UKPSC APS Mains Exam Paper II - 14 March 2026 (Answer Key)

UKPSC APS Mains Exam Paper II (Essays and Drafting) – 14 March 2026 (Answer)

March 16, 2026

(iv) डिजिटल इंडिया और समावेशी विकास

21वीं सदी ‘सूचना और तकनीक’ की सदी है। इस युग में किसी भी राष्ट्र की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने नागरिकों को तकनीक से कितनी कुशलतापूर्वक जोड़ पाता है। भारत सरकार द्वारा 1 जुलाई, 2015 को शुरू किया गया ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान इसी दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। इसका मूल उद्देश्य न केवल देश को डिजिटल रूप से सशक्त बनाना है, बल्कि ‘समावेशी विकास’ (Inclusive Growth) के लक्ष्य को प्राप्त करना भी है, जहाँ विकास का लाभ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक बिना किसी भेदभाव के पहुँचे।

डिजिटल इंडिया के मुख्य स्तंभ

डिजिटल इंडिया कार्यक्रम मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों पर केंद्रित है:

  • प्रत्येक नागरिक के लिए एक उपयोगिता के रूप में डिजिटल बुनियादी ढाँचा।
  • मांग पर शासन और सेवाएँ ।
  • नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण। ब्रॉडबैंड हाईवे, यूनिवर्सल मोबाइल एक्सेस और ई-गवर्नेंस जैसे स्तंभों ने भारत की प्रशासनिक और सामाजिक संरचना को बदल दिया है।

समावेशी विकास में डिजिटल इंडिया की भूमिका

डिजिटल इंडिया ने समावेशी विकास के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है:

1. वित्तीय समावेशन : ‘जनधन-आधार-मोबाइल’ (JAM) त्रिमूर्ति ने बैंकिंग व्यवस्था में क्रांति ला दी है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से अब सरकारी योजनाओं का पैसा (पेंशन, सब्सिडी, छात्रवृत्ति) सीधे लाभार्थी के खाते में पहुँचता है। इसने बिचौलियों की भूमिका और भ्रष्टाचार को समाप्त कर गरीब और वंचित वर्गों को उनका पूरा हक दिलाया है।

2. शिक्षा और स्वास्थ्य में सुगमता: ‘दीक्षा’ और ‘स्वयं’ जैसे पोर्टल्स के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र भी देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। वहीं, ‘ई-संजीवनी’ जैसी टेली-मेडिसिन सेवाओं ने दूर-दराज के गाँवों में विशेषज्ञों द्वारा इलाज को संभव बनाया है, जो समावेशी स्वास्थ्य की दिशा में बड़ा कदम है।

3. कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था: ‘ई-नाम’ (e-NAM) जैसे प्लेटफार्मों ने किसानों को बिचौलियों के जाल से मुक्त कर अपनी उपज देश के किसी भी कोने में बेचने की शक्ति दी है। डिजिटल साक्षरता अभियान (PMGDISHA) के तहत करोड़ों ग्रामीणों को तकनीक से जोड़ा जा रहा है।

4. महिला सशक्तिकरण और उद्यमिता: डिजिटल तकनीक ने महिलाओं के लिए घर बैठे स्वरोजगार के द्वार खोले हैं। सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) और सोशल मीडिया के माध्यम से महिला स्वयं सहायता समूह अपने उत्पादों को वैश्विक बाजार तक पहुँचा रहे हैं।

चुनौतियाँ: डिजिटल डिवाइड

सफलता के बावजूद, ‘डिजिटल डिवाइड’ (शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे में अंतर) एक बड़ी चुनौती है। आज भी कई दुर्गम पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की गति और बिजली की उपलब्धता एक मुद्दा है। इसके अलावा, साइबर सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के प्रति जागरूकता की कमी समावेशी विकास की गति को बाधित कर सकती है।

निष्कर्ष

डिजिटल इंडिया केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है। इसने तकनीक को विलासिता से हटाकर ‘बुनियादी अधिकार’ बना दिया है। समावेशी विकास के लिए यह आवश्यक है कि तकनीक सुलभ (Accessible) होने के साथ-साथ सस्ती (Affordable) भी हो। यदि हम अपनी डिजिटल साक्षरता और बुनियादी ढाँचे को और सुदृढ़ करते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत एक ऐसी अर्थव्यवस्था बनेगा जहाँ हर नागरिक डिजिटल रूप से साक्षर और आर्थिक रूप से स्वतंत्र होगा। डिजिटल इंडिया वास्तव में ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को साकार करने का सबसे सशक्त माध्यम है।

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