| 2. निम्नलिखित गद्यांश का संक्षेपण (केवल एक अनुच्छेद में) लिखिए, जो गद्यांश की शब्द संख्या के एक-तिहाई से अधिक न हो । | अंक : 10 |
भारतीय धर्म और संस्कृति के संबंध में अंग्रेज प्रशासकों और ईसाई मिशनरियों के आक्रामक रुख के कारण धर्म-सुधारकों के लिए धारदार मार्ग से गुजरना आवश्यक हो गया। एक ओर उन्हें विदेशियों के समक्ष अपने धर्म और संस्कृति की वकालत करनी पड़ी और दूसरी ओर देशवासियों के समक्ष धर्म का नया अर्थापन करना पड़ा । इस संक्रांतिकाल में धर्म का पल्ला पकड़ना बहुत आवश्यक था, क्योंकि धर्म अनिवार्यतः समाज- सुधार के साथ जुड़ा हुआ था । पुराणपंथी और सुधारक दोनों ने अपने मत के प्रचारार्थ धर्मशास्त्रों की शरण ली । राजा राममोहन राय को सती प्रथा के उन्मूलन के लिए धर्मशास्त्रों की गवाही की आवश्यकता हुई । विद्यासागर ने सिद्ध किया कि धर्मशास्त्रों में वैधव्य का कोई विधान नहीं है। दयानंद सरस्वती सामाजिक सुधारों को वैधता देने के लिए वेदों की ओर उन्मुख हुए। धीरे-धीरे तर्क की संगति पर विशेष बल दिया जाने लगा। इससे रूढ़ियों को उच्छिन्न करने में सुविधा हुई। फलत: परंपरावादी और धर्म-सुधारक दोनों ही अतीत के गौरव को जागरित करने में सफल हुए। इससे भारतीयों में आत्मसम्मान का बोध हुआ और बराबरी के स्तर पर पश्चिम का सामना करने तथा स्वतंत्रता की माँग करने का आत्मविश्वास मिला । यद्यपि परंपरावादी लोग धर्म-सुधार में आस्था नहीं रखते थे, फिर भी राष्ट्रीयता पर उन्होंने अत्यधिक बल दिया । उनका कहना था कि राष्ट्रीयता में सभी सुधार समाविष्ट हैं। वस्तुतः जिन्हें परंपरावादी कहा जाता है और जिस अर्थ में कहा जाता है, उस अर्थ में वे परंपरावादी नहीं थे। परंपरा की निरंतरता में कुछ अंश नये युग के प्रसंग में सार्थक होते हैं और कुछ अर्थहीन । परंपरा की प्रासंगिकता किस तत्त्व में है और किसमें नहीं, इसका विवेचन और चयन अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । परंपरावादियों ने भी इस चयन में विवेक का परिचय दिया ।
दिए गए गद्यांश का संक्षेपण
अंग्रेज प्रशासकों एवं मिशनरियों की चुनौतियों के बीच भारतीय धर्म-सुधारकों ने शास्त्रों की नवीन व्याख्या कर समाज-सुधार और राष्ट्रीयता को जोड़ा। राजा राममोहन राय, विद्यासागर और दयानंद सरस्वती जैसे मनीषियों ने रूढ़ियों के उन्मूलन हेतु तर्क और परंपरा का सहारा लिया, जिससे भारतीयों में आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का आत्मविश्वास जगा। परंपरावादियों और सुधारकों, दोनों ने ही अतीत के गौरव को पुनर्जीवित करते हुए आधुनिक संदर्भ में परंपरा के सार्थक तत्वों का विवेकपूर्ण चयन किया, जिससे अंततः राष्ट्रीय चेतना सुदृढ़ हुई।
