Governor of Bengal

बंगाल के गवर्नर जनरल (Governor General of Bengal)

ब्रिटिश गवर्नर जनरल मूल रूप से भारत में ब्रिटिश प्रशासन के मुखिया थे। ये कार्यालय फोर्ट विलियम के प्रेसीडेंसी के गवर्नर जनरल के शीर्षक के साथ 1773 में बनाया गया था।

Click Here बंगाल के गवर्नर (Governor of Bengal)
Click Here भारत के गवर्नर जनरल (Governor General of India)
Click Here भारत के वायसराय (The Viceroy of India)

बंगाल के गवर्नर जनरल (Governor General of Bengal)

वारेन हेस्टिग्स (Warren Hastings)

कार्यकाल – 1774 – 1785
महत्वपूर्ण कार्य – 

  1. बनारस की सन्धि (1773)
  2. रेग्युलेटिंग एक्ट (1773) के अंतर्गत कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय की स्थापना
  3. फैजाबाद की सन्धि (1775)
  4. एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल
  5. नन्द कुमार पर अभियोग (1775)
  6. पिट्स इंडिया एक्ट (1784)
  7. महाभियोग –  हेस्टिंग्स भारत का एकमात्र गवर्नर जनरल था जिस पर बर्क ने महाभियोग का मुकदमा दायर किया। 

नंद कुमार अभियोग (1775) –
नन्द कुमार जो मुर्शिदाबाद का भूतपूर्व दीवान था, उसने हेस्टिग्स पर यह आरोप लगाया था कि उसने मीरजाफर की विधवा मुन्नी बेगम से ₹ 3.5 लाख नवाब मुबारिकुद्दौला का संरक्षक बनने के लिए घूस ली थी। वारेन हेस्टिग्स ने इलिजाह इम्‍पे (Elijah Impey) की मदद से जालसाजी के मुकदमे में नन्द कुमार को फांसी पर लटका दिया इसे न्यायिक हत्या कहा गया है। पिट्स इण्डिया एक्ट के विरोध में इस्तीफा देकर जब वारेन हेस्टिंग्स फरवरी, 1785 ई. में इंग्लैण्ड पहुँचा, तो बर्क द्वारा उस पर महाभियोग लगाया गया। ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में 1788 ई.से 1795 ई. तक 7 वर्ष महाभियोग चला, परन्तु संसद ने उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

सर जॉन मैकफरसन  (Sir John McPherson)

कार्यकाल – 1785 – 1786 ई.

  • सर जॉन मैकफरसन ने भारत में अस्थायी नियुक्ति पर मात्र एक वर्ष कार्य किया।

लॉर्ड कार्नवालिस (Lord Cornwallis)

कार्यकाल – 1786 – 1793 

  • 1786 ई. में कम्पनी ने एक उच्च वंश तथा कुलीन वृत्ति के व्यक्ति लॉर्ड कार्नवालिस को पिट्स इण्डिया एक्ट के अन्तर्गत रेखांकित शान्ति स्थापना तथा शासन के पुनर्गठन हेतु गवर्नर-जनरल नियुक्त कर भारत भेजा। 

न्यायिक सुधार 

  • कार्नवालिस कोड शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धान्त पर आधारित था, जिसके तहत न्याय प्रशासन तथा कर को पृथक् कर दिया गया अर्थात् कलेक्टर की न्यायिक व फौजदारी शक्तियाँ ले ली गई तथा उसके पास केवल कर सम्बन्धी शक्तियाँ रह गईं। 
  • उसने वकालत के पेशे को नियमित बनाया।

सिविल सेवा सुधार

  • कार्नवालिस को भारत में नागरिक सेवा ICS का जन्मदाता माना जाता है। 
  • प्रथम भारतीय ICS सत्येन्द्रनाथ टैगोर 1863 ई. में बने। 
  • प्रारम्भ में इस परीक्षा की अधिकतम आयु सीमा 23 वर्ष थी, जिसे लिटन ने घटाकर 19 वर्ष कर दिया।

