जन्म हुआ। ये सात भाई थे; लेकिन अन्य किसी के बारे में कोई विवरण नहीं मिलता। इनकी माता का नाम रामदेवी था। श्री मोलाराम में चित्रकला के बीज पैतृक गुणों के रूप में विद्यमान थे। इनके परिवार का वास्तविक व्यवसाय स्वर्णकारी था। तथ्य यह है कि प्रायः सभी हिन्दू चित्रकार, विशेषकर राजपूत शैली के चित्रकार, पेशे से स्वर्णकार ही थे; लेकिन साथ ही कला-साधना भी किया करते थे। इन्होंने भी अपने पिता व पितामह से स्वर्णकारी के साथ-साथ चित्रकला सीखी; लेकिन बाद में अपना पूरा समय इसी ओर देने लगे; और इस दिशा में इन्होन पाश्चर्यजनक उन्नति करके दिखलाई।
ये गढ़वाल के चार महाराजाओं के शासनकाल में कार्य करते रहे –
(1) महाराज प्रदीपशाह (सन् 1717 से सन् 1772 तक);
(2) महाराज ललितशाह ( सन् 1772 से सन् 1780 तक);
(3) महाराज जयकृतशाह (सन् 1780 से सन् 1885 तक ); और
(4) महाराज प्रगुम्नशाह (सन् 1785 से सन् 1804 तक )।
इसमें कोई संदेह नहीं कि उपरोक्त सब महाराजाओं ने इन्हें निश्चित धन-राशि तथा गांवों की मालगुज़ारी भी इनके नाम बांधकर इन्हें आर्थिक चिंताओं से मुक्त कर दिया। इतना ही नहीं, ये उनके दरबार के एक अत्यन्त विश्वासपात्र अधिकारी थे। चित्रकार के अतिरिक्त ये एक कवि और दार्शनिक भी थे तथा राजनीति-कला में भी पटु थे; इसी कारण सब लोग इनका आदर और सम्मान करते थे।

केवल गढ़वाल राज्य में ही इनका सम्मान नहीं था; बल्कि पूर्व में कांतिपुर (नेपाल) से लेकर पश्चिम में कांगड़ा तक सब पर्वतीय राज्यों में इनकी प्रसिद्धि पहुंच गई थी । इस बात के प्रमाण मिले हैं कि ये कुछ दिनों तक कांगड़ा के राजा संसारचन्द के दरबार में भी रहे और वहां कई चित्रकारों का मार्ग-दर्शन किया। उन राज्यों में जाकर इन्हें कभी-कभी अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी मिलता रहता था; विशेषकर कांगड़ा, सिरमौर, गुलेर और मंडी आदि पश्चिमी हिमालय के रजवाड़ों में इनका काफी प्रभाव था। 

गढ़वाल में गोरखा शासन

सन 1803 ई० का राजनैतिक भूकम्प आ गया; उसके फलस्वरूप श्रीनगर से गढ़वाल-राज्य सदा के लिये समाप्त हो गया और उसके स्थान पर कुछ वर्षों के लिये गोर्खाशासन स्थापित हो गया। महाराज प्रद्युम्नशाह तो राज-परिवार को लेकर देहरादून चले गये; लेकिन ये अपनी चित्रशाला को लेकर कैसे व कहां जाते? इसलिये श्रीनगर में रुक कर इन्होंने अपने भाग्य की परीक्षा करना उचित समझा।

लेकिन इनकी चित्र-कला की प्रसिद्धि तो पहले से ही नैपाल तक पहुँची हुई थी। इसलिए गोरखा सेना के सरदार तथा गवर्नर श्री हस्तिदल चौतरिया ने इनका सम्मान किया और इनकी आर्थिक सहायता पूर्ववत् जारी रखी। चित्रकला के अतिरिक्त वह इनके राजनैतिक ज्ञान से भी परिचित था; उसने इनकी चित्रकला की प्रशंसा करने के साथ-साथ इनसे यह भी अनुरोध किया कि ये गढ़वाल राज्य की उत्पत्ति और विस्तार का विवरण सुनाने की भी कृपा करें; उसी अवसर पर इन्होंने छंदबद्ध “श्रीनगर राज्य का इतिहास” गोरखा-गवर्नर को सुनाया। उसे सुनकर यह और भी प्रसन्न हुआ; तथा इन्हें चित्रकला के लिए सब सुविधायें प्रदान कर दीं; इसलिए ये और भी प्रसन्नता के साथ श्रीनगर में ही रह गये। 

