GM Technology in Indian Agriculture Innovation, Risks and the Need for Balanced Policy

भारतीय कृषि में GM तकनीक: नवाचार, जोखिम और संतुलित नीति की अनिवार्यता

December 6, 2025

भारत में GM (Genetically Modified) फसलों पर बहस नवाचार, खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और पर्यावरणीय जोखिम के चौराहे पर खड़ी है। प्रारंभिक सफलता के बाद चुनौतियाँ उभरीं, जिससे वैज्ञानिक मूल्यांकन, पारदर्शी विनियमन और सार्वजनिक विश्वास प्रमुख कारक बन गए। लेख GM तकनीक को अवसर, जोखिम और विवेकपूर्ण उपयोग के संतुलन के रूप में प्रस्तुत करता है।

खाद्य सुरक्षा से किसान कल्याण तक: भारत में GM फसलों का भविष्य क्या हो सकता है?

परिचय: भारत में GM फसलों पर पुनर्विचार का संदर्भ

भारत में कृषि क्षेत्र लगातार उन दबावों का सामना कर रहा है जो खाद्य सुरक्षा, किसान आय, जलवायु अनिश्चितता और उत्पादकता के सुधार से जुड़े हैं। इस पृष्ठभूमि में GM तकनीक एक संभावित समाधान, साथ ही विवाद का विषय भी बनी हुई है। लेख इस तकनीक की उपयोगिता, जोखिम, नियमन और सामाजिक स्वीकार्यता को बहुपक्षीय दृष्टि से परखता है। लेखक स्पष्ट करता है कि आज प्रश्न यह नहीं है कि GM तकनीक काम करती है या नहीं, बल्कि यह कि भारत इसे कितनी वैज्ञानिकता, पारदर्शिता और जनविश्वास के साथ अपनाता है।

इस वर्ष के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार में इस बात की पुष्टि हुई कि भविष्य का आर्थिक विकास नवाचार-चालित मॉडल पर निर्भर करेगा। कृषि भी इसका अपवाद नहीं है। GM तकनीक नवाचार का एक रूप होने के कारण नीति-निर्माताओं के सामने अवसर और जोखिम दोनों प्रस्तुत करती है। GM फसलों का वास्तविक प्रभाव प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि खेतों में किसानों की आजीविका और पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य पर दिखाई देता है।

भारत में GM फसलों की संवैधानिक व नियामक पृष्ठभूमि

भारत में Genetic Engineering Appraisal Committee (GEAC), जो पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत है, GM फसलों को मंजूरी देने वाली शीर्ष संस्था है। यह संस्था:

  • बायोसुरक्षा मूल्यांकन
  • बहु-स्थलीय फील्ड ट्रायल्स
  • पर्यावरणीय जोखिम आकलन
  • सार्वजनिक परामर्श

जैसे चरणों के बाद ही किसी GM फसल को व्यावसायिक उपयोग हेतु अनुमोदन देती है। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारें अंतिम मंजूरी प्रदान करती हैं, जिससे संघीय संरचना के तहत केंद्र–राज्य संबंध GM फसल नीतियों को प्रभावित करते हैं। तथापि, आलोचना यह है कि भारत में नियामक संरचना धीमी, सतर्क और कभी-कभी राजनीतिक रूप से प्रभावित होती है। उदाहरणस्वरूप:

  • Bt बैंगन को 2009 में GEAC से मंजूरी मिली, किंतु सार्वजनिक विरोध के बाद अनिश्चितकालीन स्थगन लागू कर दिया गया।
  • GM सरसों (DMH-11), जिसे भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया, ने सुरक्षा मूल्यांकन पार कर लिया है, लेकिन अंतिम स्वीकृति अभी भी लंबित है।

यह सावधानी एक ओर सुरक्षा सुनिश्चित करती है, पर दूसरी ओर नवाचार को धीमा भी करती है, जिससे भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकता है।

Bt कपास: भारत की GM यात्रा की शुरुआत और उसके परिणाम

भारत में GM फसलों का वास्तविक अध्याय सन् 2002 में Bt कपास के व्यावसायिक उपयोग की मंजूरी से शुरू हुआ। इसमें Cry1Ac जीन (जो अमेरिकन बॉलवर्म के खिलाफ प्रतिरोध प्रदान करता है) को भारतीय हाइब्रिड किस्मों में जोड़ा गया था।

शुरुआती सफलता के तथ्य

  • Bt कपास अपनाने के बाद उत्पादन 6 क्विंटल/हेक्टेयर से बढ़कर 2013 तक 16 क्विंटल/हेक्टेयर हुआ।
  • कीटनाशक उपयोग में गिरावट आई।
  • कई किसानों की आय में वृद्धि हुई।
  • 10 वर्षों में Bt कपास 90% से अधिक कपास क्षेत्र में फैल गया।

