UKPSC APS Mains Exam Paper II - 14 March 2026 (Answer Key)

UKPSC APS Mains Exam Paper II (Essays and Drafting) – 14 March 2026 (Answer)

March 16, 2026

(iii) संसद और भारतीय लोकतंत्र

लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है जिसमें जन-इच्छा सर्वोपरि होती है। भारतीय लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जिसका हृदय इसकी ‘संसद’ है। भारत के संविधान के अनुसार, संसद देश की सर्वोच्च विधायी संस्था है। यह वह मंच है जहाँ 140 करोड़ से अधिक भारतीयों की आकांक्षाएं, समस्याएं और भविष्य के सपने प्रतिबिंबित होते हैं। संसद न केवल कानून बनाने वाली संस्था है, बल्कि यह सरकार की जवाबदेही तय करने वाला प्रहरी भी है।

भारतीय संसद की संरचना

भारतीय संसद द्विसदनात्मक व्यवस्था पर आधारित है, जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन—लोकसभा (निम्न सदन) एवं राज्यसभा (उच्च सदन) शामिल हैं।

  • लोकसभा: यह ‘जनता का सदन’ है, जिसके सदस्य प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाते हैं। यह लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति का केंद्र है।
  • राज्यसभा: यह ‘राज्यों की परिषद’ है, जो भारतीय संघ के राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है और निरंतरता का प्रतीक है। इन दोनों सदनों का संगम भारतीय लोकतंत्र को संतुलन और स्थिरता प्रदान करता है।

लोकतंत्र में संसद के मुख्य कार्य

संसद भारतीय लोकतंत्र के स्तंभ के रूप में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती है:

  1. विधायी कार्य: संसद का प्राथमिक कार्य देश के लिए कानूनों का निर्माण करना है। बदलती परिस्थितियों के अनुसार पुराने कानूनों में संशोधन करना (जैसे अनुच्छेद 370 या जीएसटी) और नए कानून बनाना संसद की सर्वोच्च शक्ति है।
  2. कार्यपालिका पर नियंत्रण: संसदीय लोकतंत्र में सरकार संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से सांसद मंत्रियों से जवाब मांगते हैं। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार निरंकुश न हो पाए।
  3. वित्तीय नियंत्रण: जनता के कर (Tax) के पैसे का उपयोग कैसे होगा, इसका निर्णय बजट के माध्यम से संसद ही लेती है। “बिना प्रतिनिधित्व के कोई कराधान नहीं” का सिद्धांत यहीं चरितार्थ होता है।
  4. विमर्श का मंच: संसद देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिनिधियों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करने का अवसर प्रदान करती है। यहाँ होने वाली चर्चाएँ जनमत का निर्माण करती हैं।

चुनौतियाँ और वर्तमान परिदृश्य

आज के समय में भारतीय संसद के समक्ष कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। पिछले कुछ वर्षों में संसद की बैठकों के दिनों में कमी आई है। कार्यवाहियों में लगातार होने वाला शोर-शराबा और व्यवधान (Disruptions) चर्चा के स्तर को गिरा देते हैं। इसके अतिरिक्त, महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना विस्तृत चर्चा के पारित करने की प्रवृत्ति लोकतंत्र की ‘मंथन’ वाली भावना को कमजोर करती है। दलीय राजनीति कभी-कभी राष्ट्रीय हितों पर हावी होने लगती है, जो संसदीय मर्यादा के लिए चिंता का विषय है।

संसद की गरिमा और भविष्य

भारतीय लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संसद कितनी प्रभावी ढंग से कार्य करती है। नए संसद भवन (‘सेंसर’ और आधुनिक तकनीक से लैस) का निर्माण इस विश्वास को दर्शाता है कि हम अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं को भविष्य की जरूरतों के साथ जोड़ना चाहते हैं। संसद की गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों की है। स्वस्थ आलोचना और रचनात्मक बहस ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।

निष्कर्ष

संक्षेप में, संसद भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है। यह वह धागा है जो विविधताओं वाले भारत को एकता के सूत्र में पिरोए रखता है। संसद की सार्थकता केवल कानून बनाने में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास को बनाए रखने में है। यदि संसद प्रभावी, पारदर्शी और संवेदनशील बनी रहती है, तो भारतीय लोकतंत्र का भविष्य सदैव उज्ज्वल रहेगा। जैसा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था—”संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह बुरा सिद्ध होगा।” अतः संसद के सदस्यों का आचरण ही लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा है।

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