‘वंदे मातरम्’, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में लिखा, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया। परंतु इसके बाद प्रकाशित आनंदमठ के संदर्भ, बाद की वैचारिक व्याख्याएँ, और इसके कुछ धार्मिक रूपक—विशेषकर दुर्गा एवं लक्ष्मी से तुलना—ने इसे हिंदू-मुस्लिम विवाद का केंद्र भी बनाया। कांग्रेस, मुस्लिम लीग, टैगोर, नेहरू और बोस के भिन्न दृष्टिकोणों ने इसे राष्ट्रीय गीत घोषित करने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को आकार दिया।
वंदे मातरम्: राष्ट्रवाद, धार्मिक संवेदनाएँ और राजनीतिक विमर्श का इतिहास
(Vande Mataram: A History of Nationalism, Religious Sensitivities, and Political Discourse)
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ऐतिहासिक व संवैधानिक पृष्ठभूमि (Constitutional & Historical Background)
‘वंदे मातरम्’ का इतिहास सिर्फ एक गीत का इतिहास नहीं है; यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों, औपनिवेशिक प्रतिरोध, धार्मिक विविधता, और राजनीतिक वैचारिकताओं के बीच उभरे गंभीर विमर्श का दस्तावेज़ है।
गीत की उत्पत्ति 19वीं सदी के उस दौर में हुई जब बंगाल में कृषि संकट, अकाल, और औपनिवेशिक दमन एक साथ सक्रिय थे। इस सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारतीय नवजागरण की बौद्धिक लहर भी उठ रही थी, जो राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक आयामों को नए रूप में अभिव्यक्त कर रही थी।
हालांकि स्वतंत्र भारत के संविधान में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा 1951 में दिया गया, लेकिन यह दर्जा सहजता से नहीं आया। इसका संबंध उन राजनीतिक संघर्षों से था जिनमें मुस्लिम लीग, कांग्रेस, हिंदू महासभा, और विभिन्न भारतीय चिंतक शामिल थे।
वंदे मातरम् की उत्पत्ति (Origins of Vande Mataram)
इतिहासकार सव्यसाची भट्टाचार्य के अनुसार, वंदे मातरम् की रचना 1870 के शुरुआती वर्षों में हुई। बाद में इसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (प्रकाशन: 1881) में विस्तारित रूप में शामिल किया गया।
उपन्यास का परिवेश 1770 का दशक, अर्थात् फकीर-सन्यासी विद्रोह का काल था—एक ऐसा समय जब बंगाल भीषण अकाल, कर्ज़ संकट, और जमींदारी दमन से जूझ रहा था। इस परिवेश में राष्ट्रमाता की अवधारणा को धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया।
गीत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी अनुवादक अरविंद घोष (Aurobindo Ghosh) ने इसकी शुरुआत “I bow to thee, Mother” से की। बाद के छंदों में भारतमाता की तुलना दुर्गा, लक्ष्मी, और सरस्वती से की गई है। यह तुलना, बाद में, विवादों का प्रमुख आधार बनी।
स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की राजनीतिक भूमिका (Political Role in Freedom Movement)
1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुई। इसी क्षण से ‘वंदे मातरम्’ एक सांस्कृतिक प्रतीक से आगे बढ़कर उपनिवेश-विरोधी आंदोलन का युद्ध-घोष बन गया।
स्वदेशी आंदोलन, ब्रिटिश वस्तुओं की बहिष्कार सभाएँ, छात्र आंदोलन, और सार्वजनिक जुलूसों में “वंदे मातरम्” का उद्घोष औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देता था। इस प्रकार, गीत ने भारतीय राष्ट्रवाद के भावनात्मक एकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परंतु यही लोकप्रियता बाद में सांप्रदायिक तनाव का कारण भी बनी। विशेष रूप से 1920 और 1930 के दशक में जब हिंदू-मुस्लिम संबंध बिगड़ने लगे, यह गीत राजनीतिक मतभेदों का प्रतीक बन गया।
मुस्लिम लीग का दृष्टिकोण (Muslim League’s Perspective)
मुस्लिम लीग की आपत्तियाँ मुख्यतः दो आधारों पर थीं—
- धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग (Idolatrous Imagery)
- बाद के छंदों में देवी-देवताओं के संदर्भ
1938, कराची, सिंध प्रांतीय मुस्लिम लीग सम्मेलन में मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि कांग्रेस की विधानसभाएँ वंदे मातरम् से आरंभ कर “मुसलमानों के प्रति घृणा फैलाने वाले गीत” गाती हैं।
इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश अधिकारी सर हेनरी क्रैक ने 1937 में लिखा कि यह गीत “Muslims के विरुद्ध एक ‘hymn of hate’ के रूप में उत्पन्न हुआ”—एक दावा अत्यंत विवादास्पद परंतु लीग के तर्कों को राजनीतिक आधार देने वाला था।
इस प्रकार, मुस्लिम लीग के लिए यह गीत सिर्फ धार्मिक आपत्तियों का विषय नहीं था, बल्कि यह कांग्रेस की प्रमुखता और हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार का प्रतीक भी माना जाता था।
1930–40 के दशक की राजनीति और सांप्रदायिक तनाव (Communal Climate of 1930s–40s)
1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस की सरकारें स्थापित होने के बाद यह मुद्दा और तीखा हो गया। कई मुस्लिम संगठनों का तर्क था कि स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों और विधानसभाओं में गीत को अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
इस काल में—
- 1926 के चुनाव,
- विभिन्न दंगों,
- हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग के उभार—
ने इस गीत को हिंदू सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना दिया, जिससे उस पर मुस्लिम समुदाय की आपत्तियाँ और बढ़ीं।
कांग्रेस का दृष्टिकोण (Congress’s Perspective)
कांग्रेस के लिए चुनौती दोहरी थी—
- राष्ट्रीय आंदोलन में गीत का ऐतिहासिक योगदान
- मुस्लिम समाज की संवेदनशीलताओं का सम्मान
इसलिए 1930 और 1940 के दशक में कांग्रेस के अंदर गहन बहसें चलीं।
नेहरू का दृष्टिकोण
जवाहरलाल नेहरू ने अक्टूबर 1937 में सुभाष चंद्र बोस को लिखा कि विरोध “काफी हद तक साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा गढ़ा गया” है, परंतु कुछ आपत्तियों में “वास्तविक आधार” भी है।
नेहरू का दृष्टिकोण था कि:
- राजनीतिक उपयोगिता हेतु किसी समूह की भावनाओं की अनदेखी उचित नहीं,
- परंतु नीति साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर नहीं बननी चाहिए।
सुभाष चंद्र बोस का दृष्टिकोण
बोस गीत के प्रबल समर्थक थे और इसे कांग्रेस की सांस्कृतिक विरासत का अविभाज्य भाग मानते थे। उनके अनुसार, इस गीत में राष्ट्रसम्मान और आत्मबल का संदेश है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर का हस्तक्षेप
नेहरू ने जब टैगोर से राय माँगी, तो टैगोर ने लिखा कि उन्हें गीत के पहले दो छंद अत्यंत प्रिय हैं, क्योंकि उनमें प्रकृति और मातृभूमि की सौम्य एवं मानवीय छवि है। परंतु बाद के छंदों में देवी-देवताओं के रूपक और आनंदमठ से जुड़ा राजनीतिक-सांप्रदायिक संदर्भ उन्हें स्वीकार्य नहीं था।
टैगोर ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने 1896 के कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार स्वयं इस गीत को गाया था, लेकिन राष्ट्रीय गीत के रूप में पहले दो छंद पर्याप्त हैं।
कांग्रेस कार्यसमिति का ऐतिहासिक प्रस्ताव, 1937 (CWC Resolution 1937)
अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने गीत पर औपचारिक प्रस्ताव लाया।
प्रारंभिक मसौदे में लिखा था:
“महान राष्ट्रीय गीत आदेश पर नहीं बनते; वे तब आते हैं जब प्रतिभा चाहती है, और जनता उन्हें स्वीकार करती है।”
लेकिन अंतिम प्रस्ताव में यह हिस्सा हटा दिया गया। अंतिम प्रस्ताव के महत्वपूर्ण बिंदु थे:
- पहले दो छंद ‘राष्ट्रीय आंदोलन का अविभाज्य हिस्सा’ बन चुके हैं।
