| 8. निम्नलिखित में से किसी एक पर हिन्दी भाषा में, विषय का अंकन करते हुए लगभग 500 (पाँच सौ) शब्दों में निबन्ध लिखिए: | अंक : 25 |
(i) उत्तराखण्ड में भूस्खलन: कारण, प्रभाव एवं निवारण
हिमालय की गोद में बसा उत्तराखण्ड अपनी नैसर्गिक सुंदरता के लिए ‘देवभूमि’ के रूप में विख्यात है। परंतु, पिछले कुछ दशकों से यह राज्य अपनी भौगोलिक संवेदनशीलता के कारण भीषण प्राकृतिक आपदाओं, विशेषकर भूस्खलन की चपेट में है। भूस्खलन एक ऐसी भू-वैज्ञानिक घटना है जिसमें ढालों पर जमा मलबा, मिट्टी या चट्टानें गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे की ओर खिसकने लगती हैं। उत्तराखण्ड के लिए यह केवल एक भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि एक स्थायी मानवीय और आर्थिक त्रासदी बन चुकी है।
भूस्खलन के मुख्य कारण
उत्तराखंड में भूस्खलन के कारणों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
1. प्राकृतिक कारण:
- भौगोलिक बनावट: हिमालय विश्व की सबसे नवीन पर्वत श्रृंखला है, जिसकी चट्टानें अभी भी कच्ची और अस्थिर हैं।
- अत्यधिक वर्षा: मानसून के दौरान ‘बादल फटने’ की घटनाओं से मिट्टी की पकड़ ढीली हो जाती है, जिससे पहाड़ दरकने लगते हैं।
- भूकंपीय संवेदनशीलता: उत्तराखंड ‘भूकंपीय जोन 4 और 5’ में आता है। हल्के भूकंप के झटके भी पहाड़ों में दरारें पैदा कर देते हैं।
2. मानवीय कारण (मानव-जनित):
- अवैज्ञानिक निर्माण: सड़कों को चौड़ा करने के लिए पहाड़ों की अनियंत्रित कटाई और ‘ब्लास्टिंग’ (विस्फोट) ने पर्वतों की नींव हिला दी है।
- वनों का कटाव: पेड़ों की कमी के कारण मिट्टी का कटाव बढ़ गया है।
- अनियंत्रित पर्यटन: क्षमता से अधिक भार और भारी वाहनों की आवाजाही ने मृदा पर दबाव बढ़ा दिया है।
- जल विद्युत परियोजनाएं: नदियों पर बने बांध और सुरंग निर्माण से भू-गर्भीय संतुलन बिगड़ रहा है।
प्रभाव: एक गंभीर चुनौती
भूस्खलन के प्रभाव बहुआयामी और दीर्घकालिक होते हैं:
- जन-धन की हानि: प्रतिवर्ष सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं और बस्तियां मलबे में दब जाती हैं।
- अवरुद्ध मार्ग: चारधाम यात्रा और स्थानीय संपर्क मार्ग बाधित होने से खाद्य आपूर्ति और चिकित्सा सेवाएं ठप हो जाती हैं।
- नदियों का मार्ग परिवर्तन: मलबे के कारण नदियां कृत्रिम झीलें बना लेती हैं, जिनसे बाद में ‘फ्लैश फ्लड’ (अकस्मात बाढ़) का खतरा बढ़ जाता है।
- आर्थिक क्षति: कृषि योग्य भूमि का विनाश होता है और पर्यटन उद्योग (जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है) को भारी धक्का लगता है।
निवारण एवं प्रबंधन
भूस्खलन को पूरी तरह रोकना असंभव है, लेकिन इसके प्रभाव को न्यूनतम किया जा सकता है:
- सतत विकास : पहाड़ों में निर्माण कार्य के दौरान ‘ब्लास्टिंग’ के बजाय आधुनिक और कम हानिकारक तकनीकों का प्रयोग करना चाहिए।
- वनीकरण : ढालों पर गहरी जड़ों वाले पौधे लगाकर मिट्टी की पकड़ मजबूत की जानी चाहिए।
- प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली : संवेदनशील क्षेत्रों में सेंसर लगाकर समय रहते सूचना देने की व्यवस्था सुदृढ़ हो।
- रिटेनिंग वॉल और ड्रेनेज: सड़कों के किनारे मजबूत दीवारें और जल निकासी के उचित प्रबंध होने चाहिए ताकि पानी पहाड़ों के अंदर न रिस सके।
- आपदा प्रबंधन: राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) को और अधिक तकनीकी रूप से सक्षम बनाना।
निष्कर्ष
उत्तराखण्ड में भूस्खलन की समस्या प्रकृति और मानव के बीच बिगड़ते संतुलन का परिणाम है। हमें यह समझना होगा कि विकास की कीमत विनाश से नहीं चुकाई जा सकती। ‘पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था’ के बीच समन्वय बिठाकर ही हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित देवभूमि सौंप सकते हैं। सरकार, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