इन सभी संकेतकों ने GM तकनीक को एक अभूतपूर्व कृषि नवाचार के रूप में स्थापित किया।

सफलता की गिरावट: कीट प्रतिरोध, लागत वृद्धि और किसानों की चिंता

Bt कपास की सफलता स्थायी नहीं रही। समय के साथ:

1. पिंक बॉलवर्म का प्रतिरोध विकसित होना

  • पिंक बॉलवर्म ने Bt टॉक्सिन के प्रति प्रतिरोध क्षमता विकसित कर ली।
  • किसानों को पुनः भारी मात्रा में कीटनाशक उपयोग करने पड़े।
  • लागत बढ़ी, लाभ कम हुआ और प्रारंभिक लाभांश समाप्त हो गया।

2. बीज कीमतों और IPR विवादों ने बहस तेज की

  • GM बीज महंगे थे, और बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) को लेकर विवादों ने किसानों में असंतोष पैदा किया।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस गहरी हुई।

3. वर्षा आधारित क्षेत्रों में असफल प्रयोग

भारत में सार्वजनिक क्षेत्र ने इंडिजिनस Bt हाइब्रिड विकसित करने की कोशिश की, परंतु शुष्क व अनिश्चित वर्षा वाले क्षेत्रों में ये किस्में अनुकूलन नहीं कर सकीं। यहाँ महत्वपूर्ण है कि किसान संकट को केवल GM तकनीक से जोड़ना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं। शोध इंगित करता है कि संकट की जड़ें:

  • बाजार अस्थिरता
  • कृषि ऋण संरचना
  • बीमा की कमी
  • गैर-तकनीकी जोखिम

जैसे व्यापक प्रणालीगत कारणों में भी छिपी थीं।

अगली पीढ़ी की GM तकनीक की आवश्यकता और बाधाएँ

वर्तमान चुनौतियों के आलोक में भारत को स्टैक्ड जीन, हर्बिसाइड टॉलरेंट (HT) फसलें, और बहु-कीट प्रतिरोधी किस्में चाहिए। किंतु मंजूरी प्रक्रिया धीमी है। इसका प्रभाव निम्न प्रकार से परिलक्षित होता है:

अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा पर प्रभाव

  • ब्राज़ील, अर्जेंटीना और यूक्रेन में GM मक्का की औसत पैदावार 6,045 किग्रा/हेक्टेयर है, जबकि भारत की पारंपरिक मक्का पैदावार 2,703 किग्रा/हेक्टेयर है।
  • ब्राज़ील में GM गन्ना उत्पादकता को बढ़ाकर 101,157 टन/प्रति फैक्ट्री कर देता है, जो भारत के 52,336 टन (गैर-GM) की तुलना में लगभग दोगुना है।

इससे स्पष्ट है कि GM तकनीक न अपनाने की अवसर लागत बड़ी है।

सार्वजनिक धारणा: विज्ञान, संस्कृति और विश्वास का त्रिकोण

GM फसलों पर जनमत भारत में तीव्र रूप से विभाजित है। इसके प्रमुख कारण:

वैज्ञानिक विमर्श बनाम सांस्कृतिक संवेदनशीलता – एक वर्ग GM तकनीक को कृषि के आधुनिकीकरण का उपकरण मानता है, जबकि दूसरा:

  • दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव
  • जैव विविधता पर अनिश्चित जोखिम
  • परंपरागत कृषि पर कथित खतरा

को लेकर चिंतित रहता है।

मीडिया का प्रभाव – GM फसलों पर प्रस्तुतियाँ अक्सर ध्रुवीकृत होती हैं, जिससे जन-चर्चा वैज्ञानिक जानकारी से दूर हो सकती है।

विश्वास का संकट – यदि किसानों और आम जनता को लगता है कि निर्णय उद्योग-हित से प्रेरित हैं, तो GM तकनीक को स्वीकृति आसानी से नहीं मिलेगी। इसलिए:

  • भागीदारी-आधारित नियमन,
  • पारदर्शी डेटा,
  • स्वतंत्र वैज्ञानिकी समीक्षा,
  • व्यापक किसान प्रशिक्षण,

बेहद आवश्यक हैं।

GM तकनीक: खतरा नहीं, एक उपकरण—लेकिन उपयोग का तरीका महत्वपूर्ण

GM तकनीक को सकारात्मक/नकारात्मक दो श्रेणियों में देखना गलत है। यह एक औजार (Tool) है, और इसकी उपयोगिता इस पर निर्भर करेगी कि:

  • इसे कौन नियंत्रित करता है?
  • किसान इसकी लागत वहन कर सकते हैं या नहीं?
  • पारिस्थितिकी पर इसके प्रभावों को कितना गंभीरता से परखा जाता है?
  • किस हद तक नियमन पारदर्शी और वैज्ञानिक है?