पुलिस सुधार 

  • कार्नवालिस ने ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों के पुलिस अधिकारों को समाप्त कर थानों की स्थापना की और वहाँ एक दरोगा व कुछ पुलिस कर्मचारी नियुक्त किए। 
  • अंग्रेजी दण्डनायकों (Magistrates) को जिले की पुलिस का भार दिया गया। 
  • कार्नवालिस ने पुलिस तथा न्यायिक प्रशासन को सीधे अपने अधीन ले लिया।

राजस्व सुधार 

  • कार्नवालिस ने 1787 ई. में प्रान्त को राजस्व क्षेत्रों (36 से घटाकर 23 कर दी) में विभाजित कर उन पर एक कलेक्टर नियुक्त कर दिया। 
  • 1790 ई. में जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया। शर्त यह थी कि वे कम्पनी को वार्षिक कर देते रहें। उसने रेवेन्यू बोर्ड की स्थापना की। 
  • कार्नवालिस ने व्यापारिक सुधारों के तहत ठेकेदारों के स्थान पर गुमाश्तों तथा व्यापारिक प्रतिनिधियों द्वारा माल लेने की व्यवस्था बना दी तथा निजी व्यापार को समाप्त कर दिया। 
  • कम्पनी के कार्यकर्ताओं के वेतन को बढ़ाकर बेईमानी व धूर्तबाजी को खत्म करने का प्रयास किया। साथ ही उसने प्रत्येक पदाधिकारी को भारत में आने से पूर्व अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने को बाध्य किया। 

स्थायी बन्दोबस्त

  • बंगाल की स्थायी भूमि, कर व्यवस्था पर अन्तिम निर्णय कार्नवालिस ने सर जॉन शोर के सहयोग से लिया और अन्तिम रूप से जमींदारों को भूमि का स्वामी मान लिया गया। 
  • 1790 ई. में बंगाल के जमींदारों से 10 वर्षीय व्यवस्था की गई, जिसे 1793 ई. में स्थायी कर दिया गया, जिसे स्थायी बन्दोबस्त कहते हैं।
  • इस व्यवस्था के अन्तर्गत जींदारों को अब भू-राजस्व का 10/11 भाग कम्पनी को तथा 1/11 भाग अपनी सेवाओं के लिए अपने पास रखना था। 
  • कम्पनी ने यद्यपि इसे पूरी तरह से अपने हित में बताया, परन्तु शीघ्र ही यह व्यवस्था उत्पीड़न तथा शोषण का साधन बन गई।

सर जॉन शोर (Sir John Shore)

कार्यकाल – 1793 – 1798 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • ब्रिटिश संसद ने सर जॉन शोर के समय में 1793 ई. का चार्टर एक्ट पास किया। 
  • इसने मैसूर के प्रति अहस्तक्षेप की नीति का पालन किया तथा जमींदारों को भूमि का वास्तविक स्वामी माना। 
  • सर जॉन शोर के समय में ही निजाम और मराठों के बीच 1795 ई. में खुर्दा का युद्ध लड़ा गया। 

लॉर्ड वेलेजली (Lord Wellesley)

कार्यकाल – 1798 – 1805 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • 1798 ई. में रिचर्ड कॉले वेलेजली जिसे माक्विस ऑफ वेलेजली के नाम से जाना जाता है, भारत का गवर्नर-जनरल बना। 
  • लॉर्ड वेलेजली बंगाल का शेर के उपनाम से प्रसिद्ध था। 
  • वह अपनी सहायक सन्धि प्रणाली के कारण प्रसिद्ध हुआ। 
  • सहायक सन्धि का प्रयोग वेलेजली से पूर्व भारत में डूप्ले द्वारा किया गया था।

