Mitti ka Nirman

मृदा और इसका निर्माण

मृदा, जैव तथा अजैव पदार्थों की एक परिवर्तनशील और विकासशील पतली परत है, जो भूपृष्ठ को ढके हुए है। यह वानस्पतिक आवरण को बनाए रखने में मदद देती है। इसमें विभिन्न परतें होती हैं, जो मूल शैल में भौतिक, रासायनिक और जैविक अपक्षय की प्रक्रियाओं द्वारा बनती हैं। मृदा निर्माण के कारक मृदा निर्माण को नियन्त्रित करने वाले पाँच कारकों में मूल शैल, उच्चावच, समय, जलवायु तथा जैविक तत्व शामिल हैं। पहले तीन कारकों को निष्क्रिय कारक तथा अन्तिम दो कारकों को क्रियाशील कारक कहते हैं। आधारी शैल तथा तलवायु मृदा निर्माण के दो महत्वपूर्ण कारक हैं, क्योंकि ये अन्य कारकों को प्रभावित करते हैं।

मृदा निर्माण के कारक (Due to Soil Construction)

Due to Soil Construction

1. मूल शैल

मृदा अपने नीचे स्थित विभिन्न खनिजों से युक्त शैल या मूल शैल पदार्थों से निर्मित होती है। मूल शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती है, तथा भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा अपघटित हो जाती है। इससे मृदा के अजैव खनिज कणों का निर्माण होता है। मूल शैल मृदा निर्माण में लगने वाले समय, उसके रासायनिक संघटन, रंग, गठन, बनावट खनिज अंश तथा उर्वरता को भी प्रभावित करती

2. उच्चावच

किसी क्षेत्र की स्थलाकृति मूल शैल पदार्थों के अपरदन की मात्रा तथा वहां बहने वाले जल की गति को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार मृदा निर्माण में सहायक प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उच्चावच से प्रभावित होती हैं। तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में जल तेजी से बहता है। इसके विपरीत मन्द ढालों पर जल की गति धीमी होती है। इसलिए तीव्र ढालों वाले क्षेत्रों की भूमि में पानी का रिसाव कम होता है, जिससे मृदा निर्माण की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। तीव्र ढालों पर अपरदन अधिक तेजी से होता है। इससे मृदा निर्माण में बाधा पड़ती है। यही कारण है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पतली परत वाली कम उपजाऊ मृदा का निर्माणा होता है। मैदानी क्षेत्रों में पूर्ण विकसित उपजाऊ मृदा का निर्माण होता है।

3. समय

मृदा का निर्माण बहुत धीरे-धीरे होता है। पूर्ण रूप से विकसित मृदा का निर्माण तभी होता है; जब भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएँ बहुत लंबे समय तक कार्य करती हैं।

4. जलवायु

मृदा निर्माण की प्रक्रिया में जलवायु सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारक है। जलवायु न केवल समय की लंबी अवधि में मूल शैल पदार्थों के कारण मृदा में उत्पन्न अन्तरों को कम करती है; अपितु मृदा में होने वाली जैविक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करती है। इस कारण एक प्रकार की जलवायु वाले प्रदेशों में दो विभिन्न प्रकार के मूल शैल पदार्थों के द्वारा एक ही प्रकार की मृदा का निर्माण होता है।

उदाहरण के लिए राजस्थान की शुष्क मरुस्थलीय जलवायु में बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से एक ही प्रकार की बलुई मृदा का निर्माण हुआ है। इसके विपरीत दो भिन्न जलवायु प्रदेशों में एक ही प्रकार के मूल शैल पदार्थों से दो भिन्न प्रकार की मृदाओं का विकास होता है। उदाहरण के लिए रवेदार ग्रेनाइट शैल पदार्थों से मानसूनी जलवायु प्रदेशों में जहाँ लेटेराइट मृदा का निर्माण हुआ है, वहीं उपार्दै प्रदेशों में लेटेराइट से भिन्न मृदाओं का निर्माण हुआ है।

5. वनस्पति तथा जीव

मूल शैल पदार्थों पर विकसित मृदा की गुणवत्ता में वहाँ के पेड़-पौधे तथा जीवजन्तुओं की सक्रिय भूमिका होती हैं। मृत पेड़-पौधों तथा जीवजन्तुओं से मृदा का जैविक अंश बनता है। अपघटन व जैविक प्रक्रियाओं के सहयोग से जैव पदार्थ ह्यूमस के रूप में बदल जाते हैं। ह्यूमस से ही मृदा उपजाऊ बनती है। इसके द्वारा मृदा की जल धारण करने की क्षमता में वृद्धि होती है। मृदा इसी जैविक पदार्थ के द्वारा वनस्पति का पोषण करती है। इसके बदले में वनस्पति का आवरण मृदा की ऊपरी उपजाऊ परत की अपरदन से रक्षा करती है। वनस्पति का आवरण वर्षा के जल को बहने से रोकता है और उसे मृदा की निचली परतों में रिसने के लिए मजबूर करता है। इस आवरण से मृदा की नमी का वाष्पीकरण भी कम होता है। इस प्रकार उपजाऊ और विकसित मृदा बनने में सहायता मिलती है।

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