- इनमें किसी भी समुदाय को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
- बाकी छंद आमतौर पर न गाए जाते हैं और उनमें कुछ धार्मिक संकेत हैं जिन पर मुस्लिम मित्रों ने आपत्ति की है।
- राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो छंद गाए जाएँ।
- आयोजकों को किसी अन्य “असंदिग्ध” गीत गाने की स्वतंत्रता हो।
यह निर्णय भारतीय राष्ट्रवाद के समावेशी दृष्टिकोण का प्रतिनिधि था, जहाँ सांस्कृतिक परंपरा और धार्मिक विविधता में संतुलन खोजा गया।
संविधान निर्माण और 1951 का अंतिम निर्णय (Constituent Assembly & 1951 Decision)
संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों पर चर्चा के दौरान अत्यधिक संवेदनशील रुख अपनाया।
1951 में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, बतौर सभा-अध्यक्ष, ने घोषणा की:
- ‘जन गण मन’ को राष्ट्रीय गान का दर्जा दिया जाएगा।
- ‘वंदे मातरम्’ (पहले दो छंद) को राष्ट्रीय गीत माना जाएगा।
इस प्रकार, कांग्रेस कार्यसमिति का 1937 का प्रारूप स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक नीति का आधार बन गया।
सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक बहसें (Social Impact & Cultural Debates)
‘वंदे मातरम्’ ने भारत की सांस्कृतिक स्मृति को कई स्तरों पर प्रभावित किया है:
- राष्ट्रीय भावना का स्रोत – स्वतंत्रता सेनानियों के लिए (जैसे कि बिपिनचंद्र पाल, अरविंद घोष, लाला लाजपत राय) यह गीत आध्यात्मिक शक्ति और राजनीतिक प्रेरणा का प्रतीक था।
- साहित्यिक महत्त्व – बंकिमचंद्र का आनंदमठ बंगाल एवं भारतीय साहित्य में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
- धार्मिक विविधता और बहुलतावाद – गीत पर मुस्लिम लीग की आपत्तियों ने यह प्रश्न उठाया कि:
- क्या एक राष्ट्रगीत सभी समुदायों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान कर सकता है?
- क्या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद धार्मिक राष्ट्रवाद में बदल सकता है?
- आधुनिक राजनीतिक विमर्श – हाल के वर्षों में गीत को बाध्यतामूलक बनाए जाने पर बहस पुनः उभरी है। यह बहस धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान की परिभाषा के इर्द-गिर्द घूमती है।
आगे का मार्ग — एक संतुलित दृष्टिकोण (Path to Balanced Resolution)
भारत जैसे बहुविध समाज में राष्ट्रीय प्रतीक समावेशिता, सभी समुदायों के सम्मान, और इतिहास की बहुल व्याख्याओं के आधार पर निर्मित होने चाहिए। ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो छंदों को अपनाने का निर्णय इसी दिशा में एक व्यावहारिक समाधान था।
यह निर्णय यह भी स्वीकार करता है कि:
- सांस्कृतिक परंपराएँ मूल्यवान हैं।
- परंतु राष्ट्रीय प्रतीक “एकता” के उपकरण होते हैं, न कि सांप्रदायिक विभाजन के।
आज के समय में आवश्यकता है कि गीत को उसके ऐतिहासिक संदर्भ, साहित्यिक मूल्य, और राजनीतिक विवादों—सबकी संतुलित समझ के साथ पढ़ा जाए।
निष्कर्ष (Conclusion)
‘वंदे मातरम्’ एक गीत से कहीं अधिक है। यह—
- भारतीय राष्ट्रवाद की उभरती चेतना,
- औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध संघर्ष,
- धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान,
- राजनीतिक विवाद,
सभी का प्रतीक है।
संविधान सभा द्वारा 1951 में पहले दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा देना यह दर्शाता है कि भारतीय राष्ट्रवाद मूलतः समावेशी, संवाद आधारित, और बहुलतावादी है।
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📌 UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न GS Paper I (Essay Paper)
GS Paper I (Modern Indian History)
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