बिहार में हर्यक वंश (Haryanka Dynasty in Bihar)

मगध एवं बिहार शब्द का प्रथम उल्लेख अथर्ववेद में हुआ है। भारत का प्रथम साम्राज्य मगध साम्राज्य को माना जाता है, जिसका संस्थापक हर्यक वंश का बिंबिसार या श्रेणिक है।

बिंबिसार (544-492 ई.पू.) [Bimbisar]

बौद्ध ग्रंथ महावंश के अनुसार हर्यक वंश का संस्थापक बिंबिसार 15 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा तथा इसके नेतृत्व में ही मगध साम्राज्य का विस्तार आरंभ हुआ। इसने अपनी राजधानी राजगृह को बनाया तथा लगभग 52 वर्षों तक शासन किया। राजगृह का नियोजन वास्तुकार महागोविंद ने किया था। बिंबिसार ने मगध के उत्थान के लिए तीन प्रकार की नोतियों अपनाई

  1. वैवाहिक संबंध की नीति – इसने मगध साम्राज्य विस्तार के लिए वैवाहिक नीति के अंतर्गत कोसल के राजा प्रसेनजित् की बहन कोशला देवी से विवाह करके दहेज के रूप में काशी जैसे उपजाऊ क्षेत्र की प्राप्त किया। बिंबिसार ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए लिच्छवी राजकुमारी चेलन्ना (चेतक की पुत्री) के साथ तथा पंजाब की राजकुमारी क्षेमा के साथ विवाह किया।
  2. मैत्री की नीति – बिंबिसार ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए मैत्री की नीति अपनाई। उसने अवंति शासक प्रोद्योतसेन  के साथ मैत्री संबंध स्थापित किया तथा उसके उपचार के लिए अपने राजवैद्य जीवक को भेजा।
  3. विजय की नीति – बिंबिसार ने अंग को जीतकर अपने पुत्र अजातशत्रु को वहाँ का शासक नियुक्त किया। इतिहास में बिंबिसार को ऐसा प्रथम शासक माना जाता है, जिसने स्थायी सेना रखी तथा पहली बार हाथी को अपनी सेना में शामिल किया। 493 ई. पू. में अजातशत्रु अपने पिता बिंबिसार की हत्या कर मगध का शासक बनी।
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अजातशत्रु  (493 – 461 ई.पू.) [Ajatshatru]

अातशत्रु अपने पिता बिंबिसार की भॉति सामान्यादी प्रकृति का शासक था। यह जैन धर्म का अनुयायी थी। इसका उपनाम कुनिक था। इसके शासन काल में तीन महत्वपूर्ण विद्रोह हुए, जिसके परिणाम अजातशत्रु के पक्ष में रहे।

  • कोसल के साथ संघर्ष – बिंबिसार की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी कोशल देवी की भी मृत्यु दु:ख के कारण हो गई, जिससे प्रसेनजित् ने क्रोधित होकर मगध को दिए गए काशी के अनेक गाँवों पर पुनः अधिकार कर लिया। काशी को लेकर अजातशत्रु और प्रसेनजित् के बीच युद्ध हुआ, जिसमें प्रसेनजित् पराजित हुआ और उसने भागकर वस्ती में शरण ली। दूसरी बार युद्ध में अजातशत्रु पराजित हुआ, लेकिन प्रसेनजित् की पुत्री वाजिरी के साथ अजातशत्रु ने विवाह करके संघर्ष को समाप्त किया। अजातशत्रु के शासन काल में ही कोसल को अंतिम रूप से मगध में मिला लिया गया।
  • वञ्जि संघ के साथ संघर्ष – कोसल विजय के बाद अजातशत्रु ने अपने मंत्री वस्कार के सहयोग से वञ्जि संघ में फूट डाल दी। उसके बाद 16 वर्षीय युद्ध में इसने वैशाली को अपने राज्य में मिला लिया। इस युद्ध में अजातशत्रु ने कंटक-शिला एवं गदा-मूसल जैसे शास्त्रों को प्रयोग किया। वञ्जि से युद्ध करने के लिए गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर अजातशत्रु ने एक सैनिक छावनी का निर्माण किया, जो बाद में पाटलिपुत्र के नाम से जानी गई। अवंति नरेश प्रद्योत के द्वारा आक्रमण किए जाने की आशंका को ध्यान में रखकर अजातशत्रु ने राजगृह में सुरक्षा दुर्ग बनलाया, जो भारत में स्थापत्य निर्माण का प्राचीनतम उदाहरण है।
  • मल्ल के साध संघर्ष – लिच्छवियों को पराजित करने के बाद अजातशत्रु ने मल्ल संघ पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया। वैवाहिक संबंध के द्वारा अजातशत्रु ने वत्स को अपना मित्र बना लिया। अजातशत्रु ने अपने शासन के दसवें वर्ष में गौतम बुद्ध के महापरिर्वाण के पश्चात् उनके अवशेषों पर राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया। अजातशत्रु से वैशाली की नगरवधू आम्रपाली प्रेम करती थी। उसके शासन काल में ही राजगूर की सप्तपर्णी गुफा में महाकश्यप की अध्यक्षता में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। अजातशत्रु का पुत्र उदयन उसकी हत्या कर स्वयं मगध साम्राज्य का शासक बना।
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उदयन (461-444 ई.पू.) [Udayan]

उदयन अपने पिता अजातशत्रु के शासन काल में चंपा का राज्यपाल था। इसने अपने पिता अजातशत्रु की हत्या कर सत्ता ग्रहण किया था। इसने गंगा और सोन नदी के संगम पर पाटलिपुत्र नगर को बसाया तथा मगध की राजधानी राजगृह से हटाकर पाटलिपुत्र में स्थापित की। उदयन जैन अनुयायी था। उसने पाटलिपुत्र के मध्य में एक जैन चैत्यगृह का निर्माण करवाया था। अवंति के राजा पोलक ने उदयन की हत्या करा दी। काशी के अमात्य शिशुनाग ने हर्यक वंश के अंतिम शासक नागदशक की हत्या कर शिशुनाग वंश की स्थापना की। नागदशक को पुराण में ‘दर्शक’ भी कहा गया है।

 

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