सहायक सन्धि 

  • फ्रांसीसियों के भय को समाप्त करने तथा अंग्रेजी सत्ता की श्रेष्ठता स्थापित करने के उद्देश्य से वेलेजली ने भारत में सहायक सन्धि प्रणाली को प्रचलित किया। 
  • इस सन्धि को स्वीकार करने वाले राज्यों के वैदेशिक सम्बन्ध अंग्रेजी राज्य के अधीन हो जाते थे, परन्तु उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाता था। 
  • सहायक सन्धि करने वाले प्रत्येक राज्य को अपनी राजधानी में एक अंग्रेजी रेजीडेण्ट को रखना पड़ता था तथा कम्पनी की पूर्व आज्ञा के बिना राजा किसी भी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं ले सकता था। 
  • सहायक सन्धि स्वीकार करने वाले राज्यों का क्रम है – हैदराबाद (1798 ई.), मैसूर (1799 ई.), तंजौर (1799 ई.), अवध (1801 ई.), पेशवा (1802 ई.), भोंसले (1803 ई.), सिन्धिया (1804 ई.)। 
  • इन राज्यों के अलावा सहायक सन्धि स्वीकार करने वाले अन्य राज्य थे-जयपुर, जोधपुर, मच्छेड़ी, बूंदी तथा भरतपुर । 
  • तंजौर (अक्टूबर, 1799 ई.) व कर्नाटक (जुलाई, 1801 ई.) पर कब्जे के बाद इसके समय में ही 1801 ई. में मद्रास प्रेसीडेन्सी का सृजन किया गया। 
  • इसी के कार्यकाल में द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1802-03 ई.) हुआ। 
  • लॉर्ड वेलेजली के समय चौथा आंग्ल मैसूर युद्ध (1799 ई.) हुआ जिसमें श्रीरंगपट्टम का दुर्ग जीत लिया गया और टीपू को वीरगति प्राप्त हुई। 
  • नागरिक सेवा में भर्ती किए गए युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए 1800 ई. में लॉर्ड वेलेजली ने कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। 
  • 1799 ई. में वेलेजली ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाया। 
  • 1803 ई. में इसने बाल हत्या पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दिया।

लॉर्ड कार्नवालिस (Lord Cornwallis)

कार्यकाल – 1805 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • कार्नवालिस पुनः 1805 ई. में भारत का गवर्नर-जनरल बनकर आया, इसने होल्कर व सिन्धिया को शान्त करने का प्रयत्न किया और राजपूत रियासतों से अंग्रेजी कम्पनी की सुरक्षा को वापस लेने का प्रयत्न किया, इसी दौरान 1805 ई. में उसकी गाजीपुर में मृत्यु हो गई।
  • गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) में ही उसकी समाधि है।

सर जॉर्ज बार्लो (Sir George Barlow)

कार्यकाल – 1805 – 1807 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • उसने अहस्तक्षेप की नीति का कठोरता से पालन किया। उसने सिन्धिया को ग्वालियर तथा गोहुद के प्रदेश वापस कर दिए। 
  • राजपूतों से ब्रिटिश सुरक्षा को वापस ले लिया, किन्तु उसने डायरेक्टरों की आज्ञा के विरुद्ध बेसीन की सन्धि जारी रखी। 
  • इसी के काल में वेल्लोर में सिपाहियों का विद्रोह हुआ, जिसका कारण फौजी वर्दियों को पहनने, बालों को कटाने आदि से सम्बन्धित था, जिसे मद्रास के गवर्नर लॉर्ड विलियम बैंटिक ने शान्त किया। 
  • इस विद्रोह के कारण ही बालों को वापस बुला लिया गया।

लॉर्ड मिण्टो प्रथम (Lord Minto – I)

कार्यकाल – 1807 – 1813 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • गवर्नर-जनरल के रूप में भारत आने से पूर्व वह नियन्त्रण बोर्ड का अध्यक्ष था। 
  • इसके समय में पर्शिया के शाह से एक सन्धि हुई, जिसके अनुसार कोई भी विदेशी सेना उसकी अनुमति के बिना उसके क्षेत्रों से नहीं गुजर सकती थी। 
  • 1809 ई. में लॉर्ड मिण्टो महाराजा रणजीत सिंह के साथ अमृतसर की सन्धि में सम्मिलित हुआ। 
  • सन्धि पर अंग्रेजों की ओर से चार्ल्स मेटकॉफ ने हस्ताक्षर किए।