इस प्रकार GM फसलें भारत के लिए अवसर हैं, पर उनके विवेकपूर्ण उपयोग की पूर्व शर्त विज्ञान-आधारित नीति और जनविश्वास है।

खाद्य सुरक्षा, किसान आय और पारिस्थितिकी: संतुलन की चुनौती

भारत को GM तकनीक पर निर्णय इन तीनों स्तंभों के बीच संतुलन बनाकर करना होगा:

खाद्य सुरक्षा – भारत की बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए:

  • अधिक उत्पादन,
  • सूखा-सहनशील किस्में,
  • कीट-प्रतिरोधी फसलें

आवश्यक होंगी—जिसमें GM तकनीक मदद कर सकती है।

किसान आय में सुधार – GM फसलें यदि सही परिस्थितियों में अपनाई जाएँ, तो:

  • इनपुट लागत घटा सकती हैं
  • उत्पादकता बढ़ा सकती हैं
  • आय स्थिर कर सकती हैं

लेकिन गलत रणनीति स्थिति उलट भी सकती है, जैसा कि Bt कपास के बाद के वर्षों में देखा गया।

पारिस्थितिकीय सुरक्षा – GM फसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर अनुसंधान अभी भी जारी है, इसलिए:

  • बफर ज़ोन
  • रिफ्यूजिया प्रणाली
  • कीट प्रतिरोध प्रबंधन
  • पोलनेशन-रूट मॉनिटरिंग

जैसे कदम अनिवार्य होने चाहिए।

आगे की राह (Path to Solution): क्या किया जाना चाहिए?

  • नियामक सुधार – GEAC की प्रक्रिया को वैज्ञानिक, समयबद्ध और पारदर्शी बनाना होगा।
  • सार्वजनिक विश्वास पुनर्निर्माण – डेटा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध होना चाहिए।
  • स्वदेशी R&D को बढ़ावा – भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप GM किस्में विकसित करनी होंगी।
  • किसान प्रशिक्षण – GM फसलों के सही उपयोग, जोखिम और प्रबंधन पर व्यापक शिक्षा आवश्यक है।
  • सार्वजनिक–निजी संतुलन – IPR और लागत संबंधी चिंताओं को नीति-स्तर पर हल करना होगा।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की तैयारी – GM आधारित उत्पादकता सुधार भारत को वैश्विक कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगा।

निष्कर्ष (Conclusion)

भारत को GM तकनीक को न तो अंध-समर्थन से अपनाना चाहिए, न ही भय के कारण अस्वीकार करना चाहिए। समाधान विज्ञान, नीति और सामाजिक विश्वास के त्रिकोणीय संतुलन में है। GM एक उपकरण है—उसका मूल्य उसके उपयोग पर निर्भर करेगा।

📌 UPSC / State PCS के संभावित परीक्षा प्रश्न

GS Paper I (Essay Paper)

  • “जीएम प्रौद्योगिकी और भारतीय कृषि का भविष्य: वादा, जोखिम और संतुलन की खोज।”
  • “नवाचार बनाम सावधानी: भारत के जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में नैतिक और नीतिगत दुविधाएँ।”
  • “आनुवंशिक संशोधन के युग में खाद्य सुरक्षा: एक विकासशील लोकतंत्र के सामने चुनौतियाँ।”

GS Paper II (Governance & Policy)

  • “भारत में जीएम फसलों के नियमन में GEAC की भूमिका और सीमाओं की विवेचना कीजिए।”
  • “सार्वजनिक विश्वास की कमी जीएम प्रौद्योगिकी को नीति-निर्माण में किस प्रकार प्रभावित करती है?”

GS Paper III (Science & Technology / Agriculture)

  • “Bt कपास के अनुभव से भारत जीएम फसलों के भविष्य के लिए क्या सीख सकता है? विश्लेषण कीजिए।”
  • “जीएम मक्का और गन्ने पर वैश्विक उत्पादकता आंकड़ों के संदर्भ में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति का मूल्यांकन कीजिए।”
  • “जीएम फसलों की कृषि-परिस्थितिकीय चुनौतियों और उनके समाधान के उपायों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।”

 

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