यद्यपि श्री मोलाराम गोरखा दरबार की कृपा पर आश्रित थे, तथापि इन्होंने अपनी स्वाधीन भावना नहीं छोड़ी; और आवश्यकता पड़ने पर स्पष्ट बात कहने से नहीं चूके। 

मोलाराम एक ऊँची श्रेणी के विद्वान और राजनीतिज्ञ थे और एक निष्पक्ष दार्शनिक व तत्ववेत्ता की तरह अपने समय की राज्य-शक्तियों को सन्मार्ग बतलाते रहते थे। इनकी स्पष्टवादिता का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि वह “गोर्ख्याणी” का ज़माना था और गोर्खा सरदारों के विरुद्ध एक साधारण सी बात कहना भी जान पर खेलने के बराबर खतरनाक था। तथापि उपयुक्त अवसरों पर ये सत्य बात कहने से नहीं चूके और गोर्खा सरदार ने भी इनकी विद्वत्ता और प्रतिष्टा देखकर इनसे कुछ नहीं कहा। 

गोर्खा-साम्राज्य ने शिमला के पर्वती राज्यों तक शीघ्र अपनी सीमाएँ बढ़ा ली; लेकिन उसके बाद ही उसे भारत में उत्तरोत्तर बढ़ती हुई ब्रिटिश शक्ति का मुकाबला करना पड़ा। और अन्त में सन् 1815 ई० में, केवल 12 वर्ष तक यहां रह कर, गढ़वाल तथा अन्य पड़ोसी पर्वतीय राज्यों से हाथ धोकर, उसे अपनी प्रारम्भिक स्थिति ही स्वीकार करनी पड़ी।

गढ़वाल में अंग्रेजी शासन

अंग्रेजों ने देहरादून, मसूरी व चकराता का इलाका हथियाने के सिवाय अलकनन्दा से पूर्व का गढ़वाल भी अपने सीधे अधिकार में ले लिया और तत्कालीन गढ़वाल-नरेश महाराज सुदर्शनशाह को अलकनन्दा से पश्चिम का कुछ भाग दे दिया। अतः वे टिहरी में अपनी नई राजधानी बना कर वहीं रहने लगे। फलस्वरूप श्री मोलाराम के सम्मुख फिर एक जटिल प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि ये श्रीनगर में ही रहें, या अपने महाराजाओं के तत्कालीन उत्तराधिकारी के साथ टिहरी जाकर नये सिरे से अपना जीवन प्रारंभ करें। इनकी उम्र उस समय लगभग 75 वर्ष की हो चुकी थी, और अपनी चित्रशाला को उठा कर कहीं अन्यत्र ले जाना इनके लिए प्रायः असम्भव था; इसलिए सोच विचार करने के बाद इन्होंने श्रीनगर में ही रहने का निश्चय किया तथा मृत्यु-पर्यन्त वहीं रहे।

जीवन के अंतिम क्षण 

जीवन के अन्तिम चरण में, ऐसा अनुमान है कि, इन्हें आर्थिक निश्चिन्तता नहीं रही, क्योंकि यह कहा जाता है कि अंग्रेज-शासकों के समक्ष इन्होंने पुराने गढ़वाल नरेशों द्वारा दिये गये आर्थिक अनुदान तथा बाद में गोर्खा गवर्नर द्वारा तत्सम्बन्धी पुष्टि-पत्र प्रस्तुत किये, तथा अन्तिम अधिकारी तक प्रयत्न किया, लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिली, अर्थात इनके आर्थिक अनुदान बन्द हो गये। उधर टिहरी जाने से इनकार कर देने के कारण वे वहां नहीं गए। अतः अपनी पहले की कमाई तथा वर्तमान साधनों का उपयोग करके अपने पूर्वजों के स्थान श्रीनगर में ही किसी प्रकार इन्होंने अन्तिम अट्ठारह वर्ष बिताये; यद्यपि श्रीनगर को दुर्दशा और अपनी आर्थिक चिन्ताओं के कारण इन्हें नजीबाबाद, लखनऊ, कान्तिपुर, लाहौर, कांगड़ा, जयपुर आदि की यात्रा करनी पड़ी थी।