लॉर्ड हेस्टिंग्स (Lord Hastings)

कार्यकाल – 1813 – 1823 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • लॉर्ड हेस्टिंग्स की नियुक्ति गवर्नर-जनरल के रूप में 1813 ई. में हुई। 
  • वह भारत में इस दृढ़ संकल्प के साथ आया कि वह देश के कार्यों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करेगा, किन्तु बाद में उसने अनुभव किया कि देश की स्थिति ऐसी है कि उस नीति पर चलना सम्भव नहीं है।

आंग्ल-नेपाल युद्ध (1814 – 1816 ई.) 

  • सर्वप्रथम लॉर्ड हेस्टिग्स को नेपाल के विरुद्ध 1814 ई. में कार्रवाई करनी पड़ी। 
  • कर्नल निकल्सन तथा गार्डनर के नेतृत्व में अल्मोड़ा पर अधिकार करने में सफल हो गए। गोरखा नेता अमर सिंह थापा हार गया। तथा उसने शरण ले ली।
  • इसके पश्चात मार्च, 1816 ई. में संगौली की सन्धि पर हस्ताक्षर हुए। 
  • संगीली की सन्धि के अनुसार, गढ़वाल, कुमाऊँ, शिमला, रानीखेत एवं नैनीताल अंग्रेजों के अधिकार में आ गए तथा गोरखों ने काठमाण्डू में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रखना स्वीकार कर लिया। 

पिण्डारियों का दमन (1817 – 1818 ई.) 

  • हेस्टिग्स को पिण्डारियों के दमन का भी श्रेय प्राप्त है। यह लुटेरों का एक दल था, जिसमें हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्मिलित थे। हेस्टिग्स ने पिण्डारियों के दमन के लिए उत्तरी सेना की कमान स्वयं संभाली, जबकि दक्षिणी सेना की कमान टॉमस हिसलोप को दी गई। 
  • उनके नेताओं में वासिल मोहम्मद ने सिन्धिया के यहाँ शरण ली, किन्तु उसने आत्महत्या कर ली। करीम खाँ को गोरखपुर में एक छोटी-सी रियासत दे दी गई और चीतू को शेर मारकर खा गया। अमीर खान को टोंक का नवाब बना दिया गया, 1824 ई. तक पिण्डारियों का दमन कर दिया गया।

मराठा संघ का अन्त 

  • हेस्टिग्स द्वारा मराठा को तृतीय युद्ध में पराजित कर मराठा संघ को भंग कर दिया गया। 
  • 1 जून, 1817 ई. को पेशवा ने अपनी हार स्वीकार कर एक सन्धि पर हस्ताक्षर किए, जिसके अनुसार मराठा संघ समाप्त हो गया। 
  • हेस्टिंग्स ने बाजीराव द्वितीय को गद्दी से उतारकर ₹ 18 लाख वार्षिक पेंशन देकर कानपुर के समीप बिठूर नामक स्थान पर भेज दिया। 
  • हेस्टिग्स के समय में ही एलफिन्सटन ने बम्बई में महालवाड़ी तथा रैयतवाड़ी व्यवस्था के मिश्रण को लागू किया। 
  • बंगाल में रैयत के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए 1822 ई. में ‘टैनेन्सी एक्ट’ या ‘काश्तकारी अधिनियम’ लागू किया गया, जिसके अनुसार यदि रैयत अपना निश्चित किराया देती रहे, तो उसे विस्थापित नहीं किया जाएगा।

लॉर्ड विलियम पिट एमहर्स्ट (Lord William Pitt Amherst)

