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क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding)

कुछ समय पहले (4 फरवरी, 2009) राज्य सभा में एक प्रश्न पूछा गया था कि “क्या यह सत्य है कि क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) वर्षा शुरु नहीं करती वरन्‌ वर्षा की मात्रा को बढ़ा देती है?”। इस प्रश्न के जवाब में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने कहा था कि कतिपय परिस्थितियों के रहते हुए उपयुक्त बादल की उपस्थिति में क्लाउड सीडिंग वर्षा की केवल मात्रा को ही नहीं बढ़ाती है वरन्‌ वर्षा शुरू भी करती है। वैसे जब देश में फिलहाल भारी वर्षा हो रही हो तब क्लाउड सीडिंग की चर्चा उतना प्रासंगिक प्रतीत नहीं होता परंतु हकीकत यह है कि कई बार, या यूं कहें कि अधिकांश समय भारत में जल संकट की ही स्थिति बनी रहती है। संकट की यह स्थिति कृषकों के लिए और संकट लेकर आती है क्योंकि उनका जीवन-निर्वाह इसी पर निर्भर है। ऐसे में समय-समय पर “क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding)” के जरिये कृत्रिम वर्षा कराने की बात आती रहती है। आईए जानते हैं कि आखिर क्लाउड सीडिंग है क्या और इसकी प्रक्रिया क्या है?

क्या होती है क्लाउड सीडिंग?

क्लाउड सीडिंग असमर्थ बादलों को बरसने के लिए समर्थ बनाती है अथवा वर्षा निर्माण सामग्री के द्वारा सृजन योग्य बादल से वर्षा में वृद्धि कराने का एक तरीकों हैं। वस्तुत: क्लाउड सीडिंग मौसम संशोधन तकनीक है जो वायुमंडल में संघनित अणु को कुत्रिम तौर पर जोड़कर वर्षा या बर्फ सुजित करने की बादल को क्षमता को बढ़ा देती है। उल्लेखनीय हैं कि बादल, जो कि छोटी-छोटी जल बूंदों या बर्फ क्रिस्टल का बना होता है, का निर्माण तब होता है जब वायुमंडल में जलवाष्प ठंडा होकर धूल या लवण के कणों के आसपास संघनित हो जाता है। इन कणों के बिना, जो कि संघनन अणु कहलाते है, वर्षा की बूंदे या बर्फ की टुकड़ों का निर्माण नहीं हो सकता और वर्षा भी नहीं हो सकती।

कृत्रिम तरीके के बादल से होने वाले वर्षण से वाष्पीकरण का अप्रत्यक्ष प्रभाव पर्यावरण की ताप गतिकीय दक्षता को बढ़ा देता है जिससे ताजे संवहनी बादलों का निर्माण तथा वर्षा में वृद्धि होती है। वर्षा में वृद्धि तथा प्रदूषण घटाने के लिए इसी सिद्धांत का प्रयोग किया जाता है। दो तरह से क्लाउड सीडिंग संभव है – जेनरेटरों एवं राकेटों का प्रयोग करके ‘जमीनी’ तथा विमान का प्रयोग करके ‘हवाई’ सीडिंग। वर्षण अथवा बर्फ की वृद्धि के लिए सृजित किए जाने वाले बादल की किस्म (गर्म या ठंडा) के आधार पर, बादल के आधार में स्प्रे के रूप में लवण का उपयोग करके हाइग्रोस्कोपिक सीडिंग तथा कोल्ड सीडिंग हेतु बादल के ऊपर से सिल्वर आयोडाइड का इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्लाउड सीडिंग पृष्ठभूमि

वैज्ञानिक 1940 के दशक से ही क्लाउड सीडिंग पर प्रयोग कर रहे हैं। इस संबंध में एक प्रयोग 1946 में न्यूयार्क के जनरल इलेक्ट्रिक प्रयोगशाला में किया गया। वहां कई परीक्षणों के उपरांत वैज्ञानिकों को शुष्क कार्बन (जमा हुआ कार्बन डाई ऑक्साइड) को सुपरकूल जल बुंदों में बदलने में सफलता प्राप्त हुयी। इस पर और परीक्षणों के उपरांत वर्षण वृद्धि में भी सफलता मिली। जनरल इलेक्ट्रिक प्रयोगशाला में प्रयोग से जुड़े विंसेंट शेफर को इसका आविष्कार माना जाता है।

वैज्ञानिक अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकीय विकास के परिणामस्वरूप वर्षा वृद्धि में क्लाउड सीडिंग एक लोकप्रिय तरीका उभरकर सामने आया, खासकर विश्व के सर्वाधिक शुष्क क्षेत्रों में जैसे कि यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन, मोरक्को, लीबिया एवं सीरिया में। क्लाउड सीडिंग क्षेत्र में एक डल्लेखनीय+ऑपरेशन चीन द्वारा 2009 में बीजिंग शहर के ऊपर संचालित किया गया। बादमें इंडोनेशिया सरकार ने जंगलों में लगी आग को बुझाने के लिए क्लाउड सीड़िंग का ही सहारा लिया।

सीडिंग की आवश्यकता क्यों?

