Bhumij or Land Revolt

भूमिज विद्रोह (Bhumij or Land Revolt)

December 29, 2018

भूमिज विद्रोह को गंगानारायण हंगामा (Ganga Narayan Hangama) भी कहा जाता है। यह विद्रोह जनजातीय जमींदारों और जनजातीय लोगों का संयुक्त विद्रोह था, जिसकी अगुआई बड़ाभूम के राजा बेलाक नारायण के पोते गंगानारायण ने की थी।

विद्रोह के कारण

इस विद्रोह के पीछे कुछ राजनीतिक कारण तो थे ही, साथ ही मूल रूप से यह विद्रोह आदिवासी उत्पीड़न से उपजा था। बड़ाभूम की जागीर को गंगानारायण से उसके भाई माधव सिंह ने हड़पने का षड्यंत्र रचा था। माधव सिंह दीवान था। उसने जनता का बहुत शोषण किया था। जब गंगानारायण ने उसका विरोध किया तो वह कंपनी सेना की शरण में जा पहुँचा। गंगानारायण ने भी हालात की गंभीरता को समझा और उसने उन जमींदारों से संपर्क किया, जो अंग्रेजी व्यवस्था से त्रस्त थे। उनके साथ गंगानारायण को जनजातीय लोगों का भी समर्थन मिला, क्योंकि आदिवासी लोग भी इस व्यवस्था से बहत निराश थे। कोल और ‘हो’ जाति के लोग तो बुरी तरह से नाराज थे। इस प्रकार गंगानारायण के नेतृत्व में एक संयुक्त विद्रोह की भूमिका बनी, जिसमें जनजातीय लोगों की भूमिका रही। सन् 1832 में ही जब कोल विद्रोह को दबाने के प्रयास चल रहे थे, उसी दौरान गंगानारायण ने अपने विद्रोही गुट के साथ विद्रोह का बिगुल बजा दिया। इस विद्रोह को अंग्रेजों ने ‘भूमिज विद्रोह’ की संज्ञा दी। शीघ्र ही विद्रोह ने व्यापक रूप ले लिया और कंपनी सेना इन विद्रोहियों को दबाने के लिए लेफ्टिनेंट बैंडन और टिमर के नेतृत्व में निकल पड़ी। खरसावाँ का ठाकुर अंग्रेजों की ओर से लड़ा।

इस लड़ाई में गंगानारायण मारा गया और खरसावाँ के ठाकुर ने उसका सिर काटकर कैप्टन विल्किंसन को उपहार में भेज दिया। विद्रोह का दमन हो चुका था, लेकिन विल्किंसन को इस विद्रोह ने कुछ और सोचने पर विवश कर दिया। उसने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को वस्तुस्थिति समझाकर उनसे परामर्श किया और जंगल महाल में प्रशासकीय परिवर्तन की आवश्यकता बताई। रेगुलेशन-XIII के अंतर्गत जंगल महाल जिले को स्थगित कर इसकी दीवानी अदालत बंद कर दी गई। नई गठन नीति लागू हुई, जिसमें शेरगढ़, विष्णुपुर और सोनपहाड़ी को वर्धमान में शामिल कर लिया गया तथा शेष भागों को मिलाकर मानभूम को जिला बना दिया गया। इस जिले में झालदा, धनबाद, सुपुर, रायपुर, अंबिका नगर, बड़ाभूम और श्यामसुंदरपुर सहित कई मुख्य क्षेत्रों को शामिल किया गया। इसका तात्कालिक मुख्यालय मानबाजार बनाया गया, जिसे सन् 1838 में बदलकर पुरुलिया ले जाया गया।

इस प्रकार ‘भूमिज विद्रोह’ भी प्रशासनिक व्यवस्था के सुधार का एक कारण बना। अंग्रेज अधिकारी जान गए थे कि आदिवासी लोगों को न्याय-व्यवस्था की पारदर्शिता न मिलना और उनका किसी भी प्रकार का उत्पीड़न रोज नए विद्रोह को जन्म देनेवाले कारण थे। प्रशासनिक व्यवस्था को गवर्नर के अधीन करके इस दिशा में सार्थक कदम उठाया गया था।

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