वृद्धावस्था तथा आर्थिक चिन्ता-इन दो कारणों ने स्वभावतया इनमें अध्यात्म-भावना को प्रबल किया। इसीलिये इन्होंने उस युग में अध्यात्म तथा मनस्तत्व-सम्बन्धी काव्यों की रचना की। साथ ही इन्होंने अपनी चित्रकला के लिये ‘दशावतार’ देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूप यथा ‘अष्ट दुर्गा’ग्रह आदि धार्मिक विषय छाँटे। इसके अतिरिक्त ये नये कलाकारों को शिक्षा देत रहे। उदाहरणस्वरूप महाराज सुदर्शनशाह के चाचा, कुवर प्रीतमशाह, इनके शिष्य थे और चित्रकला सीखने के लिये टिहरी से 30 मील पैदल चलकर इनके पास श्रीनगर आया करते थे। 

इस प्रकार अन्तिम क्षण तक कला-साधना करते हर तथा अपनी कला का प्रचार व प्रसार करते हुये इन्होंने श्रीनगर में सन् 1833 ई० को इस संसार से विदा लिया!!!

इनके चित्र तथा चित्रकला 

गढ़वाल ने पहाड़ी-चित्रकला के विकास में योग ही नहीं दिया, बल्कि श्री मोलाराम के नेतृत्व में उसे पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया था, क्योंकि ये ही उसके सर्वश्रेष्ठ तथा प्रतिनिधि कलाकार थे। इन्होंने अपनी प्रतिभा का चमत्कार यहां तक दिखाया कि पहाड़ी चित्रकला में “गढ़वाल शैली” का एक विशेष स्थान बन गया है । 

इनके चित्रों के विषय 

इनके चित्रों के विषय बहुत विस्तृत हैं – नायिका भेद, ऋतुओं और प्रकृति के विषय; ‘दशावतार’, ‘अष्टदुर्गा’, और ‘ग्रह’ आदि पौराणिक विषय; तथा दाम्पत्य-जीवन और तत्कालीन राज-परिवार के जीवन पर इन्होंने चित्र बनाये थे। जिन बारीकियों को कवि लोग अपनी साहित्यिक रचनाओं में नहीं दिखा पाये, उनको इन्होंने रेखाओं और रंगों के द्वारा प्रदर्शित किया है। चूंकि ये स्वयं एक कवि थे, इसलिये कई साहित्यिक शब्द-चित्र इनके चित्रों में बड़े आकर्षक ढंग से जीवित हो उठे हैं।

चित्रों की विशेषतायें 

इनके चित्रों की विशेषतायें इस प्रकार हैं ये रंगों के मिश्रण में बहुत कुशल थे, विशेषकर सुनहरे और हरे रंग के मिश्रण में। उन दिनों एक-चक्षु-चित्र बनाने की प्रणाली प्रचलित थी; इसलिये इन्होंने भी सभी चित्र एक-चक्षु बनाये। इनके चित्रों में हिमालय की छटा और गढ़वाली वृक्षों व पशु-पक्षियों की शोभा भी स्पष्ट दिखाई देती है: प्रायः प्रत्येक चित्र में इन्होंने श्रीनगर के दोनों ओर के ‘नर’ व ‘नारायण’ पर्वत तथा बीच में बहती हुई अलकनन्दा की धारा दिखाई है। साथ ही गढ़वाल में सर्वत्र फूलने वाले ‘मनोरा’ वृक्ष को भी चित्रित किया है। 

प्रारम्भ में लगभग 30 वर्ष की आयु तक ये मुगल शैली में चित्र बनाते थे; बाद में इन्होंने पहाड़ी शैली को अपनाया और उसमें प्राचार्यत्व प्राप्त किया। महिलाओं के शरीर तथा उनकी वेष-भूषा का इन्होंने विस्तार-पूर्वक बारीकी के साथ चित्रण किया है। लगभग दो सौ वर्ष बीत जाने पर भी इनके चित्रों की चमक व स्पष्टता अभी तक पूर्ववत है। 

