यह लेख The Hindu में प्रकशित लेख (Balancing, not swinging: on India-Russia ties, Indian diplomacy) से लिया गया हैं, इस लेख में भारत-रूस संबंधों के 25 वर्ष पूर्ण होने के बीच हालिया मोदी-पुतिन वार्ता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, पश्चिम के साथ संतुलन, और प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद रूस से आर्थिक-कूटनीतिक संबंध बनाए रखने की प्रतिबद्धता को रेखांकित करती है। लेख शांति, व्यापार, ऊर्जा और वैशिक भू-राजनीति पर भारत की संतुलित नीति का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है।
रूस-भारत समीकरण: भू-राजनीतिक दबावों के बीच स्वायत्त कूटनीति की परीक्षा
ऐतिहासिक एवं संवैधानिक संदर्भ (Constitutional & Historical Background)
भारत-रूस संबंधों की नींव 1950 के दशक से ही अपेक्षाकृत स्थिर और विश्वसनीय मानी जाती है। शीत युद्ध के दौरान भारत की गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) नीति के बावजूद, सोवियत संघ ने भारत को रक्षा, अंतरिक्ष, औद्योगिक विकास और कूटनीतिक समर्थन प्रदान किया। 1971 के भारत-सोवियत मैत्री संधि ने दोनों के संबंधों को औपचारिक रूप से सुरक्षा-सहयोग की दिशा में स्थापित किया।
भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत आज भी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) माना जाता है, जो संविधान के अनुच्छेद 51 में निहित शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और संप्रभु समानता की अवधारणा से प्रेरित है।
इस पृष्ठभूमि में, वर्तमान वैशिक राजनीति के तनावपूर्ण वातावरण—विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध (2022-वर्तमान)—ने भारत की संतुलनकारी भूमिका की परीक्षा ली है।
वर्तमान स्थिति: 2024–25 के भू-राजनीतिक संदर्भ में भारत-रूस संबंध (Current Status)
लेख में वर्णित घटनाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि व्लादिमीर पुतिन ने 2022 के आक्रमण के बाद पहली बार भारत का दौरा किया। उनके विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट ने पश्चिमी देशों को रूस को अलग-थलग करने का आधार दिया है। इसके बावजूद भारत ने उन्हें न केवल आमंत्रित किया, बल्कि राजकीय सम्मान प्रदान किया—जो स्पष्ट संकेत है कि भारत संबंधों को समाप्त नहीं करना चाहता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्राप्त करना और यह कहना कि पुतिन “मित्र” हैं, पश्चिमी दबाव के बीच भारत के स्वतंत्र कूटनीतिक रुख को रेखांकित करता है।
साथ ही, भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह रूस की आलोचना में पश्चिम के स्वर को नहीं अपनाएगा। यह भारत की तटस्थ और हित-आधारित नीति को प्रमाणित करता है, जिसमें भारत युद्ध को लेकर “शांति की आवश्यकता” तो दोहराता है, पर किसी पक्ष को दोषी ठहराने से बचता है।
पश्चिमी दबाव और आर्थिक आयाम (Economic Pressures & Strategic Calculations)
रूस के साथ भारत का सहयोग आज पहले की तुलना में अधिक जटिल है, क्योंकि:
- अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा कठोर प्रतिबंध रूस से ऊर्जा और व्यापार को महंगा और जोखिमपूर्ण बनाते हैं।
- अमेरिका द्वारा भारतीय तेल कंपनियों पर 25% टैरिफ अधिभार और रूसी कंपनियों पर लगाए गए प्रतिबंध भारत के लिए आयात बाधित कर रहे हैं।
- भारत को अपने दीर्घकालिक ऊर्जा हितों और रणनीतिक साझेदारियों को सावधानीपूर्वक संतुलित करना पड़ रहा है।
इसके बावजूद, भारत रूस से व्यापार संबंध बनाए रखना चाहता है, क्योंकि:
- रूस सस्ते कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया था।
- रूस भारत की रक्षा आवश्यकताओं का पारंपरिक आपूर्तिकर्ता रहा है।
- रूस का भूराजनीतिक महत्व और एशिया-प्रशांत में प्रभाव भारत के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक मूल्य रखता है।
2024–25 मोदी-पुतिन शिखर सम्मेलन के मुख्य परिणाम (Major Takeaways of the Summit)
वार्ता में भारत ने उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया जहाँ:
आर्थिक सहयोग
- श्रम गतिशीलता समझौता (Labour Mobility Agreement): रूस में भारतीय कुशल कर्मियों के लिए अवसर बढ़ाने की दिशा में कदम।
- यूरिया संयंत्र स्थापित करने हेतु एमओयू: कृषि-संबंधी उर्वरक सुरक्षा में आत्मनिर्भरता बढ़ाने का प्रयास।