कार्यकाल – 1823 – 1828 ई.
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • लॉर्ड एमहर्ट के समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना बर्मा का प्रथम युद्ध तथा भरतपुर का उत्तराधिकार युद्ध है। उसी के काल में आंग्ल-बर्मा युद्ध (1824-26 ई.) लड़ा गया।
  • इस युद्ध का समापन 1826 ई. के ‘याण्डबू की सन्धि’ से हुआ, जिसके तहत बर्मा नरेश महाबन्दुला ने अंग्रेजी कम्पनी को अराकान तथा तनासरिम के प्रान्त दिए। मणिपुर की स्वतन्त्रता को स्वीकार कर लिया गया और अपनी राजधानी में एक अंग्रेज रेजीडेण्ट को रखना स्वीकार कर लिया। 
  • 1824 ई. का बैरकपुर विद्रोह भी इसी के समय हुआ। 

 

Read Also :

 

बंगाल के गवर्नर (Governor of Bengal)

प्लासी के युद्ध के समय बंगाल में अंग्रेज प्रमुख डेक था। प्लासी के युद्ध में क्लाइव ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन किया। इसी कारण प्लासी की विजय के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने लार्ड क्लाइव को बंगाल का गवर्नर बना दिया।

Click Here भारत के गवर्नर जनरल (Governor General of India)
Click Here बंगाल के गवर्नर जनरल (Governor General of Bengal)
Click Here भारत के वायसराय (The Viceroy of India)

बंगाल के गवर्नर (Governor of Bengal)

लॉर्ड रॉबर्ट क्लाइव (Lord Robert Clive)

कार्यकाल – 1757 – 60 व 1765-67
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • प्लासी की विजय के बाद क्लाइव को बंगाल का प्रथम गवर्नर बनाया गया। 
  • बक्सर की विजय के बाद इसे पुनः गवर्नर बनाकर बंगाल भेजा गया। 
  • राजस्व सुधारो को व्यवस्थित करने के लिए परीक्षण व अशुद्धि (Trial & Error) के नियम को अपनाया गया। 

प्रमुख घटनाएं 

  1. दीवानी की प्राप्ति, 
  2. व्यापार समिति, 
  3. श्वेत विद्रोह (सैनिको को उपहार न दोहरा भत्ता बंद), 
  4. द्वैध शासन, 
  5. बर्क ने क्लाइव को ‘बड़ी-बड़ी नीवें रखने वाला’ कहा जबकि प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार ‘पीवल स्पीयर’ ने उसे “भविष्य का अग्रदूत” कहा।
  6. क्लाइव ने इंग्लैण्ड में जाकर आत्महत्या कर ली। 

जॉन जेफानियाह होलवेल (John Zephaniah Holwell) 

कार्यकाल – 1760
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • यह क्लाइव के बाद बंगाल का स्थानापन्न गवर्नर बना। 
  • इसी ने ब्लैक होल की घटना का वर्णन किया था। 

हेनरी वैंसिटार्ट (Henry Vansittart)

कार्यकाल – 1760 – 65
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • बक्सर के युद्ध के समय वेन्सिटार्ट ही बंगाल का गवर्नर था। 

हैरी वेरेलस्ट (Harry Verelst)

कार्यकाल – 1767 – 69
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • द्वैध शासन के समय ये बंगाल के गवर्नर थे। 

जॉन कर्टियर (John Cartier)

कार्यकाल – 1769 – 72
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • इनके समय में भी बंगाल में द्वैध शासन जारी रहा। 
  • 1770 में बंगाल में आधुनिक भारत का प्रथम अकाल पड़ा। 

वारेन हेस्टिग्स (Warren Hastings)

कार्यकाल – 1772 – 85
महत्वपूर्ण कार्य – 

  • यह बंगाल का अन्तिम गवर्नर था। 
  • इसने बंगाल में द्वैध शासन को समाप्त कर दिया। 
  • रेग्युलेटिंग एक्ट के अंतर्गत वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल बनाया गया।

Click Here To Read – बंगाल के गवर्नर जनरल (Governor General of Bengal)

Read Also :

 

error: Content is protected !!