पहाड़ी तथा गढ़वाल-शैलियों के अन्य चित्रकारों से एक अधिक विशेषता इनमें यह है कि इन्होंने प्रायः प्रत्येक चित्र पर अपना नाम व तिथि अंकित कर दी है तथा सुन्दर कवितायें लिखकर उन्हें चमका दिया है। 

श्री मुकन्दीलाल के प्रयासों द्वारा 

इनको सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का श्रेय श्री मुकन्दीलाल, बी० ए० (औक्सन), बार-एट-लौ को जाता है। सन् 1908 में जब मुकन्दीलाल बनारस हिंद कौलेज के छात्र थे, उन्हें अपने गुरु स्वगीय डा० आनन्द के० कुमारस्वामी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ; वे भारतवर्ष के उच्चतम कला-पारखियों में से एक थे; उनके प्रोत्साहन पर श्री मुकन्दीलाल ने इनके चित्रों तथा कला के सम्बन्ध में सामग्री एकत्र करना प्रारम्भ किया। सन् 1909 में उन्होंने इनके कुछ चित्र डा० कुमारस्वामी को दिखाये; उनमें से 6 चित्र उन्होंने खरीद लिए और वे अब अमेरिका के बोस्टन म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं। सन् 1910 ई० में श्री मुकन्दीलाल ने प्रयाग की प्रदर्शिनी में इनके कुछ चित्र प्रदर्शित किये और तब अधिकाधिक लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ। उन्हीं दिनों कलकत्ते के प्रसिद्ध अंग्रेजी मासिक पत्र “माडर्न रिव्यू” के दो अंकों में श्री मुकन्दीलाल ने इनके विषय में लेख प्रकाशित कराये तथा दो रंगीन चित्र भी छपवाए। उसी वर्ष बंगाल के प्रसिद्ध कलाकार श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई श्री गगनेन्द्रनाथ ठाकुर ने इनके वंशधर श्री बालकराम साह से इनके कुछ चित्र खरीद लिये; वे अब अहमदाबाद के “श्री कस्तूरभाई लालभाई संग्रह” में मौजूद हैं। 

उसके बाद तो सारे देश का ध्यान इनकी ओर बड़े जोरों से आकर्षित हुआ। डा० के० आनन्द कुमारस्वामी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “राजपूत कला” (राजपूत आर्ट) में इन्हें “गढ़वाल-शैली” का निर्माता घोषित किया। उनके बाद श्री जे० सी० फ्रेंच ने अपनी पुस्तक “हिमालयन आर्ट” में इनको चित्रकला का उल्लेख किया। फिर श्री अजित घोष ने “राजपूत चित्रकला की पहाड़ी शैली” विषय पर अपने विद्वत्तापूर्ण भाषण में इनका वर्णन किया। श्री एन०सी० मेहता ने अपनी पुस्तक “भारतीय चित्रकला का अध्ययन” (स्टडीज़ इन इण्डियन पेंटिंग) में तथा अपने अन्य लेखों में इनका उल्लेख किया।

इधर श्री मुकन्दीलाल, मोलाराम पर अध्ययन करते तथा लिखते चले आये हैं । “मौडने रिव्यू” के अतिरिक्त उन्होंने “विशाल भारत”, “सरस्वती” और “रूपम” आदि प्रतिष्ठित पत्रों में लेख लिखे हैं। प्रयाग की “हिंदुस्तानी” पत्रिका में सन् 1932 से सन् 1942 तक उनकी एक लेखमाला “चित्रकार मोलाराम की चित्रकला और कविता” शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। सन 1946-50 में अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिका “रूप-लेखा” में उनकी एक लेखमाला “चित्रकला की गढ़वाल शैली” (गढ़वाल स्कूल ऑफ़ पेण्टिग) प्रकाशित हुई थी। उसी लेखमाला में उन्होंने घोषित किया कि वे शीघ्र ही “मोलाराम और उनकी कला का अध्ययन” (हिस्ट्री औक मोलाराम एण्ड हिज आर्ट) पुस्तक प्रकाशित करने वाले हैं। साथ ही उन्होंने “चित्रकला की गढ़वाल शैली का इतिहास” (हिस्ट्री औफ दि गढ़वाल स्कूल औक पेण्टिग) भी तैयार की है।

 

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