- आर्थिक रोडमैप (2024, मॉस्को) का पुनर्पुष्टि:
- समुद्री गलियारों के माध्यम से संपर्क बढ़ाना,
- राष्ट्रीय मुद्रा भुगतान प्रणाली (Rupee-Ruble mechanisms) को सक्षम बनाकर प्रतिबंध-चुनौतियों पर काबू पाना,
- 2030 तक व्यापार को बढ़ावा देना।
रणनीतिक क्षेत्रों में सावधानी
- कोई नया रक्षा करार नहीं
- कोई नया परमाणु सहयोग समझौता नहीं
- अंतरिक्ष सहयोग पर कोई संवेदनशील घोषणा नहीं
स्पष्ट है कि भारत ने ऐसे क्षेत्रों से दूरी बनाए रखी जिन पर पश्चिमी राष्ट्र संवेदनशील प्रतिक्रिया दे सकते थे।
विदेश नीति में संतुलन: “ध्रुव तारा” और पश्चिमी साझेदारी (Balancing Between Russia & the West)
प्रधानमंत्री मोदी ने रूस को “ध्रुव तारा” (Lode Star) बताया—एक ऐसा स्थिर बिंदु जिसे भारत लंबे समय से भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखता आया है। परंतु यह वक्तव्य प्रतीकात्मक है; भारत वास्तव में “एक-तरफ़ा झुकाव” नहीं दिखा रहा, बल्कि ठोस संतुलन अपनाने की कोशिश कर रहा है। भारत की वर्तमान कूटनीति तीन स्पष्ट लक्ष्यों पर आधारित है:
- रूस से संबंध बनाए रखना – क्योंकि यह ऊर्जा, रक्षा और कूटनीतिक मुद्दों में महत्वपूर्ण है।
- पश्चिम के साथ व्यापार और तकनीकी साझेदारी
- अमेरिका के साथ व्यापार वार्ता, सेमीकंडक्टर सहयोग और उच्च प्रौद्योगिकी साझेदारी
- यूरोपीय संघ के साथ FTA वार्ता
- किसी भी पक्ष के साथ अत्यधिक जुड़ाव से परहेज़ – यदि भारत किसी समय रूस या पश्चिम की ओर अत्यधिक झुकता है, तो रणनीतिक स्वायत्तता कमजोर पड़ेगी।
युद्ध, शांति और भारत की स्थिति (War, Peace & India’s Diplomatic Position)
रूस-यूक्रेन संघर्ष ने विश्व-व्यवस्था में ध्रुवीकरण को बढ़ाया है। अमेरिका का शांति प्रस्ताव, जिसे रूस ने अस्वीकार कर दिया है, यूरोप में तनाव को बढ़ा रहा है।
भारत इस पर स्पष्ट रूप से:
- युद्ध को गलत बताने से बचता है
- केवल “वार्ता और कूटनीति” पर आधारित समाधान की बात करता है
- किसी भी पक्ष का समर्थन करने के बजाय अपने हितों को प्राथमिकता देता है
आर्थिक आंकड़े और चुनौतियाँ (Trade Figures & Challenges)
भारत-रूस व्यापार में असंतुलन एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
- 2023–24 में भारत-रूस व्यापार $65–70 बिलियन तक पहुंचा, जिसमें से अधिकांश कच्चा तेल था।
- परंतु भारत का रूस को निर्यात बहुत कम है, जिससे भुगतान प्रणालियों पर दबाव बनता है।
- भारत ने $100 बिलियन व्यापार लक्ष्य (2030) घोषित किया है, परंतु लेख के अनुसार:
- नए तेल आयात पर रोक
- रक्षा समझौतों का अभाव
- भुगतान तंत्र की जटिलताएँ
इस लक्ष्य को कठिन बना देती हैं।
रणनीतिक खतरे और अवसर (Risks & Opportunities)
जोखिम
- रूस पर अत्यधिक निर्भरता
- पश्चिमी प्रतिबंधों का अप्रत्यक्ष प्रभाव
- रूस-चीन निकटता, जो भारत के लिए चिंताजनक है
- यूरोप और अमेरिका के साथ संबंधों में संभावित तनाव
अवसर
- रूस में इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और मानव संसाधन में निवेश
- आर्कटिक मार्गों और समुद्री गलियारों का विकास
- उर्वरक, कृषि, खनन और फार्मा सेक्टर में सहयोग
राजनीतिक-कूटनीतिक निष्कर्ष (Political & Diplomatic Conclusion)
- भारत को रणनीतिक स्वायत्तता पर अडिग रहना चाहिए।
- “एक झूले” की तरह रूस से पश्चिम या पश्चिम से रूस की ओर अत्यधिक झुकाव भारत के दीर्घकालिक हितों के विपरीत होगा।
- भारत को दोनों पक्षों से लगातार और संतुलित जुड़ाव बनाए रखना होगा।
अंततः भारत को अपनी विदेश नीति को सिद्धांत आधारित, हित-केन्द्रित और शांतिपूर्ण संतुलन में विकसित करना होगा—यही उसका वास्तविक सामरिक लाभ है।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत-रूस संबंधों का वर्तमान चरण यह स्पष्ट करता है कि भारत न तो किसी एक ध्रुव पर निर्भर होना चाहता है, न किसी दबाव में झुकना। लेख का निष्कर्ष यह है कि भारत की वास्तविक सामरिक शक्ति उसकी “रणनीतिक स्वायत्तता” में निहित है, जिसे बनाए रखने के लिए संतुलित, सतत और विवेकपूर्ण कूटनीति आवश्यक है।
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📌 UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न GS Paper I (Essay Paper)
GS Paper II (Polity & International Relations)
GS Paper III (Economy & Security)
GS Paper IV (Ethics)
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