बादलों की सीडिंग के कारण वर्षा में वृद्धि, बादलों के आकार, बादल में अंतर्निहित जल तथा व्याप्त वायुमंडलीय परिस्थितियों जैसे कई कारकों
पर निर्भर करती है। सीडिंग बादल के अलग-अलग टुकडों में की जा सकती है और कभी-कभी बादलों के समूहों पर भी। उपयुक्त बादलों की उपलब्धता मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। यदि अधिक उपयुक्त बादल उपलब्ध हों तो ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रफल समाहित किया जा सकता है। वैसे, बादलों की सीडिंग से सूखे की स्थिति को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन बादलों की सीडिंग के माधयम से समय रहते कराई गई बारिश भले ही थोड़ी मात्रा में हो, फसलों को नई जिंदगी दे तो सकती ही है। इसी प्रकार यदि लक्षित तरीके से जलग्रहण क्षेत्रों (कैचमेंट एरिया) के ऊपर बादलों की सीडिंग की जाए तो इससे बांधों में जलस्तर बढ़ाने में सहायता मिलती है। चूंकि क्लाउड सीडिंग में, एक बादल के भीतर निहित जल को वर्षा बूदों में रूपांतरित करने की दक्षता बढ़ाना शामिल होता है, नजदीकी बादलों  पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस प्रकार, आसपास के इलाके में वर्षा में कोई कमी नहीं आती है। उष्ण बादलों की सीडिंग के लिए जमीन आधारित तथा राकेट विधियां प्रभावी नहीं होतीं क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि उत्पनन कण बादलों के ऊपरी इलाके तक पहुंचे।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ऐसे प्रयोगों को विशेषज्ञों तथा मौसम संशोधन समिति के मार्गदर्शन में करने की सिफारिश करता है जो मौसम संशोधन (वेदर मॉडिफिकेशन) हेतु प्रोटोकॉल का निर्धारण करता है। वैसे यह अलग-अलग भौगोलिक इलाकों के लिए अलग-अलग है। यदि विश्व मौसम विज्ञान संगठन के साथ-साथ स्थानीय प्रोटोकॉल का पालन किया जाए तो इस कार्यक्रम की सफलता बढ़ जाती है। भारत में ऐसे कार्यक्रमों की योजना पूरे मानसून मौसम के लिए बनाई जानी चाहिए ताकि सीडिंग के प्रचुर अवसर उपलब्ध हो सकें तथा फसलों के विकास के लिए समय से जल उपलब्ध हो।

क्लाउड सीडिंग की अवसंरचना

सीडिंग प्रक्रिया के लिए एक मौसम राडार, टेलीमेट्री युक्त विमान तथा तूफान पर नजर रखने वाला टाइटन साफ्टवेयर युक्त कंप्यूटर की आवश्यकता होती है। क्लाउड सीडिंग के विभिन्‍न घटकों में निम्नलिखित शमिल हैं:

सी-बैंड राडार : यह राडार सीडिंग क्षेत्र तथा उसके आसपास के एक कि.मी. क्षेत्र को मॉनीटर करता है।

सीडर और शोध विमान : सीडर विमान अपने पंखों पर लगी रैक पर रखी फ्लेयर्स की मदद से बादल के आधार को सीड करता है। इन फ्लेयर्स को ज्वलित करने के बाद होने वाले उत्सर्जन से आर्द्रताग्राही कण पैदा होते हैं जिन्हें बादल आधार के निचले हिस्से में, जहाँ प्रबल ऊर्ध्वाधर गति मौजूद होती है, समाहित किया जाता है। सीड किए गए प्लम जब बादल के भीतर प्रवेश करके विकसित हो-जाता हैल्तब आकार, द्रव्यमान, बादल की बूंदों एवं वर्षा बूंदों की संख्या को मापने के लिए शोध विमात द्वारा कई उपकरणों का प्रयोग किया जाता हैं। राड़ार बादल: कें समग्र गुणधमों एवं बादल से जुड़ी गतिकी को मॉनीटर करता है। इसके बाद बादल को ट्रैक किया जाता है तथा उससे जुड़े सभी लक्षणों का मूल्यांकन किया जाता है। क्षेत्र में हुई वर्षा को दर्ज करने तथा राडार प्रेक्षणों के सत्यापित करने हेतु जमीन पर अतिरिक्त वर्षा मॉनीटरन नेटवर्क होते हैं।

