सिख धर्म (Sikhism)

सिख धर्म (Sikhism)

‘सिख (Sikh)’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘शिष्य’ होता है। तीर्थयात्रा, जप-तप, पूजा-पाठ, जाति-पांति आदि आडंबरों के कट्टर विरोधी थे। सोलहवीं शताब्दी में भारत में उदित इस धर्म के संस्थापक सिखों के प्रथम गुरू गुरूनानक (Gurunanak) माने जाते हैं। इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के ‘ननकाना साहिब’ नामक स्थान पर हुआ था।

गुरू नानक ने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए ऐसे मत का प्रवर्तन किया, जिसमें दोनों की समर्पण भावना झलकती है। नानक ने ईश्वर को निराकार, अबोधगम्य व अविनाशी बताया। वे मूर्ति पूजा के खिलाफ थे। उन्होंने अंधविश्वासों का जमकर विरोध किया, चाहे वे हिन्दुओं के हों या मुसलमानों को गुरूनानक ने जगह-जगह घूमकर अंधविश्वासों से बचने व उस सच्चे निरंकार के प्रति समर्पित होने का संदेश दिया। उन्होंने कविताओं व गीतों के माध्यम से भाईचारा, सहिष्णुता, प्रेम एवं भक्ति का प्रकाश फैलाया। उनके विचारों, गीतों व कविताओं का संकलन किया गया जिसे पवित्र ‘आदि ग्रंथ’ का नाम दिया जाता है। 

गुरू नानक की शिक्षाएँ तीन तरीके से व्यवहार में लायी जाती हैं – 

  • वंद चक्को : दूसरों से बाँटो और जरूरतमंदो की मदद करो; 
  • कीरत करो : बिना धूर्तता व छल के ईमानदारी के साथ आजीविका चलाना; 
  • नाम जपना : दिव्य ईश्वर का नाम जपना तथा सदैव स्मरण करना। 

गुरू नानक के बाद नौ गुरू हुए। दसवें और आखिरी गुरू गुरू गोविन्द सिंह थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ ‘लड़ाका फौज’ तैयार की, जिसे ‘खालसा’ के नाम से जाना जाता है। 

सिख धर्म की शाखा खालसा में पाँच वस्तुएँ – कंघा, कड़ा, केश, कच्छा तथा कृपाण के प्रयोग पर बल दिया गया है। 

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सिख धर्म के प्रमुख सिद्धांत व शिक्षाएँ इस प्रकार हैं – 

  • एकेश्वरवाद में विश्वास।
  • आत्मा की अमरता में विश्वास। 
  • मूर्ति पूजा का विरोध।
  • बाल-विवाह का विरोध। 
  • जाति प्रथा का विरोध।

सिख गुरु

नाम पिता माता
गुरू नानक देव महिता कालू माता त्रिपता
गुरू अंगद देव बाबा फेरूमाॅल  माता रामो
गुरू अमरदास तेज भान माता बख़त कौर
गुरू रामदास बाबा हरीदास माता दइआ कौर
गुरू अरजन देव गुरू रामदास माता भानी
गुरू हरगोबिंद गुरू अरजन देव माता गंगा
गुरू हरिराइ बाबा गुरदिੱता माता निहाल कौर
गुरू हरि क्रिशन गुरू हरिराइ माता क्रिशन कौर
गुरू तेग बहादुर गुरू हरगोबिंद माता नानकी
गुरू गोविन्द सिंह गुरू तेग बहादर माता गूजरी

 

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