प्रस्तुत लेख विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए अधिसूचित 2024-25 के नियमों और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उन पर लगाई गई हालिया रोक का गहन विश्लेषण करता है। यह कैंपस में व्याप्त जातिगत भेदभाव, विशेषकर रोहित वेमुला जैसे दुखद मामलों के बाद उपजे विमर्श, और कानूनी ढांचे की प्रभावकारिता पर केंद्रित है।
समानता और न्याय की दिशा में एक कदम: विश्लेषणात्मक सारांश
ऐतिहासिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार और अस्पृश्यता के उन्मूलन के संकल्प को शैक्षणिक परिसरों में लागू करना सदैव एक चुनौती रहा है। ऐतिहासिक रूप से, उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में हाशिए के समुदायों (SC/ST/OBC) के छात्रों के साथ होने वाला भेदभाव केवल भौतिक नहीं, बल्कि संरचनात्मक और मनोवैज्ञानिक भी रहा है। 2012 में UGC ने इस दिशा में एक रूपरेखा तैयार की थी, किंतु प्रवर्तन की कमी के कारण अधिकांश संस्थानों ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसी घटनाओं ने राष्ट्र की अंतरात्मा को झकझोर दिया, जिसके परिणामस्वरूप न्यायिक हस्तक्षेप और नागरिक समाज की सक्रियता बढ़ी। अंततः, न्यायालय के निर्देश पर UGC (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Rules को नई दिशा दी गई।
वर्तमान स्थिति और न्यायिक हस्तक्षेप
हाल ही में, 29 जनवरी 2026 को भारत के उच्चतम न्यायालय ने UGC के इन नए नियमों पर रोक लगा दी है। न्यायालय ने इन नियमों को “अत्यधिक व्यापक” (too sweeping) करार दिया है। हालांकि ये नियम जनवरी 2024-25 में अधिसूचित किए गए थे, लेकिन इनके कार्यान्वयन को लेकर कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां उत्पन्न हो गई हैं। वर्तमान में स्थिति यह है कि जहां एक ओर कैंपस में भेदभाव विरोधी तंत्र की तत्काल आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर वैधानिक बारीकियों और परिभाषाओं को लेकर न्यायिक असहमति बनी हुई है।
प्रशासनिक प्रयास और तंत्र का विकास
2025 के नए नियमों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि ये केवल सिद्धांत नहीं बताते, बल्कि एक निगरानी ढांचा भी तैयार करते हैं। इसमें समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres), इक्विटी समितियां (Equity Committees), इक्विटी हेल्पलाइन और क्विक रिस्पांस स्क्वॉड की स्थापना का प्रावधान है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसमें शिकायतों के निवारण के लिए एक समयबद्ध सीमा (Time-bound resolution) निर्धारित की गई है। UGC ने यह भी प्रावधान किया है कि नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, जो पूर्ववर्ती 2012 के ढांचे की तुलना में अधिक सशक्त प्रवर्तन क्षमता प्रदान करता है।
जाति आधारित भेदभाव: एक कड़वा सच
UGC के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले पाँच वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतों में दोगुनी से अधिक वृद्धि हुई है। यह डेटा इस बात का प्रमाण है कि परिसरों में सामाजिक पदानुक्रम आज भी प्रभावी है। भेदभाव अक्सर आरक्षण नियमों को लागू न करने, मौखिक दुर्व्यवहार, और शैक्षणिक मूल्यांकन में पक्षपात के रूप में प्रकट होता है। लेख तर्क देता है कि इन समस्याओं का समाधान करना न केवल प्रशासनिक दायित्व है, बल्कि यह एक राजनीतिक और सामाजिक प्राथमिकता होनी चाहिए।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
उत्तर भारत के कई परिसरों में इन नियमों के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं। विरोध के मुख्य रूप से दो आधार हैं। पहला, नियमों में जाति आधारित भेदभाव को केवल SC, ST और OBC के विरुद्ध होने वाले कृत्यों के रूप में परिभाषित किया गया है। दूसरा, इसमें झूठी शिकायतों (False Complaints) के विरुद्ध किसी कठोर कार्रवाई का प्रावधान नहीं है। सामान्य वर्ग के छात्रों के एक वर्ग का मानना है कि यह परिभाषा उनके हितों की रक्षा नहीं करती। हालांकि, सामाजिक वास्तविकता यह है कि जातिगत उत्पीड़न मुख्य रूप से निचली जातियों के विरुद्ध ही होता है, फिर भी न्यायिक संतुलन बनाने के लिए परिभाषा को अधिक समावेशी बनाने पर विचार किया जा रहा है।
2012 बनाम 2025: तुलनात्मक विश्लेषण
आलोचकों का तर्क है कि 2025 के नियम 2012 के ढांचे का एक “हल्का संस्करण” (Dilution) हैं। 2012 के नियमों में भेदभाव के कई अन्य रूपों को भी पहचाना गया था और SC/ST छात्रों के लिए विशेष अनुभाग थे जो आरक्षण मानदंडों के पालन पर केंद्रित थे। इसके विपरीत, 2025 के नियम प्रशासनिक ढांचे (समितियों और हेल्पलाइन) पर अधिक जोर देते हैं। हालांकि नया ढांचा निगरानी के मामले में बेहतर लग सकता है, लेकिन यह उन गहरे संरचनात्मक मुद्दों को संबोधित करने में कम प्रभावी हो सकता है जिन्हें 2012 के प्रारूप में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था।
समाधान की राह और संतुलन का सिद्धांत
आगे का मार्ग एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने में निहित है। उच्चतम न्यायालय द्वारा उठाई गई चिंताओं को दूर करने के लिए, UGC को “झूठी शिकायतों” के प्रावधान को पुनः सम्मिलित करना चाहिए, लेकिन एक सुरक्षा चक्र के साथ। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि केवल वे शिकायतें जो स्पष्ट रूप से किसी को फंसाने के लिए ‘प्रेरित’ (Motivated) पाई जाएं, उन्हीं पर कार्रवाई हो, न कि उन शिकायतों पर जिन्हें छात्र साक्ष्यों के अभाव में सिद्ध नहीं कर पाए। भेदभाव की परिभाषा को भी इस तरह सुधारा जा सकता है कि वह राजनीतिक संदेश को कमजोर किए बिना संवैधानिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप हो।
निष्कर्ष
शैक्षणिक संस्थानों में समानता केवल नियमों से नहीं, बल्कि एक समावेशी संस्कृति के निर्माण से आएगी। UGC के इन नियमों पर रोक एक अस्थायी बाधा हो सकती है, लेकिन यह संस्थानों को आत्मनिरीक्षण करने का अवसर भी प्रदान करती है। माननीय उच्चतम न्यायालय की भूमिका यहाँ यह सुनिश्चित करने की है कि न्याय न केवल हो, बल्कि होता हुआ दिखे भी। जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष को “व्यापक” होने के आधार पर रोका नहीं जाना चाहिए, बल्कि उसे और अधिक सटीक और प्रभावी बनाया जाना चाहिए ताकि भविष्य में किसी भी छात्र को अपनी पहचान के कारण अपनी जान न गंवानी पड़े।
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📌 UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न GS Paper I (Essay)
GS Paper II (Governance and Social Justice)
GS Paper IV (Ethics)
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