क्लाउड सीडिंग का तरीका

ऐरोसॉल कण निचले वायुमंडल में बादल बूंदों के निर्माण के लिए सीड्स का निर्माण करते हैं। बादल कणों का यह एकत्रण वायुमंडल में निलंबित ऐरोसॉल कणों के आकार एवं रासायनिक अभिलक्षणों पर निर्भर होता है। ऐरोसॉल की संरचना, जैसे कि धूल, कार्बनमय कण अथवा सल्फेट के आधार पर बादल संघनन न्यूक्ली निर्माण की आर्द्रताग्राहिता (वायुमंडल में जलवाष्प की ऐरोसॉल कण पर संघनित होने की क्षमता) में बदलाव आ सकता है।

ऐरोसॉल की बर्फ निर्माण क्षमता उसकी क्रिस्टलीय प्रकृति पर निर्भर करती है। क्लाउड सीडिंग में, बादल के ऊपरी अथवा निचले हिस्से पर वितरण हेतु सिल्वर आयोडाइड अथवा अन्य आर्द्रताग्राही कणों का इस्तेमाल किया जाता है। वितरित आर्द्रताग्राही कण बादल के उष्ण अथवा शीत क्षेत्र (शून्य डिग्री तापमान से नीचे) के अभिलक्षणों को बदल सकते हैं। इस प्रकार कण बादल संघनन न्यूक्ली प्रदान करते हैं तथा बादल बूंद पर जल के संघनन द्वारा विकसित होते हैं। अन्ततोगत्वा वर्षा की बूंद बनाने के लिए और बादल के छोटे-छोटे आकार इकट्ठा करके आकार में कुछ मिलीमीटर और बड़े हो जाते हैं जो वर्षण के रूप में नीचे गिरते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश जैसे भारत के कई राज्य पानी की कमी दूर करने के लिए ऑपरेशनल क्लाउड सीडिंग करते रहे हैं। वैसे सीडिंग के लिए कोई निर्धारित प्रोटोकॉल नहीं है और आम सहमति भारतीय ऊष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान द्वारा 1970 के दशक में किए गए प्रयोगों के परिणामों पर आधारित हैं। हालांकि बढ़ी हुई मानव गतिविधियों के कारण पार्टिकुलेट एवं उनकी संरचना में बदलाव आया है। इसलिए विमानवाहित उपकरणों पर आधुनिक प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करके बादलों एवं वर्षण पर प्रभावों की जाँच तथा क्लाउड सीडिंग के लिए और अधिक सटीक प्रोटोकॉल बनाने की जरुरत है।

केपिक्स पहल

क्लाउड-ऐरोसॉल पर संपूर्ण क्षमता निर्माण की दिशा में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने बादल-ऐरोसॉल अंतः्क्रिया एवं वर्षण वृधि) प्रयोग (Cloud Aerosol Interaction and Precipitation Enhancement Experiment: CAIPEEX) की शुरुआत की हैं। बादल-ऐरोसॉल एवं वर्षण प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए भारत का यह पहला प्रयोग है जिसका उद्देश्य है : एयरोसॉल-बादल-वर्षण अंतःक्रियाओं की भौतिकी एवं गतिकी को संबोधित करना तथा, बादल-सीडिंग प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करके वर्षा निर्माण एवं वर्षा वृद्धि के लिए एक वैज्ञानिक आधार तैयार करता। बादल-ऐरोसॉल अंत: क्रिया एवं वर्षण वृद्धि प्रयोग का उद्देश्यय मार्नसूती बॉदलों, कबॉदल बुँदीं एँबें वर्षा बूंद निर्माण के आधार तथा ऐरोसॉल प्रदूषण द्वारा इन प्रक्रियाओं को प्रभावित करने के तरीके की जाँच-पड़ताल करना है।

क्लाउड सीडिंग के दुष्प्रभाव

क्लाउड सीडिंग सूखा की स्थिति से निपटने में सहायक हो सकती है, परंतु इसके कुछ अपने दुष्प्रभाव हैं। एक तो यह प्राकृतिक प्रणाली के साथ छेड़छाड़ है जिसके भविष्य में कई दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। वर्ष 2009 में बीजिंग शहर के ऊपर क्लाउड सीडिंग से कृत्रिम वर्षा के कारण तापमान में अचानक गिरावट आ गई। इससे राजमार्ग व सड़के बंद हो गयीं जिसके परिणामस्वरूप बीजिंग में यातायात प्रभावित हुआ। इससे पूर्व 1947 में अमेरिका में पूर्वी तट के हरिकेन में 102 किलोग्राम का शुष्क बर्फ सीड किया गया जिसकी वजह से जॉर्जिया में काफी क्षति हुयी। इसके लिए जनरल इलेक्ट्रिक पर क्षतिपूर्ति का मुकदमा भी चलाया गया। युद्ध के दौरान अनैतिक नीति अपनाने के आरोप भी इस पर लगते रहे हैं। जैसे कि अमेरिका पर आरोप लगाया गया कि उसकी सेना ने वियतनाम युद्ध के दौरान हो ची मिन्ह ट्रायल के ऊपर क्लाउड सीडिंग के जरिये वर्षा कराया जिसे ‘ऑपरेशन पोपेये’ कहा गया।

 

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